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कहानी- आपकी ख़ातिर (Short Story- Aapki Khatir)

सिर मुंडाते ही ओले. आते ही उन्होंने एक करारा सा तमाचा मेरे गाल पर मार दिया. मेरी आंखों के आगे पूरा ब्रह्माण्ड ही घूम गया और मैं स्कूटर से नीचे गिर पड़ा. मेरे गिरने की आवाज से मुकेश ने पलटकर देखा. उसके तो होश उड़ गए.

 

सीमा इसलिए प्रभावित थी कि मैंने अपनी दसवीं कक्षा प्रथम श्रेणी में विशेष योग्यता से पास की और उसका प्रथम श्रेणी प्रतिशत मुझसे कम था. ग्यारहवीं में आते ही हम दोनों इतने पक्के दोस्त हो गए, जितने पक्के दसवीं कक्षा में दुश्मन थे, क्योंकि मैं शैतान और वह सीधी थी.

इस दोस्ती ने धीरे धीरे रंग बदला और प्रेम परवान चढ़ना शुरू हो गया. साथ साथ फिल्में देखने के कारण उनमें प्रदर्शित प्रेम प्रसंग हम दोनों को उत्साह देता था और उसमें दर्शाए गए तरह-तरह के प्रेम प्रकरण हम सीखने लगे.

एक दिन मैंने सीमा से फिल्म देखने का वादा कर लिया, परंतु समस्या थी कि उस दिन आर्थिक संकट के बादल मेरे ऊपर मंडरा रहे थे. किसी तरह का कोई चारा न था. मित्रों ने अपनी खाली जेबें उलट कर दिखा दीं. पिताजी ने पैसे देने से डांट दिया. मां का पर्स खाली था तथा भाई ने पैसे के नाम पर झिड़क दिया.

“क्या करते हो इतने पैसों का? फ़िज़ूलख़र्ची? नहीं है पैसे-वैसे मेरे पास.”

मायूस चेहरा और ग़मगीन दिल लिए मैं एक पुस्तक लेकर बैठक में बैठा पढ़ रहा था. इतने में बाहरसे आवाज़ आई, “राजीव…”

मैं पहचान गया, मुकेश आ गया है.

मैंने उसे बैठक में बैठा दिया. वहीं एक जगह उस समय ऐसी थी, जहां हम दोनों के अलावा कोई न था. मैंने उसे अपने संकट का कारण बताया और उससे भी सहायता करने की अपील की. प्रभु प्रेमियों पर बड़ी कृपा करता है. मुकेश ने मुझे सांत्वना देते हुए कहा, “इंतज़ाम हो गया. चिंता मत कर, लेकिन तुझे मेरे साथ अभी चलना होगा.” और मेरे पास खिसक कर कान में कहने लगा,‌ “मुझे पिताजी ने पचास रुपए दिए हैं, पेट्रोल डलवाने के लिए, हम ऐसा करेंगे कि किसी स्कूटर से तीन लिटर तेल निकाल कर अपने स्कूटर में डाल लेंगे और तू मुझसे ये पचास रुपए ले जाकर अपना काम चलाना.”

मैं एकदम चौंक गया,‌ “तो तू मेरे लिए चोरी करेगा?”

“नहीं यार, मैं तो किसी दूसरे के स्कूटर से पेट्रोल निकालूंगा और अपने में डालूंगा. ये चोरी थोड़े ही है. ऐसा तो मैं पहले भी कई बार कर चुका हूं. हां,ये अलग बात है कि अब की बार का ख़र्चा मैं तुझे दे रहा हूं.”

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मुझे तो पसीना आ गया और वह साधारण रूप सेअपनी बात कह रहा था. प्रस्ताव के पक्ष में दी गईमेरी दलीलें न्यायोचित थीं, परंतु उसकी बात इसलिए शेर रही, क्योंकि मेरी ज़रूरत मेरी मजबूरी थी. इंसान ज़रूरत का ही तो ग़ुलाम है. अंत में वह जीत गया और मैं हार गया.

