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कहानी- मलिका, तुम तख़्त का नूर हो (Short Story- Malika Tum Takhat Ka Noor Ho)

रावी चिनाब के भयानक उच्छृंखल तरंगों को चीरती हुई गोद में नन्हीं नतिनी को बैठाए हुए अपने चंद जांबाज़ों के साथ रास्ता बनाती हुई तूफ़ान की तरह साहसी नूरजहां बागियों पर भूखी शेरनी की तरह झपट पड़ी.

सन् १६५१ की एक ख़ुशनुमा सुबह! जहांगीर के दिल की मल्लिका, नूर महल को ‘नूरजहां’ का खिताब मिला. मुग़लों का स्वर्णिम युग अपने शीर्ष बिंदु पर था. जहांगीर दिल्ली के तख्त पर बैठा अपनी न्यायप्रियता और कुशल प्रशासन के साथ, मुग़ल बादशाहत को एक सूत्र में बांधे था. उत्तरी और दक्षिणी रियासतें कुछ समय से शांत थीं. मुगलाई रौनक वाली दिल्ली अपने पूरे बहार और शबाब में थिरक रही थी.

संगीत और कलाप्रेमी बादशाह जहांगीर अपने शौको-हयात में डूबा था. इसलिए उसने सल्तनत की बागडोर स्वेच्छा से मल्लिका-ए-नूरजहां को सौंप दी थी. कुछ दिनों तक सल्तनत के नवाब-उमरावों और सदरों ने मल्लिका के तख्त पर बैठने का विरोध किया. लेकिन कछ समय बाद ही ये सभी मल्लिका नूरजहां के कुशल राज्य प्रशासन और रियाया के दुख-दर्द को समझने के न्यायपूर्ण प्रयासों को देखकर ख़ुद ही चुप हो गए. कोमल मन वाला कला मर्मज्ञ बादशाह जहांगीर रियासत और रियाया की सरगर्मियोंऔर हंगामों से दूर रहकर, अपनी ही कल्पनाओं के रचे माहौल में समाया था. उसके लिए तो दो प्याले शराब और दो खुराक अफीम ही काफ़ी थी.

इन सब पर हावी थी जहांगीर के महल में होनी वाली हर सांझ की वह ख़ुशबू भरी बयार, जो गीत-ग़ज़ल‌ शायरियों की गमक लिए, घुंघरूओं की मादक थाप के साथ नाचती-गाती झूम-झूमकर सूरज की पहली किरण के साथ भैरवी गाती थी.

लेकिन उधर बागियों की पेशानियों पर फिर से बल पड़ने लगा था. हुकूमत को एक नाजनीना महिला के हाथों सल्तनत को चलाते देख उनके तेवर बदलने लगे. महल के भीतर चुपचाप षडयंत्र पनपने लगे. उधर चाक-चौबन्द मल्लिकाए नूरजहां बड़े जोशो खरोश के साथ उन्हें भरसक दबाती रही. कई बार सदरों-बज़ीरों ने नूरजहां के ख़िलाफ़ भरे दरबार में खिलाफ़त करने की कोशिश की, लेकिन ऐन मौक़े पर वे जहांगीर की शान में खुलेआम गुस्ताख़ी करने का साहस भी न कर सके. ऐसी आग तो ढपी दबी थी, लेकिन जो बगावत की आग धीरे-धीरे सुलग रही थी, बादशाह जहांगीर के ख़ुद के बेटे.

दिल्ली तख्त के लिए जहांगीर ने अपने पिता से ख़ुद बगावत कर एक खूनी इतिहास को जन्म दिया था. अब ख़ुद के गद्दीनशीं रहते बड़ा बेटा खुशरू भी खुलेआम जहांगीर के ख़िलाफ़ बगावत कर बैठा. तंग आकर जहांगीर ने खुशरू को गिरफ़्तार कर उसकी आंखें छीनकर उसे काल कोठरी में डाल दिया. दूसरा बेटा खुर्रम जहांगीर से भी शातिर निकला. उसने तीसरे भाई को दक्षिण ले जाकर मौत के घाट उतार दिया. जहांगीर का सबसे प्यारा बेटा था -परवेज़ और परवेज़ से छोटा था शहरयार, जिसे नूरजहां सबसे ज़्यादा प्यार करती थीं.

