लघुकथा- घर-ख़र्च (Laghukath...

लघुकथा- घर-ख़र्च (Laghukatha- Ghar-kharch)

“भाभी, ये भैया को दे देना. बैंक में जमा करवा देंगे. घर मे रहेंगे, तो ख़र्च ही हो जाएंगे.” पीछे मुड़ते हुए बोली, “पिताजी को मत बताना और पासबुक भी आप ही रख लेना, मैं फिर कभी आकर ले जाऊंगी.” उसका इशारा अपने ससुरजी पर था.

पड़ोस की नीरा आज सुबह-सुबह दरवाज़े पर खड़ी थी. मैंने दरवाज़ा खोला, तो अपनी बैंक की पासबुक के साथ 100 के 20 नोट मुझे पकड़ाते हुए कहा, “भाभी, ये भैया को दे देना. बैंक में जमा करवा देंगे. घर मे रहेंगे, तो ख़र्च ही हो जाएंगे.” पीछे मुड़ते हुए बोली, “पिताजी को मत बताना और पासबुक भी आप ही रख लेना, मैं फिर कभी आकर ले जाऊंगी.” उसका इशारा अपने ससुरजी पर था.
मैंने बैंक पासबुक और पैसे अपने पति को सौंप दिए, जो बैंक मे कार्यरत हैं. सोचती रही कि नीरा ने सही ही कहा कि घर में तो ख़र्च ही हो जाते हैं. कितनी मुश्किल से कमाती है नीरा. पति तो शराबी ठहरा.
अगले ही दिन नीरा के ससुरजी दरवाज़े पर खड़े थे. हाथ में बीमा की रसीद और पूरे चार हज़ार दो सौ पैंसठ रुपए… पांच का सिक्का अलग हाथ में पकड़े हुए.

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मुझसे बोले‌, “यह पोती के नाम से पॉलिसी का प्रीमियम जमा करवाना है.” पिताजी जानते हैं कि मैं बीमा कंपनी में काम करती हूं. मैंने रसीद देखकर तारीख़ देखी, तो बोली, ”अभी तो इसमें पूरे बीस दिन बाकी हैं. एक महीने की पूरी छूट मिलती है जमा करवाने में.”
वे बोले‌‌‌, “घर में तो ख़र्च ही हो जाएंगे. सोचता हूं नीरा की कुछ मदद ही कर दूं, इसलिए पेंशन मिलते ही ज़रूरी ख़र्च पहले ही ज़मा कर देता हूं.” ना जाने कौन-सा सपना दिखा रहे थे पिताजी और मैं लौटते हुए पिताजी की पीठ पर घर-ख़र्च की परिभाषा ढूंढ़ने की कोशिश कर रही थी.

Sangeeta Sethi
संगीता सेठी

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