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कहानी- मुक्तिबोध (Short Story- Muktibodh)

“अब बर्दाश्त के बाहर की बात हो रही है. मैं तेरी एक नहीं सुनूंगी! क्यों सहन कर रही है इसको! तेरे अंदर क्या कमी है, जो तुझे इसके साथ रहने पर मजबूर कर रही है! भारत में लोग रहते नहीं हैं क्या? इसी दिन के लिए तुझे पढ़ाया-लिखाया गया है क्या! अब जो होगा देखा जाएगा!”

अपने मां-पापा को एयरपोर्ट छोड़ते समय मन भर आया, लेकिन वे सकुशल लौट रहे हैं, यह सोच कर मुझे संतोष हुआ. घर आकर बड़े से सोफे में धंस कर लेट गई और आंखों को हाथ से ढंक कर फूट-फूट कर रोने लगी. वे लोग तीसरी बार अमेरिका के बोस्टन सिटी में मेरे पास तीन महीने के लिए रहने आए थे, लेकिन उनका यह ट्रिप पिछले दो ट्रिप से बिल्कुल भिन्न था. बेटी नव्या स्कूल चली गई और पति प्रशांत हमेशा की तरह अपने कमरे में क़ैद हो गया.

मस्तिष्क में अतीत के पन्ने फड़फड़ाने लगे. मां-पापा बिल्कुल नहीं चाहते थे कि मैं अमेरिका आऊं. मैं उनकी इकलौती बेटी हूं, लेकिन प्रशांत के ज़िद्दी और मुंहफट स्वभाव के कारण मैंने उनको उसे कुछ बोलने का अवसर ही नहीं दिया. मेरा प्रशांत से प्रेम-विवाह हुआ था, लेकिन विवाह होते ही उसका असली रूप बहुत जल्दी सामने आ गया.

चार वर्ष के कोर्टशिप में भी मैं उसको समझ नहीं पाई, फिर किशोरवय की कच्ची उम्र! जब प्रशांत से पहली बार मिली थी, मैं मात्र 19 वर्ष की थी. विवाह के बाद मैंने पाया कि मुझे तो किसी भी कार्य के लिए निर्णय लेने की आज़ादी नहीं थी, न ही कोई सलाह देने की. ज़रा सा कुछ बोलने की कोशिश करती, प्रशांत चिल्ला कर मेरा मुंह बंद कर देता था. धीरे-धीरे मैं उसके हर निर्णय के अनुसार बहती ही चली गई.

विवाह के पांच वर्ष बाद हमारा अमेरिका आना हुआ. यहां अधिकतर अपने परिजनों की ज़िम्मेदारी से भागने वाले या विलासितापूर्ण जीवन चाहने वाले दो ही तरह के लोग बसते हैं. प्रशांत के इस निर्णय के पीछे दोनों ही कारण थे. अपने माता-पिता से उसे कोई लगाव नहीं था. उसके लिए पैसा ही सब कुछ था. यहां आते ही मैं प्रेग्नेंट हो गई. मेरे मां-पापा की ख़ुशी का ठिकाना ही नहीं रहा. मैं भी इस नई उपाधि की बेसब्री से प्रतीक्षा करने लगी.

प्रसव के समय मेरी सेवा के लिए मेरे मां-पापा को बुलाया गया. अमेरिका में मेड अत्यधिक महंगी होने के कारण दोनों ने छह महीने तक मेरी, मेरी बेटी नव्या की और घर के पूरे काम की अच्छे से देखभाल की. प्रशांत को तो कुछ भी लेना-देना नहीं था, लेकिन बात-बात में उन्हें टोकना वह कभी नहीं भूलता था. कई बार तो मां की आंखों में आंसू आ जाते थे, लेकिन नातिन नव्या का चेहरा देखकर वे बहुत जल्दी सहज हो जाती थीं. वे अमेरिका में थे, इसलिए वे बहुत असहाय थे. मुझे भी नहीं बताते थे कि मुझे जानकर तकलीफ़ होगी, लेकिन मेरे सामने भी वह नहीं चूकता था. मुझे उसका व्यवहार बहुत व्यथित करता था, लेकिन मेरी ज़ुबान पर तो जैसे ताला लग गया था.

