काव्य- अपने-अपने क्षितिज… (Kavay...

काव्य- अपने-अपने क्षितिज… (Kavay- Apne-Apne Kshitij…)

तुमने मुझे लिखा
मैंने तुमको
आपस में कविताएं बदलकर भी
हम स्वयं को पढ़ सकते हैं

अधूरे तुम भी रहे
पूरा मैं भी कहां हो सकी
सजा करके अपने-अपने अधूरेपन
हम पूर्ण हो सकते हैं

तुमने स्वीकारा चुप रहना
मैंने कुछ भी न बोलना
अपने मौन कवच में भी
हम बहुत कुछ कह सकते हैं

तुम्हारी अपनी व्यस्तताएं
मेरी अपनी रही
यूं उलझे हुए से हम
एक-दूसरे को सुलझा सकते हैं

कहीं तुम उदास दिखे
मैं भी थोड़ी अनमनी
हज़ारों तरीक़े हैं
अपनी-अपनी शिकायतें बांट सकते हैं

तुम्हारी अपनी सीमाएं
मेरे भी कुछ दायरे
अपने-अपने वृत्तों में हम
कोई नया सिरा खोज सकते हैं

तुमने अपनी तरह सोचा
मैंने अपनी तरह
कल्पनाओं का एक नया क्षितिज गढ़कर
हम दोनों वहां मिल सकते हैं

हां माना, क्षितिज एक भ्रम है
तो भ्रम ही सही
अपने-अपने क्षितिज में हम
धरती-आसमान बन सकते हैं

इतना तो कर ही सकते हैं
हैं न!!

नमिता गुप्ता ‘मनसी’

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Photo Courtesy: Freepik

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