कहानी- अपना पराया (Short Story- ...

कहानी- अपना पराया (Short Story- Apna Paraya)

जैसे ही उसने झुककर मौसी के चरण स्पर्श किए, वे चौंक कर सिर उठाई, तो सामने कुंदन को देख थोड़ी देर के लिए एकटक देखती रह गईं, फिर उसे खींचकर सीने से लगा फूट-फूट कर रो पड़ी. आहट सुन पापा भी बाहर आ गए. उसे देख उनकी आंखें भी छलक आईं. उसे लिए हुए वह घर के अंदर आ स्नेह से उसकी पीठ थपथपाते हुए उसके क़रीब आकर बैठ गए. उसे लगा अपने ऐसे होते है, जिन्हें अपने मान-अपमान से ज़्यादा अपनों की चिंता होती है. जिन्हें अपने रिश्ता तोड़ने के बदले झुकना पंसद होता है.

पूरे दो दिनों से कुंदन बुखार में तड़प रहा था, पर घर के लोगों को फ़ुर्सत ही नहीं थी कि उसकी देखभाल करें. यहाॅं तक की उसकी पत्नी एकता भी अपने कजन की शादी में इस कदर व्यस्त थी कि उसे पूरी तरह नौकरों के सहारे छोड़ दी थी.
कुंदन को प्यास लगी थी, पर उसे किसी को भी पुकारने की इच्छा नहीं हुई. उसका अंतः करण शोक और निराशा से विदीर्ण हो रहा थ. उसने कभी सोचा भी नहीं था कि उसकी यह दुर्दशा होगी, पर अपनी इस स्थिति के लिए किसे दोष देता? घरजमाई बन इस घर में रहने का उसका ख़ुद का फ़ैसला था. वह पत्नी को भी बेवफ़ा और स्वार्थी कैसे कह सकता था. उसका व्यक्तित्व ही इतना दुर्बल और निरूपाय हो गया था कि वह निरंतर सब के द्वारा छला जा रहा था, बस एक ग़लत कदम और  उसकी जीवन की दिशा ही बदल गई.
उसके पापा कैलाशनाथ, जो कभी उसके सबसे अपने थे, जो उसकी सबसे ज़्यादा चिन्ता करते थे, जो उसके आर्दश गाइड, फिलोसॉफर और मां भी थे, उसी पर उसने शक किया, घृणा की जिसका परिणाम अब भुगत रहा था. जब किसी की आत्मा पर संशय का पर्दा पड़ जाता है, वैसा संशयी व्यक्ति कभी सही-ग़लत का अंतर समझ ही नहीं पाता है. पापा के प्यार पर संशय ने ही उसे अपने घर-परिवार के लिए अजनबी बना दिया. 
