एक रविवार को अंकित सोकर उठा तो दूध पीकरबाहर झूला झूलने चला आया. देखा पिताजी आम के पेड़ को बहुत प्यार से सहला रहे हैं और उनकी आंखों में आंसू हैं. अंकित ने पहले कभी भी पिताजी की आंखों में आंसू नहीं देखे थे. वह घबरा गया.
जब से पिताजी का ट्रांसफर इस शहर में हुआ है अंकित देख रहा था कि पिताजी बहुत ख़ुश हैं. मां ने अंकित को बताया था कि पिताजी का बचपन इसी शहर में बीता था इसलिए उन्हें इस शहर से विशेष लगाव है, क्योंकि उनके बचपन की यादें इस शहर में बसी हुई हैं.
जो सरकारी घर उन्हें रहने को मिला था वो बहुत पुराना, लेकिन काफ़ी बड़ा था. घर के आगे-पीछे बड़ा सा बगीचा था, जिसमें तरह-तरह के पेड़ लगे थे.
अंकित को सामने वाले बगीचे में लगा आम का पेड़ ख़ासतौर पर पसंद था, क्योंकि उस पर झूला डला था और इस समय उस पर आम भी लगे थे. अंकित जब मन करता उस पर झूला झूलता और पका आम दिखने पर पिताजी से तुड़वाकर खाता. इस पेड़ के आम बहुत मीठे थे.
एक रविवार को अंकित सोकर उठा तो दूध पीकरबाहर झूला झूलने चला आया. देखा पिताजी आम के पेड़ को बहुत प्यार से सहला रहे हैं और उनकी आंखों में आंसू हैं. अंकित ने पहले कभी भी पिताजी की आंखों में आंसू नहीं देखे थे. वह घबरा गया.
“पिताजी, क्या हुआ, आप ठीक हो न?” अंकित ने धीरे से पिताजी का हाथ पकड़ कर पूछा.
“हां बेटा मैं ठीक हूं.” पिताजी ने मुस्कुराते हुए कहा.
“आप इस आम के पेड़ को इस तरह प्यार क्यों कर रहे हैं?” अंकित ने झिझकते हुए कहा.
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“जानते हो अंकित पैंतीस साल बाद मैं दुबारा इस घर में आया हूं. यह घर तुम्हारे दादाजी अर्थात मेरे पिताजी को मिला था. तब मैं छोटा था और मेरे दादाजी ने ही यह आम का पेड़ लगाया था, जो आज तुम्हे छांव और आम दे रहा है.” पिताजी ने बताया.
“अरे वाह, आप इसी घर में रहते थे?” अंकित ने आश्चर्य से पूछा.
“हां तब यह घर मेरे पिताजी को मिला था. आज इतने सालों बाद मैं दुबारा इसी घर में वापस आ गया हूं. तुम हमेशा हर घर में मुझे फलों के पेड़ लगाते देख कर कहते थे न कि आप क्यों बेकार पेड़लगाते हैं, जबकि आपको तो कभी इसके फल खाने को ही नहीं मिलेंगे.” पिताजी बोले.
अंकित को याद आया कि पिताजी को जो भी घरमिलता वे उसके बगीचे में और आसपास की खाली ज़मीन पर भी हमेशा फलों के पेड़ लगाते थे जबकि ट्रांसफर हो जाने के कारण वे कभी भी उन पेड़ों के फल नहीं खा पाए. जब अंकित समझदार हुआ तो हमेशा पिताजी से कहता कि आप बेकार समय और पैसा क्यों व्यर्थ ख़र्च करते रहते हैं फलों के पेड़ लगाने और उनकी देखभाल करने में जबकि इसमें फल आने के पहले ही आपका ट्रांसफर हो जाता है. पिताजी चुपचाप मुस्कुरा देते, लेकिन उन्होंने पेड़ लगाना नहीं छोड़ा.
“यदि उस समय वो भी यही सोचते कि दो-चार साल ही तो रहना है यहां तो बेकार आम का पेड़ लगाने का क्या फ़ायदा तो आज तुम्हे इसके फल और छांव नहीं मिलती. न तुम इस पर झूला झूल पाते. बेटा चाहे फलों के हों या छाँव वाले, हमेशा पेड़ लगाते रहना चाहिए. हम भी जो फल खाते हैं उनके पेड़ दूसरों ने लगाए हैं. आज तुम्हे फल नहीं, बल्कि आम और छांव के रूप में परदादा जी का आशीर्वाद मिल रहा है.”
पिताजी ने कहा “हम भी दो-चार साल में भले ही चले जाते हैं, लेकिन हमारे लगाए पेड़ आज और भविष्य में किसी न किसी अंकित को तो छांव और फल दे रहे हैं और देते रहेंगे.”
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“मैं समझ गया पिताजी. अब मैं भी आपके साथ हर घर में न सिर्फ़ पेड़ लगाऊंगा वरन उसकी देखभाल भी किया करूंगा, ताकि भविष्य में हर अंकित को मीठे फल और ठंडी छांव मिलती रहे.” अंकित ने कहा तो पिताजी ने प्यार से उसका सिर थपथपाया.
“शाबास बेटा!”
अंकित ने धीरे से पेड़ को छुआ. अचानक पेड़ की डालियां हिली और पत्ते लहराने लगे. उसे लगा उसके परदादा जी ने उसे आशीर्वाद दिया है.

विनीता राहुरीकर

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