हिंदी कहानी- भूख (Hindi Short Story- Bhookh)

 

Hindi Short Story

बंगलों से बचा-खुचा ले जाना अभी तक उसकी नियति थी तो क्या सूतक लगे घर का खाना ले जाना परिस्थितियों के समक्ष समझौता नहीं?  दीवार घड़ी के 4 घंटे बजते ही उसकी तंद्रा भंग हुई. कशमकश की दलीलों और तर्कों पर स्वयं उसकी और बच्चों की भूख हावी हो चुकी थी.

घर में घुसते ही नथुनों में घुस आई घी की महक और भुने राजगिरी की ख़ुशबू से कला की आंतें कुलबुला गईं. घर से भूखे पेट आज वह काम पर निकली थी. कल शाम बंगलों से मिले बचे-खुचे भोजन को वह सुबह बच्चों को नाश्ते के रूप में दे आई थी. उसी से रात को भोजन कर वह सुबह बच्चों के लिए रख पाई थी. अपना हिस्सा रख पाना उसके लिए संभव नहीं था.
पति के आकस्मिक निधन से ऐसी स्थिति निर्मित हुई थी. छोटी बहन लाजो के प्रयास से सिर छुपाने के लिए नाले के समीप बनी झुग्गियों में एक किराए पर घर ले पाई थी. पास के रिहायशी कॉलोनी में लाजो के संपर्क और अनुनय-विनय पर उसे पांच बंगलों में झाड़ू-पोंछे और बर्तन मांजने का काम मिल गया था. लाजो ने यथासंभव उसकी सहायता की थी.
“कला आज बर्तन नहीं है, साफ़-सफ़ाई के बाद ये लिस्ट लेकर किराने का सामान ले आ, साहब बात कर आए हैं. लिस्ट के अनुसार उपवास का अच्छा सामान लेना.” मेमसाहब की बातों से घी की लहराती महक रास्ता भूलकर उसके नथुनों से दूर हो गई.
“नवरात्रि प्रारंभ हो गई है. रोज़ अच्छे से झाड़ू-पोंछा करना. घर में सभी का उपवास है. मिकी और टीना तो शाम को एक समय फलाहार लेंगे. मेरा और साहब का फल-दूध से काम चल जाएगा.” मेमसाहब ने सामान के लिए थैला बरामदे में रखते हुए कहा.
घर की साफ़-सफ़ाई के बाद थैला लेकर वह किराने की दुकान की ओर चल पड़ी. आज वैसे भी वर्मा साहब और गुप्ता साहब के यहां छुट्टी थी. वे दोनों सपरिवार एक सप्ताह के लिए वैष्णोदेवी के दर्शन हेतु गए थे.
किराने की दुकान पर सेठ को लिस्ट देकर पॉलिथिन में भरे मखाने, छुहारे, राजगिरी, सूखे मेवे और न जाने क्या-क्या, जिनके बारे में उसने न कभी सुना था और न ही देखा था, वह देखने लगी. उपवास में ऐसा भोजन? इसका मतलब आज भी बचा-खुचा खाना बंगले से नहीं मिलने वाला.