आज उसे अपनी मां सरला देवी की भी बहुत याद आ रही थी, जो उसकी छोटी से छोटी ख़ुशी के लिए भी अपनी बड़ी से बड़ी ख़ुशी कुर्बान करने के लिए हमेशा तैयार रहतीं. उसके एक पुकार पर अपने सारे काम छोड़ उसके आगे-पीछे दौड़ती रहतीं. कभी उसे हल्का-सा बुखार भी आ जाता, तो वह कभी उसके सिर सहलाती, कभी पैर दबाती. इस बात के लिए पापा अक्सर उन्हें समझाते, “थोड़ा-बहुत बुखार हो जाना सामान्य-सी बात है, इसमें घबराने की क्या बात है. तुम्हारे इस तरह घबराने से मैं भी नर्वस हो जाता हूं.”
उसे स्कूल से आने में ज़रा-सी देर हो जाती तो, वे सड़क पर आ खड़ी होतीं. उनका सुबह से शाम तक का समय उसी के इर्दगिर्द उसके आराम का ख़्याल करते गुज़रता. उनका यह जुनून देख पापा अक्सर भुनभुनाते, “तुम्हारा इतना ज़्यादा लाड़-प्यार इसे ज़रूर बर्बाद कर देगा.” पर मां का अटल विश्वास था कि उसका बेटा एक दिन बहुत बड़ा आदमी बनेगा.
टेंथ में जब उसे 93 प्रतिशत मार्क्स मिले, उनकी ख़ुशी का ठिकाना न रहा. पूरे मुहल्ले में मिठाई बंटवाई. पर जल्द ही उनकी ख़ुशियों को किसी की नज़र लग गई. उन्हें लिवर का कैंसर हो गया. जैसे ही डॉक्टरों ने उनके जीवन को तीन महीनों में सिमित कर दिया, उन्हें सबसे ज़्यादा यही चिंता खाए जा रही थी कि उनके बाद उनके बेटे का उनकी तरह ख़्याल कौन रखेगा?
एक बात उन्हें अच्छी तरह समझ में आ गई थी कि उनके जीवन में वक़्त और हालात दोनों बदल गए थे, जो अब उनके वश में नहीं था. काफ़ी सोच-समझकर अपने बचपन की सहेली और दूर के रिश्ते से बहन सुचित्रा को अपने पांच वर्षीय बेटी वसुधा के साथ अपने पास बुलवा ली थी. सुचित्रा असमय ही विधवा हो गई थी और बेटी के साथ कोई आश्रय ढूढ़ रही थी. हालात ऐसे थे कि दोनों को एक-दूसरे की ज़रूरत थी, इसलिए दोनों के बीच एक अपनत्व भरा रिश्ता कायम हो गया था. सरला के ऐेसे दुर्भाग्यपूर्ण कठिन समय में सुचित्रा ने उसके पूरे घर-परिवार को अच्छी तरह संभाल लिया था, तो सरला ने भी वसुधा को एक अच्छे स्कूल में एडमिशन दिला उसकी सारी ज़िम्मेदारी उठा ली थी. धीरे-धीरे दोनो मां-बेटी उस परिवार का एक अभिन्न अंग बन गए थे.