घर पर यह कह कर कि मैं मुकेश के साथ जा रहाहूं और अभी आता हूं, चल दिया. मुकेश को मालूम था कि कहां क्या करना है.

एक बिल्डिंग, जिसमें प्रथम तल पर विभिन्न कार्यालय थे, उसकी चहारदीवारी के सहारे एकांत में स्कूटर एक कतार से खड़े थे. उन्हीं में से एक हरे रंग के स्कूटर के पास ले जाकर मुकेश ने अपना स्कूटर रोका. मुझे सख्त हिदायत दी कि मैं स्कूटर के चालक वाली सीट पर बैठा रहे और कुछ न करूं. मेरे साथ यह पहला मौक़ा था, इसलिए हृदय की धड़कन इतनी तेज़ थी कि उसकी आवाज़ मेरे कानों तक आ रही थी, लेकिन फिर भी मैं सामने की ओर मुंह करके बैठ गया.

इस बीच मुकेश ने स्कूटर की डिग्गी खोल कर उसमें से एक पानी की बोतल, एक रबड़ का हरे रंग का पाइप निकालकर अपने स्कूटर की पेट्रोल-टंकी खोली और खड़े हुए उस दूसरे हरे रंग के स्कूटर के पास जाकर बगल में बैठ गया. वह इस तरह बैठा कि सड़क पर खड़े व्यक्ति की नज़र उस पर न पड़े, परन्तु ताड़ने वाले तो क़यामत की नज़र रखते हैं.

दो बोतल पेट्रोल वह डाल चुका था तथा तीसरी भर रहा था कि सामने से आते हुए दो व्यक्ति मुझे दिखाई दिए, जो हमारी ही तरफ़ देख रहे थे. मैं मुकेश को इसलिए आगाह न कर सका कि उसेबताते हुए शायद वे लोग पहचान जाएंगे, लेकिन ये क्या मालूम था कि उन्होंने प्रथम तल से ही अपने कार्यालय की खिड़की से हमें देख लिया था.

सिर मुंडाते ही ओले. आते ही उन्होंने एक करारा-सा तमाचा मेरे गाल पर मार दिया. मेरी आंखों के आगे पूरा ब्रह्माण्ड ही घूम गया और मैं स्कूटर से नीचे गिर पड़ा. मेरे गिरने की आवाज से मुकेश ने पलटकर देखा. उसके तो होश उड़ गए.

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बोतल हाथ से गिर गई, पाइप भी फिसल गया. उन दोनों व्यक्तियों ने हम दोनों दोस्तों की लकड़ी वही रबड़ की पाइप, लात तथा घूंसों से पूजा शुरू कर दी. हम दोनों रो रहे थे, परंतु हमारी कोई नहीं सुन रहा था. हमारी प्रार्थना शायद ईश्वर भी नहीं सुन रहा था. बुरे वक़्त का कोई साथी नहीं होता. कई बार थप्पड़, लात तथा घूंसों के प्रहार हमारी नाजुक देह बर्दाश्त नहीं कर पाई और हम गिर गए, मगर हमें मारने वाले क्या जांबाज़ थे! वे हमारा गिरेबान पकड़ कर एक झटके से उठा लेते थे, वे तीस-तीस साल के जवां मर्द और हम सोलह-सत्रह, साल के किशोरों को ठोक ठोक कर मज़बूत बनाने की अपनी पूरी कोशिश करते रहे. अंततः जब इस हुजूम में आए सभी लोगों की पूजा हम दोनों मित्रों ने सिर झुकाकर श्रद्धा से स्वीकार कर ली, तब उस भीड़ में खड़े एक वृद्ध व्यक्ति ने हुजूम के साथ यही निर्णय किया कि हम दोनों को ऊपर ले जाया जाए तथा हमारे अभिभावकों को उनके बच्चों की बहादुरी के कारनामों के लिए उनको बेइज़्ज़त करके उनका अभिनंदन किया जाए.

