कहानी- आत्ममुग्धा (Short Story- ...

कहानी- आत्ममुग्धा (Short Story- Atmamugdha)

वो जाने के लिए मुड़ी ही थी कि शिवम ने अपने दाएं हाथ से कसकर उसकी कलाई पकड़ ली. कमज़ोर हाथों की छुअन भी उसे सिहरा गई. ढेर सारा प्यार उमड़ आया शिवम पर. उसका मन हुआ कि वो शिवम के सीने से लिपट जाए और इतना रोए कि सारा गुबार निकल जाए. उनके सामने अपनी ग़लती का इकरार कर मुक्त हो जाए उस बोझ से, जो उसके दिलो-दिमाग़ को थका रहा था, उसे लगातार चूर-चूर कर रहा था.

कराहने की आवाज़ सुनाई दी तो तापी सूप छानना छोड़ तेज़ी से अंदर कमरे में भागी. शिवम दर्द से कराह रहे थे. बहुत कोशिश कर उसने उन्हें करवट दिलवाई. पूरा बायां हिस्सा पैरेलाइज़्ड हो चुका था. बड़े प्यार और धैर्य से तापी ने उनके घावों को पोंछा और दवाई लगाकर पट्टी बांध दी. शिवम की पीड़ा उसे हर बार अंदर तक झकझोर जाती थी. अपने आंसुओं को आंखों में ही कैद रहने को मजबूर कर उसने बहुत धीमे स्वर में कहा, “तुम्हारा सूप तैयार है, बस अभी लाई.”
शिवम के लिए अब जवाब देना कठिन हो गया है. बहुत कोशिश कर, देखा जाए तो अपनी सारी ताक़त लगाकर वे जो भी कुछ बोलते हैं, वह इतना अस्पष्ट होता है कि सिवाय तापी के किसी और के लिए समझना बहुत मुश्किल है. हां, उनकी गहरी आंखें जो आजकल भावनाओं से कुछ ज़्यादा ही लबालब भरी रहती हैं, बहुत कुछ कह जाती हैं. शिवम की आंखें कुछ कह पातीं, इससे पहले ही वह कमरे से बाहर निकल गई.
क्यों? क्यों नहीं करना चाहती है वह शिवम का सामना? आख़िर उसकी ग़लती क्या है? सबको ऐसा ही लगता है कि उनकी आदर्श बहू, आदर्श भाभी और जो भी रिश्ता उसका शिवम से ब्याह करने के बाद बना था, सबके लिए वह एक मिसाल और बेहतरीन जीवनसाथी है. समर्पण और त्याग की मूर्ति है, जो कुछ भी ग़लत कर ही नहीं सकती. फिर शिवम से नज़रें मिलाने का साहस क्यों नहीं है उसमें? क्यों एक अपराधबोध को अपने पर लादे वह ज़िंदगी को एक बोझ की तरह जी रही है? बाहर से मुस्कुराती है, सबके सामने सहज बनी रहती है, पर भीतर ही भीतर रोज़ मरती है. अपने से ही सवाल करती है कि क्या वह इस बात की स्वीकारोक्ति के लिए तैयार है?
“नहीं.” अचानक ही उसके मुंह से निकला.
तभी मधुरिमाजी किचन में चाय बनाने घुसी थीं.
“क्या हुआ बेटा, किससे बात कर रही थी? यहां तो कोई भी नहीं है?”
“नहीं मम्मी, बस… ऐसे ही कुछ सोच रही थी और शब्द निकल गए.” उसके हाथ जल्दी-जल्दी सूप छानने लगे थे.
“बेटा, मैं समझ सकती हूं तेरी मनोदशा. शिवम को लेकर तू हमेशा चिंतित रहती है. उसकी सेवा और देखभाल में दिन-रात एक किए रहती है. तेरा मन ही नहीं, तन भी थक गया होगा. कितनी बार कहा कि नौकर से कुछ काम करवा लिया कर, पर तेरी ज़िद्द है कि शिवम के सारे काम तू ही करेगी.” मधुरिमाजी ने चाय प्यालों में डालते हुए कहा.
