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कहानी- जुड़ाव जड़ों से (Short Story- Judav Jadon Se)

अनिल माथुर

“... अब मैं ज़िंदगी में मिले किसी भी रिजेक्शन को दिल से नहीं लेता. बल्कि जितने ज़्यादा रिजेक्शन उतना कम दर्द और उतना ज़्यादा आत्मविश्‍वास महसूस करता हूं. आप सही कहते हो फोन में व्यस्त रहने, ईयर बड्स लगाकर घूमने से किसी से जुड़ना मुश्किल है...”

“उमा बाई, अगले महीने से धुलाई और खाने का काम थोड़ा बढ़ जाएगा. सास-ससुर साथ रहने आ रहे हैं. आपके पास काम ज़्यादा हो, तो किरण को बोल देना. वह कर लेगी.”

“वह कहां से कर लेगी मैडम, अगले महीने ही तो लगन है उसका.”

“क्या? किरण का भी रिश्ता तय हो गया? कब? पिछले साल ही तो बड़ी बेटी मंजू की शादी की है!” मैं हैरान थी.

“अब क्या करें मैडम? बेटियां तो पराए घर जाएंगी ही. हम पिछले महीने ताई सास के गुज़र जाने पर गांव गए थे न, वहीं हमारी एक दूर की चचिया सास ने किरण के लिए रिश्ता सुझाया था.”

“अच्छा, फिर?” मैं उत्सुक थी.

“फिर क्या? उसके थोड़े दिनों बाद ही हमने आपसे दोबारा छुट्टी ली थी. हमें ससुराल की शादी में मायरा भरने जाना था. बस, वहीं शादी में ही वे लड़के वाले मिल गए और किरण की बात पक्की कर आए.”

“अच्छा!” मैंने गहरी सांस ली.

“ज़रा चाय चढ़ा दे. सिर दुख रहा है. तू भी पी लेना. वैसे लड़का करता क्या है?”

“बिजली विभाग में लाइनमैन है.”

“किरण शादी के बाद भी घरों में काम करेगी?” “अब यह तो उसके ससुराल वाले जानें. करवाएंगे तो कर लेगी.” चाय छानकर उसने मुझे पकड़ा दी थी और बर्तन धोकर जमा दिए थे. मुझसे बातें करते हुए एक क्षण के लिए भी उसके हाथ नहीं रुके थे. उमा बाई चली गई थी.

मैं सोच के अथाह सागर में गोते लगाने लगी. चाय का कप खाली हो गया था. कानों में एक शायरी सरगोशी कर उठी- ‘कौन कहता है कि दर्द स़िर्फ दवा से जाता है. लगा दे मरहम कोई चाय का, तो भी सुकून आ जाता है...’ झूठ, सरासर झूठ! मेरा तो सिरदर्द और बढ़ गया है. एक ओर उमा बाई है, जिसने दो साल में दो शादियां निपटा दी हैं. वह भी चेहरे पर बिना किसी शिकन के. यहां तक कि मुझे ही पता नहीं लगा. जबकि रोज़ ही मां-बेटी दो बार आकर काम कर जाती हैं. और एक मैं हूं. बेटा तीस का होने जा रहा है. आकाश पाताल एक कर लेने के बाद भी उसके लिए एक आदर्श सुयोग्य कन्या नहीं ढूंढ़ पा रही हूं.

रिश्तेदारों, पड़ोसियों द्वारा सुझाए रिश्ते पसंद नहीं आए, तो हमने मैट्रिमोनियल साइट का सहारा लिया. वहां हज़ारों की तादाद में विवाह योग्य सजातीय लड़कियां देख मुझे आस बंधी कि मेरे घर भी अब एक सुकन्या का पदार्पण हो ही जाएगा. बेटे की मदद से फोटो वगैरह छांटकर उसका एक अच्छा सा प्रोफाइल बनाया और अपलोड कर दिया. ऐसा लगा मानो कोई किला फतह कर लिया हो.

वाकई इतने तक के सफ़र में ही मुझे एड़ी चोटी का पसीना आ गया था. सबसे श्रमसाध्य और दुरुह कार्य था बेटे को शादी के लिए मनाना. समझ नहीं आता, इस जेन जी का शादी नामक संस्था से 36 का आंकड़ा क्यों बनता जा रहा है? बेटा हो चाहे बेटी, सबको करियर की पड़ी है. और शादी, बच्चे उन्हें इस मामले में सबसे बड़े स्पीड ब्रेकर्स लगते हैं. जाने क्या-क्या कह, समझाकर हमें उसे शादी के लिए तैयार करना पड़ा, मसलन- तुम्हें ना सही, हमें बहू की ज़रूरत है. तुम्हारी उम्र नहीं हो रही, पर हमारी सास-ससुर बनने की उम्र निकलती जा रही है.

