कहानी- इन्वेस्टमेंट (Short Story- Investment)

Short Story- Investment

“कल के हालात से डरकर हम आज रिश्तों में दरारें डालें, उन्हें खाद-पानी से वंचित कर, स़िर्फ इसलिए सूखने दें कि कल इसमें फल कहीं कड़वे ना लग जाएं. आप जिसे बेव़कूफ़ी कह रही हैं, मैं उसे इन्वेस्टमेंट कहती हूं. रिश्तों का इन्वेस्टमेंट… मेरी मानिए, तो आप भी अपनी ससुराल में यह इन्वेस्टमेंट करके जीवनभर मुनाफ़ा कमाइए.”

”श्‍वेता, दो दिनों से देख रही हूं, जिसे देखो बस तेरे गुणगान गाता है… तू है बड़ी लकी… तेरी फ़िक़्र तो ऐसे करते हैं, जैसे तू बहू नहीं, इस घर की बेटी हो.” निकिता के मुंह से अनायास निकले शब्दों पर श्‍वेता मुस्कुराकर बोली, “सच दीदी,  शादी के पहले डर लगता था, ना जाने कैसा परिवार मिले, एडजस्टमेंट हो पाएगा या नहीं? पर अब ऐसा लगता है, जैसे ये परिवार मेरे लिए ही बना था. बस, मैंने यहां रहना शुरू नहीं किया था. सब कुछ कितना सहज, कितना प्यारा है. सब अपने लगते हैं.”

“ओके-ओके, अब इतना भी मत डूब जा अपनी ससुराल में कि तेरा अपना अलग वजूद ही ना रहे. सच बताऊं, तो लकी तू नहीं, तेरे ससुरालवाले हैं, जिन्हें तेरी जैसी नौकरीपेशा और बेवकूफ़ बहू मिली है.” अपनी बड़ी बहन निकिता की विरोधाभासी बात पर सन्न श्‍वेता उसका चेहरा ताकती रह गई. कुछ पल को लगा शायद यह मज़ाक था या सुनने में कुछ ग़लती हुई थी.

पहली बार छोटी बहन की ससुराल आई निकिता दीदी के तीन दिन के प्रवास को जीवंत बनाने में श्‍वेता के सास-ससुर और पति उदित ने कोेई कसर नहीं छोड़ी थी. श्‍वेता साफ़ देख रही थी कि उसके वजूद को हाथोंहाथ लिए उसकी हर इच्छा को सम्मान देनेवाले इस नए भरे-पूरे परिवार को देखकर निकिता अभिभूत है. ऐसे में इस तरह की टिप्पणी… यथार्थ से नितांत परे थी.

“क्या हुआ श्‍वेता? बुरा मान गई क्या? मैं तो बस इतना चाहती हूं कि दूसरों को ख़ुश करने और वाहवाही लूटने के चक्कर में तू अपना मटियामेट ना कर ले. यूं ही पूरी तनख़्वाह लाकर उदित के हाथ में दे देती है और उदित अपनी मम्मी को, और तो और, आए दिन सबके लिए गिफ्ट लाती रहती है. ये सब क्या है? जब से आई हूं, तेरी सास के मुंह से सुन रही हूं, श्‍वेता ने ये दिया, श्‍वेता ने वो दिया. कुछ उन्होंने भी दिया है या नहीं.”

“दीदी, उन्होंने मुझे बहुत कुछ दिया है. उदित जैसा प्यार करनेवाला पति और अपना संरक्षण, जिसके तले हम अपना जीवन सुकून से बिता रहे हैं. लाइफ में और क्या चाहिए? रही मम्मी-पापा की बात, तो उनको अपनी पेंशन मिलती है. हम क्या दे सकते हैं उन्हें? दे तो वो रहे हैं हमें, एक स्ट्रेसफ्री लाइफ…”

“फिर भी श्‍वेता किसी के हाथ में अपनी सारी सैलेरी रख देना, अ़क्लमंदी नहीं है. आज ये प्यार लुटा रहे हैं, कल क्या हालात हों, कौन जानता है. ये तो ख़ुदकुशी करने जैसा है.