“मम्मी, मैं उन्हें सूप पिलाकर अभी आती हूं.” तापी जवाब देने से बचना चाहती थी.
तापी को देखकर मधुरिमा की आंखें जब-तब गीली हो जाती हैं. शिवम ने जब कहा था कि वह दूसरी जाति की लड़की से शादी करना चाहता है, तो घर में सबसे ज़्यादा विरोध उन्होंने ही किया था. पता नहीं दूसरे आचार-व्यवहार वाली लड़की उनके यहां आकर एडजस्ट कर भी पाएगी या नहीं? हालांकि तापी से मिलने के बाद वे उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाई थीं. एकदम सहज व्यवहार, ग़ज़ब के आकर्षण के साथ ही उसकी बातचीत में भी एक मिठास थी. उससे मिलने के बाद उन्होंने तुरंत ही अपनी पसंद की मोहर लगा दी थी.
शिवम की ख़ुशी का तो ठिकाना ही नहीं था.
“थैंक्यू मां, फॉर एक्सेप्टिंग तापी. मैं यक़ीन दिलाता हूं कि आपको मेरे इस निर्णय पर कभी अफ़सोस नहीं होगा. शी इज़ ए वंडरफुल गर्ल.”
अपने प्रोफेसर बेटे को इससे पहले इतना ख़ुश उन्होंने कभी नहीं देखा था. वैसे भी शिवम रिज़र्व ही रहता था. कम बोलता था और बेकार की बातों से दूर ही रहता था.
“मेरे बोरिंग भइया भी इतने रोमांटिक हो सकते हैं, कोई सोच भी नहीं सकता. बड़े छुपे रुस्तम निकले! लव मैरिज कर रहे हो.” छोटी बहन शिविका ने छेड़ते हुए कहा था.
छोटा भाई सोहम भी कहां चुप रहने वाला था.
“भइया, क्या लड़की चुनी है! कितनी डैशिंग लगती है. लगता है, प्रेम भी बहुत सोच-समझकर किया है.”
“ओए, ख़बरदार! ज़रा संभलकर बोल, नहीं तो कान खींचूंगा. याद रख, अब वह तेरी भाभी बनने वाली है.” शिवम ने कॉलेज में पढ़ रहे सोहम की पीठ पर मुक्का मारते हुए कहा.
तापी उनके घर आई और इस तरह उन सब से घुलमिल गई जैसे बरसों से उनके साथ रही हो. सुबह काम पर जाने से पहले जितना संभव होता, घर के काम में हाथ बंटाती. शाम को भी आकर मधुरिमाजी की मदद करती. घर में मेड थी, फिर भी मधुरिमाजी और तापी को अपने हाथों से खाना बनाना अच्छा लगता था. सबका मन जीतकर वह परिवार के लोगों की ही नहीं, बल्कि तमाम रिश्तेदारों की भी मनपसंद बहू बन गई थी. जो लोग पहले शिवम की तारीफ़ करते नहीं थकते थे, उनकी ज़ुबान पर अब केवल तापी का नाम रहने लगा था.

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अपनी वाक्पटुता और विद्वता से वह सबको मोहित करती रहती और झोली भर-भर कर तारी़फें बटोरती. यह सब बनावटी नहीं था, वह थी ही ऐसी. हंसमुख, ज़िंदगी के एक-एक पल को जीने वाली. शिवम का साथ पाकर वह बेहद ख़ुश थी. शिवम भी तो उसके बिना एक पल नहीं रहना चाहता था. उन दोनों की तारीफ़ किए बिना कोई नहीं रह पाता था.
फिर क्या उन्हें किसी की नज़र लग गई? उन्हें नज़र लगी या उन दोनों के बीच कोई अनकहा खिंचाव शुरू हो गया? अच्छी बात तो यह थी कि इस बात की भनक सिवाय उन दोनों के किसी और को नहीं लगी.
