कहानी- कच्ची धूप (Short Story- Kachchi Dhoop)

Short Story- Kachchi Dhoop

“अरे… देखो, देखो कोई…! जल्दी आओ! ये लड़की तो पागल हो गयी है!”

अर्पिता ख़ुशी को थामे हुए, बौखलाई हुई-सी चीख रही थी. ख़ुशी की कलाई से बूंद-बूंद खून चू रहा था. लड़की रो नहीं रही थी. बड़े यत्न से उसने आंसुओं को अपनी बड़ी-बड़ी आंखों के कटोरे में रोक रखा था. सभी टीचर्स की आंखों में सवाल थे. कुछ ही पलों में छात्राओं की भीड़ भी प्रश्‍नवाचक नज़रों के साथ इकट्ठी हो गयी थी. सभी टीचर्स ने ख़ुशी को स्टाफ़ रूम में लाकर दरवाज़ा बन्द कर दिया था.

“ ये अपनी कलाई पर ब्लेड से राजीव का नाम लिख रही थी.” अर्पिता ने दयनीय मुद्रा में कहा था.

“क्या…?” कई सारी टीचरों का समवेत स्वर गूंजा था.

काफ़ी देर से अर्पिता स्टाफ़ रूम में बैठी अपनी सह-शिक्षिका और सहेली श्रुति का इन्तज़ार कर रही थी. घंटी बजते ही श्रुति क्लास से बाहर निकली तो दूर से ही उसे स्टाफ़ रूम में बैठी अर्पिता दिख गयी.

श्रुति जानती थी, पिछले कई दिनों से अर्पिता परेशान थी. एक अजीब-सा केस उसके लिये परेशानी का कारण बना हुआ था.

“श्रुति! अभी फ्री हो ना? तो फिर बैठो… ज़रा मेरी समस्या का हल बताओ.

जानती हो, अब तो ख़ुशी क्लास में बेहद खोई-खोई-सी रहती है. उसकी सूनी आंखें जैसे हमेशा दरवाजे की ओर लगी राजीव को ढूंढ़ती रहती हैं. पिछले कई दिनों से राजीव स्कूल भी तो नहीं आ रहे हैं. मुझे समझ में नहीं आता… ऐसा कितने दिन चलेगा?  ख़ुशी जैसी अच्छी लड़की का भविष्य ही कहीं दांव पर ना लग जाये.”

“अर्पिता… अब तो तुम्हें ख़ुशी के माता-पिता से मिल ही लेना चाहिए. वैसे

मुझे लगता है, इस प्रॉब्लम का सोल्युशन हमें मिल सकता है.” श्रुति ने कुछ सोचकर कहा था.

“पता नहीं, तुम्हें क्या सोल्युशन दिख रहा है. मैं तो हार गयी हूं इस लड़की से. जितना भी समझाती हूं, उतना ही वो नासमझ होती जा रही है. अब तू ही बता… मैं क्या करूं?” अर्पिता ने श्रुति का हाथ थामकर कहा.

“मैं… तुम्हें इस परेशानी का हल कल बताती हूं. अभी मुझे एक बार मिसेस जोशी से कुछ बातें करनी हैं.”

देर रात तक श्रुति की आंखों से नींद गायब थी. वो पिछले कई दिनों के घटनाक्रम को याद कर रही थी, ताकि अर्पिता की परेशानी का कोई हल ढूंढ़ सके. पिछले पांच वर्षों से श्रुति और अर्पिता इस स्कूल की शिक्षिकाएं थीं. दोनों ने एक साथ इस स्कूल में काम करना शुरू किया था. दोनों का पाला तरह-तरह की छात्राओं से पड़ा था और छात्राओं के विषय में दोनों ही अक्सर डिसकस करती रहती थीं.

कुछ दिनों पहले ही अर्पिता ने नौंवी कक्षा की एक छात्रा ख़ुशी के विषय में जो कुछ भी बताया था, वो वाकई परेशानी का विषय था. इस उम्र में किशोरियों को जो ख़्याल आते हैं, उनसे श्रुति व अर्पिता अनजान नहीं थीं,

पर ख़ुशी की समस्या कुछ गम्भीर रूप ले रही थी.

