
अश्लेषा
“बेटा छोड़ना सीखो, यदि किसी की बात बुरी या कड़वी भी लगती है, तो उसे छोड़ दो. ये तुम्हारे ही भले के लिए है. मन जितना हल्का होगा जीवन उतना ही आसान और आनंद से भर जाएगा...”
पूरब की तरफ़ हल्की लालिमा के साथ ही भोर का सुनहरा उजास धरा पर छाने लगा था. पेड़ों पर पंछी चहचहा रहे थे. पार्क में लोग मॉर्निंग वॉक पर आने लगे थे. नरम दूब पर ओस की बूंदें झिलमिला रही थीं. प्रकाश ने चप्पलें उतार कर पैर घास पर रख दिए, एक शीतलता तलवों से मस्तिष्क तक सुकून दे गई. उन्होंने एक गहरी सांस ली शुद्ध हवा में. कॉलोनी से थोड़ी दूर यह पार्क बना हुआ था. काफ़ी बड़ा था, जिसमें आसपास से बहुत से लोग सुबह-शाम पैदल घूमने या एक्सरसाइज़ करने आते थे. प्रकाश भी रोज़ सुबह ताज़ी हवा में सैर करने आते. जगह-जगह बैंच भी लगी हुई थी, जब थक जाते तो थोड़ी देर बैठ जाते.
उनकी बेटी की ससुराल भी पास में ही थी. वो भी सुबह सैर करने आती. इसी बहाने प्रकाश रोज़ उससे मिल भी लेते और बातें भी कर लेते. लेकिन पिछले कुछ दिनों से रचना को लेकर वे चिंतित हो रहे थे. साल भर भी नहीं हुआ है उसकी शादी को और अभी से रिश्ते उसे जंजाल लगने लगे हैं. रोज़ उसके पास किसी न किसी की शिकायतें रहतीं. कभी सास की, कभी ससुर की, कभी शहर में ही रहनेवाली विवाहिता ननद की. छोटी-छोटी बातों को मन से लगा बैठती है. छुटपुट बातें और ग़लतफ़हमियां हर घर में होती हैं, लेकिन रचना हर बात को मन से लगा लेती है और सिर पर रखे रहती है.
प्रकाश जानते हैं कि उसके ससुराल वाले सुलझे हुए सभ्य लोग हैं. कहीं न कहीं रचना की अपेक्षाएं ही बहुत अधिक हैं, अभी वो रिश्तों में सामंजस्य नहीं बिठा पा रही है. लेकिन यदि सीधे-सीधे उससे यह कह दे, तो हो सकता है वो आहत हो जाए, सोच बैठे कि माता-पिता भी पराए हो गए हैं, उसे समझते नहीं हैं. हो सकता है कभी आगे सच में बड़ी बात हो जाए, तो बोल नहीं पाए. प्रकाश इसी सोच में डूबे रहते आजकल. क्या करें, कैसे समझाएं बेटी को कि वह समझ भी जाए और उसके मन में अपने माता-पिता से दूरी भी न आए. चौबीस साल की ही तो है अभी. उतनी परिपक्व भी नहीं है ये उम्र. रचना की मां निर्मला भी सहानुभूति दिखाने की आड़ में थोड़ा सा समझाती रहती है उसे. प्रकाश ने गहरी सांस ली. ऐसा ही स्वभाव और सोच रही रचना की, तो ख़ुद ही अपना जीवन बोझिल बना बैठेगी.

तभी रचना आ गई. सुबह सवेरे के इस सुकूनभरे समय में भी चेहरा तनाव से भरा हुआ था उसका. आते ही शुरू हो गई, “पता है उन्हें कि मैं इस समय घूमने आती हूं और आप यहां मेरी प्रतीक्षा करते हैं तब भी ज़बर्दस्ती चाय बना दी मेरी भी और ज़िद करके पिलाई. पंद्रह मिनट ख़राब कर दिए मेरे. सुबह से ही मूड ख़राब कर दिया. उस पर दोपहर को दीदी फिर आ रही हैं. पिछले हफ़्ते ही तो आई थीं. अब बार-बार क्यों आना. हर समय बस सबकी चाकरी में ही लगे रहो. मैं तो परेशान हो गई हूं पिताजी. मन करता है सुदीप से कहूं अलग घर ले लो. स्वतंत्रता से तो रहूंगी.”
प्रकाश स्तब्ध रह गए. रचना बात को इतना बढ़ा देगी, ये तो उन्हें उम्मीद नहीं थी. छोटी सी बात को भी हफ़्तों तक सोचती रहेगी. कितना अच्छा ससुराल मिला है, कितने सज्जन और सीधे सरल लोग हैं तब भी ये लड़की...
