कहानी- अदृश्य दीवार (Short Story...

कहानी- अदृश्य दीवार (Short Story- Adrishay Deewar)

“अपने बच्चों को संस्कार देने में मैंने कभी कोई कसर नहीं छोड़ना चाहता था, पर क्या करूंं नए ज़माने की हवा ही ऐसी है उसके प्रभाव से कोई कैसे बच सकता है? मेरी बेटी भी इसका अपवाद नहीं है. उसमें भी आप सब को कुछ कमियां दिखाई देंगी. इसे मेरी कमज़ोरी समझकर उसे माफ़ कर देना. ये ना समझना कि मैंने अपना सिर का बोझ आपको सौंप दिया है. वह मुझे बहुत अज़ीज़ है. आज उसका विवाह आपके सुपुत्र अव्यक्त के साथ करके मैं अपने आपको धन्य समझ रहा हूं.” इतना कहते हुए उनकी आंखें छलक आईं.

स्वभाव से सीधे-सादे डॉक्टर गिरीश चंद्र तिवारी तकनीकी यूनिवर्सिटी के निदेशक थे. वह बड़े कर्मठ और मेहनती थे. अपने काम पर उनकी बड़ी अच्छी पकड़ थी. वे महीने-दो महीने में राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय मीटिंग में भाग लेने के लिए अन्य शहरों और विदेश भी जाते रहते. इक्कीसवीं सदी के नए माहौल में भी उनके जीवन में संस्कारों का बड़ा महत्व था. ये संस्कार उन्हें अपने मां-बाबूजी से मिले थे. उनके बाबूजी ने अपना अंतिम समय अपने बेटे गिरीश के साथ ही गुज़ारा था. वे काफ़ी बुज़ुर्ग हो गए थे और अब पूजा-पाठ नहीं कर पाते थे. ऐसे समय में गिरीश ही बाबूजी को अपने पास बिठाकर उनकी जगह ख़ुद सारे कर्मकांड संपन्न करते. बाबूजी को अपने बेटे को देखकर बहुत संतोष था.
बाबूजी के इस दुनिया से जाने के बाद भी उन्होंने वह दिनचर्या नहीं छोड़ी. सुबह चार बजे उठकर नित्यकर्म से निवृत्त होकर पूजा-पाठ करना. उसके बाद तुलसी को जल चढ़ाना और एक घंटा भागवत गीता का पाठ करना उनकी दिनचर्या में शामिल था.
इसके अलावा उन्हें पोथी बांचनी भी आती थी. उनके पिताजी पुरोहित का काम करते थे. गिरीश बचपन से ही पढ़ने में बहुत होशियार थे. उनके मां-बाबूजी भी चाहते थे कि उनका बेटा यह आकाश वृत्ति छोड़कर कोई अच्छा-सा व्यवसाय अपना ले. पुरोहित गिरी में उन्हें कोई भविष्य नज़र नहीं आ रहा था. कभी विवाह मुहूर्तों की अधिकता कारण अच्छी कमाई हो जाती, तो कभी महीनों तक कोई पूछता भी न था.
अपनी मेहनत और लगन के कारण गिरीश चंद्र इंजीनियरिंग करने के बाद एक सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रोफेसर हो गए थे. अपनी काबिलियत की बदौलत आज निदेशक के पद तक पहुंच गए. उनकी हिंदी, अंग्रेज़ी व संस्कृत भाषा और अपनी पहाड़ी बोली पर बहुत अच्छी पकड़ थी. इन सबके बावजूद बाबूजी से बचपन में सीखे गए सभी कर्मकांड उन्हें आज भी कंठस्थ थे और वे उनके दिनचर्या का अनिवार्य हिस्सा बन गए थे. उनके माथे पर सदा चंदन का टीका सुशोभित रहता. इसी वजह से हर कोई उन्हें पंडितजी के नाम से पुकारता. उन्हें भी यह नाम बहुत अच्छा लगता. पूर्वजों की अपनी थाती को उन्होंने अपने नाम के साथ जोड़ लिया था. कर्म से न सही नाम से वह आज भी अपने को पंडित ही समझते. वे हमेशा पूजा-पाठ के बाद चंदन का तिलक लगाना न भूलते.