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खुर्रम गम्भीर, साहसी और शालीन मर्द था. खुर्रम को दिल्ली दरबार में अपने ससुर वजीरे आजम खां की सबसे बड़ी आड़ थी. अपने दामाद के हक़ों के पहरूवे के रूप में, उसकी भीतरी और बाहरी ताक़त का माया चारों ओर फैला था. चुनांचे, खुर्रम जो उस समय दक्षिण का सूबेदार था, बगावत पर उतर आया, पर नूरजहां की मस्तैदी ने खुर्रम के इस बिद्रोह को नाकाम कर दिया.

चूंकि चोट उल्टी पड़ी थी, इसलिए शहजादा खुर्रम बंगाल की ओर भागा, लेकिन नूरजहां ने उसे वहां भी चैन में बैठने नहीं दिया. शहजादा खुर्रम वहां से भागकर आगरा चले आए. बादशाह जहांगीर तब पंजाब रियासत में बागियों को दबाने में बुरी तरह मसरूफ़ थे.

नूरजहां ने देखा कि मुग़ल बादशाह और दिल्ली तख्त को ज़िंदा रखने के लिए और बागियों के शरमायेदार शहज़ादा खुर्रम की ताक़तों को पूरी तौर पर नेस्तनाबूद करने के लिए लाजिमी तौर पर तैयार होना पड़ेगा. सो उसने मखमली गद्दे त्याग कर कमर कस ली. खुर्रम के साथ उसकी बाग़ी सेना, अब सेनापति महावत खां के साथ खुलेआम मैदान में‌ उतर आई थी.

मल्लिकाए नूरजहां ने पहले छल कपट से बागी सेनापति महावत खां को तोड़ने की कोशिशें की. महावत खां हाथ नहीं आया. तंग आकर नूरजहां शाही सेना लेकर महावत खां के पीछे दौड़ गई. नूरजहां के जानलेवा कोप से बचने के लिए महावत खां अपनी बागी सेना लेकर काबुल की ओर भागा. इसी भागमभाग में बागी महावत खां ऐसा काम कर बैठा, जिसने मलिकाए नूरजहां के होश उड़ा दिए.

हुआ यह कि पंजाब में बग़ावत दबाने के बाद जहांगीर काबुल की ओर विद्रोहियों के सिर कुचलने के लिए चला, तो झेलम बीच भगोड़े महावत खां ने धोखे से वार कर बादशाह जहांगीर को पकड़ लिया. नूरजहां क्रोध से सुलग उठी. जहांगीर को कोई हाथ लगाए नूरजहां को यह गवारा न था. खुली तलवार हाथ में लेकर मुग़ल बादशाहत की तारीखों में फिर नूरजहां ने जो किया, वह इतिहास में अमर हो गया.

खूंखार शेरनी की तरह उसने अकेले चुपचाप एक अमावस्या की रात बागियों के पड़ाव पर छापा मारा और जहांगीर की चौकसी में लगे सभी पहेरदारों को मौत के घाट उतार कर बादशाह को ले उड़ी. सुबह ही महावत खां को जब यह भनक पड़ी, तो वह अपनी सेना के साथ नूरजहां के पीछे भागा.

