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काव्य- वो निगाह मेरी है… (Kavya- Wo Nigah Meri Hai…)

By Admin June 21, 2019 in Digital PR

 

Kavya- Wo Nigah Meri Hai

कुछ तो मिलता है सोच कर तुझको

हर उड़ान की जद में आसमां नहीं होता

 

दिल अगर आंख, आंख दिल होती

तो दर्द लफ़्ज़ों का कारवां नहीं होता

 

सदमें और हक़ीक़त का फैसला अधूरा था

वरना धड़कन में तेरा बयां नहीं होता

 

ख़्वाब की जागीर में पेंच थे घटाओं के

यूं ही तेरी ज़ुल्फ़ में रूहे मकां नहीं होता

 

फ़रिश्ते भी मांगते हैं छांव तेरे पलकों की

वो निगाह मेरी है जहां राजदां नहीं होता…

 

Murli Manohar Shrivastav

मुरली मनोहर श्रीवास्तव

 

मेरी सहेली वेबसाइट पर मुरली मनोहर श्रीवास्तव की भेजी गई कविता को हमने अपने वेबसाइट में शामिल किया है. आप भी अपनी कविता, शायरी, गीत, ग़ज़ल, लेख, कहानियों को भेजकर अपनी लेखनी को नई पहचान दे सकते हैं…

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