ख़ुशी अपने क्लास की होनहार छात्राओं में से थी. उसी स्कूल में राजीव भी पढ़ाते थे. एक आकर्षक और संवेदनशील टीचर. ख़ुशी की कक्षा में वो फ़िज़िक्स के टीचर थे. उनके पढ़ाने का ढंग भी आकर्षक था. ख़ुशी होनहार थी, इसलिये दूसरे टीचरों की तरह राजीव भी उस पर ज़्यादा ध्यान देते थे. शायद… ख़ुशी इसी से प्रभावित हो गयी थी. टी.वी. या किताबों में कहीं उसने पढ़ा था और उनसे प्रभावित ख़ुशी ने एक बार अपनी फ़िज़िक्स की कॉपी में राजीव सर के लिये एक छोटा-सा प्रेम-पत्र लिखकर रख दिया था. राजीव तो चौंक ही गये थे. उसने ख़ुशी की क्लास टीचर अर्पिता को बताया था. अर्पिता को अपनी प्रिय छात्रा ख़ुशी से ऐसी आशा नहीं थी. गुस्से व खीझ में बिना कुछ सोचे-समझे उसने ख़ुशी को सज़ा दे दी थी. श्रुति ने जब ख़ुशी को कड़ी धूप में, मैदान में खड़े देखा था तो उसे सब पता चल गया था.

“अपू… ये क्या? तुम क्या समझती नहीं हो कि ख़ुशी उम्र के किस दौर से गुज़र रही है? उसे समझाना तो दूर… तुमने उसे ऐसी सज़ा दी!” श्रुति ने अर्पिता को डांटा था.

ख़ुशी के लाल हुए चेहरे पर अपमान के आंसू और गर्मी से आया पसीना देखकर अर्पिता को भी बुरा लगा था. अकेले में श्रुति और अर्पिता ने उसे काफ़ी समझाया था.

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“इस उम्र में हम सपनों की दुनिया में जीते हैं. पहले तो शारीरिक आकर्षण से हम प्रभावित होते हैं. फिर कोई मीठा बोल दे या प्रशंसा ही कर दे तो… वो शख़्स हमें अपना लगने लगता है. हम उससे ही अपने जीवन की डोर बांधने के सपने सजाने लगते हैं. पर हम जो सामने देखते हैं, वही सच नहीं होता. हर आदमी के दो पहलू होते हैं. दूसरा पहलू हमें ढूंढ़ना होता है. तुम समझ रही हो ना… ख़ुशी! ये प्यार नहीं होता है. ये तो महज़ आकर्षण है. इस घटना को भूल कर तुम अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो.

“श्रुति ने ख़ुशी को समझाया था. उस व़क़्त तो ख़ुशी की आंखों से बहते आंसुओं और नीची निगाहों को देखकर सभी ने ये समझा था कि लड़की अपनी ग़लती पर शर्मिंदा है. इसलिये उसके अभिभावक को नहीं बुलाया गया था.

पर ये अन्त नहीं था. ख़ुशी रोई थी, क्योंकि उसे दु:ख हुआ था कि उसकी प्रिय शिक्षिकाएं भी उसे समझ नहीं सकी थीं. इस बात का खुलासा भी बाद में ही हो सका था. श्रुति और अर्पिता ख़ुशी को साथ लेकर स्टाफ़ रूम से बाहर निकली थीं कि राजीव सर सामने आ गये थे. ख़ुशी ने जिस तरह से उन्हें देखा था, वो सभी को अखर गया था. राजीव ने उसे देख कर भी अनदेखा करते हुए, अपना क्लास लेना ज़ारी रखा था. ख़ुशी अब ख़ामोश-सी हो गयी थी. खाली समय में भी वो अपनी सहेलियों के साथ नहीं रहती थी, बल्कि अब वो अपनी पढ़ाई के प्रति ज़्यादा ही ज़िम्मेदार हो गयी थी. राजीव सर अब पहले की तरह खुलकर उससे पेश नहीं आ पाते थे, बल्कि वे तो खुलकर पढ़ा भी नहीं पा रहे थे, क्योंकि उनके कक्षा में प्रवेश करते ही छात्राएं कानाफूसी शुरू कर देतीं या दबी-दबी-सी हंसी गूंजती रहती.