उनके भारत लौटने के बाद मैं अपनी नन्हीं बिटिया के पालन-पोषण में इतनी व्यस्त हो गई कि अपना अस्तित्व ही जैसे भूल गई. मैं पढ़ी-लिखी और अच्छे कद-काठी की हूं और भारत में नौकरी छोड़कर अमेरिका आई थी, लेकिन उसे जारी रखने का कभी ख़्याल तक नहीं आया. उसको पालने में या घर के कार्यों में प्रशांत का कोई सहयोग भी तो नहीं था, लेकिन मेरे कार्य-कलापों की उसकी दृष्टि में कोई कद्र नहीं थी. वह चाहता था नव्या को क्रेच में छोड़कर मैं नौकरी करूं.

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प्रशांत का अच्छा-ख़ासा वेतन था, जो वह फिज़ूलख़र्ची में बर्बाद कर देता था. यह देखकर मैं भला सोचती भी क्यों नौकरी करने की! मैं लोहे की तो बनी नहीं थी कि नौकरी भी करूं और घर भी संभालूं! मैं बच्ची को क्रेच में छोड़ने के बिल्कुल पक्ष में नहीं थी. मेरा यह निर्णय उसके वर्चस्व पर भारी पड़ा, जो उसके बर्दाश्त के बाहर था. रात-दिन वह मेरे नौकरी न करने पर मुझे ताने देने लगा. ज़रा-ज़रा से ख़र्चे पर मुझे नीचा दिखाने में कभी कसर नहीं छोड़ता था, लेकिन मैं चुपचाप सब सहती जा रही थी. करती भी क्या, नव्या अमेरिका में पैदा हुई है. उसका भविष्य यहीं सुरक्षित है. कम से कम उसकी पढ़ाई और अन्य ख़र्चों को प्रशांत वहन कर रहा है. दूसरा भारत जाकर वहां नए सिरे से बसना इतना आसान नहीं है. ऐसी स्थिति में सारी ज़िम्मेदारी मेरे कंधों पर आ जाएगी. प्रशांत का सहयोग तो मिलने से रहा. नौकरी छोड़े मुझे कई वर्ष हो गए थे. इंडिया में मुझे अच्छी नौकरी मिलना भी असंभव सा लग रहा है.

मेरे पापा को पेंशन मिलती है, जिससे उनका ख़र्चा चलता है. मैं डिपेंडेंट वीसा पर हूं, इसलिए यहां से निकलते ही मेरा अमेरिका से संपर्क ही टूट जाएगा. फिर मैंने ज़िद करके प्रेम-विवाह किया है, लोग क्या कहेंगे! इन सब समस्याओं ने मेरे पैरों को बेड़ियों से बांध रखा था.

तलाक़ लेना भी मेरे लिए इतना आसान नहीं था. मैं जैसे लोहे के मज़बूत जाल में उलझती जा रही थी. जब नव्या ग्यारह वर्ष की हुई, तो मेरे मां-पापा दूसरी बार हमारे पास रहने आए. इसके पहले मेरा कई बार भारत जाना हुआ, लेकिन मैंने कभी भी उनसे अपनी स्थिति साझा नहीं की. करने से फ़ायदा भी क्या था! वे दुखी होने के अतिरिक्त कर भी क्या सकते थे! प्रशांत उनके सामने भी मुझसे ऐसा ही व्यवहार करता था. यह देखकर वे बहुत परेशान हुए. मां ने मुझे बोला भी कि मेरे अंदर का स्वाभिमान कहां गायब हो गया! मैं क्यों इतना अपमान सह रही हूं. उनका प्रशांत से कुछ बोलने का फ़ायदा ही नहीं था. फिर भी मेरी मां से रहा नहीं गया. एक दिन जैसे ही वे कुछ बोलने को हुईं, वह समझ गया और चिल्लाकर बोला, “मुझे नहीं अपनी बेटी को समझाओ! आप कर क्या लोगे? ले जाओ अपनी बेटी को अपने साथ इंडिया!”