तापी ने तौलिया लगाकर चम्मच से सूप शिवम के मुंह में डाला. बहुत धीरे-धीरे, ताकि उसे तकलीफ़ न हो.
“ठीक है ना? ज़्यादा गरम तो नहीं? नमक ज़्यादा तो नहीं?”
शिवम चुपचाप सूप पीता रहा. स्वाद, ठंडा, गरम, फीका, अच्छा, बुरा… सारे एहसास मर चुके हैं उसके. कितना प्यार करता था वह तापी से, उसके लिए कुछ भी करने को हमेशा तत्पर रहता था. देखा जाए तो उसके लिए कोई भी, कुछ भी करने को तत्पर हो जाएगा. वह है ही ऐसी.
“और कुछ चाहिए? शाम को खिचड़ी बना दूं?” लग रहा था जैसे तापी ख़ुद से ही सवाल-जवाब कर रही है.
“तुम्हारी दवाई का भी वक़्त हो गया है.” शिवम का सिर ऊंचा उठाकर उसने उनके मुंह में गोली रख दी. पानी पिलाकर मुंह पोंछा. वे दाएं हाथ से ख़ुद ग्लास पकड़ने की ज़िद्द कर रहे थे, पर लकवा मारने के बाद से कमज़ोरी जैसे उनके पूरे शरीर में ही आ गई थी. वैसे भी तापी को उनका काम करना पसंद था. वो जाने के लिए मुड़ी ही थी कि शिवम ने अपने दाएं हाथ से कसकर उसकी कलाई पकड़ ली. कमज़ोर हाथों की छुअन भी उसे सिहरा गई. ढेर सारा प्यार उमड़ आया शिवम पर. उसका मन हुआ कि वो शिवम के सीने से लिपट जाए और इतना रोए कि सारा गुबार निकल जाए. उनके सामने अपनी ग़लती का इकरार कर मुक्त हो जाए उस बोझ से, जो उसके दिलो-दिमाग़ को थका रहा था, उसे लगातार चूर-चूर कर रहा था.
अपने सारे एहसास ज़ब्त कर उसने बहुत ठंडेपन से उसकी बांह छुड़ाते हुए पूछा, “कुछ चाहिए क्या?”
“कुछ देर बैठो ना मेरे पास…” शिवम के मुंह से टूटे-फूटे शब्द निकले. अधिकार नहीं, याचना का भाव था.
‘क्यों शिवम, क्यों तुम इतने विद्वान, प्रखर, बुद्घिजीवी और हर तरह से श्रेष्ठ होने के बावजूद हीनता के शिकार हुए? क्यों तुमने यह ठाना कि इस हीनता, इस बौनेपन, जिसे तुमने ख़ुद ओढ़ा था, जो तुम्हारे ख़ुद की ही सोच का सृजन था, से बाहर निकलने के लिए तुम अपनी सारी श्रेष्ठता को दांव पर लगा दोगे..?’ कहना तो बहुत कुछ था, लेकिन कुछ नहीं कह पाई तापी.
“बाद में आती हूं.” तापी के लिए असहनीय था शिवम की इस लाचारी को देख पाना.
शिवम किसी भी पहलू से कमतर नहीं थे, न हैं. तापी का बिंदासपन, उसकी खिलखिलाती हंसी, शब्दों का जादू… इन्हीं सब पर तो फ़िदा हुए थे शिवम. फिर उसकी यही ख़ूबियां अब उन्हें क्यों खलने लगी थीं? पांच साल हो गए हैं उनके विवाह को, बच्चा नहीं है. तीन साल की तो प्लानिंग की थी कि वे बच्चा पैदा नहीं करेंगे, उसके बाद हुआ ही नहीं. सच कहें तो इस ओर उसका ध्यान ही नहीं गया. शिवम और परिवार का प्यार पाने के बाद उसे जीवन में कोई कमी महसूस ही नहीं हुई.