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आज 2 बंगले बंद मिलेंगे और 3 बंगलों में व्रत-उपवास के कारण कुछ भी मिलने से रहा. पल्लू से माथे पर पसीने की बूंदों को पोंछते समय पल्लू की गांठ में बंधे पैसों की ओर ध्यान गया. खोलकर देखा, एक 10 का नोट, 5 और 2 रुपए के एक-एक सिक्के थे. 17 रुपए से महीने का आख़िरी सप्ताह गुज़ारना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन था. उस पर बंगलों से एडवांस तनख़्वाह मांगना यानी हाथ से काम गंवाना था.
“कला चाय पी ले.” वर्मा मेमसाहब ने चाय दी. सुबह से चौथी चाय थी. खाली पेट चाय से भर-भरकर मानसिक रूप से तो संतोष मिल रहा था, परंतु शारीरिक रूप से पेट की आग का दमन कर पाने में वह असमर्थ थी.
“शाम को मत आना, बर्तन नहीं होंगे. चाय का भगौना और कप मैं धो लूंगी.” जिसकी उम्मीद थी वही हुआ. इस बंगले में तो शाम की गुंजाइश न रही. सीढ़ियों पर लाजो मिल गई.
“जीजी, तीसरी गली के बंगला नं. 5 के मल्होत्रा साहब नहीं रहे, इसलिए दुबे मैडम के घर का काम जल्दी निबटाना पड़ा. ये लोग वहां बैठने जा रहे हैं. बच्चे कैसे हैं?” लाजो उसके कंधे पर हाथ रखते हुए बोली.
छोटी बहन के इस सहारे पर ही तो वह जी रही है. चाहकर भी वह भोजन या खाने की चर्चा लाजो से न कर पाई.
“जीजी, मल्होत्रा साहब के यहां काम वाली 4 दिन से छुट्टी पर है. तू तो जानती है, तेरी बगल वाली झुग्गी की सत्तो को. परसों चोरी के झूठे केस में पुलिस उसके पति को पकड़कर ले गई. वह बेचारी थाने-कचहरी के चक्कर में उलझी होगी. तुझसे क्या बन पाएगा आज? मल्होत्रा साहब के यहां जाकर काम कर देगी?”
“लाजो, अभी बंगाली साहब का काम बाकी है. उनका काम निबटाकर घर पहुंचना है. बच्चे भूखे होंगे. देख सूरज भी चढ़ आया है. देखती हूं यदि बंगाली साहब के घर का काम जल्दी हो गया तो पहुंच जाऊंगी.” कहते हुए दोनों अपने-अपने गंतव्य की ओर हो लीं.
बंगाली साहब के घर में घुसते ही तली मछली की महक से कला के पेट में घुमड़ते हुए भूख के बादल बिना बरसे ही गायब हो गए. क्या नवरात्रि और क्या तीज़-त्योहार? बंगाली साहब के यहां हर दिन मछली के बिना भोजन अधूरा रहता है. मेमसाहब की टूटी-फूटी बंगला मिश्रित हिंदी में कला समझ गई थी कि इस मांसाहारी परिवार में उसे यह समझौता तो करना ही पड़ेगा.
“कौला तुम जोल्दी काम निबटा लो. मौल्होत्रा शाहेब मारा गया, उनके यहां जाना है.” कला तो समझ गई, पर उसे हंसी आ गई.
इस घर से न तो वह कभी कुछ लेती थी और न ही मेमसाहब ने कभी दिया. कला का शुद्ध शाकाहारी होना उसे इस परिवार से कुछ भी लेने से रोकता था.
एक बज चुके थे. ताला बंद कर वे दोनों एक साथ घर से निकले.
घर में भूखे बच्चे उसका इंतज़ार कर रहे होंगे. बच्चों को झुग्गी से बाहर न निकलने की हिदायत देकर वह रोज़ निकलती है. आज तो सत्तो की बेटी भी उसके यहां आकर बैठी होगी- दीपा की हमउम्र. सत्तो की बेटी ने भी कुछ न खाया होगा सुबह से. उसे अनायास लाचारी और बेबसी में डूबी सत्तो, थानेदारों के समक्ष नज़र आने लगी. पति के लिए कितना गिड़गिड़ा रही होगी.
इसी ऊहापोह में वह कब मल्होत्रा साहब के घर के सामने बंगाली मेमसाहब के साथ आ खड़ी हुई, उसे पता ही नहीं चला.
“कौला, तुम चलेगा अंदर.” बंगाली मेमसाहब ने इशारों-इशारों में उस से पूछा.
पल्लू में बंधे 17 रुपए को मुट्ठी में भींचकर कला अंदर चल दी. आज यहां काम कर देगी तो 5-6 घर उसके हो जाएंगे. आमदनी बढ़ेगी तो बच्चों की पढ़ाई, रहन-सहन, भोजन, पहनने-ओढ़ने में ख़र्च कर सकेगी और कुछ बचत भी कर पाएगी. ़ज़्यादा से ़ज़्यादा 2 घंटे और, आज 3 बजे तक घर पहुंचेगी.
यहां काम के बाद ब्रेड का पैकेट और अचार के पाउच लेकर घर पहुंचेगी.
मल्होत्रा साहब के घर रोना-धोना मचा था. अर्थी तैयार की जा रही थी. चारों ओर स़फेद कपड़ों में लोग नज़र आ रहे थे. गर्मी के मारे सभी हलाकान थे. गली के मोड़ पर मुक्ति वाहन खड़ा था. एक नौजवान लड़के को सभी लोग सांत्वना और दिलासा दे रहे थे, वह शायद मल्होत्रा साहब का लड़का था.
कला की निगाहें भसीन मेमसाहब को ढूंढ़ रही थीं, वे मल्होत्रा साहब की रिश्तेदारों में से थीं और लाजो उन्हीं के घर कपड़े धोने का काम करती थी.
बड़े लोगों की यदि बारातें सड़क रोकती हैं तो उनकी शवयात्रा में उपस्थित लोग उनके बड़प्पन की याद दिलाते हैं. सैकड़ों लोग मल्होत्रा साहब की शवयात्रा में शामिल थे. कला को अब खीझ हो रही थी. अर्थी उठने का नाम नहीं ले रही थी. एक-एक सगे-संबंधी, रिश्तेदार और समाज के लोग मृत देह को माला पहना रहे थे. उसे अपनी सोच पर बड़ी शर्मिंदगी हुई, जिनका सगा दुनिया छोड़ कर गया, उन्हें तो अंतिम दर्शन जीभर करना चाहिए. उसकी भूख और दोपहर के भूखे उसके बच्चों से यहां किसे क्या लेना-देना!

