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लव स्टोरी- मेरे सपनों का राजकुमार… (Love Story- Mere Sapno Ka Rajkumar…)

शादी से लेकर हनीमून तक के सफ़र में वे हर पल मेरे संग बने रहने का प्रयास करते रहे और मैं किसी-न-किसी बहाने दूर छिटकने का. ख़ासकर हनीमून के वक़्त, तो मैं इस बात को लेकर काफ़ी काॅन्शियस हो गई थी कि लोग हमें साथ-साथ देखकर उल्टे-सीधे ताने न कसने लगें.

कहते हैं, शादी और हनीमून एक लड़की की ज़िंदगी के सबसे हसीन पल होते हैं. जिनका वह तरूणाई से यौवनावस्था तक बेसब्री से इंतज़ार करती है. मेरी ज़िंदगी में भी ये पल आए, लेकिन अफ़सोस मन में इन्हें लेकर मुझे कोई खु़शी या उत्साह नहीं था. दरअसल, परिस्थितियां कुुछ ऐसी बन पड़ी थीं कि जिस लड़के से मेरी शादी तय हुई थी, वह किसी मायने में मेरे सपनों के राजकुमार से मेल नहीं खा रहा था. छोटा कद, सांवला रंग, दुबली काया, चेहरे पर दाग़, जबकि अपने सौन्दर्य को लेकर मैंने हमेशा राजकुमारी और चंदा जैसी उपमाएं ही सुनी थीं.
शादी से लेकर हनीमून तक के सफ़र में वे हर पल मेरे संग बने रहने का प्रयास करते रहे और मैं किसी-न-किसी बहाने दूर छिटकने का. ख़ासकर हनीमून के वक़्त, तो मैं इस बात को लेकर काफ़ी काॅन्शियस हो गई थी कि लोग हमें साथ-साथ देखकर उल्टे-सीधे ताने न कसने लगें. इसलिए जैसे ही हम अपने गंतव्य मनाली पहुंचे, तो होटल में पहुंचते ही मैं रिसेप्शन से अपने सुइट की चाबियां लेकर सीढ़ियां चढ़ने लगी. जबकि मेरे पति बैरे को सामान उठाने में मदद करने लगे.
सुइट में पहुंचकर मैं राहत की सांस ले ही रही थी कि नीचे से हो-हल्ला सुनाई पड़ा. मैंने खिड़की से नीचे झांका, तो देखा एक लड़की अपनी साड़ी संभालती तेजी से भाग रही है, उसके पीछे-पीछे मेरे पति और उनके पीछे चार-पांच लोगों की भीड़. मेरी तो रूह कांप उठी.
‘हे भगवान! सूरत के साथ-साथ क्या यह इंसान चरित्र से भी..?’ मुझे चक्कर-सा आने लगा और मैं बिस्तर पर बेसुध गिर गई. जोर-जोर से दरवाज़ा खटखटाने की आवाज़ से मेरी तंद्रा टूटी. बाहर एक गार्ड को खड़ा देखा. उसने मुझसे पूछा कि सुनिल कुमार आपके पति हैं? तो मेरा संदेह यकीन में बदल गया. ‘अब क्या होगा? मुझे थाने जाकर अपने पति के बेकसूर होने की दुहाई देनी होगी?’
कांपते कदमों से मैं उसके संग नीचे आई. तो वही लड़की लपककर भीड़ चीरती मेरे एकदम पास आ गई.
‘आपके पति ने मेरा सब कुछ लुटने से बचा लिया.’ वह भावविह्ल हो रही थी. उसके पति ने उसे संभाला. पता चला वह भी हनीमून कपल था. विदा होते वक़्त रिवाज़ के अनुसार लड़की ने भारी साड़ी और सारे गहने पहन रखे थे, जो उसके पति ने उतरवाकर उसके पर्स में रखवा दिए थे. वह जब रिसेप्शन पर चाबी ले रहा था, तभी एक बदमाश, जो जाने कब से उन पर नज़र रखे हुए था, लड़की का पर्स झपट्टा मारकर ले उड़ा.
साड़ी संभालते वह उसके पीछे लपकी. मेरे पति तुरंत उसकी मदद को दौड़े. और मैं बेवकूफ़ बिना पूरी बात जाने ही न जाने क्या समझ बैठी? अपनी सोच पर मैं बेहद लज्जित हो उठी. तभी सामने से लोग हटे, तो एक बैंच पर मुझे अपने पति बैठे दिखे. उनके पैर में चोट आई थी और एक आदमी मरहमपट्टी कर रहा था. मैं दौड़कर उनसे लिपट गई और फूट फूटकर रोने लगी. वे मुझे प्यार से सहलाने लगे, “कुछ भी तो नहीं हुआ, मैं बिल्कुल ठीक हूं.”
मैं कहना तो चाहती थी कि ये पश्चाताप और खु़शी के मिलेजुले आंसू हैं, जिन्होंने मेरे मन का सारा मैल धो दिया है. पर निःशब्द मंत्रमुग्ध उन्हें निहारती ही रह गई, क्योंकि मेरे सामने बेहद ख़ूबसूरत, उज्ज्वल, मज़बूत कद-काठीवाला मेरे सपनों का राजकुमार जो खड़ा था… जो मेरा पहला प्यार ही नहीं जन्मभर का साथ भी बन गया था…

संगीता माथुर

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