ज़िंदगी बहुत अच्छी और सहज गति से चल रही थी. अपने मिलनसार स्वभाव और सेवाभाव के कारण तापी को सबसे प्रशंसा मिलती.
“इतनी पढ़ी-लिखी है, इतना कमाती है, पर अहंकार बिल्कुल नहीं है.”
“और देखो तो, घर के कामों में भी निपुण है.“
“कौन कहेगा कि दूसरी जाति की है.” अपनी तरह से हर कोई उसे सराहता. अपनी प्रशंसा सुनना किसे अच्छा नहीं लगता? वह आत्ममुग्धा-सी अपनी झोली आगे फैला प्रशंसा बटोरती गई. अपनी तारीफ़ सुनने का जैसे उसे नशा-सा हो गया. कभी जब कोई उसकी तारीफ़ में कुछ न कहता, तो उसे लगता कि कुछ कमी रह गई है. यक़ीनन वह बेस्ट थी, लेकिन धीरे-धीरे यह नशा उसे मदहोश करने लगा. वह घंटों शीशे के सामने खड़ी होकर ख़ुद को निहारती और मन ही मन प्रशंसा में मिले शब्दों को दोहराती. वह और बेहतर बनने की कोशिश करने लगी.
जब आपकी किसी सहज वृत्ति में कोशिश का धागा जुड़ जाता है, तो इंसान की स्वाभाविकता की जगह कृत्रिमता ले लेती है. सब कुछ फैब्रिकेटेड लगता है. शिवम को पहले जहां तापी का गुणगान एक सुखद अनुभूति से भर देता था, वही अब उनके अहं को ठेस पहुंचाने लगा था. उन्हें तापी के सामने अपना अस्तित्व बौना नज़र आने लगा था. शिखर पर होने के बावजूद वे नीचे सरक रहे थे. वे जब किसी से बात करते, तो तापी उसके आगे कुछ ऐसा कह देती कि सब ‘वाह’ करने लगते.
अपने क्षेत्र में तो वे निरंतर आगे बढ़ रहे थे, पर उनके अपने ही माता-पिता, भाई-बहन, नाते-रिश्तेदार, मित्र आदि तापी को उनसे बेहतर मानने लगे थे. सर्वगुण संपन्न होने की उपाधि धारण किए तापी इस ख़ुशी में सराबोर थी और उसका भरपूर आनंद उठाना चाहती थी. वह समझ ही नहीं पाई कि उसे मिल रही प्रशंसा से कुंठित होते शिवम अपने इर्द-गिर्द एक महीन जाला बुन रहे हैं. उनमें आए बदलाव को यकायक वह समझ नहीं पाई थी. अचानक वे बात-बात पर बेवजह उस पर ग़ुस्सा होने लगे, उसकी हर बात को काटने लगे, उसके हर काम में ग़लतियां निकालने लगे. जब भी कोई तापी की तारीफ़ करता, तो वे मुंह बनाकर या तो वहां से चले जाते या उसकी कमियां गिनाने लगते.
जहां एक तरफ़ तापी के लिए प्रशंसा बटोरना एक नशा बन गया था, वहीं शिवम के लिए उसे नीचा दिखाना एक जुनून बन गया था. दोनों अपने-अपने ढंग से जीने लगे थे, अपनी दुनिया के पैमाने स्वयं गढ़ते हुए, जैसे एक-दूसरे के लिए उस दुनिया में जगह ही नहीं रह गई थी. अब तो कई बार शिवम तापी पर हाथ भी उठा देते थे, सबके सामने उसकी बेइज़्ज़ती करते थे, लेकिन तापी उनके प्यार की ख़ातिर सब कुछ सह लेती… या कोई प्रतिक्रिया कर वह अपनी इमेज दूसरों के सामने बिगाड़ना नहीं चाहती थी. हालांकि इस बात का एहसास उसे बहुत बाद में हुआ था.

