कहानी- दिल धड़कने दो (Short ...

कहानी- दिल धड़कने दो (Short Story- Dil Dhadkane Do) | Hindi Short Story

                    पूनम अहमद

Hindi Short Story

उसने देखा वह बालकनी में खड़ा था. मन हुआ हाथ हिला दे. सारे दिन की उदासी पल भर में जैसे छूमंतर हो गई. हाथ हिलाने की हिम्मत नहीं हुई. आसपास ही अन्य महिलाएं भी इधर-उधर ही टहल रही थीं. उसे देखते ही कविता का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कता रहा.

कविता ने घड़ी देखी, सुबह के साढ़े सात बजे थे. बेडरूम की खिड़की का पर्दा हटाया. सामनेवाली बिल्डिंग की पार्किंगवाली खुली जगह पर नज़र डाली. सामने की बेंच खाली थी, उसने बेचैनी से इधर-उधर देखा, वह कहीं नहीं दिखा. क्या हुआ? आज वह मॉर्निंग वॉक पर नहीं गया क्या! उसे बहुत बेचैनी हुई, उसका रूटीन तो सेट है. वह इस समय मॉर्निंग वॉक से लौटकर कुछ पल सामने पार्किंग की जगह के एक कोने में स्थित इस बेंच पर बैठता है, फिर चौथे फ्लोर पर स्थित अपने फ्लैट में जाता है. कविता को अपने बेडरूम की खिड़की से उसकी एक बालकनी भी दिखती है. वह बेंच पर नहीं दिखा, तो कविता ने उसकी बालकनी में नज़र डाली. वहां भी कोई नहीं था. कविता का दिल उदास हो गया, दो महीने से कविता दिन-रात उसी के बारे में सोच रही है. उसने सोचा, हो सकता है उसे कोई काम हो. हो सकता है शाम को वह दिखाई दे जाए. वह बेमन से मेड से काम करवाकर ऑफिस जाने के लिए तैयार होने लगी. फिर वह अपनी कार से ऑफिस के रास्ते पर बढ़ गई.
मुलुंड की इस सोसायटी में वह चार महीने से अकेली रह रही थी. दो साल पहले उसने विनोद से प्रेमविवाह किया था. विवाह के छह महीने में ही उसे महसूस हो गया था कि जीवनसाथी चुनने में उससे भूल हो गई है. आशिक़ मिज़ाज विनोद के चरित्र की उच्छृंखलता उसे परेशान करने लगी थी. आती-जाती लड़कियों को घूरना, उनके फिगर-पहनावे पर कमेंट करते चलना, उसकी इन आदतों पर कविता मन ही मन जल कर रह जाती थी. विनोद के ऑफ़िस में काम करनेवाली रीना से विनोद के प्रेमपूर्ण संबंध की ख़बर कविता को मिली, तो पूछने पर उसने बिना घुमाए-फिराए स्वीकार करते हुए कहा था, “हां, कविता. मुझे उससे प्यार हो गया है. मैं उसके साथ रहना चाहता हूं. तुम ही बताओ, अब क्या करना चाहिए?” विनोद की साफ़ शब्दों में कही गई दो टूक बात ने कविता को कड़वे यथार्थ पर लाकर पटक दिया था. उसने भी कहा था, “फिर डायवोर्स ही ठीक रहेगा.”
“नो प्रॉब्लम. जल्दी ही इस बारे में क़दम उठाते हैं.” कहते हुए विनोद किसी अजनबी की तरह घर से बाहर चला गया था. विवाह बचाने का प्रयत्न दोनों में से किसी ने नहीं किया था. दोनों ने सोचा, हम दोनों एक-दूसरे के लिए नहीं बने थे. इस आत्म जागृति के बाद दोनों अपने रिश्ते की लाश को अदालत में जला आए थे.
कविता के माता-पिता का स्वर्गवास हो चुका था. भाई-बहन कोई था नहीं. वह उच्च शिक्षित थी, अच्छे पद पर कार्यरत थी. सुना था विनोद ने रीना से विवाह कर लिया था. इधर कुछ दिनों से वह अपनी मनोदशा से बेचैन थी. न चाहते हुए भी वह उस अजनबी की ओर आकर्षित हो रही थी. कुछ दिनों से शनिवार व रविवार ऑफिस की छुट्टी होने पर वह सोसायटी के गार्डन में सैर के लिए जाती थी, तो वह उसे वहीं दिखता था. वह अपने बेटे के साथ क्रिकेट खेलता था. बेटा सात-आठ साल का होगा. काफ़ी बार आमना-सामना होने पर कविता ने