पंडितजी को लोगों से मिलना-जुलना ज़्यादा पसंद नहीं आता था. वे ज़माने के हिसाब से बड़ी-बड़ी बातें बनाने में यक़ीन नहीं रखते. अपने काम से काम रखना और उसकी पूरी जानकारी रखना यही उनकी आदत में शामिल था.अपने काम में वे कोई कसर न रखते. बाकी सारा समय उनका प्रभु सेवा में ही व्यतीत होता था.
वे जानते थे आनेवाली पीढ़ी से इन सबकी उम्मीद नहीं की जा सकती थी. उनके बेटे वेदांत को बचपन से ही यह सब पसंद न था. उन्होंने बहुत कोशिश की पर बेटे को अपनी राह पर न ला सके.
उन्हें इस बात का मलाल था कि उनके बच्चे उनके अनुसार नहीं चलते थे. उनके बेटे वेदांत ने इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल कर ली थी और एक मल्टीनेशनल कंपनी में इंजीनियर बन गया था. बेटी दिशा को डॉक्टरी व इंजीनियरिंग में कोई रुचि न थी. वह भी पढ़ने में होशियार थी और आगे चलकर प्रोफेसर बनना चाहती थी. वह यूनिवर्सिटी से भौतिकी में एम एस सी कर रही थी.
पंडितजी को एक बात का बड़ा संतोष था कि उनकी पत्नी रीमा उन्हीं की तरह संस्कारवान थी. पति के लिए सुबह से लेकर शाम तक पूजा-पाठ की व्यवस्था करते हुए वह भी इन कार्यों में पारंगत हो गई थी. वह पति के उठने से पहले पूजा के लिए फूलों की थाली सजा देती और पूजा का कमरा ख़ुद साफ़ करती. पंडितजी को यह पसंद नहीं था कि उनकी पत्नी के अलावा कोई उनके पूजाघर में प्रवेश करें. रीमा इस बात को ध्यान में रखती और उनके अधिकांश कार्य ख़ुद करती थी. पंडितजी ने अपने दैनिक दिनचर्या का एक वीडियो बना लिया था. जब कभी वे सरकारी काम से घर से दूर देश-विदेश में रहते, तो इसी से अपने दिन की शुरुआत करते. कैसी भी परिस्थिति रही हो उन्होंने कभी शाकाहार के अलावा किसी चीज़ को हाथ तक नहीं लगाया. वे कई दिन तक केवल फलाहार करके भी रह जाते.


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उनके घर पर सभी आधुनिक सुविधाएं मौजूद थी, लेकिन वहां का माहौल आज भी पुराने दिनों की याद दिला देता. सुबह नित्य कर्म के लिए जाते समय कान मे जनेऊ लपेटना वे कभी न भूलते. अक्सर बच्चे उनको ऐसा करते देखकर हंसते और मम्मी से कहते, “क्या मम्मी, पापा आज भी पुराने ज़माने की तरह वाॅशरूम जाते हैं. वहां पर सब आधुनिक सुविधाएं हैं. फिर वे इस तरह कान पर जनेऊ क्यो लपेट लेते हैं?”
“तुम्हें इससे क्या परेशानी है? वे अपने बच्चो को तो ऐसा करने के लिए नहीं कहते. उनके अपने संस्कार है. वे जैसा चाहेंगे वैसा करेंगे.”
“तो फिर वे हमें सुबह जल्दी उठने और पूजा-पाठ करने के लिए क्यों कहते हैं?”
“जल्दी उठना कोई बुरी बात तो नहीं है बेटे. सभी ज्ञानी और महान लोगों का यही कहना है कि सुबह जल्दी उठना चाहिए.”
“मम्मी, क्या आप भी उनकी तरह उपदेश देने लगी.”
“बात की शुरुआत तुमने की थी मैंने नहीं. पापा अपनी ज़िंदगी जैसा जीना चाहते हैं जीने दो. इससे तुम्हें तो कोई नुक़सान नहीं होता.” मम्मी बोली, तो दिशा बुरा-सा मुंह बनाकर चली गई.