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शिवम का तापी के प्रति क्रूर व्यवहार, हर बात में उसका विरोध करना… इन सब बातों से भी तापी दूसरों की नज़रों में उठ गई. प्रशंसा के साथ अब उसे सहानुभूति भी मिलने लगी थी. सब शिवम को ही बुरा कहने लगे थे. “तू क्यों इसे तंग करता है? और यह है कि तेरे ज़ुल्म सहकर भी ख़ामोश रहती है.” अपनी मां के मुंह से ऐसे शब्द सुनकर शिवम अपना आपा खो देते थे.
शिवम चिढ़ते गए, बौखलाते गए… उनके अंदर की घुटन इतनी बढ़ गई कि एक दिन जब वे तापी को मारने के लिए हाथ उठा रहे थे, तो उन्हें दिल का दौरा पड़ गया. साथ ही शरीर का बायां हिस्सा भी पैरेलाइज़्ड हो गया. एक साल हो गया है शिवम को बिस्तर पर पड़े हुए. बीच-बीच में उन्हें व्हील चेयर पर बिठाकर कमरे से बाहर ले जाया जाता है. भीतर से सब उदास हैं, पर पूरा परिवार उन्हें ख़ुश करने की कोशिश करता रहता है, लेकिन वे बिल्कुल ख़ामोश हो गए हैं.
ख़ामोश तो अब तापी भी रहने लगी है. बस, नहीं बदला है तो उसका समर्पण भाव, सेवा करने का जज़्बा, वह शिवम के लिए दिन-रात एक किए रहती है. विदआउट पे छुट्टी ले रखी है उसने.
घर के सारे सदस्यों के साथ शिवम ड्रॉइंगरूम में व्हील चेयर पर बैठे टीवी देख रहे थे. मां उनके बालों में उंगलियां फेर रही थीं. मां के हाथों का स्पर्श हमेशा सुखद होता है. उन्होंने मां का हाथ पकड़ लिया और नन्हे शिशु की तरह उन्हें देखने लगे, मानो किसी तरह का आश्‍वासन चाहते हों, “मां, बोलो ना… मैं अच्छा हूं ना?”
“मेरा प्यारा बच्चा! चिंता मत कर, सब ठीक हो जाएगा. डॉक्टर ने कहा है, रोज़ मालिश करने से तू जल्दी ठीक हो जाएगा. फिर तापी है ना तेरा ख़्याल रखने के लिए. दो टाइम बिना भूले तेरी मालिश करती है. जिसकी पत्नी इतनी अच्छी हो, इतना प्यार करती हो, उसे तो चिंता करनी ही नहीं चाहिए बेटा.” मधुरिमाजी ने बहुत प्यार से तापी की ओर देखते हुए कहा.
अचानक शिवम ने मां का हाथ छोड़ दिया. तापी सब कुछ देख रही थी.
तो क्या सच में वही ज़िम्मेदार है शिवम की इस हालत की? उसका अच्छा होना शायद शिवम के पौरुष को आहत कर गया. काश, वह इस बात को पहले समझ पाती..! तो क्या शिवम के लिए वो प्रशंसा बटोरना छोड़ देती? शायद हां, शायद नहीं…
सारे जवाब हैं तापी के पास. अब तो जैसे ख़ुद ही सवाल-जवाब करने की आदत पड़ गई है उसे. पहली बार उसे मधुरिमाजी का अपनी तारीफ़ करना अच्छा नहीं लगा. उनकी हर बात अनसुनी कर वह व्हील चेयर को धकेलती हुई शिवम को अंदर कमरे में ले गई. शिवम को बिस्तर पर लिटा दिया और बिना कुछ कहे उनके सीने पर उसने सिर रख दिया. उसके आंसू शिवम को भिगो रहे थे. वे अपने दाएं हाथ से उसकी पीठ सहला रहे थे. आत्ममुग्ध रहने वाली तापी का मन हुआ कि वह चीख-चीखकर कहे कि शिवम, तुम ही सत्य हो, तुम ही सुंदर हो… तुम ही सत्यम्, शिवम्, सुंदरम् हो.

सुमन बाजपेयी

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