‘वर्क व्हाइल यू वर्क, प्ले व्हाइल यू प्ले’ यानी जब काम करें तो पूरी तरह काम करें और जब आराम करें तो पूरी तरह आराम! यह बात बहुत पुरानी है, लेकिन आज की तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी में शायद हम इसे भूल ही चुके हैं.
छुट्टी मिलती है तो हम घूमने का प्लान बनाते हैं, टिकट बुक करते हैं, होटल चुनते हैं, कपड़े पैक करते हैं, तस्वीरें खींचने की तैयारी करते हैं, लेकिन क्या हम सचमुच छुट्टी मनाते हैं?
ज़रा सोचिए, जब आप घूमने जाते हैं तो क्या ऑफिस से पूरी तरह दूर हो पाते हैं? क्या मोबाइल पर आने वाले ईमेल और संदेश आपको परेशान नहीं करते? क्या लैपटॉप साथ नहीं जाता? और अगर लैपटॉप नहीं भी हो तो क्या मोबाइल आपका चलता-फिरता ऑफिस नहीं बन जाता?
आज इंसान इतना व्यस्त हो चुका है कि अक्सर उसके मुंह से यही सुनाई देता है, “फ़ुर्सत ही नहीं मिलती.” जब मरने तक की फुर्सत नहीं है, तो अच्छी तरह जीने का समय कहां से आएगा? यही वजह है कि अब छुट्टी मनाने के लिए भी बाकायदा प्लानिंग करनी पड़ती है. मगर असली सवाल यह है कि छुट्टी मिलने के बाद भी क्या हम अपने मन को छुट्टी दे पाते हैं?
घूमने गए, फिर भी ऑफिस साथ
हाल के एक सर्वे में सामने आया कि आज बहुत से लोग छुट्टी पर जाने के बावजूद अपने काम से पूरी तरह अलग नहीं हो पाते. लैपटॉप साथ रहता है. किसी को प्रस्तुति तैयार करनी होती है, किसी को रिपोर्ट भेजनी होती है तो किसी को एक्सेल शीट अपडेट करनी होती है. ईमेल और संदेशों का जवाब देना भी जारी रहता है.
फ़र्क़ सिर्फ़ इतना होता है कि ऑफिस में औपचारिक कपड़े पहनकर काम किया जाता है और छुट्टी के दौरान आरामदायक कपड़ों में.
मोबाइल ने तो स्थिति और बदल दी है. अब वह सिर्फ़ बातचीत या मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि छोटा सा ऑफिस बन चुका है. नतीज़ा यह होता है कि छुट्टी से लौटने के बाद भी व्यक्ति तरोताजा होने की बजाय थका हुआ महसूस करता है.
आराम करना भी एक कला है
विशेषज्ञों का मानना है कि आज के हाईटेक दौर में लोगों ने काम करना तो सीख लिया है, लेकिन आराम करना भूल गए हैं. आराम का अर्थ सिर्फ़ बिस्तर पर लेटना या घंटों मोबाइल चलाना नहीं है.
खुले वातावरण में बैठकर प्रकृति को निहारना, समुद्र किनारे नंगे पैर रेत पर चलना, किसी शांत जगह बैठकर पसंदीदा किताब पढ़ना, संगीत सुनना, पुरानी यादों को ताज़ा करना, नई जगह के लोगों से मिलना, वहां की संस्कृति और इतिहास को समझना, ये सब भी आराम का हिस्सा हैं.
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और लेखक जॉनी थॉमसन ने काम और आराम के संबंध पर शोध किया है. उनके अनुसार, आराम आलस नहीं, बल्कि नई ऊर्जा हासिल करने और रचनात्मक विचारों को जन्म देने का माध्यम है.
दरअसल, जब हम लगातार काम में व्यस्त रहते हैं तो हमारा दिमाग़ एक ही दिशा में सोचता रहता है. लेकिन जब हम थोड़ा रुकते हैं तो हमारा अवचेतन मन पीछे चल रहे सवालों और समस्याओं पर काम करता रहता है. कई बार इसी दौरान अचानक कोई ऐसा नया विचार आता है, जिसकी हमने कल्पना भी नहीं की होती. इसलिए आराम रचनात्मकता का दुश्मन नहीं, बल्कि उसका साथी है.
फ़ुर्सत से निकला है स्कूल
जर्मन दार्शनिक जोसेफ पाईपर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक लेजर: द बेसिस ऑफ कल्चर में काम, आराम और फ़ुर्सत के महत्व पर विस्तार से विचार किया है. उनका कहना था कि आधुनिक समाज ने काम को जीवन का केंद्र बना दिया है, जबकि इंसान केवल काम करने वाली मशीन नहीं है.
दिलचस्प बात यह है कि अंग्रेज़ी का स्कूल शब्द मूल ग्रीक शब्द स्कोले से आया है, जिसका अर्थ था फ़ुर्सत का समय.