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“ममा, बुढ़ापा उम्र से नहीं, सोच से मापना चाहिए. और इस पैमाने पर आप अभी बहुत यंग हैं. समय के साथ आप ओल्ड नहीं हो रहे हैं, तपकर गोल्ड हो रहे हैं.”

मैंने यहां तक कह दिया किसी भी वय, जाति, शहर, व्यवसाय से चलेगी. बस लड़की होनी चाहिए. मन में डर भी बैठ गया था कि आजकल तो समलैंगिक विवाह भी आम हो गए हैं. कहीं वह दिन ना देखना पड़ जाए. बेटा पिघल गया, “ममा, ज़रूरत से ज़्यादा सोचकर हम ऐसी समस्या खड़ी कर लेते हैं, जो है ही नहीं. मैं गे नहीं हूं.” हमने इतने में ही राहत की सांस ली. अभी इतने एडवांस जो नहीं हो पाए हैं हम! ख़ैर बेटे का प्रोफाइल अपलोड करते ही लगा, अब शादी की तैयारी शुरू कर देनी चाहिए. फिर सोचा जब इतना संयम रखा है, तो थोड़ा और रख लेते हैं. एक बार लड़की फाइनल हो जाए. आजकल तो इतने वेडिंग प्लानर हैं. इतना बढ़िया प्रबंध हो जाता है कि घर की शादी में भी मेहमान जैसी फीलिंग आती है. मैंने बड़े उत्साह से लड़कियों के प्रोफाइल देखना शुरू किया. रात-दिन मोबाइल में नज़रें गड़ाए रहने से चश्मे का नंबर और बढ़ गया. मैं जो लड़कियां शॉर्ट लिस्ट करती, वे बेटे को पसंद नहीं आतीं और जो वो शॉर्ट लिस्ट करता, मुझे नहीं जम रही थीं. मैंने यहां भी सरेंडर कर दिया.

“लड़की के साथ रहना तुझे है. तो तू ही सेलेक्ट कर, इंट्रेस्ट भी तू ही भेज, एक्सेप्ट भी तू ही कर, डिक्लाइन भी तू ही कर.”

“फिर आप क्या करोगे? प्रोफाइल बनवाया तो आपने है.”

“सेलेक्ट करने में मदद कर दूंगी.”

“ठीक है. पर उससे बड़ा एक काम और है. पैरेंट्स के कॉल्स आपको संभालने होंगे. मैं वो हैंडल नहीं कर सकता.”

कुछ कॉल संभालते ही मुझे समझ आ गया कि यह काम आसान नहीं है, ख़ासकर तब जब बेटा यह कहते हुए मुझे कॉल थमा दे कि आप बात करो, उधर लड़की की मम्मी है. और फिर इशारों में मुझे यह भी समझाए कि उसे यह शादी नहीं करनी है.

“तू ऐसा कर, पैसा जमा करवाकर ख़ुद पेड मेंबर बन जा और जो तुझे पसंद है, उसी से बात कर ले.” मैंने सुझाया.  

“मुझे कोई पसंद नहीं है. और सच तो यह है कि मुझे अभी शादी ही नहीं करनी है.” वह फिर फैल गया. बेटे के जवाब से मेरे रहे सहे हौसले भी पस्त हो गए. ऐसा लगा मानो मैं अभी रेस के बिगनिंग पॉइंट पर ही खड़ी हूं. भागना अभी शुरू ही नहीं किया है.

“नहीं नहीं.. ठीक है, मैं संभाल लूंगी. तू अपना ऑफिस का काम देख. मैंने कुछ और शॉर्ट लिस्ट की है. वीकेंड पर फ्री हो तब देख लेना.” मैंने किसी तरह बात संभाली. रिश्तेदार, पड़ोसी और आग में घी डालते.

“अभी तो तेरा बेटा वर्क फ्रॉम होम कर रहा है. अच्छा मौक़ा है, फटाफट लड़की देखकर निपटा दे. कहीं और नौकरी करने जाए, इससे पहले ही इसे एक से दो कर दे.” मैं क्या कहती? मेरा बस चलता तो दो क्या तीन करके भेजती.

इधर कुछ समय से मुझे उसका मेट्रोमोनियल साइट से भी मोहभंग होता नज़र आने लगा था. कई-कई दिनों तक साइट ही नहीं खुलती. सप्ताह के पांच दिन तो वर्क प्रेशर का बहाना रहता. और वीकेंड में वह कहीं ना कहीं निकल जाता. कभी किसी दोस्त का बर्थडे, कभी साइट सीइंग, कभी दोस्त की बहन की शादी.

