खिलखिलाता बचपन जब किसी ऐसे हाथों में चला जाता है जहां अपनों से दूर उसे शारीरिक और मानसिक यातनाएं सहन करनी पड़ती है, जहां न बाहर निकलने का जरिया है और न ही जीने का कोई मकसद... इसे चाइल्ड ट्रैफिकिंग यानी बाल तस्करी कहते हैं.
चाइल्ड ट्रैफिकिंग का मतलब लड़कों और लड़कियों के साथ किए जाने वाले शोषण से है. जबरदस्ती किए जाने वाला ये शोषण श्रम और यौन के लिए किया जाता है. जानकारी के लिए बता दें दुनिया भर में ह्यूमन ट्रैफिकिंग के सभी पीड़ितों में से 27% बच्चे हैं और हर तीन पीड़ित बच्चों में से दो लड़कियां हैं.

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चाइल्ड ट्रैफिकिंग के कुछ मामलों में बच्चों को उनके परिवार का कोई सदस्य, रिश्तेदार और परिचित द्वारा बेच दिया जाता है. जबकि कुछ मामलों में बच्चों को गरीबी से दूर शानदार जीवन, (अच्छा खाना-पीना, अच्छे कपड़े, खिलौनों और शिक्षा) के झूठे वादे कर उन्हें बहला-फुसलाकर ले जाते हैं, जबकि असलियत कुछ और ही होती है. चाइल्ड ट्रैफिकिंग से पीड़ित बच्चे शारीरिक, यौन और भावनात्मक हिंसा, दुर्व्यवहार, यातना और सदमा, बंधुआ मजदूरी, जबरन शादी और गुलामों जैसा जीवन जीने के मजबूर होते हैं. इनके साथ जानवरों से भी बुरा व्यवहार किया जाता है. उनका जीवन खराब हो जाता है और वे अधिकारों से वंचित रहते हैं.
क्या कहते हैं आंकड़े
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के अनुसार- भारत में हर आठ मिनट में एक बच्चा लापता होता है. जो चाइल्ड ट्रैफिकिंग की गंभीरता को दर्शाता है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार- भारत में साल 2023 में लगभग बीस हजार बच्चे ऐसे थे जो सड़कों पर रहते थे. इनमें से सिर्फ दस हजार बच्चे ऐसे थे जो अपने परिवार के साथ सड़क किनारे पर रहते थे और बाकी के दस हजार बच्चे बेघर थे. ये बेघर बच्चे न सिर्फ बाल श्रम और तस्करी का शिकार होते हैं, बल्कि उन्हें यौन शोषण, शारीरिक दुर्व्यवहार और उत्पीड़न का भी सामना करना पड़ता है.

कैसे निपटें चाइल्ड ट्रैफिकिंग से?
चाइल्ड ट्रैफिकिंग से निपटने के लिए एक बहुआयामी रणनीति की आवश्यकता है. इस रणनीति के तहत -
- मजबूत कानूनी ढांचा बनाया जाए, जैसे- इम्मोरल ट्रैफिक (प्रिवेंशन) एक्ट, 1956 (ITPA)
- जुवेनाइल जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन) एक्ट, 2015,
- प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्शुअल ऑफेंसेज (POCSO) एक्ट, 2012
- ट्रैफिकिंग ऑफ पर्सन्स (प्रिवेंशन, केयर एंड रिहैबिलिटेशन) एक्ट, 2021 का सख्त प्रवर्तन

कैसे करें रोकथाम?
- सामाजिक-आर्थिक असुरक्षा को दूर करने के लिए बच्चों को शिक्षा की व्यवस्था करें, गरीबी उन्मूलन और जागरूकता अभियान चलाए जाएं.
- 'बाल रक्षा भारत' जैसी संस्थाओं द्वारा चलाए जा रहे कार्यक्रम, जहां स्थानीय स्तर पर सतर्कता समितियां गठित की जाती हैं.
- राज्यों के सीमावर्ती क्षेत्रों में निगरानी बढ़ाना.
- पूनम शर्मा