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सुचित्रा को कुंदन का पूरा ख़्याल रखते और पुत्रवत प्यार करते देख सरला ने उससे वादा लिया था कि उसके नहीं रहने पर वह उसके पुत्र को छोड़कर कही नहीं जाएगी, ताकी वह निश्चिंत हो इस दुनिया को छोड़ सके. सुचित्रा से वादा लेने के महीनाभर बाद ही वह काल के गाल में समा गई थी. सरला के नहीं रहने पर सुचित्रा ने अपना वादा निभाया. कुंदन की देखभाल के साथ-साथ उसको मानसिक संबल भी दिया. उसे मां की इच्छा पूरी करने के लिए प्रोत्साहित करती रहती. 
मां के जाने के बाद कुंदन पूरी तरह टूट गया था. मां को भूलना उसके लिए आसान नहीं था, वह उसके रूह की गहराइयों से जुड़ी थीं. फिर भी उसने अपना पूरा ध्यान और शक्ति पढ़ाई में लगा दिया, क्योकि उसे अपनी मां की इच्छा जो पूरी करनी थी. उसकी मेहनत रंग लाई और उसका एडमिशन आई.आई.टी कानपुर में हो गया.
कानपुर जा कर वह ऐसा पढाई में रम गया कि कम ही घर आता. घर आते ही उसे मां की यादें विकल कर देती. उसकी समझ में नहीं आता विधाता ने उसकी मां की जीवन यात्रा बीच में ही समाप्त कर क्यों उनके साथ अन्याय किया.गांव से दादी आ गई थी. उसके पापा की देखभाल के लिए पर मां की मृत्यु ने उसके पापा को भी मानसिक रूप से पूरी तरह तोड़ कर बिखेर दिया था. फिर भी वह कुंदन की देखभाल और उसकी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए पहले से ज़्यादा तत्पर रहते. एक सुचित्रा मौसी ही थी, जो कुल जमा तीन सदस्यों के बीच कड़िया जोड़ती रहती.
जब वह इंजीनियरिंग के फाइनल ईयर में था, उसे पटना में रहनेवाले उसके एक दोस्त कुणाल ने सूचित किया कि उसके पापा ने सुचित्रा मौसी से शादी कर ली है. सुनते ही दुख, क्षोभ और घृणा से उसका सर्वांग थरथरा उठा. इतनी बड़ी बात हो गई और पापा ने उसे बताना भी ज़रूरी नहीं समझा. वो तो उसके सबसे अपने थे, फिर उसे इतना पराया क्यों कर दिया कि उससे पूछना भी उन्होंने ज़रूरी नही समझा. उसके अंदर उथल-पुथल सी मची हुई थी, फिर भी उसने पापा को फोन नहीं किया. दो दिनों बाद उसे पापा का भेजा हुआ लिफ़ाफ़ा मिला. उसे समझते देर नहीं लगी कि फोन से बोलने की हिम्मत नही हुई, तो लिखकर भेजा है. ग़ुस्से में लिफ़ाफ़े के टुकड़े-टुकड़े कर डस्टबीन मेें डाल दिया. रातभर मां को याद कर निःशब्द रोता रहा. दूसरे दिन ही उसने मन ही मन फ़ैसला कर लिया कि वह कभी लौटकर पटना नहीं जाएगा. पापा ने उसे समझाने की बहुत कोशिश की. कानपुर तक आए. वह मौन साधे प्रतिक्रियाविहीन बैठा रहा. उसकी मूक आंखों का उपालंभ पापा को भी अंदर तक आहत कर गया. पापा ने उसे बहुत समझाया कि इस शादी से तुम्हारे जीवन में कोई अंतर नहीं आया है. सब कुछ पहले जैसा ही है. आज भी हम दोनों तुम्हारे उतने ही अपने है जितना की इस शादी के पहले थे. पर वह नहीं माना तो नहीं माना. पापा के शादी करते ही उसे वह घर पराया लगने लगा था. जिस सुचित्रा मौसी में कभी उसे मां के दर्शन होते थे, अब छलनामयी विमाता नज़र आने लगी थी. इस उम्र में पापा का शादी करना उसकी नज़रों में एक मर्यादाहीन आचारण था, जो लोगों की नज़रों में उसे शर्मशार कर रहा था.
