उसने लिखा था, "यहां का वातावरण आपके लिए अनुकूल नहीं है. हम दोनों दिनभर बाहर रहते हैं, आप व्यर्थ में बोर होंगे. फिर आपका स्वास्थ्य भी ऐसा नहीं है कि आप बार-बार यात्रा कर सकें. इसलिए मैं आपको यहां आने की राय नहीं दूंगा."
शाम को जब आलोक और अर्चना बाज़ार से लौटे तो मेरे लिए नई शॉल ले आए. मेरी पन्द्रह वर्षीया नातिन अलका ने ज़िद की कि मैं उसे तुरन्त शॉल ओढ़ कर दिखाऊं. जब मैंने शॉल ओढ़ी तो वह खिलखिला कर बोली, "नानाजी इस शॉल में तो आप अशोक कुमार जैसे स्मार्ट नज़र आ रहे हैं." इसी तरह गपशप करते हुए काफ़ी समय बीत गया.
रात को दस बजे जब मैं बिस्तर पर लेटा तो इतना स्नेह और सम्मान पाकर मुझे सुख की नींद आनी चाहिए थी, पर मैं देर तक सो नहीं सका. यह सोच कर मन में ग्लानि होती रही कि मेरी पुत्री अर्चना जिसे बचपन से मेरी उपेक्षा सहन करनी पड़ी, वह आज मेरी असहाय वृद्धावस्था में मेरे जीवन का भार सहर्ष वहन् कर रही है.
हमारी यह पुरानी मान्यता है कि बेटी पराया धन होती है. परन्तु मुझे तो सर्वाधिक अपनत्व अपनी बेटी से ही प्राप्त हो रहा है. अर्चना तो एक योग्य पुत्री का दायित्व सफलतापूर्वक निभा रही है, पर मैं स्नेहशील पिता की भूमिका में कभी खरा नहीं उतर पाया.
रात्री के एकान्त में मुझे मेरी पत्नी नीलिमा की बहुत याद आ रही थी. नीलिमा ने हमेशा प्रयास किया कि मैं अपनी बच्ची के प्रति आकर्षण का अनुभव करूं, परन्तु मैं अर्चना के प्रति हमेशा निर्मोही बना रहा जिन दिनों नीलिमा गर्भवती थी.
उन दिनों मेरी मां ने पुत्र जन्म की लालसा में नीलिमा से कई व्रत रखवाए थे, पर इन सबका कोई परिणाम नहीं निकला था.
जिस दिन नीलिमा ने अर्चना को जन्म दिया था मां अपनी पोती को देखने हस्पताल नहीं गई थी. मैं भी बेमन से हस्पताल गया था. होंठों पर फीकी मुस्कान लाकर मैं नीलिमा से मिला था. अपनी बच्ची की ओर एक बार निहार कर मैं दफ़्तर चला गया था.
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आमतौर पर बच्चे के जन्म के बाद लोग उसके साथ मन बहलाने के लिए दफ़्तर बन्द होते ही घर जाने की तैयारी में रहते हैं, पर मुझे घर जाने की कोई जल्दी नहीं रहती थी. मैं दफ़्तर से सीधा क्लब जाता या पुस्तकालय. नीलिमा के द्वारा पुत्र को जन्म न देने के कारण अपनी मां की भांति मैं भी उसे अपराधिनी मानने लगा था. जब मैं घर पर होता तो अर्चना की बाल सुलभ चंचलता मुझे आकर्षित तो करती, पर कभी-कभार उसके गाल थपथपा देने के अलावा मैंने कभी उसे अपना स्नेह प्रदान नहीं किया. मुझे याद है उस दिन नीलिमा ने मुझसे कहा था कि मैं अर्चना के दाखिले के लिए किसी अच्छे स्कूल की खोज करूं. तब मैंने रूखे स्वर में कहा था, "इन बातों के लिए मेरे पास समय नहीं है. उसके दाखिले की चिन्ता तुम ही करो."
उस दिन अर्चना प्रसन्नता के आवेग से आल्हादित होकर घर आई थी और मेरे गले में बांहें डाल कर बोली थी, "पापा मैं कक्षा में प्रथम आई हूं. आप मुझे क्या गिफ्ट देंगे?"
मैंने उसकी ख़ुशी पर पानी फेरते हुए कह दिया था, "अपनी मम्मी के साथ बाज़ार चली जाओ, वो तुम्हे तुम्हारी मनपसन्द चीज़ें दिलवा देंगी."
अर्चना चुपचाप अपनी मम्मी के पास चली गई थी. एक दो बार के अलावा मैं कभी अर्चना के जन्मदिन की पार्टी में भी सम्मिलित नहीं हुआ पर नीलिमा अर्चना का जन्मदिन हमेशा पूर्ण उत्साह से मनाती थी. अर्चना हमेशा अपनी मम्मी के निर्देशानुसार कार्य करती थी,
उस दिन मेरी प्रसन्नता की सीमा नहीं रही जब नीलिमा ने अनुपम को जन्म दिया. उन दिनों मैं शाम का पूरा समय अनुपम के साथ खेलने में बिता देता था. अर्चना भी हमारे साथ शामिल होती और अपनी हरकतों से अनुपम को ख़ूब हंसाती थी. अर्चना द्वारा अनुपम को खिलाना मुझे अच्छा लगता था, पर मेरा ध्यान अनुपम पर ही केन्द्रित रहता था.