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समझने लगती हैं. उनके चेहरे पर प्रेम के नाम पर एक सलज्ज मुस्कान खेलने लगती है. उनकी फुसफुसाहटें पूरे स्कूल में गूंजती हैं. उसी दिन पूरा स्टाफ़ रूम अर्पिता की चीख से चौंक गया था.

“अरे… देखो, देखो कोई…! जल्दी आओ! ये लड़की तो पागल हो गयी है!”

अर्पिता ख़ुशी को थामे हुए, बौखलाई हुई-सी चीख रही थी. ख़ुशी की कलाई से बूंद-बूंद खून चू रहा था. लड़की रो नहीं रही थी. बड़े यत्न से उसने आंसुओं को अपनी बड़ी-बड़ी आंखों के कटोरे में रोक रखा था. सभी टीचर्स की आंखों में सवाल थे. कुछ ही पलों में छात्राओं की भीड़ भी प्रश्‍नवाचक नज़रों के साथ इकट्ठी हो गयी थी. सभी टीचर्स ने ख़ुशी को स्टाफ़ रूम में लाकर दरवाज़ा बन्द कर दिया था.

“ ये अपनी कलाई पर ब्लेड से राजीव का नाम लिख रही थी.” अर्पिता ने दयनीय मुद्रा में कहा था.

“क्या…?” कई सारी टीचरों का समवेत स्वर गूंजा था.

“ये लड़की पागल हो गयी है.”

मिसेज जोशी ने तो गुस्से में अपना हाथ ही उठा लिया था.

“ये क्या सोचती है, ऐसा करके ये राजीव को पा लेगी? राजीव शादीशुदा है. उसकी अपनी ज़िन्दगी है.” इतिहास पढ़ानेवाली शिखा ने कुछ तल्खी से कहा था.

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ख़ुशी के हाथ पर श्रुति बैण्डेज बांध रही थी. ख़ुशी ने एक बार अपनी गम्भीर नज़रों से जाने क्या कहने की कोशिश में शिखा की ओर देखा था और दूसरे ही पल नज़रें फेर ली थीं.

ख़ुशी को समझाने के लिए प्रधानाध्यापिका मिसेज जोशी ने फिर श्रुति को ही भेजा था.

“टीचर… मैं राजीव सर से… बहुत प्यार करती हूं.” एक लम्बी ख़ामोशी के बाद ख़ुशी ने कहा था.

“पर… क्या तुम नहीं जानतीं कि वो शादीशुदा हैं. क्या तुम सोचती हो कि वो तुमसे शादी करेंगे?” श्रुति ने ख़ुशी की आंखों में झांकते हुए कहा था.

“अगर वो मुझसे शादी नहीं करेंगे, तो मैं मर जाऊंगी. आत्महत्या कर लूंगी.” ख़ुशी की दृढ़ता से श्रुति सहम गयी थी.

श्रुति को समझ में नहीं आ रहा था कि अब वो क्या करे. तभी अनायास ही उसके दिमाग़ में कौंधा था कि क्यों ना राजीव से ही श्रुति की सीधी बात करायी जाये.

राजीव से भी श्रुति की बातचीत कराई गयी, पर वो पागल लड़की अपने सर की गोद में सिर रख कर रोती रही और राजीव इससे इतना घबरा गये कि उनसे कुछ बोलते ही नहीं बना. एक किशोर लड़की को समझना या समझाना राजीव जैसे युवा फ़िज़िक्स के टीचर के बस में नहीं था. राजीव ने बस इतना किया था कि कुछ दिनों के लिये उन्होंने स्कूल से छुट्टी ले ली थी. पर ये समस्या का समाधान तो नहीं हो सकता था.

श्रुति ने रात की ख़ामोशी में इस समस्या का हल ढूंढ़ निकाला था.

“अपू… आज मैं इस समस्या का हल लेकर आयी हूं.” कहकर श्रुति ने अपनी सहेली को कुछ समझाना शुरू किया था.

“ठीक है, हम यही करेंगे. वैसे ख़ुशी के माता-पिता कहते हैं कि अगर कुछ दिनों में कोई राह नहीं दिखती है तो वे लोग उसे मनोचिकित्सक को दिखाएंगे.” अर्पिता ने बेहद दबी-बुझी आवाज़ में दुखी होकर कहा था.