पंडितजी ने कभी भी अपने बच्चों के लिए सुविधाएं जुटाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी. हर नई तकनीकी का सामान सबसे पहले उनके घर आ जाता. पत्नी की इच्छाओं का भी वे बहुत ध्यान रखते थे. उनकी मदद के लिए घर पर तीन कामवाले तैनात थे. बस, एक पंडितजी ही थे जो नए ज़माने के अनुसार, अपने आप को किसी तरीक़े से ढाल नहीं पाए थे. तकनीकी के जानकार स्वयं इसके प्रयोग से दूर रहते. सही बात तो यह थी कि वे ऐसा करना भी नहीं चाहते थे. अपनी दिनचर्या से वे बहुत संतुष्ट थे.
वेदांत दिल्ली में नौकरी कर रहा था. जब भी मौक़ा मिलता वह घर आ जाता. पंडितजी बेटे से बड़े प्यार से पूछते, “बेटा, तुम्हारा काम कैसा चल रहा है?”
“अच्छा चल रहा है.”
“काम मन लगाकर करना चाहिए. ड्यूटी में किसी प्रकार की लापरवाही नहीं होने चाहिए.”
“आप ठीक कहते हैं पापा. मैं ऐसा कोई काम नहीं करूंगा, जिससे आप या किसी और को कोई परेशानी हो.”
“मैं तुमसे बस इतना ही चाहता हूं बेटा. ईश्वर का दिया हमारे पास सब कुछ है.”
“जी पापा.” वेदांत पापा के सामने उन्हीं की तरह सीधे और सरल जवाब देता. वह उनसे किसी प्रकार की बहस में नहीं उलझकर उपदेश नहीं सुनना चाहता था. अपने दोस्तों के साथ वह ख़ूब मौजमस्ती करता. पंडितजी सब कुछ जानते हुए भी उससे कभी कुछ नहीं कहते थे. हां बेटी, को लेकर वे थोड़ा चिंतित रहते थे. वे हमेशा रीमा को कहते, “अपनी बेटी को भी कुछ संस्कार सिखाओ ना.”
“नए ज़माने के बच्चे हैं. मेरी बात सुनते ही नहीं.”
“रीमा तुम्हारा ज़माना भी इतना पुराना नहीं था. तुमने भी तो अपने को मेरे अनुसार ढाल लिया है.”
“कोशिश तो बहुत करती हूं, लेकिन वह कुछ सुनने को राजी नहीं होती.”
“प्यार से समझाओ. लड़कियों को मम्मी की बात जल्दी समझ में आती है. तभी मैं उसे कुछ नहीं कहता. कम से कम लड़कियों में लड़कियों जैसे लक्षण होने चाहिए.”
“आप ठीक कहते हैं. मैं फिर कोशिश करती हूं.” रीमा बोली.
पंडितजी सुबह घर से पौष्टिक नाश्ता करके अपने इंस्टीट्यूट चले जाते थे. दोपहर का खाना वे नहीं खाते थे. बस फल खाकर गुज़ारा कर लेते. दोपहर में रीमा और दिशा एक साथ लंच करते. आज दिशा काॅलेज से आई, तो लंच करते हुए रीमा ने बात छेड़ी,
“दिशा, तुम सुबह बहुत देर से उठती हो. थोड़ा जल्दी उठा करो बेटा. तुम्हारे पापा को यह अच्छा नहीं लगता.”
“मम्मी, पापा की बहुत सारी चीज़ें हमें भी तो अच्छी नहीं लगती. हम जब दूसरों के पापा को देखते हैं, तो हमें भी अपने पापा को देखकर बड़ी परेशानी होती है.”
“ऐसी क्या कमी है उनमें?”
“एक हो तो बताऊं. मेरी सारी दोस्त अपने पापा के साथ कितना घुल-मिलकर रहती है. वे उनके साथ दोस्तों जैसा व्यवहार करते हैं. एक हमारे पापा है जिनके सामने खड़े होने में भी झिझक होती है.”
“तुम भी उनसे खुलकर बात करके अपनी झिझक दूर कर सकती हो.”
“पता नहीं उनसे बात करने में बीच में संस्कारों की अदृश्य दीवार क्यो खड़ी हो जाती है?”
“तुम एक बार कोशिश करके तो देखो.”
