कहानी- जीवन ठहरा नहीं (Short Story- Jeevan Thahara Nahi)

Short Story- Jeevan Thahara Nahi

“नहीं सुधा, जीवन अभी ठहरा नहीं, बस एक पड़ाव से गुज़र रहा है. अभी तो बहुत रास्ते तय करने हैं, बहुत दूर जाना है… साथ-साथ एक-दूसरे का हाथ थामे. सच, मैं तो सोचकर ही रोमांचित हो रहा हूं. ऐसा लग रहा है कि असुरक्षा और चिंताओं की परछाइयों से निकलकर इतने सालों के बाद अब हमारा समय आया है कि हम अपना जीवन अपने ढंग से जी सकें, अपने अधूरे सपने पूरे कर सकें…”

 रात के अंधियारे में जब निद्रा रानी पूरे जग को अपनी आगोश में समेटे लोरियां गा रही थी, सुधा की आंखों में न नींद थी, न ही दिल में चैन. वो रसोईघर में भारी मन से बैठी आटे के लड्डू बनाने में व्यस्त थी. बीच-बीच में जब नज़र कुछ धुंधला जाती, तो आंखों से छलक आई वेदना को साड़ी के पल्लू से पोंछ पुनः लड्डू बनाने लगती. दिनभर में कितना कुछ बना लिया था उसने अपने छोटे बेटे अमित के लिए- नमकीन मठरी, मीठे पारे, चकली, गुझिया और भी न जाने क्या-क्या… मगर दिल को अभी भी संतोष नहीं था. जो हाल घर से पहली बार हॉस्टल जा रहे हर बेटे की मां का होता है, वही हाल आज सुधा का भी था.

कैसे रहेगा इतनी दूर? मेरे बिना तो एक काम भी ठीक से नहीं कर पाता… पता नहीं ठीक से खाएगा-पिएगा भी या नहीं?… कौन रखेगा उसका ध्यान?… नन्हीं-सी जान है. देश के सर्वाधिक प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग संस्थान आईआईटी में 25वां रैंक पानेवाला 18 वर्षीय मेधावी अमित सुधा के लिए अभी भी ‘नन्हीं-सी जान’ ही था, जो सुबह की ट्रेन से कानपुर आईआईटी जा रहा था.

सुधा दिनभर के जतन से बनाए गए नाश्ते को बैग में व्यवस्थित कर ही रही थी कि पीछे से अमित रसोई में आ धमका, “प्लीज़ मम्मी सोने भी दो ना, कितनी देर से सोने की कोशिश कर रहा हूं, मगर तुम्हारी खटर-पटर रुकने का नाम ही नहीं ले रही… और ये क्या-क्या भर दिया बैग में? उ़फ् मम्मी, कानपुर भारत में ही है चीन में नहीं, वहां ये सब मिलता है…” अमित की झल्लाहट से सुधा की आंखें पुनः नम हो गईं. “ओह मम्मी, प्लीज़ अब रोओ मत… मेरी प्यारी मम्मी… मेरा वो मतलब नहीं था…” अमित अपनी दुखी मां को बांहों में भर दिलासा देने लगा. “मम्मी, आपका और पापा का यही सपना था कि मैं आईआईटी से इंजीनियरिंग करूं और आज जब मैं आपका सपना पूरा करने जा रहा हूं तो आपका ये हाल हो रहा है. जब जतिन भइया एन.डी.ए. में गए थे, तब भी आपका ऐसा ही हाल हुआ था. आपको तो ख़ुश होना चाहिए कि आपके दोनों बच्चे आपकी ही दिखाई हुई राह पर आगे बढ़ रहे हैं, अपना मुक़ाम हासिल कर रहे हैं और आप हैं कि यूं रोनी सूरत बनाए बैठी हैं.”