मुझे देख, अपनी और अमोल दोनों की सैलेरी को मुट्ठी में रखती हूं.”

“दीदी, थोड़ा समर्पण और उनका विश्‍वास भी अपनी मुट्ठी में करना सीखो, वरना ये तो निरी रेत है, फिसल गई, तो हाथ खाली रह जाएंगे.”

“रहने दे श्‍वेता, समर्पण और विश्‍वास निरी क़िताबी बातें हैं. यही रिश्ते कल क्या रूप धरें, कौन जानता है?”

“कल के हालात से डरकर हम आज रिश्तों में दरारें डालें, उन्हें खाद-पानी से वंचित, स़िर्फ इसलिए सूखने दें कि कल इसमें फल कहीं कड़वे ना लग जाएं. आप जिसे बेव़कूफ़ी कह रही हैं, मैं उसे इन्वेस्टमेंट कहती हूं. रिश्तों का इन्वेस्टमेंट…

मेरी मानिए, तो आप भी अपनी ससुराल में यह इन्वेस्टमेंट करके जीवनभर मुनाफ़ा कमाइए.”

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“तू और तेरी बड़ी-बड़ी बातें… कल जब ये लोग सब कुछ तेरी ननद को उठाकर दे देंगे, तब देखती हूं, तेरा ये इन्वेस्टमेंट कहां काम आता है?” श्‍वेता चुप थी. शायद दीदी को बदलना उसके हाथ में नहीं था. पर निकिता ख़ुश थी… आख़िर आज उसे श्‍वेता को नीचा दिखाने का मौक़ा मिल ही गया. याद आया, किस तरह से उससे तीन साल छोटी बहन ने अमोल के सामने उसे निरुत्तर कर दिया था. एक बार निकिता ने श्‍वेता को बताया कि अमोल ने उससे घर के पज़ेशन के वक़्त थोड़ी-सी फाइनेंशियल हेल्प मांगी थी, पर निकिता ने अमोल को साफ़ मना कर दिया था कि घर के बारे में सोचना उसका काम है. अगर वह हाउसवाइफ होती, तो क्या वह इंतज़ाम नहीं करते. यह बात अमोल को चुभी थी. उस दिन के बाद निकिता से कभी कुछ नहीं मांगा. निकिता की इस बात पर श्‍वेता ने उस वक़्त तो कुछ नहीं कहा, लेकिन दूसरे दिन दीपावली की रात अमोल ने निकिता को सोने के झुमके दिए, तो निकिता ने इतराते हुए कहा था, “दुनिया का दस्तूर है, पति की कमाई पर पत्नी का पूरा अधिकार और पत्नी की कमाई सौ टका पत्नी की. उसमें कोई हाथ नहीं लगा सकता है.” उस वक़्त श्‍वेता ने अपने जीजाजी का पक्ष लेते हुए हंसकर कहा था. “दीदी, ये ग़लतफ़हमी मत रखना कि हाउसवाइफ मिलने पर जीजू के हाथ खाली रह जाते. सुबह से लेकर रात को सोने तक जीजू जिस तरह से तुम्हारा हाथ बंटाते हैं, वह क़ाबिले-तारीफ़ है. आप जॉब नहीं कर रही होतीं, तो सुबह-सुबह बस स्टॉप छोड़ने की चिंता छोड़ जीजू आराम से सो रहे होते. जीजू को गर्म खाना, सुबह-शाम की चाय तो मिलती. तुम्हारे पीछे आनेवाली नौकरों की फौज संभालने का झंझट नहीं रहता.”

“अरे, बस कर, तू मेरी बहन है या दुश्मन.” निकिता ने श्‍वेता को टोका था. तीन साल पहले घटी इस बात को श्‍वेता मज़ाक समझकर भूल गई थी, पर निकिता इस सच को अमोल के सामने उजागर करने के अपराध से श्‍वेता को मुक्त नहीं कर पाई थी. आज हाथ आया मौक़ा वो कैसे

गंवाती, तभी शायद श्‍वेता को उसकी तल्ख़ बातों का सामना करना पड़ा था.

