कहानी- दीपू की दुल्हनिया (S...

कहानी- दीपू की दुल्हनिया (Short Story- Deepu Ki Dulhania)

Deepu Ki Dulhania

देर रात हो गई, मगर लिस्ट पूरी न हुई. जितने लोग, उतनी ख़्वाहिशें निकलकर आ रही थीं. पेपर भर चुका था, मगर बहू के गुण थे, जो ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रहे थे. इस महामंथन में सभी ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया सिवाय दीपू के. उसको इस मीटिंग रूम से दूर रखा गया.

सुबह की सैर से लौटकर भी दीपू के दादा घर में उसी मुस्तैदी से घूम रहे थे जैसे अभी भी जॉगर्स पार्क के रास्ते नाप रहे हो.
“कैसे निकम्मे लोग हैं इस घर के… अभी तक सो रहे हैं. कितना ज़रूरी दिन है आज का. दीपू का इंजीनियरिंग का रिजल्ट आना है, फिर भी किसी को कोई परवाह ही नहीं है. कैसे देखू, किसे बुलाऊं. हमारा ज़माना होता, तो कब का देख लिया होता. सारे रिजल्ट अख़बार में आ जाया करते थे. अब तो जो देखो इंटरनेट पर ही मिलता है और ये तो हमारे लिए काला अक्षर भैंस बराबर है.”
दादाजी तेज़ी से चहलकदमी करते-करते दिवंगत दादी की फोटो के आगे रुक गए. वो फोटो से ही आंखें चौड़ीकर गुसिया रही थी, “कितनी बार कहा, कुछ और सीखो ना सीखो इस मुए इंटरनेट को चलाना ज़रूर सीख लो, तुम्हारा बुढ़ापा सुधर जाएगा, वरना बात-बात पर बच्चों का मुंह ताकोगे… मगर तुमने कभी मेरी बात सुनी है… मैं तो हमेशा से तुम्हारे लिए घर की मुर्गी दाल बराबर रही… अब भुगतो…”
“अरे चुप हो जा भागवान, मरकर भी पीछा नहीं छोड़ती…” दादा बुदबुदाए.
फोटो के बगल में लगी घड़ी पर नज़र डाली, वहां सात बज चुके थे. सब्र की सीमा ऐसे पार हुई जा रही थी, जैसे मुट्ठी से फिसलती रेत. जब सारी रेत फिसल गई, तो वे एक ही काम कर सकते थे और वही किया. चिल्लाकर भड़कने लगे, “अरे निकम्मों… आलसियों… अभी तक घोड़े बेचकर सो रहे हो… दीपू का इंजीनियरिंग का रिजल्ट आ गया होगा. कोई मुझे देख कर बताओ कि पास हुआ या फेल…”
उनकी चीख-पुकार सुनकर दीपू के मम्मी-पापा, छुटके भाई-बहन, ताऊजी-ताईजी, उनके तीन बच्चे, सभी अधखुली नींद में गिरते-पड़ते उबासियां लेते बैठक में आकर जमा हो गए. दीपू ने घफ़लत में ही लैपटॉप ऑन किया, मगर रिज़ल्टवाली वेबसाइट अभी डाउन थी.
“क्या दादू, इतनी जल्दी बेकार में उठा दिया. अभी तो रिज़ल्टवाली वेबसाइट भी पड़ी सो रही है.“ यह सुनते ही सभी बड़बड़ाते हुए वापस अंदर सोने जाने लगे.
यह देख दादाजी फिर चिल्लाए, “कैसे नामाकूल हो सब के सब, बच्चे के भविष्य की ज़रा भी चिंता नहीं, अरे रिज़ल्ट आने में अगर टेम है, तो उत्ती देर बैठकर भगवान से प्रार्थना तो कर सकते हो, वैसे भी अब तो बस उसी का सहारा है इस निकम्मे से तो कुछ होने वाला नहीं.” वे दीपू को घूरते हुए बोले, तो वो बेचारा नर्वसा गया.