“मैं ख़ुश हूं बेटा… बहुत ख़ुश… बस तुम्हारे दूर जाने से ज़रा-सा मन भारी हो रहा था, मगर अब मैं ठीक हूं… चलो चलकर सो जाओ, वरना सुबह आंख नहीं खुलेगी.” अमित सोने चला गया और रसोई से निवृत्त हो सुधा भी लेट गई, मगर उसकी आंखों से नींद अभी भी कोसों दूर थी. मन ही मन अमित के लिए पैक किया हुआ एक-एक सामान दोहरा रही थी, सब कुछ रख लिया न… कुछ भूल तो नहीं गया… थोड़ा लापरवाह है… कैसे ख़याल रखेगा अपना? कैसे रहेगा? और एक बार फिर सुधा के मस्तिष्क में उन्हीं प्रश्‍नों की पुनरावृत्ति होने लगी.

सारी रात खुली आंखों से काटकर उठी सुधा ने ठीक चार बजे अमित को जगा दिया. अमित तैयार हो अपनी मंज़िल की ओर रवाना होने लगा. जाने से पहले तक सुधा को समझाता रहा, “अकेली परेशान मत होना, 10-15 दिन में तो पापा आ ही जाएंगे, चाहो तो इस बीच मौसी के यहां चली जाना. मेरी चिंता मत करना. अब मैं अपना ख़याल ख़ुद रख सकता हूं.” मम्मी के लिए ढेरों नसीहतें छोड़ अमित चला गया.

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उसकी नसीहतें सुन सुधा को बेटे के बड़े और समझदार होने का एहसास होने लगा. इतना बड़ा कि वो दुनिया का अकेले मुक़ाबला करने को तैयार है. उसे अब मां के सुरक्षित आंचल की ज़रूरत नहीं. उसे अब मेरी ज़रूरत नहीं. ऐसी ही व्यथाओं में उलझी सुधा अमित के जाने के बाद अपने चार कमरों के आलीशान फ्लैट में इधर-उधर चक्कर लगा रही थी. किसी काम में मन नहीं लग रहा था और सच पूछो तो अब काम ही क्या बचा था उसके पास. जब कुछ न सूझा तो न जाने क्या सोचकर सुधा ने आलमारी से पुराना एलबम निकाला और देखने बैठ गई. पहले ही फ़ोटोग्राफ़ पर नज़र जम गई. आशीष के साथ पहली फ़ोटो थी उसकी. कैसे डर-डरकर, छुपकर, आशीष के ज़बरदस्ती करने पर खिंचवाई थी. कितना छुपाकर रखती थी उसे… कभी तकिये के नीचे, तो कभी आलमारी में बिछे अख़बार के नीचे. फ़ोटो देखकर पुरानी मधुर स्मृतियां सुधा के मन को गुदगुदा गईं.

नया-नया प्यार था सुधा और आशीष का. दोनों कॉलेज में साथ ही पढ़ते थे. दोनों के प्यार का आधार उनकी पारस्परिक समझ और दोस्ती थी. एक ओर जहां आशीष इलेक्ट्रॉनिक्स में पी.एच.डी. करके इलेक्ट्रॉनिक गुड्स की मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लगाना चाहता था, वहीं सुधा पत्रकार बन अपनी लेखन प्रतिभा को नए आयाम देना चाहती थी. दोनों अपने-अपने सपनों को साकार करने के साथ-साथ एक-दूसरे के सहयोगी होने के लिए भी वचनबद्ध थे. मगर आशीष के पैरेंट्स की एक दुर्घटना में हुई असमय मृत्यु से घर और दो छोटी बहनों की ज़िम्मेदारी उसके कंधों पर आ पड़ी. फलस्वरूप आशीष को पढ़ाई बीच में ही छोड़ नौकरी करनी पड़ी और घर संभालने के लिए सुधा से शादी भी. दोनों ने सोचा था कि एक बार घर की गाड़ी वापस पटरी पर आ जाए, तो अपने-अपने सपने भी पूरे कर लेंगे. पिता के निधन से श्रीहीन हुए परिवार को वैभव की ऊंचाइयों पर पुनः प्रतिष्ठित करने को प्रतिबद्ध आशीष ने दोनों बहनों के विवाह की ज़िम्मेदारी से निबटकर बैंक से लोन ले छोटी-सी इलेक्ट्रॉनिक्स पार्ट्स की मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लगाई और ख़ुद को अनवरत परिश्रम की भट्टी में झोंक डाला. अपनी अथक मेहनत और लगन के चलते वो जल्दी ही अपने क्षेत्र में स्थापित हो गया, मगर इस आयोजन में घर को बिल्कुल भुला बैठा.