हम दोनों ऊपर लाए गए. हमें एक कोने में बिठा दिया गया. बारी बारी से हमसे पूछा गया- नाम, पिता का नाम, क्या करते हो तथा पिताजी

क्या करते हैं एवं कहां पढ़ते है हम? इत्यादि.

मुकेश दोस्त के नाम पर कलंक नहीं था, इसलिए तो उसने उन लोगों से कहा कि वह मुझे नहीं जानता, परंतु उस कार्यालय में भी हमारे सच न बतानेपर घूंसे, लात और थप्पड़ पड़ने ही थे. मार के आगे तो भूत भी भागते हैं. हम धीरे-धीरे सच बताते गए, सबसे ज़्यादा सच मैं ही बता रहा था, क्योंकि मेरी कंगाली में आटा गीला हो गया था और करने वाला मुकेश था. बैठे बिठाए मुझे वह यहां घसीट लाया, अरे, मर तो नहीं जाता, अगर उस दिन सीमा के साथ फिल्म न देख पाता? परंतु अपने दिल की बात किससे कहता?

मुकेश ने उन लोगों को बताया कि उसके जेलर समान पिता का तो मद्रास तबादला हो चुका था तथा एक बड़ा भाई है. चूंकि मेरा घर कार्यालय से दूर था, इसलिए उन लोगों ने मुकेश के भाई को बुलवा भेजा. इस बीच कार्यालय में बैठे लोगों में से किसी एक ने पूछा, “बेटा, कहां पढ़ते हो?”

मैंने कहा, “सेंट मैरी स्कूल में अंकल.”

“कौन से स्टैंडर्ड में?” उसने फिर पूछा.

“इलेविन्ध में अंकल.”

“आज क्या किसी गर्लफ्रेंड से वादा किया था फिल्म देखने का?”

उसके इस प्रश्न पर मैं चकित होकर उसके चेहरे की ओर देखने लगा. अपने चेहरे पर और मासूमियत लाकर बड़ी विनम्रता से मैंने कहा, “किसी से नहीं अंकल.”

उस व्यक्ति ने बड़े आत्मविश्वास से कहा, “हम मान ही नहीं सकते बेटा.”

फिर अपने दूसरे साथी की तरफ़ मुखातिब होकर

कहने लगा, “शर्माजी, आजकल कॉन्वेंट स्कूलों में तो इश्क़ की महामारी फैली हुई है. छोटे-छोटे से बच्चे बड़ों के नक्शे कदम पर इश्क़ फरमाते हैं. पढ़ाई लिखाई को तिलांजलि और इश्क़बाज़ी, मटरगश्ती. यही है आजकल की स्कूल की शिक्षा.”

इस पर शर्माजी ने चुटकी ली, “यार, कली ही अगर भंवरे से प्यार नहीं करेगी तो फूल कैसे बनेगी?”

और इस तरह इश्क़ का वह विषय उन कार्यालय-कर्मचारियों में आपस में चर्चा का कारण बन गया.

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इस बीच मुकेश के भइया कार्यालय में आ पहुंचे.

भइया को देखते ही मुझे पसीने आ गए और थप्पड़, लात-घूसों से सूजा हुआ लाल चेहरा एकदम काला पड़ गया. मुकेश की प्रतिक्रिया तो मुझसे भी भयंकर हुई. वह एकदम बोल उठा, “मुझे लैट्रिन आई है.”

डर की वजह से उसे टट्टी की शिकायत हो गई. कर्मचारियों ने उसे लैट्रिन कर आने की छूट दे दी, परंतु जैसे ही वह शौचालय से बाहर आया, उसका चेहरा एकदम पीला तथा पसीने से लथपथ था. उसे नर्वस ब्रेकडाउन हो गया था.

