“… हम लोग सिम्मी के घरवालों के लिए ये सब ज़ेवर,कपड़े और दो लाख कैश दे रहे हैं. माना कि उनकी कोई मांग नहीं है, फिर भी ये सबलेकर जाएगी तो ठसक से तो रहेगी…”
मेरी शादी में पिताजी ने एक पौधा लगा दिया; दहेज का! मैं गहनों और उपहारों से सजी-धजी विदा हुई.
जब भाभी आईं, अनगिनत सामान बटोरे, वो पौधा पेड़ बन चुका था.
भइया की बिटिया की शादी एक ऐसे घर में तय हुई जहां कोई मांग नहीं थी; मैंने कुल्हाड़ी लेकर वो पेड़ काट डाला.
“देखो दीदी, हम लोग सिम्मी के घरवालों के लिए ये सब ज़ेवर,कपड़े और दो लाख कैश दे रहे हैं. माना कि उनकी कोई मांग नहीं है, फिर भी ये सबलेकर जाएगी तो ठसक से तो रहेगी…
और वो देखो सामने, इसी में विदा करेंगे.”
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मैंने देखा एक चमचमाती हुई कार खड़ी है, ठीक उसी पेड़ की छाया में!
“तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई फिर से लहलहाने की? मैं तुम्हें काटकर गई थी!”
पेड़ बड़ी ढिठाई से मुस्कुराते हुए बोला, “दोष आपका है! जड़ से उखाड़ कर क्यों नहीं फेंका था?”
– लकी राजीव
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