एक दिन मैं फट पड़ी, “तू इतना सोशल कब से हो गया है? पहले तो घर की लोकल शादियों में जाने में ही कतराता था. और अब दोस्त की बहन की शादी के लिए चार-चार दिनों के लिए शहर से बाहर चला जाता है.”

“शादी में ढेर सारे काम होते हैं ना ममा! दोस्त को शॉपिंग, कैटरिंग, डीजे फाइनल करने आदि कामों में मेरी मदद की ज़रूरत थी. अब आप बताओ कैसे इंकार करता? अरे हां, बताना ही भूल गया. परसों उसके यहां सत्यनारायण की कथा है. आप दोनों को भी बुलाया है.”

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“भी से क्या मतलब? तू भी पूजा अटेंड करेगा?” “ममा, पंडित वगैरह की ऑनलाइन बुकिंग हम दोस्तों ने ही करवाई है. पूजा का सामान, प्रसाद वगैरह भी ऑनलाइन ऑर्डर कर दिया है. अब वह तो अपने मम्मी-पापा के साथ पूजा में बैठ जाएगा. ऊपर की सारी व्यवस्थाएं तो हम दोस्तों को ही देखनी होगी ना!”

मैं हैरत से उसे घूरकर देखने लगी. तो वह बोल उठा, “उसके मम्मी-पापा की तबीयत ठीक नहीं रहती. घबरा रहे थे, तो हम लोगों ने बोला कि हम मैनेज कर देंगे. इनफैक्ट हम जेन जी ने एक ग्रुप बना लिया है. हर वीकेंड हम मिलते हैं. बातचीत करते हैं. अपनी-अपनी समस्याएं शेयर करते हैं. मौज-मस्ती भी करते हैं. एक से दूसरा, दूसरे से तीसरा, इस तरह हर सप्ताह नए-नए लोगों से जुड़ना हो रहा है. अच्छा लग रहा है ऑफ़लाइन लोगों से मिलना, विशेषतः अपनी रुचि वाले लोगों से जुड़ना.”

मेरे लिए उसमें यह परिवर्तन आश्‍चर्यजनक पर सुखद था. पूजा वाले दिन रजत तो मदद के नाम पर पहले ही दोस्त के घर चला गया था. हम पहुंचे तो पाया युवा जेनरेशन ने ही सारी व्यवस्थाओं का मोर्चा संभाल रखा था. एक लड़की तुरंत मेरी मदद के लिए आई. “आप नीचे नहीं बैठ सकती हैं, तो इधर कुर्सी पर आ जाइए.”

मैंने नज़रें दौड़ाईं, तो रजत अपने दोस्तों के साथ पानी, प्रसाद आदि की व्यवस्था करवाता नज़र आ गया. मैं कुर्सी पर पास बैठी दूसरी महिला से बतियाने लगी. सबकी अपनी-अपनी कथाएं चल रही थीं. हां, आरती तक माहौल धार्मिक और सौहार्द पूर्ण हो गया था. वही लड़की उन महिला के लिए पानी और दवा ले आई.

“मेरी बेटी है जूही! मेरी बीपी की दवा का यही ध्यान रखती है.”

“लकी हैं आप, वरना आज की पीढ़ी तो मोबाइल से आंखें ही नहीं उठाती. उनके खाने-पीने का हमें याद दिलाना पड़ता है.”

“बहन, बच्चे अब एप स्वाइप से थक चुके हैं. डिजिटल बातचीत सतही होती है. आज के युवा गहराई की तलाश में हैं. उन्हें वास्तविक भावनात्मक रूप से जुड़े रिश्ते लुभाने लगे हैं. अब वे आभासी नहीं, वास्तविक दुनिया से जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं. इसलिए ऑफलाइन अनुभवों को बढ़ावा देनेवाले इवेंट्स उनमें लोकप्रिय हो रहे हैं. सोशल मीडिया पर एक्टिव होने के बावजूद लोग ख़ुद को अकेला महसूस कर रहे हैं. असल दुनिया में कनेक्शन बनाने के लिए भले ही समय और प्रयास की ज़रूरत होती है, पर इससे बने रिश्तों में संतुष्टि मिलती है. रिश्तों की कोई फसलें तो होती नहीं कि पकी और काट ली. रिश्तों के तो वटवृक्ष होते हैं, जो वर्षों की मेहनत के बाद गहरी छाया और गहरी जड़ों के समान मज़बूत बनते हैं.”