मुकेश के भइया को बताया गया कि इसने पहले भी तीन बार उनका पेट्रोल चोरी किया था. भइया ने एकदम से दुखी होकर उन लोगों से कह दिया, “पुलिस को दे दीजिए इन्हें.”

परंतु वह व्यक्ति, जिसके स्कूटर का पेट्रोल हम लोग चुरा रहे थे, कुछ दयावान था और उसने उल्टा भइया को ही झिड़क दिया, “हम लोगों ने अगर इन्हें पुलिस को दे दिया तो किसी भी धारा में बंद करके जेल भेज देगी. इससे इन बच्चों का भविष्य तबाह हो जाएगा और रुपए की भी बरबादी होगी, इसलिए बेहतर ये है कि आप इन्हें घर ले जाएं और इनके पिताजी से इनकी शिकायत करें, ताकि इन्हें सुधारा जा सके.”

मुकेश के भइया, बेचारे शर्मिंदगी से सिर झुकाए उन लोगों की सलाह सुन, हम दोनों को लेकर वापस चल दिए, जितना पेट्रोल हमने उसके स्कूटर में से लिया, वह सब लौटा दिया और मन ही मन उस स्कूटर मालिक को धन्यवाद दिया कि उसने हमें पुलिस को नहीं दिया.

घर आकर मुझे और मुकेश को बाकी की बची हुई मार भी पड़ी. जिसके जी में जो आया, उसने वही कहा और मैंने उसे हमनीं बनाकर अपने रामगीन दिल में छिपा लिया. मुकेश को मुझसे ज़्यादा मार लगी, क्योंकि वह चोरी में अभ्यस्त हो गया था. उस दिन उसके विगत दिनों का कच्चा चिट्ठा भी खुल गया.

दूसरे दिन मैं स्कूल पहुंचा. विगत दिन की घटना की स्मृति मेरे बाल मानस पटल पर स्थिर छायाचित्र की भांति अंकितथी, परंतु उस बालसुलभ मानस पटल पर एक आकृति और उभरी हुई थी. वह थी सीमा की. मैं सोचता आया था रास्ते भर कि कल की वादा खिलाफी की वजह क्या बताऊंगा?

कक्षा में घुसते ही मेरी दृष्टि पहले से उपस्थित सीमा पर पड़ी. उसने मुझे देखकर दूसरी तरफ़ मुंह फेर लिया एक अजीब-सी आशंका मेरे दिमाग़ में पैदा हो गई. क्या वजह थी कि वह मुझे देखकरमुस्कुराई नहीं? मैं उसके पास वाली सीट पर बैठ गया.

मध्यांतर तक मैं अपनी आशंका को दबाए अनमनेमन से कक्षा में बैठा पढ़ता रहा. मध्यांतर में कक्षा से जब सारे विद्यार्थी बाहर चले गए, तब सीमा से झिझकते हुए पूछा मैंने, “क्या बात है आज? तुम मुझे देखकर मुस्कुराई नहीं?”

उसने मुंह फुलाकर ग़ुस्से में कहा, “तुम चोर हो. तुम कल पेट्रोल चोरी में पकड़े गए थे. मेरी मम्मी ने मुझे बताया, वे वहीं से गुज़र रही थीं.”

मैं हतप्रभ उसे देखता रह गया और उसने आगे कहा, “मेरी तुम्हारी दोस्ती अब ख़त्म. मैं एक चोर को अपना दोस्त नहीं बना सकती.”

यह कह कर वह कक्षा से बाहर चली गई.

क्षण भर किंकर्तव्यविमूढ़ बैठा रहा. तत्पश्चात् जब मुझे मेरी उपस्थिति का भान हुआ तो मुझे अपने ऊपर हंसी आने लगी. अपने टीनएजर लव पर हंसी आने लगी और मैं गुनगुनाने लगा- क्या क्या न सहे हमने सितम आपकी खातिर…

– शिवचरन लाल वर्मा

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