मुस्कुराकर उसे ‘हाय-हैलो’ कहना शुरू कर दिया था. अब कविता पूरा हफ़्ता शनिवार को उसे देखने की प्रतीक्षा में बिता देती थी.
धीरे-धीरे कविता को उसका सारा रूटीन समझ आ गया था. वह सुबह की सैर से लौटकर उस बेंच पर कुछ देर तक ज़रूर बैठता था. एक बार अंजाने में ही उसकी नज़र खिड़की पर खड़ी कविता पर पड़ गई थी. कविता ने फ़ौरन हाथ हिला दिया था. फिर तो कविता का यह रोज़ का नियम हो गया था. वह उसे रोज़ हाथ हिलाने के लिए खिड़की के चक्कर काटती रहती थी.
कविता की उससे कभी कोई बात नहीं हुई थी, पर आंखों ही आंखों में कविता उसे दोस्ती का खुला आमंत्रण देने लगी थी. कविता ने नोट किया कि अब वह बेंच पर बैठते ही उसकी तरफ़ देखता और मुस्कुरा देता. कविता का मन खिल उठता, कविता का सारा रूटीन उसके चारों तरफ़ घूमता रहता.
कविता को उसका नाम भी नहीं पता था और न शायद उसे कविता का. अब दोनों की आंखों में कुछ नए से भाव होते. कई बार गार्डन में उसकी पत्नी भी साथ होती. तब कविता ने नोट किया था. वह अपनी पत्नी की नज़रें बचाकर उसे देखकर धीरे से मुस्कुरा देता था. उसकी मृदु, कोमल व भावपूर्ण आंखें, जब वह अपनत्व से देखता, तो आंखों से ही छू लेने का सा एहसास होता कविता को.
एक बार बुखार होने पर कविता शनिवार और रविवार गार्डन में नहीं जा पाई, तो अगली बार कविता को देखते ही जब उसने कहा, “कहां थीं? बहुत दिन बाद आईं?” कविता बस मुस्कुराते हुए यह कहकर, ‘तबीयत ख़राब थी.’ आगे बढ़ गई. उसे इस बात ने उत्साह से भर दिया कि वह भी उसका इंतज़ार करने लगा है. दोनों जब तक गार्डन में रहते, नज़रें मिलते ही मुस्कुरा देते. बस, यही चल रहा था कई दिनों से.
कविता को लगता जैसे वह एक अल्हड़ किशोरी है, जिसे नया-नया प्यार हुआ है. कई बार सोचती, नाम तो पूछे, लेकिन आमना-सामना होने पर मुस्कुराकर आगे बढ़ जाती. इस आंख-मिचौली से उसे अपने अंदर एक उत्साह-सा महसूस होता रहता. उसे ही सोचती हुई वह ऑफिस पहुंच गई. उसने दिनभर बेमन से अपने काम निपटाए.
शाम को आते ही उसकी बालकनी में देखा, कुछ नहीं था. मायूस-सी, चाय का कप लेकर अपने कमरे की उसी चेयर पर बैठ गई, जहां से उसकी बालकनी दिखती थी. नज़र वहां से हट ही नहीं रही थी. आजकल उसे अपने जीवन का यह अकेलापन बहुत अच्छा लगने लगा था. जहां बस वह ख़ुद थी और दिन-रात उसी के बारे में सोचते रहना ही उसकी व्यस्तता थी. सुबह मेड कुछ खाना बनाकर रख जाती थी, वही थोड़ा-बहुत खाकर नीचे टहलने उतर गई. जहां टहल रही थी, वहां से भी उसकी बालकनी दिखती थी, अचानक उसने देखा वह बालकनी में खड़ा था. मन हुआ हाथ हिला दे. सारे दिन की उदासी पलभर में जैसे छूमंतर हो गई. हाथ हिलाने की हिम्मत नहीं हुई. आसपास ही अन्य महिलाएं भी इधर-उधर ही टहल रही थीं. उसे देखते ही कविता का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कता रहा. कुछ ही पलों में वही नीचे आ गया और उसे, “हैलो.” कहता हुआ पास से निकल गया. कविता के दिल की धड़कन बेकाबू होने लगी. इसका मतलब वह भी उसमें उतनी ही रुचि लेने लगा है. कविता के दिल को सुकून-सा मिला, मन शांत हो गया. थोड़ी देर इधर-उधर टहलकर वह वापस अपने फ्लैट में आ गई. आराम से टीवी देखा, फिर कुछ सहेलियों से फोन पर बात कर सोने चली गई.