मैं गई तो सत्यनारायण की कथा सुनने थी. पर अद्भुत ज्ञान सहेजकर लौटी. घर लौटकर दूधवाले का हिसाब करने के लिए कैलेंडर लेकर बैठी, तो ख़्याल आया अगले महीने तो बेटे रजत का बर्थडे है. मन पुलकने के साथ ही एकदम हताश भी हो उठा. तीस का हो जाएगा और अभी तक शादी क्या, लड़की का अता-पता तक नहीं है. हिसाब ख़त्म ही किया था कि रजत भी लौट आया.

“सब समेटने में थोड़ा व़क्त लग गया. कैसा लगा आपको कार्यक्रम?” “हूं...” मेरी तंद्रा भंग हुई.

“अच्छा था. अब तेरे बर्थडे पर क्या प्रोग्राम है? दोस्तों के साथ होटल में डिनर या कोई ट्रिप प्लान कर रहे हो?”

“सोच रहा हूं घर पर ही एक गेट-टुगेदर रख लें. नज़दीकी रिश्तेदार और थोड़े दोस्त लोग. आपको कुछ नहीं करना होगा. हम फ्रेंड सब इंतज़ाम कर लेंगे. आज देखा तो था आपने?” “वाह! हमें तो बहुत अच्छा लगेगा यदि ऐसा हो जाए तो. मैं अपने कुछ पड़ोसियों को भी बुला लूं? कब से घर पर ऐसा कुछ आयोजन नहीं हुआ है.”

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मैं सब कुछ भुला उत्साहित हो उठी.

“हां हां ममा! यह भी कोई पूछने की बात है?” मैं घर को सजाने-संवारने में जुट गई थी. घर का खाना तो किसी क्लाउड किचन से बनकर आना था. सबसे मिलने, बतियाने की ख़ुशी से ही मन में उमंगें उठ रही थीं. पार्टी वाले दिन रजत के दोस्तों ने न केवल सारी व्यवस्थाएं संभालीं, वरन गेम्स, नाच-गाने आदि से पार्टी में समा बांध दिया.

जूही आकर मुझसे मिली तो मेरे मुंह से निकल गया, “अरे पहले पता होता तुम आ रही हो तो तुम्हारी मम्मी को भी इनवाइट कर लेती. उस दिन उनसे बहुत सारी बातें हुई थीं.”

“कोई बात नहीं आंटी. आप घर आइएगा. हम यह मिलने-मिलाने का सिलसिला जारी रखना चाहते हैं. कुछ दिनों बाद मां का बर्थडे है. तब मैं आपको भी इनवाइट करूंगी.”

पार्टी के बाद मैंने रजत से जूही के साथ हुई बातें शेयर कीं. फिर अपने संशय का निवारण भी करना चाहा, “क्या तुम दोनों में दोस्ती से ज़्यादा कुछ है?”

“आपसे झूठ नहीं बोल सकता ममा! आपकी मेरी शादी की चिंता भी समझता हूं. पर अभी ऐसा कुछ नहीं है. सब फ़ैसले हमारे नहीं होते न! कुछ फै़ैसले वक़्त के भी होते हैं. बस, समान सोच और समान रुचि ने हमारे बीच दोस्ती की नींव रख दी है. मुझे ऑफलाइन बने रिश्ते ऑनलाइन से कीमती लगने लगे हैं. मैं अब सोच-समझकर और उद्देश्य के साथ रिश्ता बनाना चाहता हूं. मुझे असली जुड़ाव चाहिए, सिर्फ़ विकल्प नहीं. किसी से रू-ब-रू मिलकर ही उसकी पृष्ठभूमि के बारे में बेहतर तरीक़े से जाना जा सकता है. रिश्ते के लिए माहौल बनाना ज़रूरी है.

मैं ख़ुद में परिवर्तन महसूस कर रहा हूं. अब मैं ज़िंदगी में मिले किसी भी रिजेक्शन को दिल से नहीं लेता, बल्कि जितने ज़्यादा रिजेक्शन उतना कम दर्द और उतना ज़्यादा आत्मविश्‍वास महसूस करता हूं. आप सही कहते हो फोन में व्यस्त रहने, ईयर बड्स लगाकर घूमने से किसी से जुड़ना मुश्किल है.

ख़ुद को बेहतर तरीक़े से पेश करके ही हम किसी का ध्यान आकर्षित कर सकते हैं. ये सब हालांकि आपके ज़माने की बातें हैं. पर मुझे इनकी आज के समय में अहमियत समझ आ रही है.”

“जड़ों से जुड़ाव हमेशा भरोसा देता है और आत्मसंतुष्टि भी.” मेरा बरसों का अनुभव मेरी वाणी में मुखर हो उठा था. मेरे कानों में शादी की शहनाइयां बजने लगी थीं और आंखें ख़ुशी से चमक उठी थीं.

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