कविता- काश! (Kavita- Kash!)

ज़िंदगी पूरी लगा दी

एक-दूसरे को परखने में

सोचती हूं काश!

समय रहते कुछ वक़्त लगाया होता

एक-दूसरे को समझने में

 

ख़ामियां बहुत निकाली हमने

एक-दूसरे में

कसर नहीं छोड़ी हमने

घर की बात, कठघरे में लाने में

काश! समय रहते

हमने सुलझा लिया होता

घर की बात को घर में

जैसा आज है ज़माना

उससे तो बहुत बेहतर होता

 

काश! थोड़ी-सी माफ़ी

थोड़ा-सा सामंजस्य कर लिया होता

तो बचपन, मेरे घर का कुछ और ही होता

काश! देखी होती सहमी-सहमी आंखें उनकी

तो आज उन आंखों की चमक कुछ और ही होती

काश! ख़ामोशी पके बालों की महसूस की होती हमने

तो उनके चेहरे का नूर आज कुछ और ही होता…

 

अनूपा हर्बोला

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