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“निकम्मा काहे कह रहे हैं पिताजी. बहुत मेहनत की है बच्चे ने. किताबी कीड़ा बनकर कितनी रातें काली की हैं.” दीपू की मां सुमनदेवी ने विरोध के सुर बुलंद किए. सच, मांरका दिल मां का ही होता है. ख़ुद चाहे अपनी औलादों को ज़रा-जरा-सी बात पर चप्पल, झाडू, थपकी से कूट लें, मगर किसी और के कहे दो शब्द बर्दाश्त नहीं होते.
“रहने दे बहू, जब पेपर देकर बाहर निकला था, तो चुज्जा सा मुंह लटका हुआ था इसका.” दादाजी की रिज़ल्ट ना देख पाने की बेचैनी अब निराशा के पहाड़ चढ़ने लगी.
दादाजी यानी दीनदयाल शर्मा का बस यही एक ही सपना था, उनके दो बेटों, तीन बेटियों और तेरह नाती-पोतों के खानदान में कोई एक तो ऐसा चश्मोचिराग़ पैदा हो जाए, जो इंजीनियर बने और उनकी नाक ऊंची कर सके, वरना एक परचून की दुकान में कितने घरवालों को खपा सकते हैं. पिछले बरस तक उन्हें अपने सबसे बड़े पोते यानी दीपू के ताऊजी के बेटे टीटू से बड़ी उम्मीदें थी.
तीन साल तक शहर के बेस्ट कोचिंग इंस्टिट्यूट में भेजा, लाखों ख़र्च किए, मगर मज़ाल थी पहला राउंड भी क्लियर किया हो. फिर उन्होंने टीटू से हाथ जोड़ सारा फोकस छोटे पोते दीपू पर लगा दिया और उसकी कोचिंग शुरु करा दी.
दीपू यानी कुलदीपक शर्मा, नाक की सीध में चलनेवाला, घरवालों का कहा माननेवाला संस्कारी लड़का. पढता भी ख़ूब था. जब-जब दादाजी उसको कापी-किताबों में घुसा देखते, फूलकर कुप्पा हो जाते.
ख़ैर, दादाजी ने घर में फ़रमान ज़ारी कर दिया कि जब तक रिज़ल्ट पता नहीं चलता, तब तक सब नहा-धोकर मंदिर में बैठ दीपू के लिए प्रार्थना करेंगे. पूजा-प्रार्थना के कार्यक्रम से निपट और फिर लैपटॉप की आरती उतार, इंटरनेट पर दोबारा रिज़ल्ट देखा गया, तो सिवाय दीपू की ताईजी के सभी ख़ुशी के मारे उछल पड़े. उसके बाद तो जैसे दीपू पास हो गया के नारे से पूरा मोहल्ला गूंज उठा.
“मुझे तो शुरु से ही मालूम था मेरे 13 नाति-पोतों में बस यही इकलौता कुलदीपक है, जो मेरा नाम रोशन करेगा.“ दादाजी भावविभोर हुए बैठे थे.
ये सुनकर सुमनदेवी ने बड़ी-बड़ी आंखों से उन्हें घूरा. माना वो ससुर थे, पिता समान… मगर कहा ना, मां तो मां होती है. ख़ुद चाहे अपने बच्चों को दुनियाभर के जानवरों के नाम से नवाज़ दे, मगर कोई और चूजा कह दे, तो ज़रा भी बर्दाश्त नहीं होता.
घर में ऐसा माहौल था जैसे दीपू कोई जंग जीत आया हो. उसका ये कारनामा जंगल में आग की तरह पूरे कस्बे में फैल गया और लोग मुंह पर मुस्कान लिए बधाई देने पहुंचने लगे. पड़ोस के श्यामलालजी बधाई देकर निकले ही थे कि दादाजी भुनभुना उठे, “गुड पका नहीं और देखो, मक्खियां भिनभिनाने लगी.”
इस मुहावरे का वाक्य-प्रयोग किस संदर्भ में किया गया ये दीपू के पिताजी के सिर के ऊपर से निकल गया. पूछने पर दादाजी बोले, “देखता नहीं पहले तो ये श्यामलाल सीधे मुंह बात नहीं करता था. देखते ही मुंह फेर लिया करता था और मेरे पोते का इंजीनियरिंग में नाम आते ही देखो, कितनी चिकनी चुपड़ी ज़ुबान लेकर बधाई देने आ गया. क्या मैं जानता नहीं आज इसने रंग क्यों बदला? अपनी बड़ी लड़की के लिए अभी से नज़र डाल ली है इसने हमारे दीपू पर… दान-दहेज की औक़ात नहीं और सपने देखने चला है इंजीनियर दामाद के… उंह…” एक छोटी-सी बधाई के पीछे इतना बड़ा राज़ छिपा था वे सोच भी नहीं सकते थे.


