बोधकथा- संघर्ष (Bodhkatha- Sangh...

बोधकथा- संघर्ष (Bodhkatha- Sangharsh)

“…घास लंबी होकर मुरझाती रही. बांस में अंकुर नहीं फूटा. मैं दोनों को अपने स्नेह से सिक्त करता रहा. आख़िर एक दिन बांस में अंकुर फूटा और दस दिन में वो घास से दस गुना बड़ा और हज़ार गुना मज़बूत हो गया...”

एक बार एक आदमी जंगल में आत्महत्या करने गया. ईश्वर ने उसे रोका, तो उसने आत्महत्या न करने का कारण पूछा. ईश्वर ने उसे एक घास और एक बांस का पेड़ दिखा कर पूछा, “ये देख रहे हो?”
व्यक्ति ने पूछा, “इसमें नया क्या है?”

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तब ईश्वर ने उत्तर दिया,
“प्रकृति ने एक साथ दो बीज डाले. एक घास का और एक बांस का. मैंने धूप और पानी दिया. कुछ दिनों में घास उग आई. बांस में अंकुर तक नहीं निकला, पर मैंने उसे त्यागा नहीं. साल बीता. घास लंबी हो गई, पर बांस में अंकुर नहीं फूटा. पर मैंने हिम्मत नहीं हारी. एक-एक कर के दस साल बीत गए. घास लंबी होकर मुरझाती रही. बांस में अंकुर नहीं फूटा.

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मैं दोनों को अपने स्नेह से सिक्त करता रहा. आख़िर एक दिन बांस में अंकुर फूटा और दस दिन में वो घास से दस गुना बड़ा और हज़ार गुना मज़बूत हो गया. जब घास लंबी होकर अपनी उम्र पूरी करके मुरझा रही थी, बांस अपनी जड़ें मज़बूत कर रहा था.”
आदमी ने आत्महत्या का इरादा छोड़ कर संघर्ष का रास्ता चुन लिया. वो समझ चुका था कि जीवन एक संघर्ष है.

– भावना प्रकाश

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Photo Courtesy: Freepik

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