उधर भागते भागते नूरजहां बादशाह को लेकर उसकी सेना से जा मिली. जहांगीर के साथ थोड़ी ही सेना थी. नूरजहां ने हिम्मत नहीं हारी उसी सेना को जैसे तैसे तैयार कर, वह महावत खां से आख़िरी लड़ाई लड़ने के लिए झेलम की ओर कूच कर गई. मल्लिकाए नूरजहां इस लडाई में हाथी पर बैठकर युद्ध का संचालन कर रही थी. उसके हाथ में धनुष-बाण थे. पीठ पर तरकश और गोद में शहजादा शहरयार की मासूम बेटी और उसकी सबसे प्यारी नातिन. भयानक मंजर का यह खेल शुरू होने वाला था.

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महावत खान और उसकी सेना ने मल्लिकाए नूरजहां और उसके मुठ्ठीभर जांबाज़ों को देखा और आश्चर्य में पड़ गए. बागी सेना के साथ जो बाकी राजपूत थे, वे भी इस स्थिति को देखकर किकर्तव्यविमूढ़ हो गए.

मल्लिकाए नूरजहां ने हुंकार भरी और अपने हाथी को बागियों की ओर हूल दिया. बाग़ी सेना आंखें फाड़े देखती रही. समय जैसे रुक गया. हवा थर्रा उठी और लगा कि सूरज के घोड़े भी कांप उठे.

नूरजहां हाथी पर सवार होकर हिन्दुस्तान के सबसे बड़े सिपहसलार के सामने जान की बाज़ी अपने हाथों में लेकर अपने चंद सैनिकों के साथ झेलम पुल की एक ओर तैयार थी. बागी सेना ने मुठ्ठी भर सैनिकों के साथ नूरजहां के मरने मारने के इस तेवर को देखा, तो उन्होंने पुल तोड़ दिया. पर मल्लिका चूकनेवाली न थी. उसने तो इस मौक़े को अपनी जान की बाज़ी के साथ जोड़ दिया था. ज़िंदगी और मौत की इस लड़ाई में महावत खां के सामने किसी भी तरह न रुकने का निर्णय लेकर वह कटिबद्ध थी. झेलम पुल के टूट जाने पर भी रावी की उत्ताल लहरों के बीच उसने अपने हाथी को उतार दिया. नूरजहाँ की इस मर्दानगी और बहादुरी को देखकर पीछे घोड़े पर सवार बादशाह जहांगीरभी एकाएक स्तब्ध हो गए. और महावत खान के साथ उसकी विशाल सेना भी नूरजहां की इन बेपनाह दिलेरी को देखकर थर्रा उठी.

रावी चिनाब के भयानक उच्छृंखल तरंगों को चीरती हुई गोद में नन्हीं नतिनी को बैठाए हुए अपने चंद जांबाज़ों के साथ रास्ता बनाती हुई तूफ़ान की तरह साहसी नूरजहां बागियों पर भूखी शेरनी की तरह झपट पड़ी.

झेलम पुल और उसका बहता पानी आज भी गवाह है, जब पैदल से पैदल, हाथी से हाथी और घुड़सवारों में घुड़सवारों की नंगी सुरेजी तलवारें और भाले आपस में टकराए तो, राह मिलनी कठिन हो गई. जो गिरे या घायल हुए, उन्हें प्यासी झेलम ने अपने में समा लिया, जो बचे यह घोडों के खरों से कुचल गए और बाकी मतवाले हाथियों के ग़ुस्से से दब गए. चारों ओर भयानक मंज़र था.

बाग़ी सेना का पूरा ज़ोर और रूख नूरजहां पर ही था. सबसे खूंखार और जानलेवा हमला भी उसी पर हुआ. बाग़ी सेना के साथ राजपूतों का हरावल दस्ता भाले के अचूक निशानचियों को लेकर नूरजहां पर पिल पड़ा. महावत खां ने इन वीर रणबांकुरों को लेकर नूरजहां को चारों ओर से घेर लिया. फिर इस दस्ते ने नूरजहां के सभी रक्षकों को गाजर-मूली की तरह काट डाला. नूरजहां का हौदा तीरों और भालों के वार में छिद गया. चारों ओर गोले के धमाके और ग़ुबार के गर्त फैलने लग गए थे.