लेकिन अब कुछ करना ही होगा उन्हें. रचना हद से आगे बढ़ रही है. कहीं अलग होने की बात इसके मुंह से निकल गई, तो फिर जीवनभर के लिए रिश्तों में दरार पड़ जाएगी. मन हुआ कि बेटी से कहें कि चाय तो सवेरे की उसे बना कर देनी चाहिए, वो तो किया नहीं, सास ने बनाकर स्नेहवश पिला दी, उसमें भी इसे परेशानी है. लेकिन सुबह-सुबह के इस सुहावने समय में उन्होंने बात को वहीं विराम दे दिया और दोनों उठ कर पार्क के चक्कर लगाने लगे. रोज़ मिलने वाले लोग मुस्कुराकर अभिवादन कर रहे थे, आसपास खिले फूल हवा में झूम रहे थे, पंछियों की मधुर कलरव मन को आनंद दे रही थी. मगर रचना के मन तक कुछ नहीं पहुंच रहा था. बेवजह के तनाव के कारण उसने जीवन की छोटी-छोटी ख़ुशियां भी खो दी हैं. किसी अच्छी बात की तरफ़ नज़र ही नहीं जा रही है उसकी, कोई अच्छाई नहीं दिखती कहीं. हर बात बुरी ही लगती है.
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दूसरे दिन प्रकाश पार्क पहुंचे, तो उनके पास एक झोला भी था. रचना आई तो उन्होंने झोला उसे पकड़ा दिया.
“ये क्या है पिताजी, यहीं रख दीजिए न. पास में ही तो घूम रहे हैं कोई ले थोड़े ही न जाएगा.” रचना बोली.
“नहीं-नहीं इसे छोड़ा नहीं जा सकता. बहुत ज़रूरी सामान है इसमें. इसे ले चलना पड़ेगा.” प्रकाश ने कहा.
रचना ने झोला उठाकर कंधे पर टांग लिया. झोला बहुत ही भारी था. उससे बड़ी मुश्किल से चला जा रहा था. एक कंधा दुखने लगता, तो दूसरे पर टांग लेती. तब भी एक चक्कर में ही उसका दम फूल गया.
“पिताजी थोड़ी देर बैठ जाएं क्या, अब चला नहीं जा रहा. ऐसा लग रहा है जैसे पत्थर भरे हैं इसमें.” हांफ कर रचना पास वाली बैंच पर बैठ गई.
“हां इसमें पत्थर ही भरे हैं.” प्रकाश ने झोले में से पत्थर निकाल कर बैंच के नीचे रख दिए.
“आपने झोले में पत्थर भर कर मुझसे उठवाए, लेकिन क्यों पिताजी?” रचना ने आश्चर्य से पूछा.
“इसका उत्तर मैं तुम्हें कल दूंगा बेटी.” प्रकाश ने कहा.
दूसरे दिन फिर प्रकाश के पास एक झोला था. रचना ने शंकित होते हुए झोला उठाया, मगर आज झोला एकदम हल्का था. उस पर उसमें से भीनी-भीनी सुगंध आ रही थी. वह आराम से घूमने लगी. प्रकाश ने दो बार उससे पूछा कि वह थक तो नहीं गई, बैठना तो नहीं चाहती.
“नहीं पिताजी इसमें तो बिल्कुल भार नहीं है. मुझे नहीं बैठना, मैं थकी नहीं हूं.” रचना कहती.
जब घूमना हो गया तब प्रकाश ने रचना से थोड़ी देर बैंच पर बैठने को कहा. दोनों बैठ गए. प्रकाश ने झोला खोलकर दिखाया. उसमें गुलाब और मोगरे के फूल थे. उनकी भीनी-भीनी ख़ुशबू हवा में फैल गई.
“जानती हो यह झोला हमारे मन जैसा है. शिकायतों, किसी के तानों, बुरे बर्ताव, कड़वी बातों, ग़लतफ़हमी के पत्थर इसमें भर लो, तो यह भारी हो जाता है और फिर हमारे जीवन की गति धीमी हो जाती है. कल तुम कितना थक गई थी इसे उठाकर चलते हुए जब इसमें पत्थर भरे थे.” प्रकाश बोले.
“पत्थर भरे होंगे तो भारी तो हो ही जाएगा, तब उठाने वाले का थक जाना स्वाभाविक है पिताजी.” रचना बोली.
“इसी तरह मन के झोले में सबके प्रति छोटी-छोटी बातों के लिए भी शिकायतों के पत्थर भर कर रखोगी, तो वह भी भारी हो जाएगा और जीवन यात्रा उसके बोझ से थकावट भरी हो जाएगी. इस थकावट के कारण तुम जीवन के सहज आनंद से भी वंचित हो जाओगी बेटा. कभी-कभी लोग और घटनाएं उतनी बुरी नहीं होतीं, हमारा दृष्टिकोण ग़लत हो जाता है उनके प्रति. तुम एक बात को पकड़ लेती हो, तो उसे छोड़ ही नहीं पाती, उसी के बोझ तले घुटती रहती हो. जबकि तुम ख़ुद भी शांति से बैठकर सोचोगी, तो पाओगी कि वे बातें तो बिल्कुल साधारण सी थीं. उनका तो जीवन में कोई महत्व ही नहीं था.” प्रकाश ने रुक कर सांस ली.
रचना चुपचाप एक गुलाब का फूल पकड़े उसे देख रही थी.