इसी रूटीन के चलते एक महीना और बीत गया. अब सुबह-शाम जब भी घर पर होती, नज़रें उसी को ढूंढ़ती. वह भी अपने ऑफिस से शायद सात बजे तक आ जाता था. कविता भी उसी के आसपास आती थी. शनिवार और रविवार जब भी वह परिवार के साथ कार से निकलता, कविता उसके लौटने तक बेचैनी से इधर-उधर घूमती रहती. उसकी कार तो कविता अब दूर से पहचानने लगी थी. एक दिन कविता की तबीयत कुछ ढीली थी, उसने ऑफिस से छुट्टी ले ली थी. उसकी मॉर्निंग वॉक के समय हाथ हिलाकर ‘हैलो’ कहकर कविता आराम करने लगी. फिर उसने देखा वह अपने बेटे को स्कूल की बस में बिठाने उतरा. बेटे को देखकर दूर तक हाथ हिलाता रहा, फिर वह नौ बजे के आसपास अपनी कार से ऑफिस के लिए निकला. उसकी सुंदर पत्नी बालकनी में आ खड़ी हुई थी. वह उसे देखकर तब तक हाथ हिलाती रही, जब तक वह गाड़ी बढ़ाता हुआ जवाब में हाथ हिलाता रहा. रोज़ कविता साढ़े आठ बजे निकल जाती थी. आज कविता ने उसे ऑफिस जाते हुए पहली बार देखा था.
आज भी उसे देखकर कविता का दिल ज़ोर से धड़का था, पर बालकनी में खड़ी उसकी पत्नी का ख़ुश और खिला चेहरा उसे यथार्थ की दुनिया में ला बहुत कुछ सोचने को मजबूर कर गया. वह निढाल-सी बिस्तर पर लेट गई. वह महसूस कर रही थी कि उसके प्रति आकर्षण एक दुस्साहस है, संस्कारों और रस्मों के सामने आलोचना का विषय है, आकर्षण! वह भी किसी के प्रति, किसी अबोध व भोले से बेटे के पिता के प्रति! क्या कर रही है वह? क्यों किसी पराए पुरुष के प्रति इतनी आकर्षित हो रही है? क्या होगा इस आकर्षण का भविष्य? या तो किसी दिन दोनों की आंख-मिचौली कोई देख लेगा, बदनामी होगी. उसके कारण किसी पत्नी का दिल दुखेगा. रीना का अपने पति विनोद से संबंध होने पर उसने रीना जैसी औरतों को कितना कोसा था, कितनी बददुआएं दी थीं. वह ख़ुद क्या कर रही है? क्या फ़र्क़ है रीना और उसमें. यह क्या ग़लती कर रही है वह! किसी के सुखी परिवार में वह क्यों कांटा बनने की कोशिश कर रही है. उसका क्या है, दिल तो उसकी पत्नी का टूटेगा न! वह तो पुरुष है, उसे तो इसमें मज़ा आ रहा होगा कि कोई औरत दिन-रात उसकी तरफ़ पहल कर रही है. वह क्यों पतन की तरफ़ क़दम बढ़ा रही है? नहीं… नहीं, उसे ख़ुद को संभालना होगा. स्वयं को भटकने से बचाना होगा. उसके भाग्य में कोई उचित जीवनसाथी होगा, तो उसे मिल ही जाएगा. पुरुष को दूसरी औरत कितनी जल्दी आकर्षित कर सकती है. यह वह देख ही रही थी. पुरुष को तो भाता ही है यह सब. चाहे वह विवाहित ही क्यों न हो. वह अपनी भूल को सुधार लेगी, ख़ासकर जब इस भूल के कारण किसी और स्त्री के जीवन पर असर पड़ सकता हो. सारा दिन उसने अजीब-सी मनोदशा में निकाला. शाम को खिड़की पर खड़ी हुई, तो देखा वह कार से उतर रहा था. दिल फिर ज़ोर से धड़का था, पर उसने खिड़की बंद कर पूरा पर्दा खींच दिया. सोचा, दिल का क्या है, धड़कने दो. और ख़ुद को ही अपने संभले हुए क़दम पर शाबाशी देकर मुस्कुराते हुए टीवी ऑन कर लिया.

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