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समय अपनी चाल से चलते हुए उस मुक़ाम पर पहुंच गया, जहां दीपू पर इंजीनियर होने का फुल एंड फाइनल लेबल चिपक गया. उसका रुतबा बढ़ा हो चाहे ना बढ़ा हो, मगर उसके घरवालों के पैर ज़मीन पर टिकाए नहीं टिकते थे और टिके भी क्यों भला, हिंदुस्तान में कुंवारा लड़का, वह भी इंजीनियर अपने मां-पिता के लिए ब्लैंक चेक से कम नहीं होता. सो दीपू के घरवाले भी अपने ब्लैंक चैक के तैयार होने का बेसब्री से इंतज़ार करने लगे.
दीपू के लिए पहले से ही अच्छे रिश्ते आने लगे थे और नौकरी लगते ही दीपू के लिए रिश्तों की बरसात होने लगी. घरवालों को डर था कहीं दीपू भी आजकल के लड़कों की तरह ख़ुद से नैन-मटैक्का करके बहू ले आया, तो उनकी सारी आशाओं पर पानी फिर जाएगा… जिस मूंछ को दादाजी सुबह शाम चढ़ाते हैं, वो मुरझाए सूरजमुखी जैसी झुक जाएंगी. अतः घर के बड़े-बुज़ुर्गों ने उसके लिए जल्द-से-जल्द सुयोग्य कन्या खोजने की ठान ली.
मगर इतना अहम फ़ैसला क़रीबी रिश्तेदारों के बगैर कैसे पूरा होता… बाद में सब सुनाई-गिनाई ना करते कि बहू पसंदकर ली और हमें पूछा तक नहीं… अतः दीपू की कमली बुआ, फूफा, मामा, मामी, मौसा, मौसी आदि सभी को इस मुद्दे पर विचार-विमर्श करने इकट्ठा कर लिया गया.
अख़बारों और इंटरनेट की मेट्रोमोनियल सेवाओं का सहारा लेकर दीपू के लिए सुटेबिल मैच खोज शुरु हो गई और जल्द ही घर पर बायोडाटा और फोटो का ढेर लग गया. सबकी छानबीन शुरु होने लगी. किसी प्रपोजल में कोई कमी रह जाती, तो किसी में कोई.. अगर कोई फोटो सबको पसंद भी आ जाता, तो कमली बुआ बायोडेटा से कोई-न-कोई कमी निकालकर मुंह बिचका देती.
“अरे, ये तो अकेली लड़की है, इसके मां-पिता बाद में दीपू को घरजमाई बना लेगें और तुम लोग हाथ मलते रह जाओगे… या फिर शौक देखे इसके बैडमिंटन, साइकलिंग, मूवी… ये तो बाहर ही उड़ी फिरेगी…“
इन सब छांंट-छटाई के बीच दीपू अकेला एक कोने में आंखें बंदकर बैठे हुए, कानों में हैड फोन लगाकर रोमांटिक गाने सुनते हुए अपनी भावी जीवनसंगिनी के सपने देख रहा था. उसे अपने घरवालों पर पूरा विश्‍वास था कि वे उसके लिए वैसी ही दुल्हनिया लाएंगे जैसी इस वक़्त उसके ख़्यालों में आ रही है.
पूरा दिन निकल गया, मगर किसी एक बायोडाटा पर भी आम सहमति नहीं बन सकी. सुटेबिल मैच का सिलेक्शन ना हुआ, मानो देश का इलेक्शन हो गया. सबके सब एक ही दिन में पस्त हो गए.
“भाईसाहब इस तरह तो हो चुका बहू का चुनाव… क्यों नहीं हम ऐसा करें कि हम सब मिलकर बहू के गुणों की एक लिस्ट तैयार करें. इसमें सभी की तरफ़ से ऐसे पॉइंट दर्ज किए जाए, जो हमें दीपू की दुल्हन में चाहिए. फिर उन्हीं के आधार पर आगे की कार्यवाही तय की जाए.“ फूफाजी का यह प्रस्ताव भरी सभा में बहुमत से पारित कर दिया गया.
दीपू की बहन हाथ में काग़ज़ और कलम लेकर बैठी, तो लिस्ट में सबसे पहला पॉइंट कमली बुआ ने दर्ज कराया.
“और कुछ हो ना हो, मगर लड़की की जन्मपत्री दीपू से ज़रूर मिलनी चाहिए. 36 में से कम-से-कम 35 गुण तो मिलना ज़रूरी है, तभी मैं रिश्ते को हां करूंगी वरना नहीं.”