“ना बाबा ना उनसे बात करने बैठेंगे, तो वे हमें ढेर सारे उपदेश सुनाने लगेंगे.”
“ऐसा नहीं कहते बेटा तुम्हारे पापा तो संत पुरुष हैं.”
“यह बात अपनी जगह ठीक है, पर इतनी बड़ी पोस्ट में होते हुए भी पापा का आचरण हमें पसंद नहीं आता. वे आज भी पुराने ज़माने के पंडित पुरोहित जैसे लगते हैं.”
“इससे तुम्हारा क्या बिगड़ जाता है? वे तुम्हारे लिए तो कोई कसर नहीं करते. तुम जिस चीज़ की मांग करती हो, वे तुरंत पूरी कर देते हैं. बदले में वह बस इतना चाहते हैं कि हमारे घर की बेटी थोड़ी संस्कारवान होनी चाहिए.”
“मेरे संस्कारों में कहां कमी है मम्मी? मैं आज के ज़माने की आधुनिक लड़की हूं, लेकिन आप लोगों की ख़ातिर हमने भी अपने आपको इन सबसे काफ़ी हद तक दूर रखा हुआ है. आपने आजकल की लड़के-लड़कियां नहीं देखी हैं.”
“देखी न सही, पढ़ती-सुनती तो रहती हूं. मुझे तुमसे बस इतना ही कहना है कि पापा चाहते हैं तुम थोड़े से परिवार के संस्कारों को भी महत्व दो. सुबह जल्दी उठा करो साफ़-सफ़ाई रखा करो. तुम्हारा कमरा हर समय कितना बिखरा पड़ा रहता है.”


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“मैं सुबह जल्दी कैसे उठ सकती हूं? मैं तो आधी रात तक पढ़ाई करती रहती हूं.”
“तुम्हें जल्दी पढ़ने से कौन रोकता है? यहां तुम्हें कोई डिस्टर्ब करनेवाला कोई भी नहीं है. तुम दस बजे रात तक तो अपने दोस्तों के साथ बतियाती रहती हो. उसके बाद कोई खाक पढ़ाई करता है?”
“मम्मी, जब सब सो जाते हैं, मैं तो उसके बाद ही आराम से पढ़ाई करती हूं.”
“दिशा, यह तुम्हारी समस्या है हमारी नहीं.”
“हमारी प्रॉब्लम है, तो हम उसे अपने हिसाब से हल कर तो रहे हैं. हर साल क्लास में टाॅप करती हूं. बगैर पढ़े तो नंबर नहीं आते होंगे. मुझे मेरे हिसाब से पढ़ने दो प्लीज़. जल्दी उठकर करना क्या है?”
“जब ससुराल जाएंगी तब क्या करेगी? देखना तब तुम्हें मेरी बात याद आएगी.”
“तब की तब देखी जाएगी. वैसे आपको और पापा को छोड़कर सबको पता है आजकल कोई भी युवा सुबह जल्दी नहीं उठता.”
“इसी के कारण तो हमारे संस्कारों का ह्रास हो रहा है.” रीमा ग़ुस्से से बोली.
आए दिन मम्मी और दिशा में इसी बात को लेकर बहस हो जाती. मम्मी-पापा चाहते कि लड़की अच्छे संस्कारों को लेकर ससुराल जाए. दिशा यह सब सुनने को बिल्कुल तैयार नहीं थी.
समय गुज़र रहा था. दिशा ने अच्छे नंबरों के साथ प्रथम श्रेणी में एमएससी कर ली थी और वह नेट परीक्षा की तैयारी कर रही थी. इसके बाद ही वह किसी डिग्री काॅलेज में एसोसिएट प्रोफेसर बन सकती थी.
पंडितजी के सीधे-सरल स्वभाव को देखते हुए दिशा के लिए रिश्तों की कोई कमी नहीं थी. सुंदर प्रतिष्ठित परिवार की कन्या को अपनाने के लिए हर कोई तैयार था. सबके दिमाग़ में एक ही छवि थी कि बच्चों में उनके कुछ तो गुण अवश्य आए होंगे. इन सबको देखते हुए एक बहुत अच्छे परिवार से दिशा का रिश्ता तय हो गया था. लड़का पीसीएस अधिकारी था. इस रिश्ते से सब ख़ुश थे. दिशा को भी अव्यक्त जोशी बहुत अच्छा लगा था. पंडितजी ने ख़ुद पोथी देखकर अच्छा लगन चुनकर लड़की के हाथ पीले का दिन निश्चित कर दिया था.