निकिता कुछ और कहती, उससे पहले श्‍वेता की सास दमयंतीजी आ गईं. उन्होंने श्‍वेता से अपने कुंदनवाले सेट को आलमारी से निकालने को कहा. बड़े अधिकार से गुच्छे को संभालती श्‍वेता आलमारी से कुंदन का सेट निकालकर लाई, तो मां उसे हाथों में उठाकर तौलती-सी श्‍वेता से बोलीं, “नंदिनी बहुत दिनों से कुंदनवाले सेट की तारीफ़ कर रही है. मुझे लगता है उसे पसंद है. सोच रही हूं, ऐसे ही हल्के में बनवाकर उसे दे दूं.”

“मम्मी, आप दीदी को यही सेट क्यों नहीं दे देतीं.” बोलती श्‍वेता की नज़र सहसा निकिता से मिली. वह जलती नज़रों से उसे घूर रही थी, तो उसने अचकचाकर आंखें फेर लीं.

दमयंतीजी ने कुछ नहीं कहा. बस, मुस्कुराकर सेट लेकर चली गईं. निकिता श्‍वेता की बेव़कूफ़ी पर कुछ कहती, उससे पहले श्‍वेता ने वहां से निकलने में अपनी भलाई समझी.

दूसरे दिन श्‍वेता की शादी की पहली सालगिरह थी. निकिता उसके कमरे में गिफ्ट लेकर पहुंची तो देखा, वह अपनी ननद नंदिनी से फोन पर बतिया रही थी, “दीदी, आप नहीं आएंगी, तो मज़ा आधा रह जाएगा, पर कोई बात नहीं. आप बच्चों के इम्तहान दिलाइए. पलक से कहना ख़ूब अच्छे नंबर लेकर आए. उसकी मामी ने उसके अच्छे रिज़ल्ट के लिए गिफ़्ट अभी से ख़रीद लिया है.” श्‍वेता ने फोन रखा ही था कि निकिता फिर शुरू हो गई थी. “श्‍वेता, गिफ्ट लेने का अधिकार तेरा बनता है.”

“ओहो दीदी! बेटी होने के नाते नंदिनी दीदी की ख़ुशी इस घर से जुड़ी है. वो ख़ुश, तो सब ख़ुश… रिश्तों में इन छोटी-मोटी भेंटों के बड़े मायने होते हैं. ये सब रिश्तों का इन्वेस्टमेंट हैं, जिसमें मेरी निकिता दीदी कभी विश्‍वास नहीं करती हैं.” उसने हंसते हुए कहा, “उ़फ्! तू और तेरा इन्वेस्टमेंट… गंवा देगी एक दिन अपनी सारी कमाई. विश्‍वास नहीं होता कि तू मेरी बहन है और ये क्या बात हुई कि मुझे रिश्तों में विश्‍वास नहीं है, ऐसा होता तो तेरे कहने से मैं छुट्टी लेकर तेरी मैरिज एनिवर्सरी मनाने ना चली आती.” निकिता की बात पर श्‍वेता ने प्यार से उनके हाथों को पकड़कर कहा, “उसके लिए मेरी प्यारी दीदी को बहुत-बहुत थैंक्स. पर एक बात बोलूं, बुरा मत मानना. मायके से जुड़े रिश्तों को निभाना आसान है, क्योंकि वो बचपन से जुड़े हैं, हमें आदत है उनकी, लेकिन ससुराल से जुड़े रिश्तों को निभाना आसान नहीं है. उसके लिए आपसी समझ, विश्‍वास और समर्पण ज़रूरी है और उसी में हम चूक कर जाते हैं.” आज के दिन निकिता छोटी बहन से बहस नहीं करना चाहती थी, सो वो चुपचाप उसे गिफ्ट देकर चली गई.

शाम तक घर सबकी हंसी से गुलज़ार था. पर निकिता का मन दरक रहा था. पिछले हफ़्ते उसकी शादी की सालगिरह तो यूं ही निकल गई.