हम सबके मौन में उसे स्वीकृति दिखी. उसने मेरे और अपने दो साझा अकाउंट को बंद भी कर दिया, लेकिन मेरी कोई प्रतिक्रिया न देखकर वह समझ गया कि मैंने पूरी तरह इंडिया लौटने का विचार बना लिया है. यह देखकर दो-तीन दिन बाद वह मेरे पास आया और सॉरी बोला. मतलब यह उसकी धमकी मात्र थी. यह सुनकर मुझे आश्‍चर्य नहीं हुआ, क्योंकि ऐसा पहले भी हो चुका था, जो मेरे मां-पापा को नहीं पता था. उसके बाद मेरे मां-पापा के पास जाकर सॉरी बोला, तो मेरी मां बस इतना ही बोली, “तुम लोग ख़ुश रहो, बस मैं इतना ही चाहती हूं.”

एक हफ़्ते बाद मां-पापा को लौटना था. तब तक उसका व्यवहार सामान्य रहा. वे संतुष्ट होकर वापस लौट गए. लेकिन प्रशांत का स्वभाव नहीं बदला, बल्कि बद से बदतर होता जा रहा था. वह जानता था कि मैं पूरी तरह से उस पर आश्रित हूं, इसलिए उसकी हिम्मत बढ़ती ही चली गई. अब तो कोई भी वस्तु उसके हाथ में होती, ग़ुस्से में मुझ पर फेंककर अपना फ्रस्ट्रेशन निकालने की कोशिश करने लगा था.

एक बार तो मेरे सिर में चोट भी लग गई और टांके लगवाने पड़े. अमेरिका का क़ानून इतना सख़्त है कि मानसिक या शारीरिक प्रताड़ना पर तुरंत पुलिस बुलाई जा सकती है और वह आकर अपराधी को घर से बाहर निकलने के लिए बाध्य करके पीड़ित को पूरी सुरक्षा प्रदान करता है, लेकिन मैं ऐसा करने की सोच भी नहीं सकती थी, मेरी हिम्मत ही नहीं थी. मेरे आत्मविश्‍वास को ग्रहण लग चुका था.

अब तो वह बुरी आदतों का भी शिकार हो गया था. पहले तो सिर्फ़ पार्टियों में ही पीता था, लेकिन अब यह उसकी दिनचर्या में शामिल हो गया था. घर से उसे कोई मतलब नहीं था. ना ही उसे नव्या से कोई सरोकार था. उसको मैंने सिंगल मदर की तरह ही पाला था. उनके जाने के दो वर्ष बाद अचानक कोरोना-वायरस पूरे संसार में फैलने के कारण सारी फ्लाइट्स कैंसिल हो गईं, जिसके कारण मैं भारत नहीं जा पाई.

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जब मां-पापा को पता लगा कि मैं अभी दो वर्ष और भारत नहीं आ सकती, तो वे मुझसे मिलने के लिए बेचैन हो गए और फ्लाइट्स के आने-जाने पर प्रतिबंध हटते ही उन्होंने मेरे पास आने का निश्‍चय किया. अक्टूबर के महीने में यहां अत्यधिक ठंड शुरू हो जाती है और बर्फ़बारी भी होती है, जो मेरी अस्थमा की मरीज़ मां के लिए ठीक नहीं था, जानते हुए भी उनसे मिलने की उत्सुकता के कारण मैं उनको यहां आने से नहीं रोक पाई. जैसे ही वे एयरपोर्ट से बाहर आए, मैं भावातिरेक में उनसे लिपट गई. सच है कितना भी वीडियो कॉल कर लो, लेकिन शारीरिक रूप से मिलने पर जो मानसिक सुख प्राप्त होता है वह अवर्णनीय है. प्रशांत भी हमारे साथ था.