इसी बीच नूरजहां को बनाए गए निशानों में से एक तीर उसकी गोद में बैठी लड़की को लग गया. लड़की को ज़ख़्मी होते देख नूरजहां की आंखें सुलग उठीं. फिर उसने महा रणचण्डी का रूप धारण कर लिया. लड़की को ज़ख़्मी देख कुछ पलों के लिए उसकी पेशानी में बल पड़े. फिर अपनी पीठ की ढाल उतारकर बेहोश बच्ची के ऊपर रखकर उसने उसे सुरक्षित अपने पावों के पास लिटा दिया. इतनी देर तक राजपूतों की अचूक भालेबाजी से नूरजहां का महावत छिदकर झेलम में बह चुका था.

इस प्राणांतक आघात में साहसी नूरजहां ने धैर्य नहीं छोड़ा. ख़ुद वह हाथी को भी संभालने लगी और अपनी कुशल तीरंदाजी के घातक प्रहारों से बागियों के कलेजो को भी बींधने लगी. उसके लिए लड़ना अब जूझने से कम नहीं था. वह अब इने-गिने साथियों के साथ जान की बाज़ी लगाने के लिए पागलों की तरह उन्मत्त हो उठी थी.

फिर भालों और तीरों में नूरजहां का हाथी बुरी तरीक़े से चिढ़ पड़ा. एकाएक वह बिलबिलाकर और चिंघाड़कर मैदान से अंधाधुंध भाग उठा. हाथी के इस तरह भागने से बागियों ने उस पर फिर ख़तरनाक भाले और तीर फेंकें. घबराकर हाथी मैदान की बजाय झेलम में कूद पड़ा. उसके खून से झेलम का पानी भी लाल हो उठा. उस वक़्त तक नूरजहां भी तीरों और भालों में बुरी तरह घायल हो चुकी थी. उसके बदन में जगह-जगह से विषैले तीरों के अनेक ज़ख़्म हो चले थे. हौदा उसके खून से भीग उठा था. दिलेर नूरजहां अभी भी हार मानने को तैयार नहीं थी. लेकिन अचानक हाथी के इस तरह झेलम में कूदने पर वह भी लाचार हो उठी. गम्भीर रूप से घायल नूरजहां हौदे में खड़े-खड़े अर्द्धमुच्छा में डूबने लगी थी कि अचानक न जाने कैसे झेलम का रूका हुआ बांध टूट चला. भयानक रूप से गरजती झेलम की तूफ़ान भरी भयानक लहरों ने नूरजहां के उस घायल मतवाले हाथी को अपने में छुपा लिया. डूबता-उतरता हाथी झेलम के झपाटों से कुछ देर बाद उस पार निकल गया.

उस पार के पड़ाव में नूरजहां की बादियां यह सारी हैरतअंगेज मंज़र टकटकी लगाए देख रही थी. जब उन्होंने ज़ख़्मी हाथी को इस पार डगमगाते कदमों से आते देखा,तो वे घबराईं और रोती-चीखती हुई सी हाथी को घेरकर अनचीन्हें आशंका के साथ उसके चारों ओर खड़ी हो गईं . पर ज़ख़्मों से सराबोर हुई नूरजहां को खून में भीगे हौदे में जो बैठा पाया, तो उनके ताज्जुब का ठिकाना न रहा.

बेख़ौफ़, बेलौस नूरजहां इत्मीनान से हौदे में बैठी चीखती बच्ची के जिस्म से तीर निकाल रही थी. उसके माथे पर एक भी बल न था.

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इधर झेलम के बिफरे हुए रौद्र रूप की ताब देखकर, बागियों के हौसले एकाएक पस्त हो उठे. वे आज ताज-ए-तरून दिल्ली दरबार का आख़िरी कांटा भी जड़ से उखाड़ने की ठाने हुए थे. मल्लिकाए नूरजहां तो हाथ नहीं आई. लेकिन दुर्भाग्य में बहादुरी के साथ लड़ते हुए बादशाह सलामत जहांगीर बागियों की फिर से गिरफ्त में आ गए.