चाहती तो अमोल के साथ कुछ सार्थक पल बिता लेती, लेकिन वो व्यावहारिक थी. जानती थी इन भावनात्मक पहलुओं से जुड़कर जीवन नहीं चलता. अमोल आनेवाली एनिवर्सरी को लेकर पसोपेश में थे. ऐसे में निकिता ने उन्हें दुविधा से उबारते हुए कहा, “तुम्हारा टूर पर जाना बहुत ज़रूरी है. टारगेट पूरा नहीं किया, तो फाइनेंशियली प्रॉब्लम हो जाएगी. घर का पज़ेशन लेना है.”

“घर नहीं, मकान.”

“हां-हां वही…” अमोल के व्यंग्यबाण को नज़रअंदाज़ कर, मन ही मन मुस्कुराते हुए बोली, “कितनी भी कोशिश कर लो, भावनाओं में बहकर, अपनी सैलेरी में हाथ नहीं लगाने दूंगी.” अपनी सेविंग्स में बरती गोपनीयता निकिता की मंशा जता देती थी. शादी के तीन साल बाद भी निकिता अमोल के परिवारवालों को अपना नहीं पाई थी. निकिता का कुछ था, तो अमोल का बनवाया मकान, उसके दिए ज़ेवर और पूरी तनख़्वाह, जिसका हिसाब-क़िताब वो समय-समय पर करती थी. उसका हमेशा से मानना रहा है कि स्त्री को अपने पैसों और अधिकारों के प्रति सजग रहना चाहिए, ताकि भविष्य में कोई परेशानी ना हो. निकिता की ज़िद पर अमोल ने मकान के लिए लोन लिया, पर लोन चुकाने के चक्कर में उसे ओवरटाइम तक करना पड़ा, जिससे उसकी सेहत तक बिगड़ी. बढ़ती सेविंग्स निकिता के भविष्य को सिक्योर करती गई, पर वर्तमान उसके हाथ से कब फिसला, वह जान ही नहीं पाई.

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पति और परिवार के साथ बिताए हल्के-फुल्के पलों की क़ीमत उसने नहीं आंकी थी. घर के पज़ेशन के समय भुगतान की चिंता में डूबे अमोल की हालत उसके पिता से देखी नहीं गई, उन्होंने अपनी जमापूंजी बेटे के हवाले की, तो निकिता को अपनी चतुराई पर मान हो आया. डर था कि कहीं अमोल उससे रुपए ना मांग ले, पर यहां तो सब आसानी से हल हो गया. निकिता विचारों में खोई बैठक की ओर आई, तो वहां बैठी दमयंतीजी अपने पति से बोल रही थीं, “सुनो… कुंदन का सेट मैं इस बार श्‍वेता को दे रही हूं. अपनी श्‍वेता आगे बढ़कर तो मांगेगी नहीं, सोच रही हूं गिफ्ट के बहाने दे दूंगी.” “ऊंह! बेव़कूफ़ श्‍वेता, सब कुछ तो इनके हवाले कर देती है. सोने के अंडे देनेवाली मुर्गी को कोई हलाल करता है भला.” बुदबुदाती हुई निकिता उनके पास ही चली आई, मन की कसमसाहट और बढ़ गई थी.

उदित और श्‍वेता भी वहां आ गए. दोनों झुककर दमयंतीजी और उमाकांतजी का आशीर्वाद लेने लगे. वो गदगद हो उठे, आशीर्वाद की झड़ी के साथ दमयंतीजी ने साधिकार बैठने का आदेश दिया और

मुस्कुराकर यह कहते हुए कुंदन का सेट श्‍वेता के हाथ में रख दिया, “आज इसे पहनकर डिनर पर जाना.”

“ओ मम्मी, लव यू…” श्‍वेता सास के गले लगी हुई थी, तभी उमाकांतजी की आवाज़ आई, “बिटिया, इसे पकड़ो और तुम लोग संभालो. पांच-पांच लाख की एफडी तुम्हारे और उदित के नाम है.”

“पर क्यों पापा?”

“क्यों की क्या बात है? सैलेरी तो तुम लोगों से संभलती नहीं, सो हमें दे देते हो. अब थोड़ी ज़िम्मेदारी तुम भी संभालो.” ससुर की आवाज़ में उलाहने का स्नेहभरा स्वांग था, जबकि आंखों में बेटे-बहू के प्रति गर्व झलक रहा था. वो बोल रहे थे.