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दोपहर 2 बजे अर्थी उठी. मल्होत्रा मेमसाहब के दारुण क्रंदन से उसकी भी आंखें भर आईं. स्वयं के साथ घटित घटनाक्रम चलचित्र की तरह आंखों के सामने घूम गया. स्वयं का विलाप और बच्चों का हिचकियां लेकर रोना याद कर उसका गला रुंध गया.
भसीन मेमसाहब से मुलाक़ात कर लाजो का ज़िक्र करने पर ही वे समझ गईं.
काम से तो कला ने कभी जी नहीं चुराया था. रसोई में बर्तन से लेकर झाड़ू-पोंछा, आने-जानेवालों के लिए चाय, ठंडे पानी की व्यवस्था से लेकर छत में पड़े सूखे कपड़ों को लाकर तह करने तक वह निःशब्द सब कुछ चुपचाप करती रही. उसे कभी-कभी अपने द्वारा किए गए शारीरिक श्रम पर आश्‍चर्य भी होता. सुबह से भूखे पेट वह इतना काम किस जोश और जुनून में करती गई!
मल्होत्रा मेमसाहब की बहन, जिन्हें सब बुआजी संबोधित कर रहे थे, के कहे अनुसार वह चुपचाप एक-एक काम निबटाती गई. साढ़े तीन बज चुके थे.
“बुआजी, मैं जाऊं क्या? 5 बजे तक फिर से आ जाऊंगी. बच्चे घर में अकेले मेरी प्रतीक्षा कर रहे होंगे.” कला बुआजी से पूछ बैठी.
रोते-रोते लाल हो चुकी आंखों से पलकें झपकाकर बुआजी ने हामी भरी तो उसकी जान में जान आई.
बंगले से निकलकर घर जाकर उसे नहाना होगा. पिछवाड़े ही टीन के पतरों को जोड़कर नहाने की जगह
बनी थी.
“बाई…” मल्होत्रा साहब के बंगले से आवाज़ आई. किसी ने उसे ही चिल्लाकर पुकारा. मुड़कर देखा तो 20-22 वर्ष की लड़की उसे हाथ के इशारे से बुला रही थी.
अब उसे एक-एक पल भारी लग रहा था. फिर भी लड़की के आग्रह से वह वापस आई.
“बाई, अंदर बुआजी बुला रही हैं.” लड़की ने कहा.
रसोई में बुआजी फ्रिज से खाना निकाल रही थीं.
“कला, घर से मिट्टी उठी है, सूतक लगा है. आज दोपहर का भोजन तो पक चुका था. खाएगा तो कोई नहीं. इन्हें तू ले जा.” बुआजी ने कहा.
डायनिंग टेबल पर पत्तागोभी की सब्ज़ी, दाल, पनीर का रसा, गर्म डिब्बे में रखी रोटियां, भात, न जाने क्या-क्या था. सब गड्ड-मड्ड होने लगा. कला का सिर चकरा गया. बंगलों से बचा-खुचा ले जाना अभी तक उसकी नियति थी तो क्या सूतक लगे घर का खाना ले जाना परिस्थितियों के समक्ष समझौता नहीं?
दीवार घड़ी के 4 घंटे बजते ही उसकी तंद्रा भंग हुई. कशमकश की दलीलों और तर्कों पर स्वयं उसकी और बच्चों की भूख हावी हो चुकी थी.
बड़े पॉलिथिन बैग में रखे छोटे-छोटे पैकेटों में खाना लिए वह लंबे डग भरते हुए घर की ओर लौट रही थी.

 

– कौशिक सेनगुप्ता

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