ख़ुशी को लेकर अर्पिता आयी, “ख़ुशी, तुम राजीव सर को प्यार करती हो ना!” श्रुति ने कहा था.

उत्तर में ख़ुशी ने केवल अपनी नज़रें उठाकर श्रुति की ओर देखा था.

“ख़ुशी, हमने राजीव सर से बात कर ली है. उनका कहना है कि वो तुमसे शादी कर लेंगे, पर तुम पहले उनका दूसरा पक्ष भी तो देख-समझ लो. मेरा मतलब है, तुम उनके घर का वातावरण देख लो. उनका घरेलू रूप देख लो. तुम चाहो तो हमारे साथ उनके घर चल सकती हो.”

अर्पिता ने श्रुति की योजना के अनुसार ख़ुशी को समझाना शुरू किया था. कुछ देर विचार करने के बाद ख़ुशी राज़ी हो गयी थी.

योजना के अनुसार राजीव अपने घर में ही थे. बीमार होने का बहाना कर वो बिस्तर पर थे. ख़ुशी की आंखें राजीव को देखकर चमक उठी थीं और वो राजीव के सिरहाने बैठ गयी थी. कुछ ही देर में राजीव ने उससे चाय बनाकर लाने को कहा. ख़ुशी अवाक्-सी राजीव का चेहरा ताकने लगी थी.

“हां, हां.. जाओ ना, उधर बायीं ओर किचन है. वहीं तुम्हें सब मिल जायेगा. और हां, ज़रा कड़क चाय बनाना. सरदर्द हो रहा है ना!” राजीव ने आग्रह किया था. ख़ुशी अनमने मन से किचन की ओर बढ़ गयी थी.

शायद पहले कभी एक-दो बार ख़ुशी ने अपने घर में चाय बनायी थी, इसलिये काफ़ी मुश्किल से वो चाय बना पायी थी. आंखों में आंसू भरकर वो सोच रही थी, ‘घर में तो मम्मी कितनी भी रिक्वेस्ट कर ले, मैं किचन में जाना तक पसन्द नहीं करती और यहां… सर के घर… मुझे चाय बनानी पड़ रही है.

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“ख़ुशी, स्तुति अभी-अभी बाज़ार से लौटी है. तुम एक कप और चाय बना लेना.” बाहर के कमरे से श्रुति की आवाज़ सुनाई पड़ी थी. ख़ुशी तो स्तब्ध ही रह गयी थी.

‘पहले ही चाय नाप कर बनाई थी. अब फिर… पता नहीं और क्या-क्या फ़रमाइशें होंगी इनकी.’ बुदबुदाते हुए ख़ुशी ने फिर से चाय बनानी शुरू की.

ख़ुशी आधे घण्टे में चाय वगैरह लेकर बैठक में आयी तो वहां स्तुति से परिचय हुआ.

“ख़ुशी, अब तो तुम इस घर का हिस्सा बननेवाली हो, इसलिये मैं चाहती हूं कि तुम घर के काम सीख लो. चलो मैं तुम्हें कपड़े धोने का काम भी सिखा देती हूं.” स्तुति ने बड़े प्यार से ख़ुशी का हाथ पकड़कर उठाते हुए कहा, पर ख़ुशी थक चुकी थी. उसके चेहरे की ओर देखते हुए श्रुति और अर्पिता ने एक-दूसरे को इशारा किया.

“ख़ुशी, अब हम चलते हैं. तुम स्तुति से सारा काम समझ लो. अब तुम्हें भी तो एक दिन सारा कुछ सम्भालना ही होगा. वैसे स्तुति अब मां भी बननेवाली है.” श्रुति ने अर्पिता के साथ बाहर जाते हुए कहा.

ख़ुशी अनिश्‍चितता की स्थिति में कुछ न समझते हुए चुपचाप खड़ी थी. आख़िर कहती भी क्या? उसने पहले ही श्रुति से कह दिया था कि उसे कोई ऐतराज़ नहीं होगा एक ही घर में राजीव सर की पत्नी के साथ रहने में. पर वो शादी करेगी तो राजीव सर से ही.

“दी…दी! आपके घर कामवाली बाई नहीं है?”