उस पार चंद बहादुर साथियों के साथ जान की बाज़ी खेलनेवाली दिलेर नूरजहां जहांगीर के फिर से गिरफ्त होने की इस घटना को देखकर हाथ मलते रह गई. जबकि, झेलम का उन्मत बहता पानी नूरजहां के बुलंद हौसलों की तरह भयानक गर्जना कर रहा था.

बादशाह अभी भी बागियों के क्रूर पंजों में था. जहांगीर की यह क़ैद ही नूरजहां को चैन नहीं लेने दे रही थी. दिल्ली के साथ अन्य रियासतों के अलमदार मौक़ा देखकर अपने आप को अलग-अलग करने पर आमादा हो गए. खुलेआम षड्यंत्र होने लगे. कहीं से भी मौके पर कुमुक या सहायता का अंदेशा, मल्लिका के रूबरू नहीं आ पाया. देश के अंदर अमनचैन ख़त्म होने लगा.

देश की ऐसी खौफ़नाक हालत राजधानी और रियासतों में बागीपन की ख़तरनाक और दिलोजान से अज़ीज़ जहांगीर के बंदीपने की लाचारगी ने नूरजहां की आंखों की नींद उड़ा दी थी. रियाया बादशाह जहांगीर को अभी भी प्यार करती थी और दुश्मनों की गिरफ्त में रहने के बाद भी उसे दिलोजान मान देती थी.

नूरजहां ने नीति से काम लेने की सोची. बदले की भावनासे हरदम उसी आंच में सुलगती हुई नूरजहां शांत होकर दिमाग़ी ताक़त की लडाई लड़ने के लिए पैंतरे भाजने लगी. उसनेसोच लिया था कि इस पैंतरे से यदि दिल्ली का बादशाह बागियों के पंजों से एकबारगी छूट जाए तो हर फतह रियाया के ज़ोर पर संभव हो सकती है.

अपनी साम-भेद नीति के ज़रिए गर्व से सिर उठाए और साहस के साथ एक छोटी सी लड़ाई जान-बूझकर लड़ते हुए नूरजहां एक दिन फिर बागियों के सरताज और शहज़ादा खुर्रम के दायें हाथ महावत खां के सामने थी. मौला और अपनी ताकत देखकर महावत खां ने विद्रोहियों की आंख की किरकरी बनी नूरजहां को गिरफ्तार कर बादशाह जहांगीर के साथ उसे भी शाही जेल में बंद करवा दिया.

अपनी ही ताक़त में खोया महावत खां नूरजहां के एकाएक इस जाल को समझ नहीं पाया. वह इस जबर जीत की ख़ुशी में चल रहे माहौल के हर पहलू को नज़रअंदाज कर गया. वह यह छोटी सी बात भी नहीं सोच पाया कि मल्लिका का इतनी जल्दी चुप्पी तोड़कर, बिना किसी सहायता के तुरंत लड़ाई मोल लेकर थोड़े प्रयासों के बाद भी बिना किसी हुल-इज़्ज़त के अपने आपको बागियों के हवाले करने के पीछे कोई ख़ास वजह छिपी हुई है और यही वजह महावत खां की मौत का कारण बनी और शेष बागियों के लिए उनके नेस्तनाबूद होने का कारण भी बादशाह जहांगीर के साथ कड़ी क़ैद भुगतती हुई नूरजहां उस अहम वक़्त का बेसब्री के साथ इंतज़ार करने लगी जब उसे मुग़ल बादशाहत को बचाने के लिए तारीख़ का एक बेमिसाल शाहकार बनना था. धीरे-धीरे अपनी कूटनीति के सहारे नूरजहां ने माहौल देख-परखकर बागियों के आला हुक्मरानों से लेकर आम सिपाही तक, रियाया के प्राण प्यारे बादशाह सलामत पर हो रहे ज़ुल्मों की ख़बरें योजनानुसार चारों ओर फैलाईं.

