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व्यंग्य- मिशन फ्लावर (Satire- Mission Flower)

दोनों के मध्य यह होड़ लगी हुई है कि किसके घर के मंदिर में, किसकी पूजा की थाली में पुष्प अधिक होंगे, कौन पार्क से, आसपास की कॉलोनी से और दूसरों के घरों में लगे पौधे जिनकी टहनियां बाउंड्री वॉल से झांकती हुई कहती हैं कि हम पर फूल खिले हुए हैं. आप अपनी पूजा के लिए ज़्यादा से ज़्यादा फूल नोच सकते है, खींच सकते है, तोड़ सकते है या फिर थोड़ी अभद्रता पूर्वक कहें तो चुरा सकते हैं.

बढ़ती उम्र के साथ ही बी.पी., शुगर , अर्थराइटिस जैसे मेहमान बिन बुलाए ही स्थाई रूप से शरीर के भीतर स्वत: ही प्रवेश कर जाते हैं. आप मर्ज़ी चाहे कितना भी जतन क्यों ना कर लो, वह जाने के लिए तैयार ही नहीं होते हैं. बस आपको आशा के दीप दिखा कर हर रोज़ सुबह-सुबह आधी नींद से जगा देते हैं और सड़क व पार्क पर दौड़ने और चलने के लिए मजबूर कर देते हैं. आप सोचते हैं हम ऐसा करेंगे तो यह मेहमान जल्दी चले जाएंगे, किन्तु ऐसा बहुत कम ही हो पाता है. यह तो प्रथम श्रेणी के कुछ ऐसे लोगों की बात हो गई, जो बेचारे नहीं चाहते हुए भी उनिंदा में सड़कों व पार्कों पर चक्कर लगाते हुए दिखाई देते हैं.

इनके अलावा दूसरी श्रेणी में कुछ ऐसे महानुभाव आते हैं, जिनके शरीर में ना तो कोई अतिथि कब्ज़ा जमाए बैठा है और ना ही बैठने का साहस कर सकता है क्योंकि वे स्वयं इतने साहसी होते हैं कि मुंह अंधियारे सूरज के जागने और पृथ्वी पर अपनी सुनहरी किरणें फैलाने से पूर्व ही केवल इसलिए जाग जाते हैं और अपने घर से निकल जाते हैं, ताकि वे ईश्वर को श्रद्धा सुमन के संग पार्क व दूसरों के घरों में खिले पुष्प भी ईश्वर को समर्पित कर सके.

मदनमोहन जी दूसरी श्रेणी में आते हैं. वह सूरज को भी हर रोज़ मात दे जाते हैं. सूरज भले ही धरती पर आने में या अपनी रौशनी धरती पर बिखेरने में देर हो जाए, किन्तु मदनमोहन जी को अपने घर से निकलने में तनिक भी विलंब नहीं होता है. हां यह बात अलग है कि वह दफ़्तर हर रोज़ विलंब से ही पहुंचते हैं. मज़ेदार बात यह है कि वे कर्म ही पूजा है इस पर विश्वास रखते हैं. 

मदनमोहन जी भोर होने से पहले ही जाग जाते हैं और निकल पड़ते हैं कपड़े का झोला और लंबी सी बांस की एक लकड़ी लेकर, जिसके एक सिरे पर छोटे से लोहे का हुक लगा होता है, जो पौधे की टहनी को खींच कर फूल तोड़ने के काम आता है.

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पिछले एक हफ़्ते से मदनमोहन जी ठीक से सो नहीं पा रहे हैं, क्योंकि एक अघोषित युद्ध प्रारम्भ हो गया है, जब से मदनमोहन जी के कॉलोनी में सोहनलाल जी का आगमन हुआ है. दोनों के मध्य यह होड़ लगी हुई है कि किसके घर के मंदिर में, किसकी पूजा की थाली में पुष्प अधिक होंगे, कौन पार्क से, आसपास की कॉलोनी से और दूसरों के घरों में लगे पौधे जिनकी टहनियां बाउंड्री वॉल से झांकती हुई कहती हैं कि हम पर फूल खिले हुए हैं. आप अपनी पूजा के लिए ज़्यादा से ज़्यादा फूल नोच सकते है, खींच सकते है, तोड़ सकते है या फिर थोड़ी अभद्रता पूर्वक कहें तो चुरा सकते हैं.

आज मदनमोहन जी रोज़ की अपेक्षा और अधिक जल्दी जाग ग‌ए, क्योंकि उन्हें पराजय मंज़ूर नहीं है. उन्होंने अपना हथियार लिया और घर से निकल पड़े मिशन फूल पर. लेकिन यह क्या आज फिर सोहनलाल जी बाज़ी मार ग‌ए. मदनमोहन जी को केवल ऐसे ही फूल मिले, जो शायद सोहनलाल जी की पहुंच से दूर थे! इतनी ऊंचाई पर लगे फूल मदनमोहन जी के लिए भी तोड़ना आसान नहीं था. बड़ी मशक्कत के पश्चात् मदनमोहन जी अति कठिनाइयों का सामना करते हुए क़रीब-क़रीब फूलों को नोचते हुए टहनियों से अलग कर पाए, किन्तु उन्होंने हार नहीं मानी. 

आज मदनमोहन जी काफ़ी दुखी व क्रोधित थे, क्योंकि उन्हें बहुत ही कम फूल मिले थे, वह भी ऐसे फूल जो सोहनलाल जी छोड़ गए थे. मदनमोहन जी स्वयं को पराजित महसूस कर रहे थे. उनका मन सारा दिन विचलित रहा, रात भी करवट बदलते हुए ही कटी. भोर होने से पूर्व मदनमोहन जी निर्णायक मोड़ पर पहुंच गए. उन्होंने सोहनलाल जी से इस समस्या के हल पर बातचीत करने का निर्णय ले लिए और घर से निकल पड़े. 

अभी मदनमोहन जी कुछ ही दूर पहुंचे थे कि उन्होंने देखा सोहनलाल जी के हाथों में पहले की अपेक्षा और अधिक लंबी लकड़ी है. मदनमोहन जी भीतर ही भीतर तिलमिला उठे, किन्तु उन्होंने स्वयं को संयमित रखते हुए सोहनलाल जी को आवाज़ लगाई. 

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दोनों... मौसेरे भाई ने एक-दूसरे को दुआ सलाम किया फिर मदनमोहन जी ने अपने विचार रखते हुए सोहनलाल जी से कहा, "भाई मैं सोच रहा हूं क्यों ना हम साथ मिलकर फूल तोड़ें और आपस में बराबर बांट लें, इससे ना तो तुम्हें कभी फूल कम मिलेंगे और ना ही मुझे. साथ में मार्निंग वॉक का मार्निंग वॉक भी हो जाएगा."

सोहनलाल जी को भी बात जम गई. वह सहर्ष तैयार हो गए और फिर दोनों अपने-अपने हथियार के साथ कदम से कदम मिलाकर मिशन फूल पर एकजुट होकर अपने कार्य को अंज़ाम देने चल पड़े. 

- डॉ. प्रेमलता यदु 

Photo Courtesy: Freepik

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