“वो तो है. पर बाई के भरोसे कहां सारा काम होता है. अब राजीवजी की आमदनी भी तो बंधी-बंधाई है. कुछ काम तो ख़ुद करने ही होंगे ना.” स्तुति ने मन-ही-मन मुस्कुराते हुए ख़ुशी को सच्चाई से परिचित कराने की कोशिश की. ख़ुशी के मन से अब धीरे-धीरे प्यार का भूत उतरता जा रहा था. कहां उसने सोचा था कि राजीव के क़रीब बैठी वो सारा दिन उसे देखते हुए गुज़ार देगी. अपने प्रियतम के गोरे चेहरे, घुंघराले बाल और आकर्षक देहयष्टि में सारी ज़िन्दगी बिता देगी. राजीव सर भी उसके मासूम सवालों का जवाब देते रहेंगे और कहां ये सब!

अचानक ही ख़ुशी के विचारों पर दूसरा प्रहार भी हुआ. उसके राजीव सर, लुंगी-बनियान पहने बाथरूम की ओर गये. ख़ुशी को अपने सर के चेहरे पर हल्की दाढ़ी की छाया भी दिखी.

‘राजीव सर… कोई ख़ास सुन्दर तो हैं नहीं. मैं ही पागल हो रही थी.’ ख़ुशी ने मन ही मन सोचा था.

शाम को जब ख़ुशी घर लौटी, तो बेहद थक चुकी थी. दिनभर स्तुति उसे साथ लिये जाने क्या-क्या करती रही थी. ख़ुशी तो ऊब गयी थी.

‘अगर मैं सारा दिन काम करती रही तो मेरी पढ़ाई कब होगी? सभी कहते हैं कि मैं अच्छी स्टूडेंट हूं. तो…? फिर इतना काम करूंगी, तो राजीव सर के साथ समय कैसे बिता सकूंगी? फिर स्तुति दीदी मां भी बननेवाली हैं. मेरे कहने पर राजीव सर उसे तलाक़ तो देंगे नहीं. फिर दीदी कहती हैं कि राजीव सर की आय इतनी भी नहीं है कि दो-चार नौकरानियां रखी जा सकें. तब क्या होगा…? मैं एकतरफ़ा प्यार करते हुए तो…’ सोचते-सोचते ख़ुशी की आंखों में आंसू आ गये थे.

दूसरे दिन… श्रुति और अर्पिता स्टाफ़ रूम में बैठी बातें कर रही थीं.

दूसरे टीचर्स अपने-अपने क्लास में थे. ख़ुशी मौक़ा देखकर कमरे में आई.

“टीचर…, आई एम सॉरी.” ख़ुशी ने सिर झुकाकर कहा.

“ख़ुशी…? क्या हुआ…?” अर्पिता ने पूछा

“टीचर, मैं अभी केवल अपनी पढ़ाई करना चाहती हूं. मुझे अब ज़िन्दगी के दूसरे पहलू का सच दिख गया है. मैं… अभी शादी नहीं करूंगी.

“क्या…?” श्रुति और अर्पिता ने लगभग ख़ुश होते हुए कहा था.

“हमें ख़ुशी है कि तुम हक़ीक़त को समझ गईं. हम भी नहीं चाहते थे कि तुम्हारे जैसी अच्छी स्टूडेंट अभी पढ़ाई को भूलकर ग़लत निर्णय ले. शादी तो होनी ही है. पर पहले उस उम्र तक तो पहुंचो. फिर मैच्योरिटी आयेगी और तुम सब समझ सकोगी. फिर तुम शादी के झमेलों को भी सह सकोगी. अभी जो दिखता है, वो तस्वीर का एक पहलू ही दिखता है. पांच वर्षों बाद तुम इस वाक्ये को याद करोगी तो तुम्हें ख़ुद ही हंसी आयेगी. तब ये सब बचकाना लगेगा.”

श्रुति ने खुशी को सामने बिठाकर कहा.

“सॉरी टीचर…! अब मैं समझने की कोशिश करूंगी. पर आप लोग मेरी मदद करेंगी न?” ख़ुशी ने अपने आंसू पोंछते हुए कहा था.

अर्पिता ने आगे बढ़कर ख़ुशी को अपने गले से लगाते हुए कहा, “टीचर्स तो हमेशा स्टूडेन्ट्स की मदद करते हैं, खुशी!”

– सीमा मिश्रा

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