फाइनल ईयर का रिज़ल्ट आते ही उसे नौकरी मिल गई थी. बिना घर पर सूचित किए वह रांची आ गया था. घर के सभी लोग परेशान थे. वह भी काफ़ी अकेला और दुखी रहने लगा था. उसी दौरान अपने साथ काम करनेवाले विवेक से कुछ ज़्यादा ही जुड़ गया था. विवेक के घर उसे पनाह मिली. विवेक की मां के लिए वह बहुत जल्दी अपने बेटों से भी प्यारा हो गया. भयंकर तूफ़ान के गुज़र जाने के बाद घर-परिवार से बिछड़ा पक्षी उस बहेलिया को ही अपना मान लिया, जो जाल बिछाए उसे फांसने के लिए बैठा था. फिर तो विवेक की मां  राधिका देवी ने झटपट इस बेशक़ीमती नगिने को अपनी बेटी एकता की अंगूठी में जड़ने में देर नहीं लगाई. पहले तो घर बैठे बिना किसी दान दहेज के मिले इस दामाद को उस घर में ख़ूब मान-सम्मान और प्रेम मिला. एकता भी ख़ुश रहती. ससुराल की  वर्जनाओं से मुक्त यहां घूमने-फिरने की पूरी आज़ादी थी. कुंदन ने भी सहर्ष वही रहने का फ़ैसला ले लिया.
पर जल्द ही कुंदन को एहसास होने लगा था कि घर में चाहे वह जितना भी ख़र्च करे, उसका मान-सम्मान घर के बेटों-सा नहीं था. साथ ही मायके में रहने के कारण पत्नी का बड़बोलापन भी बढ़ रहा था. कुंदन की देखभाल और ख़्याल रखने के बदले उसे अपने बनाव-श्रृंगार और शॉपिंग की धुन रहती. दिनोंदिन उसके मौज-मस्ती की सीमाएं बढ़ती जा रही थीं. नए-नए आधुनिक ढंग के कपड़े-गहनों पर उसका ज़्यादा ध्यान रहता. पति उसके लिए बस पैसा कमाने का मशीन मात्र था. सासू मां जो पहले उसकी मां  होने का दावा करती थीं, अब उसे सुनाना शुरू कर दिया था कि हमेशा घर में रहनेवाले की रोज़-रोज़ आवभगत तो नहीं हो सकती. कुंदन को आवभगत की चिंता नहीं थी. उसे तो उसी प्यार की तलाश थी, जो उसके मां-पापा कभी उससे करते थे. धीरे-धीरे सब के दिल में उसके लिए प्यार घटते ही जा रहा था. अब तो स्थिति यह हो गई थी कि बीमार होने पर भी किसी के पास समय नहीं था कि उसकी देखभाल करें. कुंदन को लगने लगा था कि अपने पैरों पर स्वंय ही उसने कुल्हारी मारी है.
तभी अपनी पत्नी एकता की आवाज़ सुनकर उसकी तंद्रा भंग हुई. वह रामू से कह रही थी, “साहब उठे, तो उनसे पूछ कर दवा और खाना दोनों खिला देना. मुझे आने में थोड़ी देर हो जाएगी.’’
एकता के जाते ही वह उठ बैठा. घर में सिर्फ़ वह और रामू थे. अचानक उसके मन में अपने पापा और सुचित्रा मौसी की स्मृति मुखर होने लगी. उनका प्यार याद कर उसका मन विकल हो उठा. वह तुरंत उठकर कपड़े बदलकर और कुछ कपड़े बैग में डाल ड्राइवर को गाड़ी निकालने के लिए बोला. अब और अपमान का दंश झेलना उसे गवारा नहीं था. ऑफिस से पूरे एक महीने का छुट्टी ले, उसी समय पटना के लिए रवाना हो गया.
रातभर के सफ़र के बाद सुबह के उजास फैलने के साथ वह पटना पहुंच गया. वहां पहुचते ही उसे ऐसा लगा जैसे वहां का कण-कण उसे पुकार रहा है. इस धरती, आकाश और हवा में जाने कैसी संजीवनी थी कि उसके सारे दुख, संताप और बीमारियां पटना की धरती पर पहुंचते ही जाने कहां लुप्त हो गईं. जैसे ही कार आकर  उसके अपने घर के गेट के सामने रुकी अपना वह पुराना घर उसे किसी आत्मीय स्वजन से कम नहीं लगा. आनायास ही उसकी आंखें भर आईं. गेट खोलकर अंदर आया, तो सामने ही पथरीले आंगन में बैठी सुचित्रा मौसी चावल बीन रही थीं. पहले की तरह अपने काम में मगन. उन्हें पता ही नही चला कब उनके बगल में कुंदन आ खड़ा हुआ. जैसे ही उसने झुककर मौसी के चरण स्पर्श किए, वे चौंक कर सिर उठाई, तो सामने कुंदन को देख थोड़ी देर के लिए एकटक देखती रह गईं, फिर उसे खींचकर सीने से लगा फूट-फूट कर रो पड़ी. आहट सुन पापा भी बाहर आ गए. उसे देख उनकी आंखें भी छलक आईं. उसे लिए हुए वह घर के अंदर आ स्नेह से उसकी पीठ थपथपाते हुए उसके क़रीब आकर बैठ गए. उसे लगा अपने ऐसे होते है, जिन्हें अपने मान-अपमान से ज़्यादा अपनों की चिंता होती है. जिन्हें अपने रिश्ता तोड़ने के बदले झुकना पंसद होता है.