“अब तुम लोगों को अपने बारे में सोचना नहीं आता, तो ये काम हमें करना पड़ेगा. उदित, तुम्हारी पुरानी एफडी मैच्योर हो रही है, उसे अब घर में लगा दो.”

“पापा, हम आपको इस घर में अच्छे नहीं लगते हैं क्या?” उदित की बात पर वो बोले, “आगे तुम लोग कहां रहते हो, वो बाद की बात है, फ़िलहाल एक घर तुम लोगों का अपना भी होना चाहिए. और ज़रूरी बात, नए घर की बुकिंग बहू के नाम से होगी…” ‘नए घर की बुकिंग’. ये अनुगूंज देर तक निकिता के कानों में गूंजती रही. प्रत्युत्तर में उसे अमोल की मम्मी के शब्द सुनाई दिए- ‘अमोल, घर अपने नाम से लेना.’ क्यों? का प्रश्‍न अमोल की तरफ़ से नहीं आया था. अमोल की मम्मी बोल रही थीं- ‘तेरी पत्नी बड़ी तेज़ है. अभी से इतना अपना-पराया है, तो बाद में क्या होगा.’ उफ़्! उस दिन आग लग गई थी निकिता के तन-बदन में. कितना सुनाया था अमोल को. पर वो चुपचाप सुनते रहे. शायद आईना दिखाकर ख़ुद को और उसे नीचे नहीं गिराना चाहते थे. अपने प्रति अविश्‍वास पर आश्‍चर्य व्यक्त करती निकिता आज चुप थी. वो देख पा रही थी, जो विश्‍वास श्‍वेता पर उसके सास-ससुर ने किया था, उसके पीछे श्‍वेता के छोटे-बड़े कई प्रयास थे, जिनका बड़ा प्रतिफल उसे मिला था. दमयंतीजी बोल रही थीं, “एक बार इनका घर बन जाए, तो चिंता दूर हो…”

‘घर नहीं, मकान…’ वहीं बैठी निकिता बोलना चाहती थी, पर सबके उल्लासित चेहरे देखकर चुप रही. जहां इतना उमंग-उत्साह, समर्पण-स्नेह और आदर हो, वहां मकान अपने आप ही घर बन जाता है.

एक बार फिर उसने श्‍वेता से ख़ुद की तुलना की तो दंग रह गई. श्‍वेता के गंवाने के बावजूद कई गुना हो, सब वापस कैसे मिला? जबकि उसके पास उतना ही रहा, जितना उसका हिस्सा था. वो भी सहसा हल्का हो गया. इतना हल्का कि पलड़ा हवा में लटक रहा था. जबकि श्‍वेता की संपदा में घरवालों का प्यार, संरक्षण और विश्‍वास था, तभी शायद उसका पलड़ा धरती को छू रहा था. निकिता ने बिना जांचे-परखे ही ससुराल और अमोल पर अविश्‍वास व्यक्त किया था. अमोल ने तो फिर भी जांच-परखकर निकिता के प्रति अविश्‍वास और स्वकेंद्रित नारी की छवि बनाई थी. शिकायत की तो कोई गुंजाइश ही नहीं थी. सच तो है… कितनी ऐसी ज़रूरतें आईं, जिसे वो सहज बांट सकती थी… पर ज़िम्मेदारियां और ज़रूरतें तो जीवनभर लगी रहेंगी, उसे पूरा करना पुरुष के अधिकार क्षेत्र में आता है, कहकर वह सदा अमोल को कुंठित करती रही. ख़ुद को चतुर समझनेवाली निकिता श्‍वेता की चतुराई पर हैरान थी. वो तो अपने हिस्से पर अपना डेरा डाले उसे सुरक्षित रखने की जद्दोज़ेहद में पड़ी रही. इधर श्‍वेता ने कितनी आसानी से अपने हिस्से पर सबको जगह देकर उनके दिलों पर अपना स्थान सुनिश्‍चित करा लिया था सदा के लिए…

Minu Tripathi

     मीनू त्रिपाठी

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