पंडितजी को एक ही चिंता थी कि ससुराल जाकर लड़की कहीं उनकी प्रतिष्ठा धूल में न मिला दे. उन्हे बेटी में संस्कारों की कमी साफ़ दिखाई दे रही थी. उनके बार-बार कहने पर रीमा ने पंडितजी को आश्वासन दिया कि वह दिशा को फिर से समझाने का पूरा प्रयास करेगी. उसे जब भी मौक़ा मिलता वह बेटी को समझाने से न चूकती. दिशा को भी मम्मी के उपदेशों की आदत-सी हो गई थी. उस पर उनकी बातों का कोई असर न पड़ता. उसे जो करना होता वह करके ही रहती.
समय बहुत तेज़ी से उड रहा था. शादी से एक हफ़्ते पहले घर पर मेहमान भी आने लगे थे. उनके गांव से सभी रिश्तेदार आए हुए थे. इन दिनों सुबह से ही घर में ख़ूब चहल-पहल हो जाती. इतने पर भी दिशा ने अपनी दिनचर्या नहीं बदली थी. उसे देर से उठते देख रमा चाची बोली, “दीदी, दिशा दुल्हन बनकर दूसरे के घर जाएगी, तो क्या वहां पर ऐसे ही दिन चढ़े तक सोती रहेगी?”
“दिनभर भागदौड़ करके थक जाती हैं. कुछ देर सो लेने दे. मायका मायका ही होता है. ससुराल जाकर अपने आप यह सब आदतें छूट जाती हैं.” रीमा बोली. शादी का दिन आने तक भी दिशा की दिनचर्या में कोई भी परिवर्तन नहीं आया था. वह सुबह देर तक सोती अपने हिसाब से दिनभर के काम निपटाती.
निर्धारित समय पर लग्नानुसार सुबह मंगल स्नान के साथ विवाह कार्यक्रमों की शुरूआत हो गई. पंडितजी का आज व्रत था. बेटी की विदाई तक वे अन्न का दाना भी मुंह में नहीं रख सकते थे. देर रात तक शादी के कार्यक्रम चलते रहे. पंडितजी ने सभी व्यवस्थाएं बहुत अच्छी कर रखी थी. विवाहस्थल की सजावट, बारातियों का स्वागत से लेकर भोजन तक सब इंतज़ाम अपने आप में बेजोड़ था. कहीं कोई कसर नहीं थी. पंडितजी ने अपने सभी रिश्तेदारों और परिचितों को विवाह समारोह में सपरिवार आमंत्रित किया था, जिससे किसी को भी शिकायत का मौक़ा न मिले. रीमा, वेदांत और नज़दीकी रिश्तेदार सब मेहमानों के आवभगत में लगे थे. पंडितजी भी मेहमानों का स्वागत कर रहे थे, पर इतना सब होने पर भी वे पुरोहितजी के साथ हर जगह पर ख़ुद खड़े होकर एक-एक रस्म को पूरे विधि-विधान से निभा थे. वह इनमें कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते थे. वे और कुल पुरोहित दोनों मिलकर साथ-साथ मंत्रोचारण कर रहे थे. यह सब देखकर हर एक का दिल द्रवित हो जा रहा था. लड़की के पिता होने के साथ-साथ उन्होंने पुरोहित का ज़िम्मा भी अपने ऊपर ले रखा था. भले ही पुरोहितजी से कोई चूक हो जाए, पर पंडितजी एकदम सचेत थे.