प्राचीन ग्रीस में माना जाता था कि दैनिक काम से मुक्त होकर मिले फ़ुर्सत के समय का इस्तेमाल ज्ञान प्राप्त करने, नई चीज़ें सीखने और दर्शन पर चर्चा करने के लिए किया जाना चाहिए. इसी कारण जहां लोग फ़ुर्सत में एकत्र होकर ज्ञान और विचारों की चर्चा करते थे, उसे स्कोले कहा गया और आगे चलकर इसी से स्कूल शब्द बना.
यानी फ़ुर्सत का मूल अर्थ ही कुछ नया सीखना और जीवन को समझना था. आज हमारी छुट्टियां भी क्या हमें ऐसा अवसर देती हैं?
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छुट्टी या सोशल मीडिया का नया प्रोजेक्ट?
आज घूमने जाना भी कई बार सोशल मीडिया के लिए कंटेंट जुटाने जैसा बन गया है. लोग किसी ख़ूबसूरत जगह को आंखों से देखने और मन में उतारने से पहले मोबाइल निकाल लेते हैं.
कहां गए, क्या खाया, किसके साथ गए, हर चीज़ की तस्वीर चाहिए. फिर तस्वीरों से रील बनती है, सोशल मीडिया पर अपलोड होती है और उसके बाद शुरू होता है लाइक्स और कमेंट्स का इंतज़ार. नतीज़ा यह कि जिस जगह का आनंद लेने गए थे, वहां मौजूद रहने की बजाय हमारा ध्यान मोबाइल स्क्रीन पर अटक जाता है.
तस्वीरें लेना ग़लत नहीं है. यादों को कैमरे में क़ैद करना अच्छी बात है. लेकिन अगर तस्वीर लेने के बाद भी हमारा ध्यान इस बात पर लगा रहे कि कितने लोगों ने लाइक किया, किसने क्या कमेंट किया, तो छुट्टी का आनंद कहीं पीछे छूट जाता है.
साथ हैं, फिर भी साथ नहीं
छुट्टियों का असर हमारे रिश्तों पर भी पड़ता है. पति-पत्नी साथ घूमने जाते हैं, लेकिन कई बार उनके बीच बातचीत से ज़्यादा मोबाइल होता है. कभी तस्वीर खींचने की जल्दी, कभी वीडियो बनाने की चिंता और कभी सोशल मीडिया पर अपडेट करने की व्यस्तता.
विडंबना यह है कि हम रिश्तों में क्वालिटी टाइम न मिलने की शिकायत करते हैं, जबकि वही समय हमारे पास मौजूद होता है. हम उसे मोबाइल और दूसरी गैरजरूरी गतिविधियों में ख़र्च कर देते हैं.
छुट्टी रिश्तों को फिर से क़रीब लाने का सुंदर अवसर हो सकती है. साथ बैठकर बातचीत करना, पुरानी यादों को साझा करना, एक-दूसरे की बात ध्यान से सुनना और बिना किसी ज़ल्दबाज़ी के साथ रहना, यही असली क्वालिटी टाइम है.
ख़ुद के क़रीब आने का समय
आज इंसान काम और मनोरंजन के बीच फंस गया है. काम नहीं कर रहा होता तो मोबाइल पर सोशल मीडिया, वीडियो या किसी अन्य मनोरंजन में व्यस्त रहता है. यानी दिमाग़ को खाली रहने का अवसर ही नहीं मिलता. लेकिन कभी-कभी खाली बैठना भी ज़रूरी है. चुप रहना भी ज़रूरी है. अपने भीतर झांकना भी ज़रूरी है.
इसलिए अगली बार जब छुट्टी पर जाएं तो कुछ नियम ख़ुद के लिए बनाइए. ऑफिस के ईमेल और काम से दूरी रखिए. हर पल मोबाइल कैमरे में क़ैद करने की कोशिश मत कीजिए. सोशल मीडिया पर हर गतिविधि साझा करने की ज़रूरत महसूस न करें. अपने साथ मौजूद लोगों को पूरा समय दें.
और सबसे ज़रूरी, कुछ समय सिर्फ़ अपने लिए निकालें. किसी शांत जगह बैठें. प्रकृति को देखें. किताब पढ़ें. संगीत सुनें. कुछ न करें तो भी चलेगा. बस अपने भीतर की आवाज़ सुनें. आख़िर छुट्टी का असली उद्देश्य सिर्फ़ जगह बदलना नहीं, मन को विराम देना है.
इसलिए अगली छुट्टी से लौटते समय ख़ुद से एक सवाल ज़रूर पूछिए, “क्या मैं सचमुच रिलैक्स होकर लौटी हूं या सिर्फ़ ऑफिस की जगह बदलकर काम करती रही?”
अगर जवाब सकारात्मक है, तभी समझिए कि आपने छुट्टी मनाई है, वरना अगली बार छुट्टी पर जाने से पहले अपने मोबाइल को ही नहीं, अपने मन को भी ऑफ करना सीखिए.
– स्नेहा सिंह

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