मां की दृष्टि नव्या पर टिक गई. वह मुझसे भी लंबी हो गई थी. मैंने मां को कहा, “आप क्या देख रही हैं! यह ग्यारह वर्ष की नहीं, जब आप इससे पिछली बार मिली थीं. तब कितनी चुलबुली थी. अब पंद्रह वर्ष की पूरी होने जा रही है. बहुत बदल गई है.”

खैर आधे घंटे में हम घर पहुंच गए. मां मेरे दो मंज़िले महल जैसे घर के अंदर घुसते ही विस्फारित दृष्टि से उसका मुआयना करने लगीं. वे जानती थीं कि इतना बड़ा घर प्रशांत की पसंद से ही लिया गया होगा. बड़ा मकान, बड़ी गाड़ी, बड़ा फ़र्नीचर उसको ही चाहिए, मुझे नहीं. इस मकान को लिए अभी छह महीने ही हुए थे. अच्छे खासे मकान की दीवारें तक तुड़वा कर उसने दुबारा से प्लास्टर करवाया था. अभी भी उसमें काम चल रहा था. उसके बाद भी उसका कहना था कि इस मकान को वह पांच वर्ष में बेच देगा. किसी को भी यह बात हजम नहीं हो सकती. मेरी मां को भी जब पता चला तो वे भी बहुत हैरान हुईं, क्योंकि सब कुछ संभालना तो मुझे पड़ता था. बहुत जल्दी वे हमारी दिनचर्या से ऊबने लगीं. प्रशांत का व्यवहार उनके प्रति और भी रूखा हो गया था.

आए दिन मेरे घर में, किसी दूसरे के घर में या किसी रेस्टोरेंट में पार्टी और पीने-पिलाने का दौर और उसके बाद देर रात घर लौटना. हमारी यह जीवनशैली देखकर उनको हमारे स्वास्थ्य की बहुत चिंता हुई. उनको भी बड़े प्रेम से आमंत्रित किया जाता था. वे जातीं और मूक दर्शक बनी देखती रहतीं. कड़कड़ाती ठंड में महल जैसे वीराने घर में दोनों को अकेले रहना भी मुश्किल लगता था. प्रशांत तो घर लौटना ही नहीं चाहता था. उसे इस बात की बिल्कुल परवाह नहीं रहती थी कि मां-पापा को देर रात तक रुकना सुविधाजनक लग रहा है या नहीं.

एक दिन तो हद हो गई, जब मां ने उससे जल्दी घर चलने को कहा, तो उसने पूरे रास्ते गाड़ी को इतनी अधिक तेज रफ़्तार से चलाई कि घर पहुंचकर ही जान में जान आई. यह उसकी क्रूरता ही थी. उसे कुछ कहने से फ़ायदा नहीं था. कलह को न्योता देना ही था. नवंबर के महीने में बर्फीली हवा और घर के दमघोंटू वातावरण ने मां की अस्थमा की बीमारी को ट्रिगर कर दिया. उन्हें लगने लगा कि कब समय बीते और वे वापस भारत जाएं. बस मुझे और नव्या को देखकर वे दोनों सब्र कर लेते थे. मां का बिस्तर पर ही समय बीत रहा था कि अचानक एक दिन प्रशांत छोटी सी बात पर मुझ पर ऊपर की मंज़िल से ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाते हुए गंदी गालियां देकर मुझ पर अनर्गल गंदे आरोप लगा रहा था. मैं नव्या के साथ नीचे खड़ी चुपचाप सब सुन रही थी. मां से रहा नहीं गया और कमरे के दरवाज़े पर खड़े होकर उन्होंने सब सुना. मुझे तो आदत सी पड़ गई थी, लेकिन वे उसका यह रूप पहली बार देख रही थीं. उन्हें हैरानी होती थी कि नव्या भी अपने पापा को कुछ नहीं कह पाती. वे बहुत जल्दी समझ गई थीं कि उसमें बदलाव उम्र के कारण नहीं आया था, बल्कि घर के वातावरण ने ही उसकी चुलबुलाहट को ग्रसित कर लिया था. वे कुछ नहीं बोलीं.

