उसका हाव-भाव, बात करने का तौर तरीक़ा सब कुछ बेहद ही आर्कषक था. मैं तो उसे बस देखती ही रह गई. एकदम मंत्रमुग्ध सी. मुझे लगा कि वो मेरे सपनों का राजकुमार ही है, जो प्रत्यक्ष में प्रकट हो गया हो.
पहला अफेयर जैसे किसी परी कथा में होने वाली घटना. हर लड़की जब बचपन से गुज़रते हुए जवानी का ताज पहनती है, तो कहीं न कहीं उसका मन अपने सपनों के राजकुमार के ख़्वाब सजाता है. वह चाहती है कि कोई राजकुमार उसके लिए भी सफ़ेद घोड़े पर सवार होकर आए और दोनो एक-दूसरे के क़रीब आते ही एक-दूसरे के प्यार में गिरफ्त हो जाएं...
लड़कपन कुछ होता ही ऐसा है... वास्तविकता से कोसो दूर... कल्पनाशील व स्वप्नशील दुनिया में बसा हुआ... जिसके एक कोने में हम अपने सपनों के राजकुमार के सपने बुनते हैं और उसके सच होने की तमन्ना करते हैं.
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ऐसा ही कुछ मेरे साथ हुआ जब मैं बारहवीं कक्षा में थी. कुछ दिनों के लिए मेरा जाना मेरे मामा के घर दिल्ली हुआ. मेरे मामा एक आई.पी.एस. ऑफिसर थे. वह नवयुक्त आई.पी.एस. ऑफिसर्स को ट्रेन भी किया करते थे.
एक सुबह हम सब मामाजी के साथ बैठकर उनके बंगले के लॉन में चाय-नाश्ता कर रहे थे, तभी उनसे मिलने एक आई.पी.एस. ऑफिसर आया. उसकी अभी दिल्ली में नई पोस्टिंग ही हुई थी. वह खादी यूनिफार्म पहने हुए था. उसकी शर्ट के बाईं ओर बिल्ला लगा था, जिस पर उसका नाम अंकित था- दक्ष शर्मा. लम्बी-दुबली क़द-काठी, सटीक नैन-नक्श... उसकी पूरी पर्सनैलिटी ही लाजवाब थी.
उसका हाव-भाव, बात करने का तौर तरीक़ा सब कुछ बेहद ही आर्कषक था.
मैं तो उसे बस देखती ही रह गई. एकदम मंत्रमुग्ध सी. मुझे लगा कि वो मेरे सपनों का राजकुमार ही है, जो प्रत्यक्ष में प्रकट हो गया हो.
बातों-बातों में उसने एक नज़र मुझे देखा व देखकर थोड़ा मुस्कुराया. मुझे अपने गालों पर एक गरम तपिश महसूस हुई. ऐसा लगा मानो उसने मुझे छू लिया. इतना सुखद एहसास मुझे पहले कभी नहीं हुआ था. मेरा मन कर रहा था मैं उसे ऐसे ही निहारती रहूं.
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फिर कुछ औपचारिक बातचीत के बाद वह सच में घोड़े पर सवार होकर चला गया. मुझे बाद में पता चला कि आई.पी.एस. ऑफिसर्स को घुड़सवारी भी कराई जाती है.
उस पूरी शाम मैं उसी के बारे में सोचती रही. शाम की ठंडी हवाओं के साथ जैसे पेड़ों के पत्ते सरसरा रहे थे, वैसे ही मेरा मन भी हिलोरे खा रहा था. दिल चाह रहा था कि वह एक बार आ जाए और मैं उससे लिपट जाऊं.
फिर जितने दिन भी मैं मामाजी के यहां रुकी, मेरी निगाहें उसी की राह देखतीं. पर अफ़सोस वह फिर कभी न दिखा. उस दिन मेरी उससे पहली व आख़िरी मुलाक़ात ही थी.
आज इस बात को बीते 15 साल हो चुके हैं, पर मेरा पहला प्यार आज भी मेरे दिल के एक कोने में छिपा है. और जब भी ज़ेहन में उसका ख़्याल आता है, एक टीस सी उठती है और लब मुस्कुरा जाते हैं.
- श्रुतिका अग्रवाल
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