आशीष के सपने साकार होने के बाद सुधा भी पत्रकारिता का कोर्स करने की सोच ही रही थी कि गर्भ में एक नवीन सृजन की आकस्मिक उत्पत्ति के बाद घर-संसार की ज़िम्मेदारियों में कुछ ऐसी उलझी कि आज तक नहीं निकल पाई थी. अपनी महत्वाकांक्षा को तो कब का भुला बैठी थी वो. आशीष तो पहले से ही घर को सुधा के भरोसे छोड़े बैठे थे, दो साल पहले बड़ा बेटा जतिन भी आर्मी में चला गया था और आज जब उसकी जीवन परिधि का अंतिम केंद्र अमित भी उसके वात्सल्य की छांव को छोड़ अपने क्षितिज की तलाश में बढ़ चला, तो नितांत अकेली खड़ी रह गई सुधा को स्वयं का अस्तित्व बिखरता-सा महसूस हो रहा था, निराधार… अर्थहीन…

सुधा दो सप्ताह घर में अकेली रही, कहीं आने-जाने का मन नहीं किया. कभी अपने अतीत के पन्ने पलटती, तो कभी अपने 23 साल के लंबे वैवाहिक जीवन की समीक्षा करने लग जाती. आज अचानक ही खाली बैठी सुधा की नज़रों के सामने वो लम्हे तैरने लगे, जब दिन के 24 घंटे भी उसके काम को निपटाने के लिए कम हुआ करते थे, ‘सुधा… सुधा… मम्मी… मम्मी…’ घर में पल-पल गूंजती पुकारें, “ओफ़़्, अभी आई… कुछ काम तो ख़ुद से किया करो.” सुधा झल्लाकर कहती. आशीष तो एक रुमाल भी ख़ुद से नहीं ले सकते थे और बच्चे, जब देखो उसके पल्लू से चिपके रहते. कितना थक जाती थी सुधा उस व़क़्त. सोचा करती थी, न जाने कब मुक्ति मिलेगी मुझे इन ज़िम्मेदारियों से और आज जब सच में उसे मुक्ति मिल चुकी थी तो वो अपनों के बीच उस ‘मोस्ट-वॉन्टेड’ होने के एहसास को मिस कर रही थी. आशीष के साथ तो तसल्ली से बैठ दो बातें करने को तरस गई थी वो. लगता था जैसे उनके ढीले पड़ चुके प्रेम सूत्र मात्र औपचारिकताओं पर ही टिके थे.

कुछ ही दिनों में कितना बड़ा शून्य उभर आया था सुधा के जीवन में. क्या-क्या सोचने लगी थी वो? सभी ने अपनी-अपनी डगर ले ली, किसी को मेरी ज़रूरत नहीं रही… कैसे ढोऊंगी इस उद्देश्यहीन जीवन का भार? अपनी मनोव्यथा वो स्वयं भी नहीं समझ पा रही थी. जितना सोचती, उतना ही उलझती जाती स्वयं के बनाए हुए भ्रमजाल में.

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आज सवेरे ही आशीष का मलेशिया से फ़ोन आया था, दो दिन बाद वे घर वापस आ रहे थे. हर बार जब भी आशीष टूर से वापस आने की ख़बर देते, तो घर में जैसे बहार आ जाती, मगर इस बार ऐसा कुछ भी नहीं था.

आशीष आ गए थे. सुधा खाना बना रही थी और बीच-बीच में पास खड़े हुए आशीष को उनकी अनुपस्थिति में हुए क्रियाकलापों की जानकारी दे रही थी. खाना खाकर आशीष बैठक में बैठ गए और सुधा के पास आकर बैठने का इंतज़ार करने लगे, मगर सुधा थी कि कोई न कोई काम निकालकर अपनी व्यस्तता ज़ाहिर कर रही थी. वो आशीष के सान्निध्य से भी कतरा रही थी. उसे डर था कि कहीं उसके भीतर का गुबार बाहर निकल उनके शेष बचे-खुचे सूत्रों को भी अपने साथ बहाकर न ले जाए.