देर रात तक फेरे संपन्न हुए. सुबह गाय दान की रस्म के बाद दिशा की विदाई की तैयारी शुरू हो गई थी. यह वह समय होता है, जब कोई कितना भी कठोर दिल इंसान क्यों न हो वह अपने जज़्बात काबू में न रखकर पिघल जाता है और उसकी आंखों में भी आंसू आ जाते हैं. पंडितजी को अपने बच्चों से बहुत लगाव था भले ही एक ही घर पर रहते हुए उनके संस्कारों में ज़मीन-आसमान का अंतर था. विदाई के समय दिशा सबसे लिपट-लिपटकर रो रही थी. भाई वेदान्त भी एक ओर खड़े होकर अपने आंसू पोंछ रहे थे. आंखों में आंसू भरे दिशा मम्मी के लिपटने के बाद थोड़ा दूर खड़ी थी और पिता के गले लगने में थोड़ा झिझक रही थी.
संस्कारों के वशीभूत होकर वह कभी उनसे लिपटने का साहस नहीं कर सकी थी. उसका बहुत मन करता था कि वह भी अपनी सहेलियों की तरह अपने पापा से ढेर सारी बातें करें और उनसे लिपटकर और उनका प्यार पाए, लेकिन पापा का व्यक्तित्व ऐसा था कि वह कभी इतना साहस कर ही नहीं पाई. वही झिझक उसे इस समय भी हो रही थी.
आंखों में आंसू भरे विदाई के समय पंडितजी अपने समधी को ढूंढ़ रहे थे. सामने दिशा के पास जैसे ही वे नज़र आए उन्होंने बड़े कातर भाव से उनके हाथ पकड़ लिए और बोले, “अपने बच्चों को संस्कार देने में मैंने कभी कोई कसर नहीं छोड़ना चाहता था, पर क्या करूंं नए ज़माने की हवा ही ऐसी है उसके प्रभाव से कोई कैसे बच सकता है? मेरी बेटी भी इसका अपवाद नहीं है. उसमें भी आप सब को कुछ कमियां दिखाई देंगी. इसे मेरी कमज़ोरी समझकर उसे माफ़ कर देना. ये ना समझना कि मैंने अपना सिर का बोझ आपको सौंप दिया है. वह मुझे बहुत अज़ीज़ है. आज उसका विवाह आपके सुपुत्र अव्यक्त के साथ करके मैं अपने आपको धन्य समझ रहा हूं.” इतना कहते हुए उनकी आंखें छलक आईं.
“ऐसा कहकर हमें शर्मिंदा न करें. हम तो ऐसा कभी सोच भी नहीं सकते. आप निश्चिंत रहें आपकी बेटी अब मेरी बेटी है.”
“आपने यह कहकर मेरे दिल का बहुत बड़ा बोझ हल्का कर दिया. अपने कलेजे का टुकड़ा आपको सौंप रहा हूं. इसका ख़्याल रखना.” आंखों से आंसू पोंछते हुए पंडितजी बोले.
दिशा यह सब सुन रही थी. अब उससे न रहा गया और वह अपनी सारी झिझक छोड़कर पापा के गले लिपट गई. आंसुओं की बौछार में वह कुछ कह नहीं पा रही थी.
वह मन ही मन बुदबुदाती, ‘पापा मुझे माफ़ कर दें. मैं आपको समझ नहीं पाई. सच में आप बाहर से ही नहीं अंदर से भी संत हैं. वह कितनी मूर्ख थी, जो हमेशा उनसे दुनियादारी की अपेक्षा करती थी.’
हिचकियों के बीच में उसकी आवाज़ गले में ही अटक गई थी. वह बहुत देर तक पापा के गले से लिपटकर रोती रही. पंडितजी भी उसे प्यार से सहला रहे थे. आज पिता और बेटी के बीच की झिझक की दीवार ढह गई थी. बेटी को हल्के से अपने से अलग कर उन्होंने कार में बिठाया और आशीष देकर बोले, “सदा सुखी रहना.” इसके साथ ही दिशा को लेकर कार आगे बढ़ गई. उसके जेहन में अभी तक पापा के कहते शब्द ही गूंज रहे थे.
सब कुछ बहुत अच्छे से विधि-विधान से निपट गया था. बेटी की विदाई के साथ घर सूना हो गया. पंडितजी के दिल से बड़ा बोझ उतर गया था. उन्हें इस बात का सुकून था कि उन्होंने बच्चों को अपने संस्कार न दे सकने की बात दिशा के ससुरालवालों से छुपाई नहीं थी.

Dr. K. Rani
डॉ. के. रानी

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