“हम अक्सर ही बेकार की बातों के पत्थरों को लादकर जीवन को भारी बना लेते हैं. तुम भी यही कर रही हो. कल तुम सास के चाय के लिए रोकने को लेकर भुनभुना रही थी जबकि ये कर्तव्य तो तुम्हारा है कि तुम उन्हें चाय बनाकर देती. इतना व्यर्थ का बोझ कंधों पर ढोती रहोगी तो जीवन का सफ़र बहुत कठिन हो जाएगा. जबकि आज झोला वही है, लेकिन क्योंकि उसमें फूल रखे थे, तो उनकी सुगंध और भारहीनता ने न कंधे दुखाए न तुम्हें थकाया.” प्रकाश बोले.
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रचना के हाथ को थामकर उन्होंने उसकी हथेली को थपथपाया, “बेटा छोड़ना सीखो, यदि किसी की बात बुरी या कड़वी भी लगती है, तो उसे छोड़ दो. ये तुम्हारे ही भले के लिए है. मन जितना हल्का होगा, जीवन उतना ही आसान और आनंद से भर जाएगा.
और लोगों की अच्छाई और उनसे जुड़ी अच्छी बातों को मन के झोले में सहेज कर रखोगी, तो वे इन फूलों की तरह जीवन को महकाते रहेंगे. तुम भी सबका आनंद ले पाओगी. फेंक दो ख़ुद को थकाने वाले पत्थर मन के झोले से निकाल कर. कुछ अच्छी बातें भी होंगी, उन्हें सहेजकर रखो. थोड़ा अपने विचार, रिश्तों के प्रति अपना नज़रिया बदल कर देखो. मुझे विश्वास है मेरी समझदार बेटी मेरी बात पर ज़रूर अमल करेगी.”
प्रकाश ने झोले में से सारे फूल निकालकर उसके हाथों में रख दिए.
उस दिन रचना घर वापस आते हुए पिताजी की कही बातें सोचते हुए ही आई. घर पहुंची तो देखा ससुर जी चप्पल पहनकर उसे ढूंढ़ने ही आ रहे थे. वे देर हो जाने के कारण उसके लिए चिंतित थे. ऐसी बातों पर पहले रचना खीज जाती थी. उसे लगता कि इन लोगों को उसका ज़रा देर सुकून से सुबह का टहलना भी नहीं सुहाता, तुरंत सवाल करने लगते हैं, लेकिन आज उसके मन में पिताजी की बातें घूम रही थीं.
“यूं ही पिताजी से बातें कर रही थी. ये लीजिए उन्होंने पूजा के लिए फूल भेजे हैं.” उसने फूल ससुर जी को दे दिए.

“अरे वाह मोगरा और गुलाब, आज तो पूजा में आनंद आ जाएगा. कल उन्हें मेरी ओर से धन्यवाद कह देना.” ससुर जी ख़ुशी-ख़ुशी बोले.
रचना देख रही थी ज़रा से फूलों से भी कोई इतना ख़ुश हो सकता है. एक गुलाब उसने अपनी सास को दे दिया. वे इतनी ख़ुश हुईं कि झट उन्होंने उसे अपने बालों में लगा लिया. उनके चेहरे की चौड़ी मुस्कुराहट ने रचना के मन को सुगंध से भर दिया. आज उसने उनसे पूछ कर नाश्ता बनाया. तब तक सुदीप भी नहाकर आ गया. सबने मिलकर नाश्ता किया. आज रचना को सभी लोग कुछ ज़्यादा ही ख़ुश लग रहे थे या क्या पता ये सब तो रोज़ ही इतने ख़ुश रहते होंगे, वो ही चिढ़ी हुई रहती थी.
पिता की सीख को वह मन ही मन दोहराती रहती. धीरे-धीरे उसे ख़ुद समझ आ रहा था कि पत्थर वास्तव में उतने भारी कभी थे ही नहीं जितने उसने बना लिए थे और उनके बोझ तले ख़ुद ही घुटती जा रही थी. अब ननद भी आती तो वह सहेली की तरह उसका आना एंजॉय करती.
आसपास लगे फूलों को देख, पंछियों की चहचहाहट सुन कर रचना का चेहरा खिल उठा था. वह कौतुक से भंवरों का फूलों पर मंडराना देख रही थी.
“लगता है तुमने झोला खाली कर लिया है सारे पत्थर फेंक कर.” प्रकाश ने हंसते हुए पूछा.
“पत्थर तो कभी थे ही नहीं पिताजी, छोटी-मोटी कंकड़ियां थीं वो तो. मैं ही जबरन उन्हें भारी बनाती जा रही थी. पर हां आपके कहे अनुसार अच्छी बातों के फूलों को मैं ज़रूर सहेज लेती हूं.” रचना ने पिता के कंधे पर सिर रख दिया.
“आपका बहुत सारा धन्यवाद पिताजी, समय रहते मेरी भूल सुधार कर मेरा जीवन सरल बनाने के लिए.”
प्रकाश उसका सिर थपकने लगे. उन्हें विश्वास हो चला था कि अब उनकी बेटी का जीवन सदा महकता रहेगा और रिश्ते भी.
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