“सुधा, थोड़ी देर यहां आकर बैठो न, मुझे तुमसे कुछ ज़रूरी बात करनी है.” सुनकर सुधा का मन स्वयं से बोल उठा, उहं… अपना काम छोड़कर कभी बैठे हो मेरे पास जो मैं बैठूं, मगर आशीष के विनम्र आग्रह को ठुकरा न सकी और एक नियत दूरी बनाकर बैठक में बैठ गई.

“कहिए.” उसकी शारीरिक भाषा अभी भी काम की हड़बड़ी जता रही थी.

“सुधा, तुम ख़ुश तो हो न मेरे साथ? कोई शिकायत?” आशीष ने सुधा की आंखों में झांककर पूछा.

“अ…हं… शिकायत?” सुधा को लगा जैसे उसके मन का चोर आंखों के रास्ते निकल आशीष के सामने जा खड़ा हुआ, मन किया फट पड़े और बता दे कि हां शिकायतें तो बहुत हैं. कितनी और कौन-कौन सी, ये तो वो स्वयं भी नहीं जानती, मगर कुछ बोल न सकी.

“नहीं, मुझे क्या शिकायत होने लगी भला.”

“ये भी नहीं कि मैं तुम्हें बिल्कुल समय नहीं देता.”

“तुम अपने काम में व्यस्त रहते हो, अपना क़ीमती समय मेरे साथ बैठकर थोड़े ही गंवाओगे.” आशीष को सुधा का कटाक्ष आहत कर गया, उसने आगे बढ़कर सुधा के हाथों को थाम लिया

“सुधा, तुम्हारे साथ बिताया गया एक-एक लम्हा अनमोल है मेरे लिए. कितना तरसता हूं मैं तुम्हारे लिए… तुम्हारे साथ के लिए… ये तुम नहीं जान सकती. मुझे

इस बात का एहसास है कि मैंने अपने बिज़नेस के पीछे घर को और तुम्हें बिल्कुल अनदेखा कर दिया, मगर क्या करता? मैं ख़ुद मजबूर था.”

“मजबूर…?” सहसा सुधा को अपने कानों पर यक़ीन नहीं हुआ.

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“हां सुधा, तुम तो जानती ही हो मम्मी-पापा के अचानक चले जाने के बाद मुझ पर क्या गुज़री? उनके बिज़नेस पार्टनर्स ने हमारा हिस्सा दबाकर हमें सड़क पर खड़ा कर दिया था, ऊपर से बहनों की ज़िम्मेदारियां, हमारा भविष्य… सब कुछ अधर में था. ख़ैर भगवान की कृपा से धीरे-धीरे सब संभल गया, पर इन कटु अनुभवों और अभावों के चलते मन में एक तरह की इनसिक्योरिटी घर कर गई.”

“कैसी इनसिक्योरिटी?” सुधा ने उत्सुकता से पूछा.

“लगता था कि अगर पापा की तरह मुझे भी अचानक से कुछ हो जाए, तो तुम्हारा क्या होगा? बच्चों का भविष्य कैसे बनेगा? रात-दिन बस यही चिंता खाए जाती थी, इसीलिए बिज़नेस बढ़ाता रहा, बैंक बैलेंस बनाता रहा. मगर जब अमित का आई.आई.टी.में सिलेक्शन हुआ तो मैं इन इनसिक्योरिटीज़ से उबर गया. मुझे विश्‍वास हो चला कि अब मेरे बच्चे इस लायक़ हो गए हैं कि उन्हें मेरे सहारे की, मेरी तरफ़ से किसी सिक्योरिटी की ज़रूरत नहीं, तो मैंने अपने बिज़नेस को सीमित करने का निश्‍चय कर लिया. बहुत हो चुका यहां-वहां भागना, रात-दिन काम में पिसना, बस अब बाकी की ज़िंदगी तुम्हारे साथ सुकून से गुज़ारना चाहता हूं और तुम्हारी लेखन प्रतिभा को निखरते हुए, आगे बढ़ते हुए देखना चाहता हूं.”