उस माहौल में इन ख़बरों ने आग में घी का काम किया. वक़्त के तकाज़े के इस सिलसिले में बुद्धि कौशल की धनी नूरजहां ने काल कोठरी के भीतर से ही अपनी सरगर्मियां तेज कर दीं. और उस ख़तरनाक दौर की आख़िरी बाज़ी को जीतने के लिए वह कमर कसकर तैयार हो गई.

सब्र का यही धारदार फ़ैसला एक रात अपने पूरे रंग में आ गया. बागियों के अफ़सर नूरजहां की बहादुरी और हिम्मत के कायल होकर उसके साथ हो गए और उन्होंने बादशाह जहांगीर और बेगम नूरजहां को आज़ाद कर दिया.

मल्लिकाए हिंद ने भरपूर सरगोशियों के साथ दिल्ली तख़्तेताज़ के मालिक जहांगीर और अपने बागियों द्वारा हुई बेपनाह बेइज़्ज़ती का खुला हिसाब मांगा. वही बागी फ़ौज़ अब सिर झुकाए हुए मल्लिकाए हिंद के सामने थी. वक़्त उलट गया था.

महावत खान जान हथेली में रखकर काबुल की तरफ़ भागा. नूरजहां बागियों के इस सरपरस्त को अब कोई मौक़ा देना नहीं चाहती थी. नंगी तलवार हाथ में लिए ज़ख़्मी शेरनी की तरह वह अकेली उसके पीछे घोड़े पर दौड़ चली और अदम झेलम पुल के बीच उसने महावत खान को जा पकड़ा. तलवार के पैतरों की धनी नूरजहां के आगे, थका-हारा और डरा हुआ सिपहसालार महावत खान ज़्यादा देर तक टिक नहीं सका.

थोड़े संघर्ष के बाद ही उसका कटा हुआ सिर पुल के उस पार था और बाकी धड़ उफनती झेलम लील चुकी थी.

अपनी खूनी तलवार में उस गद्दार का खून टपकाते हुए बादशाह जहांगीर ने जब नूरजहां का चेहरा देखा, तो आज वह चेहरा उसे ग़ुरूर की आंच से भरा दिखा. एक अनोखी ख़ुशी मल्लिका-ए-हिंद के चेहरे से बरस रही थी. उसकी चमकती आंखों में आज मुस्कुराहटों का सैलाब उफन आया था. पुरसुकून की उस मदमस्त फिज़ा में नूरजहां की गोद में लेटे-लेटे बादशाह ने कहा, “मल्लिका, कह रहा हूं कि ताजे तख़्त का नूर सिर्फ़ तुम हो, हम तो उसके पायदान भर हैं..!”

मल्लिकाए-हस्न नूरजहां ने बादशाह के बालों में अपनी उंगलिया फिराते हए खनकती हंसी के साथ जवाब दिया, “मालिक, तारीफ़ के सतरों के साथ, आप ख़ुद गवाह हैं. हमने जो कुछ भी मुग़लिया सल्तनत और आपकी हिफ़ाज़त के लिए किया, वह सब आपके सदके हमारा फ़र्ज़ था.”

फिर काबुल की बग़ावत दबते ही शाही पड़ाव जन्नत की उंचाइयों, कश्मीर की वादियों की ओर चढ़ चला और शालीमार के बहिश्ती बाग़ में जा उतरा. नाजनीना के सुकुमार गुलाब की फिर ऐसी कलमें छांटी और उस झेलम की ख़ुशबू भरी केसरिया क्यारियां सम्हालीं, जिसका निचला बहाव मल्लिका-ए-हिंद नूरजहां के खून से उस वक़्त भी लाल था.

– सुधीर शाह

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