वह दिन मुझे याद है जब अनुपम का दाखिला केम्पियन स्कूल में होने वाला था और मैं उसके दाखिले को लेकर चिन्तित था. मुझे चिन्तित देखकर नीलिमा बोली थी, "जितनी चिन्ता आप अनुपम के लिए करते है उतनी चिन्ता अर्चना के प्रति तो आप को कभी नहीं रही."
"देखों भई, मैं जानता हूं कि अर्चना प्रतिभाशाली है. तुम्हारे सभी सदगुणों को उसने अर्जित किया है, पर है तो वह लड़की ही. एक दिन जब वह ससुराल चली जाएगी तब हम दोनों को अनुपम ही तो सहारा देगा." मैंने कहा था.
"मेरी एक बात याद रखना, जब मैं नहीं रहूंगी तब आपको बिटिया ही याद आएगी. जितनी ममता बिटिया दिखाती है बेटे उतनी भावुकता का प्रदर्शन कर ही नहीं सकते." नीलिमा ने कहा था.
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समय व्यतीत होता गया. अर्चना ने मनोविज्ञान में एम.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली थी, नीलिमा के प्रयासों के कारण उसका विवाह एक युवा प्राध्यापक आलोक के साथ हो गया था. बिदाई की बेला में अर्चना मुझसे लिपटकर बहुत रोयी थी. तब शायद पहली बार मेरे मन में उसके प्रति संवेदना उत्पन्न हुई थी. उन क्षणों में भी मेरी पलकों में आंसू तो नहीं थे, पर उदासी का आभास अवश्य हुआ था.
नीलिमा का एकाकीपन बढ़ गया था. अनुपम ने एम.बी.बी.एस. की परीक्षा उत्तीर्ण कर, अपनी सहपाठिनी, एक लेडी डाक्टार से विवाह कर वह विदेश चला गया और वहीं बस गया.
हम दोनों अकेले रह गए. एक वर्ष बाद नीलिमा अकस्मात चल बसी. मुझे विश्वास था कि अनुपम इस मौक़े पर अवश्य आएगा, पर केवल उसका पत्र आया. पत्र में लिखा था, "मम्मी के निधन का समाचार जानकर दुख हुआ. हम व्यस्त होने के कारण आने में असमर्थ है. आप अपना ध्यान रखना."
मेरा पुत्र मोह अभी भी भंग नहीं हुआ था. बेटे के साथ रहने के लिए मेरा मन व्याकुल था. मैने उसे लिखा- बेटे तुम्हारी मम्मी के न रहने के बाद मैं बहुत एकाकी और मानसिक रूप से व्यथित हूं. कुछ दिनों के लिए तुम्हारे पास आना चाहता हूं.
उसका पत्र मिला उसने लिखा था- यहां का वातावरण आपके लिए अनुकूल नहीं है. हम दोनों दिनभर बाहर रहते हैं. आप व्यर्थ में बोर होंगे. फिर आपका स्वास्थ्य भी ऐसा नहीं है कि आप बार-बार यात्रा कर सकें. इसलिए मैं आपको यहां आने की राय नहीं दूंगा.
एकाकीपन और मानसिक तनाव के कारण मैं बीमार हो गया. मेरी बीमारी की ख़बर पाते ही अर्चना और आलोक दूसरे ही दिन आ गए. अर्चना ने मेरी बीमारी के दौरान कई रातें जाग कर बिताईं. उसे दिन-रात मेरी सेवा करते देखकर मेरी आंखों में आंसू आ जाते, क्योंकि मैं तो कभी उसके लिए व्यथित नहीं था. स्वस्थ होने के बाद अर्चना और मेरी नातिन अलका के स्नेह युक्त आग्रह ने मुझे उनके साथ रहने के लिए बाध्य कर दिया.
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उनके साथ रहते हुए दस वर्ष बीत चुके हैं, पर उनके स्नेह में कोई कमी नहीं आई है. इस आयु में पुत्री के महत्व कों जान पाया हूं. बेटी और बेटे के प्रति भेदभाव की जो भावना मैंने जीवनभर मन में रखी. उसके कारण अपराधबोध से ग्रस्त रहता हूं. जीवनभर अपनी बिटिया की उपेक्षा करने का बोझ अभी भी मेरे मन पर है.
कल रात मैंने स्वयं के इस निर्णय को पुनः दोहराया कि जो स्नेह मैंने अपनी बेटी को प्रदान नहीं किया वह स्नेह मैं अलका को प्रदान करूंगा, शायद ऐसा करने से मेरे मन का बोझ कम हो.
- ललित कुमार शर्मा
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