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पंचतंत्र कहानी- निंदा के दुष्परिणाम (Panchtantra Story- Ninda Ke Dushparinaam)

यह सुनकर पृथु की आंखों में अश्रु भर आए. वे साधु से विनती कर बोले, "महाराज! मुझे क्षमा कर दीजिए. मैं आगे से ऐसी ग़लती कभी नहीं करूंगा. कृपया, कोई ऐसा उपाय बता दीजिए, जिससे मैं अपने दुष्ट कर्मों का प्रायश्चित कर सकूं."

राजा पृथु एक दिन सुबह-सुबह घोड़ों के तबेले में जा पहुंचे. तभी वहां एक साधु भिक्षा मांगने आ पहुंचा. सुबह-सुबह साधु को भिक्षा मांगते देख पृथु क्रोध से भर उठे. उन्होंने साधु की निंदा करते हुए बिना विचारे तबेले से घोड़े की लीद उठाई और उसके पात्र में डाल दी. साधु भी शांत स्वभाव का था, सो भिक्षा ले वहां से चला गया और वह लीद कुटिया के बाहर एक कोने में डाल दी.

कुछ समय उपरान्त राजा पृथु शिकार के लिए गए. पृथु ने जंगल में देखा कि एक कुटिया के बाहर घोड़े की लीद का बड़ा सा ढेर लगा हुआ है. उन्होंने देखा कि यहां तो न कोई तबेला है और न ही दूर-दूर तक कोई घोड़े दिखाई दे रहे हैं. वह आश्चर्यचकित हो कुटिया में गए और साधु से बोले, "महाराज! आप एक बात बताइए, यहां कोई घोड़ा भी नहीं, न ही तबेला है, तो इतनी सारी घोड़े की लीद कहां से आई?"

साधु ने कहा, "राजन! यह लीद मुझे एक राजा ने भिक्षा में दी है. अब समय आने पर यह लीद उसी को खानी पड़ेगी."

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यह सुन राजा पृथु को पूरी घटना याद आ गई. वे साधु के पैरों पर गिर क्षमा मांगने लगे.

उन्होंने साधु से प्रश्न किया, "हमने तो थोड़ी सी लीद दी थी, पर यह तो बहुत अधिक हो गई?"

साधु ने कहा, "हम किसी को जो भी देते हैं, वह दिन-प्रतिदिन प्रफुल्लित होता जाता है और समय आने पर हमारे पास लौटकर आ जाता है, यह उसी का परिणाम है."

यह सुनकर पृथु की आंखों में अश्रु भर आए. वे साधु से विनती कर बोले, "महाराज! मुझे क्षमा कर दीजिए. मैं आगे से ऐसी ग़लती कभी नहीं करूंगा. कृपया, कोई ऐसा उपाय बता दीजिए, जिससे मैं अपने दुष्ट कर्मों का प्रायश्चित कर सकूं."

राजा की ऐसी दुखमयी हालत देखकर साधु बोले,

"राजन, एक उपाय है. आपको कोई ऐसा कार्य करना होगा, जो देखने में तो ग़लत हो, पर वास्तव में ग़लत न हो.

जब लोग आपको ग़लत देखेंगे, तो आपकी निंदा करेंगे. जितने ज़्यादा लोग आपकी निंदा करेंगे, आपका पाप उतना हल्का होता जाएगा. आपका अपराध निंदा करने वालों के हिस्से में आ जाएगा."

यह सुनकर राजा पृथु ने महल में आकर बहुत सोच-विचार किया और अगले दिन सुबह से शराब की बोतल लेकर चौराहे पर बैठ गए. सुबह-सुबह राजा को इस हाल में देखकर सब लोग आपस में राजा की निंदा करने लगे कि कैसा राजा है? कितना निंदनीय कृत्य कर रहा है, क्या यह शोभनीय है? आदि आदि!

निंदा की परवाह किए बिना राजा पूरे दिन शराबियों की तरह अभिनय करते रहे. इस पूरे कृत्य के पश्चात जब राजा पृथु पुनः साधु के पास पहुंचे, तो लीद के ढेर के स्थान पर एक मुट्ठी लीद देख आश्चर्य से बोले, "महाराज! यह कैसे हुआ? इतना बड़ा ढेर कहां गायब हो गया?"

साधु ने कहा, "यह आपकी अनुचित निंदा के कारण हुआ है राजन! जिन जिन लोगों ने आपकी अनुचित निंदा की है,, आपका पाप उन सबमें बराबर-बराबर बंट गया है."

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राजा बोले, "महाराज, फिर ये मुट्ठी भर बचा क्यों? ये क्यों नहीं बंटा?"

साधु बोले, "राजन, ये तुम्हारा कर्म है. जितना तुमने मेरे भिक्षा पात्र मे मेरे खाने के लिए दिए थे उतना तो तुम्हें खाना ही पड़ेगा. "

कोई कितना भी उपाय, दान, पुण्य कर ले उसका कर्म दोष कट तो जाएगा, पर उसका मूल नष्ट नहीं होगा... उतना तो भरना ही पड़ेगा.

जब हम किसी की बेवजह निंदा करते हैं, तो हमें उसके पाप का बोझ भी उठाना पड़ता है. हमें अपने किए‌ गए कर्मों का फल तो भुगतना ही पड़ता है. अब चाहे हंसकर भुगतें या रोकर. ध्यान रहे, हम जैसा देंगे, वैसा ही लौटकर वापस आएगा.

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Photo Courtesy: Freepik

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