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दीपू के ताईजी ने अगला पॉइंट दर्ज कराया.
“बहू तो ऐसी हो, जहां बैठे उजाला कर दे, तीखे नैन-नक्श, पतली-दुबली काया, हंसे तो मोती झड़े, वो क्या कहते हैं एक्सेप्शनली ब्यूटीफुल…”
“ख़ुद की हंसी तो ऐसी है, जिसे सुनकर गली के कुत्ते अपना राग छेड़ दें, मगर बहू चाहिए मोती झाड़ती, उह…” ताऊजी ने मन-ही-मन खुन्नस निकाली.
“बहू को घर के कामकाज भी तो आने चाहिए, मसलन- रसोई, सिलाई, कढ़ाई, बुनाई वगैरा-वगैरा… आख़िर आगे गृहस्थी उसे ही चलानी है.” दीपू की मां सुमनदेवी ने अपने फ़ायदे की बात उठाई.
“जो भी हो लड़की घर के काम के साथ-साथ पढ़ी-लिखी भी होनी चाहिए, वो क्या कहते हैं ना प्रोफेशनली क्वालिफाइड. आजकल तो ऐसे बहुओं का ही ज़माना है, जिससे जब चाहे नौकरी करवाओ और जब चाहे चूल्हे में लगाओ.” मौसी ने भी अपनी बात रखी.
“अरे मैं तो कहता हूं खाली लड़की के गुण लिखने से काम नहीं चलेगा. उसका घर-बार, खानदान, स्टेटस भी तो देखना पड़ेगा. आख़िर दीपू इंजीनियर है कोई मज़ाक नहीं.” दीपू के शामलीवाले मामाजी ने, जो इसी उम्मीद में थे कि शादी में लड़की के घर से एक अदद सूटपीस मिलेगा, अपनी बात रखी.
देर रात हो गई, मगर लिस्ट पूरी न हुई. जितने लोग, उतनी ख़्वाहिशें निकलकर आ रही थीं. पेपर भर चुका था, मगर बहू के गुण थे, जो ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रहे थे. इस महामंथन में सभी ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया सिवाय दीपू के. उसको इस मीटिंग रूम से दूर रखा गया. वैसे भी जब घर में फ़ैसला करनेवाले इतने बड़े-बुज़ुर्ग मौजूद हो, तो उसके वहां होने की क्या ज़रूरत है, ऐसा उसके घरवालों का कहना था.
सबकी सलाह-मशवरे से छांटे गए रिश्तों में से एक लड़की से दीपू की मुलाक़ात कराने का प्रोग्राम तय कर लिया गया और अगले दिन 15- 20 रिश्तेदारों का जत्था लड़की के घर की ओर रवाना हो गया. बस एक दादाजी ही थे, जो ख़राब तबीयत के चलते इस जत्थे में शामिल न हो सके और उन्हें इस बात का बेहद… बेहद अफ़सोस था.
लड़की बेहद ख़ूबसूरत थी. दीपू को तो देखते ही भा गई थी और वह मन-ही-मन उस मोहिनी सूरत के साथ जीवन बसर करने के सपने भी देखने लगा था. आवभगत भी ख़ूब हुई.
रिश्ता तय होने ही जा रहा था कि मौसाजी यूं ही पूछ बैठे.
“कितनी पढ़ी हो?”
“जी एम.ए. किया है.” लड़की ने जवाब दिया.
“बस एम.ए. कुछ एमबीए. बीबीए. एमसीडी. वगैरह नहीं किया. आजकल तो जिस लड़की को देखो उसके नाम के आगे 3 अल्फाबेट का पूछल्ला ज़रूर लगा होता है, तुमने क्यों नहीं लगाया?”
और बस इतनी-सी बात पर बात बनते-बनते रह गई.
सबके घर लौटते ही दादाजी आंखों देखा हाल सुनने को मचल पड़े. क्या हुआ… कैसा रहा… बात बनी कि नहीं? उन्होंने सवालों की फूलझड़ी सुलगा दी.
“सब बहुत बढ़िया था पिताजी… पिस्तेवाली नमकीन का तो जवाब ही नहीं था… रसगुल्ले भी अच्छे बने थे.” मामाजी चटकारे लेते हुए बोले.
“समोसे भी बढिया थे, बस चटनी में तीखा ज़रा कम था… ” फूफाजी ने कमियां निकालने की आदत यहां भी नहीं छोड़ी।.
“दीदी आपने लड़की की मां की साड़ी देखी… उस पर वह कलर बिल्कुल सूट नहीं कर रहा था… हां, अगर आप पहनती तो ख़ूब फबती.” मौसी ने अपनी राय रखी.
मुफ़्त की दावत और जी-हजूरी के मज़े लेकर सबकी आत्मा भीतर तक प्रसन्न थी. बस दीपू ही था जिसका मन बहुत भारी था. वैसे तो तीन अल्फाबेट के पुछल्ले के सिवाय लड़की में कोई कमी नहीं थी, मगर सबसे पहले रिश्तें को हां कहने का अर्थ था आगे मिल सकनेवाली ऐसी तमाम दावतों को ठोकर मार देना और इतना बड़ा त्याग करने को परिवार का कोई सदस्य तैयार ना था.
“अभी पहली बार में कैसे हां कर दें… दो-चार जगह बात करके ही कुछ फाइनल करेंगे.” कहकर बात टाल दी गई.