“ये क्या कह रहे हैं? मैं और लेखन प्रतिभा, वो सब तो अतीत की बातें हैं.”

“नहीं सुधा, प्रतिभा कभी नहीं मरती. हां, अनुकूल परिस्थितियां न होने पर कुछ समय के लिए दब अवश्य जाती है, मगर उसका अस्तित्व कभी नहीं मिटता. तुम्हारे सहयोग और कर्त्तव्यनिष्ठा से हम सभी के सपने पूरे हो गए, मगर तुम वहीं की वहीं रह गईं और तुम्हें इसकी कोई शिकायत भी नहीं. मगर मुझे हमेशा यह ग्लानि रही कि मुझसे शादी कर तुम्हारी प्रतिभा का गला घुट गया. पर अब समय आ गया है कि तुम अपने बारे में सोचो और आगे बढ़ो. इस बार पीछे खड़े रहकर सहयोग देने की मेरी बारी है.”

“ये अचानक कैसी बातें कर रहे हैं आप? अब कहां लिख पाऊंगी कुछ…? मेरी तो सोच में भी जंग लग चुका है… इस उम्र में नए सिरे से शुरुआत करना असंभव है… जीवन में एक ठहराव आ चुका है.”

“नहीं सुधा, जीवन अभी ठहरा नहीं, बस एक पड़ाव से गुज़र रहा है. अभी तो बहुत रास्ते तय करने हैं, बहुत दूर जाना है… साथ-साथ एक-दूसरे का हाथ थामे. सच, मैं तो सोचकर ही रोमांचित हो रहा हूं. ऐसा लग रहा है कि असुरक्षा और चिंताओं की परछाइयों से निकलकर इतने सालों के बाद अब हमारा समय आया है कि हम अपना जीवन अपने ढंग से जी सकें, अपने अधूरे सपने पूरे कर सकें…” आशीष बोल रहे थे और उनका एक-एक शब्द सुधा के हिमशिला बने मन-मस्तिष्क को पिघलाता जा रहा था. तेज़ हुए रुधिर प्रवाह ने शिथिल पड़ी धमनियों को पुनः थरथरा दिया था. मन के समस्त पूर्वाग्रह तो न जाने कहां हवा हो चले थे और 23 साल पुराने ‘जीवन में कुछ कर गुज़रने’ के तूफ़ानी उद्वेग उनकी जगह लेते जा रहे थे.

दो दिन बाद अमित का फ़ोन आया, “मम्मी, आप जर्नल़िज़्म का कोर्स कर रही हैं… आपने कभी बताया ही नहीं कि आप लिखती भी हैं. वो तो पापा ने बताया… मम्मी, कीप इट अप, मुझे आप पर गर्व है, आप अपनी हमउम्र औरतों के लिए एक मिसाल हैं. मम्मी, बेस्ट ऑफ़ लक…” सुधा बेटे की शुभकामनाओं से भावविह्वल हो रही थी, वहीं थोड़ी दूर खड़े आशीष सुधा के चेहरे पर लौट आई बरसों पुरानी चमक निहार रहे थे. एक पड़ाव पर कुछ देर ठहर सुधा का जीवन नए कुलांचे भरने को तैयार था.

दीप्ति मित्तल

       दीप्ति मित्तल

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कहानी- जीवन ठहरा नहीं (Short Story- Jeevan Thahara Nahi)
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कहानी- जीवन ठहरा नहीं (Short Story- Jeevan Thahara Nahi)
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नहीं सुधा, जीवन अभी ठहरा नहीं, बस एक पड़ाव से गुज़र रहा है. अभी तो बहुत रास्ते तय करने हैं, बहुत दूर जाना है.साथ-साथ एक-दूसरे का हाथ थामे.सच, मैं तो सोचकर ही रोमांचित हो रहा हूं.ऐसा लग रहा है कि असुरक्षा और चिंताओं की परछाइयों से निकलकर इतने सालों के बाद अब हमारा समय आया है कि हम अपना जीवन अपने ढंग से जी सकें, अपने अधूरे सपने पूरे कर सकें
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