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वर्षों बाद ढे़र सारा प्यार, स्नेह और अपनापन पाकर वह आत्मविभोर हो उठा. घर आकर उसे बेहद शांति का अनुभव हुआ. जीवन में मिले अपमान, ठोकरें और बेगानेपन ने उसे अपनों का महत्व समझा दिया था. एक दिन जिस घर से उसे विरक्ति हो गई थी, आज वही घर उसे प्यार का सागर नज़र आ रहा था. 
रात में खाना खाने के बाद मौसी ने उसका बिस्तर उसके उसी पुराने चिर-परिचित कमरे में लगवा दिया. वह सारा काम समाप्त कर उसके सिरहाने आ बैठी. पहले की तरह ही सिर सहलाते हुए बोली, “मैं जानती हूं मैं ही तुम्हारी अपराधी हूं, पर तुम मेरा विश्वास करो यह शादी हमें मजबूरी में करनी पड़ी. सरला दी के गुज़र जाने के बाद आस-पड़ोस के लोगों के शर्मनाक फब्तियों ने हमारा जीना मुहाल कर दिया था. खुलेआम लोग हमें बदनाम कर रहे थे. वसुधा को भी तानों-उलाहनों से लोग परेशान कर रहे थे. हमारी समझ में नहीं आ रहा था क्या करें? हम दोनों मां-बेटी इस घर में पूरी तरह सुरक्षित थे. तुम्हारे पिता के लिए भी अपना घर और नौकरी दोनों इस उम्र में संभालना मुश्किल था, इसलिए ही हम दोनों ने शादी का फ़ैसला  लिया. हमारे इस फ़ैसले को तुम समझ नहीं सके और घर छोड़ दिया. तब से मैं तुम्हारा ही इंतज़ार कर रही थी. अगर तुम नहीं चाहोगे, तो चाहे मुझे जितनी भी कठिनाइयां झेलनी पड़े मैं इस घर में नहीं रहूंगी. वसुधा को साथ ले घर छोड़ दूंगी, पर अब तुम्हें इस घर से जाने नहीं दूंगी. मैंने सरला दी को वचन दिया था तुम्हारी ख़ुशियों का पूरा ख़्याल रखूंगी, फिर भला मैं कैसे तुम्हारी ख़ुशियों के आड़े आ सकती हूं.” उनकी आंखों से उनका वात्सल्य आंसुओं के रूप में उमड़ पड़ा.
थोड़ी देर तक वह निःशब्द रोती रही, जब उठकर जाने लगीं, तब कुंदन ने उनका हाथ थामते हुए कहा, “मौसी, क्या आप अपने इस नालायक बेटे को एक बार माफ़ नहीं कर सकती. मैं वादा करता हूं आगे आपको कोई शिकायत का मौक़ा नहीं दूंगा.” उसके व्यवहार से हैरान वह अश्चर्यमिश्रित दृष्टि से उसे निहारने लगीं.
‘‘मैंने एक और ग़लती की है बिना आप लोगों को बताए मैंने शादी कर ली. आशा है, आप दोनों मुझे माफ़ करेंगे.”
‘‘अरे, सच! मेरी बहू को कहां छोड़ आए? उसे साथ क्यों नहीं लाए.” जाने कब से दरवाज़े पर खड़े उन दोनों की बातें सुनते उसके पापा कमरे के अंदर आ गए.
‘‘पहले अपना ट्रांसफर तो पटना करवा लूं. फिर हमारा पूरा परिवार साथ रहेगा.’’ फिर तो देर तक आपस में घर-परिवार और बहू की बातें होती रहीं.
जब सब सोने चले गए, वह बैठा एकता को मैसेज भेज रहा था- ‘अब मैं लौट कर घरजमाई बनने तुम्हारे घर नहीं आऊंगा. अगर तुम मेरे साथ मेरे घर की बहू बनकर रहना चाहती हो, तो तुम्हें अब पटना आकर मेरे पास रहना होगा, मेरे माता-पिता के साथ, वरना आगे तुम ख़ुद समझदार हो.’


   

Rita kumari

रीता कुमारी

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