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अगले इतवार पूरा जत्था दौबार एक सुयोग्य कन्या से मिलने जा पहुंचा. पिछली बार की मिठाई-नमकीन की तारीफ़ें सुनकर इस बार दादाजी बीमारी के बावजूद ख़ुद को रोक न सके और जत्थे में शामिल हो गए. वो चले तो दिवंगत दादी ने फोटो से ही आगाह किया, “ज़्यादा मीठे पर हाथ साफ़ मत करियो… शुगर बढ़ जाएगी… कहीं ऐसा ना हो, मेरे पासवाली जगह तुम्हारा भी हार चढ़ा फोटो टंग जाए..”
“टोक दिया कमबख्त ने, हार चढ़े या अगरबत्ती जले, आज तो जी भर खाकर आऊंगा…” दादाजी जान पे खेलने का पक्का इरादाकर घर से निकल पड़े.
यह लड़की हर तरह से परफेक्ट थी. उसके नाम के आगे तीन अल्फाबेट एम.बी.ए. का पुछल्ला भी लगा था. उसे देखकर दीपू के मन के तार दौबारा झंझना उठे और वह पिछलीवाली का ग़म भूल सोचने लगा, ऊपरवाला जो करता है, अच्छे के लिए ही करता है. लड़का-लड़की एक-दूसरे को देख मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे, आंखें से आंखों के पैग़ाम पढ़े जा रहे थे, मगर तभी बुआ ने भांजी मार दी, “बेटी पढ़ी-लिखी तो हो, मगर खाना भी बना लेती हो?”
“जी” लड़की ने बड़े आत्मविश्‍वास से जवाब दिया.
“तब लड्डू, गुंजिया, नानखटाई वगैरह तो बना लेती होगी. ये बताओ अचार कितने तरह के डाल लेती हो?”
सवाल सुनते ही लड़की के चेहरे का रंग ऐसे उड़ा जैसे धूप में सूखा अचार.
“एक्सक्यूज मी.” कहकर, ऐसी अंदर गई कि फिर बाहर नहीं लौटी.एक बार फिर दीपू का दिल चकनाचूर हो गया.
इसी तरह तीसरी, चौथी, पांचवी… न जाने कितनी लड़कियों से परिवारवालों ने उसकी मुलाक़ातें करा दी. हर बार दिल में ट्यूबलाइट जली, मगर उतनी ही तेजी से घरवालों की मेहरबानी से शार्टसर्किट भी हो गया.
देखते-ही-देखते 8 साल निकल गए, मगर दीपू को उसकी दुल्हनिया नहीं मिली. अब भूले से ही कोई इक्का-दुक्का रिश्ता आता था, जो किसी-न-किसी कारण से खाली हाथ लौट जाता. बढ़ती उम्र के साथ-साथ दीपू को कुंवारा रहने का ग़म धुन की तरह खाए जा रहा था. जो चांद बादलों में छिप अठखेलियां करता था, वो धीरे-धीरे दीपू के सिर पर उतरने लगा, मगर घरवालों को इस बात की कोई चिंता नहीं थी, वो इंजीनियर जो था. इसलिए वे अपनी बनाई लिस्ट में कोई बदलाव करने को तैयार न थे.


