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कहानी- वही चांद (Short Story- Wahi Chand)

“अच्छा, एक बात बताओ, यह व्रत किसके लिए रखती हो?”

“तुम्हारे लिए.”

“तो फिर ज़मीन कोई भी हो, देश कोई भी हो, मैं तुम्हारे साथ ही तो हूं. देखो, ज़मीन भले बदल गई हो, जगह भले बदल गई हो, लेकिन चांद तो वही है न!..”

शादी के बाद यह मेरी पाचवीं और विदेश में पहली करवा चौथ थी. उसी श्रद्धा और उसी आस्था के साथ मैंने व्रत तो रख लिया था, लेकिन मन में इस बार पहले जैसा उत्साह नहीं था. अपने देश में हर साल सहेलियों और परिवार की दूसरी महिलाओं के साथ सामूहिक करवा चौथ की पूजा देखती और करती थी. ख़ूब रौनक़ रहती थी. सबके सजे-धजे चेहरे, पूजा की थालियां, हंसी-मज़ाक और गीतों के बीच कब शाम हो जाती, पता ही नहीं चलता था. लेकिन इस बार पूजा अकेले करनी थी.

मन उदास हुआ तो सासू मां को फोन लगा दिया, उन्होंने मेरी आवाज़ सुनते ही मेरी उदासी भांप ली, “क्या हुआ नंदिनी? तुम्हारी आवाज़ इतनी बुझी-बुझी क्यों है?”

“कुछ नहीं मां! बस आपकी और घर की बहुत याद आ रही है. यहां पूजा का सामान भी ठीक से नहीं मिला, समझ में नहीं आ रहा कि पूजा कैसे करूंगी? वहां तो सब साथ में पूजा करते थे, थाली बदलने से लेकर बाकी सारी रस्में भी मिल-जुलकर हो जाती थीं. यहां अकेले क्या करूंगी? किसके साथ पूजा करूंगी? सच कहूं तो बहुत अजीब लग रहा है.”

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सासू मां हंसते हुए बोलीं, “नंदिनी, जीवन में कई बार परिस्थितियों के हिसाब से पूजा करने का तरीक़ा बदल जाता है. हमेशा सबके साथ पूजा करती थी, आज विदेश में हो तो अकेले कर लेना. पूजा का महत्व थाली बदलने या लोगों की भीड़ से नहीं, मन की श्रद्धा से होता है. व्रत वाले दिन ऐसे उदास नहीं होते, पूरे उत्साह से पूजा करना, जैसे अपने घर में करती थी, और निखिल तो तुम्हारे साथ है ही, तुम दोनों मिलकर पूरी श्रद्धा से करवा माता की पूजा करना.”

उनकी बातें सुनकर मन थोड़ा हल्का हुआ. मैंने पूरी श्रद्धा से व्रत रखा. करवा माता और सर्वमंगला माता की पूजा की. शाम ढलने लगी तो चांद का इंतज़ार शुरू हो गया. आसमान में बादल छाए हुए थे. चांद निकल चुका था, लेकिन बादलों के पीछे छिपा था. आधा घंटा बीत गया. मैं बार-बार आसमान की ओर देखती, फिर घड़ी पर नज़र डालती. सच कहूं तो मुझसे ज़्यादा बेचैनी निखिल को हो रही थी.

“क्या हुआ? इतनी उदास क्यों हो गई?” उसने मेरे पास आकर पूछा.

मैंने धीमी आवाज़ में कहा, “जब अपने देश में थी न, तो करवा चौथ की पूजा करने में कितना मज़ा आता था. सबके साथ गाते-बजाते, हंसते-बोलते समय का पता ही नहीं चलता था. यहां तो एक-एक पल मुश्किल से कट रहा है. आज बहुत याद आ रही है अपने घर की, मां की, सासूमां की और उन सबकी, जिनके साथ हर साल यह दिन मनाती थी.”

निखिल ने प्यार से मेरा हाथ थाम लिया.

“अपनों की याद आ रही है न?”

“हां, बहुत…”

वह मुस्कुराया, “अच्छी बात है, कम से कम तुम्हें अपने लोगों से इतना प्यार तो है कि उनसे दूर होकर भी उनका जुड़ाव महसूस करती हो.”

“वह सब ठीक है निखिल, लेकिन तुम नहीं समझोगे, तीज-त्योहार पर अपने घर की याद कुछ ज़्यादा ही आती है.”

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“अच्छा, एक बात बताओ, यह व्रत किसके लिए रखती हो?”

“तुम्हारे लिए.”

“तो फिर ज़मीन कोई भी हो, देश कोई भी हो, मैं तुम्हारे साथ ही तो हूं. देखो, ज़मीन भले बदल गई हो, जगह भले बदल गई हो, लेकिन चांद तो वही है न! जिस चांद को तुम अपने देश में देखकर व्रत खोलती थीं, उसी चांद को यहां देखकर भी व्रत खोलोगी, और जो निखिल उस देश में तुम्हारे साथ था, वही निखिल इस देश में भी तुम्हारे साथ है, फिर इतनी उदासी क्यों?”

मैं उसे देखती रह गई. उसकी बात में कितना अपनापन था! सचमुच, देश बदलने से क्या अपना प्यार बदल जाता है? घर से दूर होने पर क्या रिश्तों की गर्माहट कम हो जाती है? मैं बड़े प्यार से उसके गले लग गई. और तभी बादलों के पीछे छिपा चांद धीरे-धीरे बाहर निकल आया.

“निखिल, चांद निकल आया!”

मैंने उत्साह से कहा और पूजा की थाली उठा ली. चांद को देखकर मन में एक अलग ही शांति उतर आई. मैंने पूरी श्रद्धा और भाव से चांद को अर्घ्य दिया. फिर हाथ जोड़कर प्रार्थना की- हे चांद! मैं किसी भी देश में रहूं, किसी भी ज़मीन पर रहूं, तुम हमेशा मेरे चांद यानी मेरे निखिल की और मेरे अपनों की रक्षा करना. मेरे दिल में उनके लिए यह प्यार हमेशा बनाए रखना. मुझसे मेरा देश दूर हो सकता है, मेरे अपने दूर हो सकते हैं, लेकिन मेरे मन से उनका अपनापन कभी दूर न हो.”

निखिल ने बड़े प्यार से मुझे पानी पिलाया. मैंने व्रत खोला तो लगा, जैसे मन पर छाई उदासी भी धीरे-धीरे छंट गई हो!

पूर्ति खरे

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