अगले दिन सुबह ही मां ने मुझे अपने पास बुलाया और बोलीं, “अब बर्दाश्त के बाहर की बात हो रही है. मैं तेरी एक नहीं सुनूंगी! क्यों सहन कर रही है इसको! तेरे अंदर क्या कमी है, जो तुझे इसके साथ रहने पर मजबूर कर रही है! भारत में लोग रहते नहीं हैं क्या? इसी दिन के लिए तुझे पढ़ाया-लिखाया गया है क्या! अब जो होगा देखा जाएगा! अब इसकी सॉरी से नहीं पिघलूंगी. यह बहुत ड्रामेबाज़ है. मैं इससे ज़रूर बात करूंगी. मुझे मत रोकना! इसकी तो हिम्मत बढ़ती ही जा रही है. हमारा भी लिहाज़ नहीं है इसे. मेरे सामने इसका ऐसा व्यवहार है तो पीछे से कैसा होगा! तू तो हमें कुछ बताती नहीं है. वह तो अच्छा हुआ हम आ गए हैं. नहीं तो यह सिलसिला चलता ही रहता.” वे लगातार ग़ुस्से में बोलती गईं.

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पहली बार मैंने उनको बोलने से मना नहीं किया. पापा भी जो हमेशा रिश्ते जुड़े रहने के पक्षधर हैं, कुछ नहीं बोले. नाश्ते के बाद मां प्रशांत से बोलीं, “मुझे तुमसे कुछ बात करनी है. ना तो मेरी बेटी तुम्हारे साथ भाग कर आई है और ना ही मैंने इसे तुमको बेचा है. या तो सुधर जाओ या इससे अलग हो जाओ! यह मेरा अंतिम फ़ैसला है..!” वह कहां इतना सुनने वाला था! मां की बात पूरी भी नहीं हुई थी, वह उठ कर चला गया, लेकिन उनका निर्णय उसने सुन लिया था. हम तीनों कमरे में आ गए. आते ही मैं मां से लिपट कर रुआंसी होकर बोली, “मां पहली बार मुझे मुक्तिबोध का एहसास हुआ है. मुझे हैरानी है कि 20 वर्ष तक मैं क्यों और कैसे इस इंसान को झेलती रही. लेकिन मुझे लगता है कि हर निर्णय का समय निश्‍चित होता है. अच्छा हुआ आप आ गईं, नहीं तो मेरा जीवन ऐसे ही चलता रहता. मैं दो वर्ष और यह सब झेलूंगी, नव्या के बारहवीं करने तक. अगले वर्ष मैं वकील से मिलकर तलाक़ के लिए केस फाइल कर दूंगी. सुना है यहां तलाक़ मिलने में लगभग एक वर्ष लग जाता है. इंडिया की तरह केस को लंबा नहीं खींचते. इस बारे में मैं जल्दी ही किसी वकील से सलाह लूंगी. आप चिंता न करें. मैं भी थक गई हूं. नव्या के कॉलेज के हॉस्टल में शिफ्ट होते ही मैं इंडिया आपके पास आ जाऊंगी. तरस गई हूं आपके साथ रहने के लिए.” इतना कहकर मैं फफक-फफक कर रोने लगी. मेरी पीठ पर सांत्वना देने के लिए हाथ फेरते हुए मां की भी आंखें गीली हो गईं.

इस घटना के एक हफ़्ते बाद उनकी वापसी हुई. पूरे हफ़्ते प्रशांत उनके सामने आने से बचता रहा. उसको समझ आ गया था कि अब उसका सॉरी निष्फल रहेगा. किचन में बर्तनों की आवाज़ से मेरे विचार तंतुओं को झटका लगा. लंच का समय हो गया था. मैं एक नई उम्मीद और आत्मविश्‍वास के साथ कि अब मैं प्रशांत की ज़्यादितियों का विरोध करूंगी और ख़ुद पर और अपने करियर पर फोकस करूंगी की सोच के साथ किचन की ओर लपकी.

सुधा कसेरा

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