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आज इतवार था एक बार फिर, दीपू के लिए सुटेबिल मैच की तलाश में घर में सारे रिश्तेदार जुड़ चुके थे. एक और दावत के अरमान ले सबके चेहरे खिले पड़े थे, मगर दीपू का कोई अता-पता नहीं था. सब जगह खोज हुई, मगर वह कहीं नहीं मिला. सुबह का घर से निकला, तो सांझ को ही घर लौटा… और वो भी अकेले नहीं, साथ में एक सजी-धजी दुल्हनिया थी. दीपू की दुल्हनिया…
घरवालों के तोते उड़ गए. दीपू पर गालियों की बौछार होने लगी, “अरे बेशर्म, ख़ुद ब्याह कर आया… नाक कटा दी बिरादरी में, न जाने कौन है, किस खानदान की है, कहां मिली, इसी ने फंसाया होगा, वरना हमारा दीपू तो गऊ है… गऊ…”
दुल्हनिया का एक भी गुण घरवालों की लिस्ट में दर्ज नहीं था. कद और शारीरिक गठन दीपू से इक्कीस था, नैन-नक्स उन्नीस… ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं थी और खाने में ब्रेड-आमलेट बना लेती थी. कुंडली कितनी मिलती थी, पता नहीं, मगर जैसी भी थी दीपू को पसंद थी. वह गालियां खाकर भी मुस्कुरा रहा था. चेहरे से कुंवारा रहने की पीड़ा गायब हो चुकी थी. ज़ुबान चुप थी, मगर आंखें कह रही थी, ‘तुम लोगों पर भरोसा कर कितनी लड़कियां हाथ से जाती रही… तुम्हारे चक्कर में रहता, तो यह भी चली जाती… जो है जैसी है, मेरी दुल्हनिया है और मुझे पसंद है…’
उस दिन घर में भले देर तलक कोहराम मचा था, सबके चेहरे उतरे पड़े थे, मगर हार चढ़े फोटो से दादी मुस्कुराती हुई अपने लाड़ले पोते और उसकी दुल्हनिया की बलाइयां ले रही थीं.

Deepti Mittal
दीप्ति मित्तल

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