कहानी- सदमा (Short Story- S...

कहानी- सदमा (Short Story- Sadma)

अनिका ने महसूस किया कि हर बात में वसुधा अपने बेटे अनुराग का ज़िक्र करती थी. मेरा अनु फुटबॉल का चैम्पियन है, तो कभी अनु गिटार पर ये धुन बहुत अच्छी बजाता था, तो कभी उसकी पसंद, तो कभी नापसंद की बातें!.. एक खीझ-सी अनिका को होने लगी अब.

‘हद होती है आत्मप्रशंसा की! जब देखो तब शुरू हो जातीं हैं. अब तो फेसबुक और स्टेटस पर भी!
अपने बच्चे के अलावा कुछ सूझता कहां है. हमारे बच्चे तो नालायक पैदा हुए जैसे, तभी सुनाती रहतीं. ख़ुद पूछी थी पार्क में उस दिन, “मैं अपूर्व को मैथ्स पढ़ा दूं.” बिना हिचक मैं भी मान भी गई…’ काम निपटाते हुए अनिका बड़-बड़ किए जा रही थी.
वसुधा उसके पड़ोस में कुछ दिन पहले आई थी. एक-दो बार रास्ते में, पार्क में मिलने के बाद अनिका ने वसुधा को घर बुलाया. दूसरे ही दिन वो हाथों में चाॅकलेट लिए आ गई. घर में अनिका का चौदह वर्षीय बेटा अपूर्व भी था. जितनी देर भी वसुधा बैठी रही अपूर्व को निहारती और हर बात में अपने बेटे अनुराग का ज़िक्र करतीं.

चाॅकलेट अपूर्व के हाथ में देकर बोलीं, “अनु भी बहुत चाॅकलेट खाता था…” जाते हुए अपूर्व के सिर पर हाथ रख कर प्यार किया. सामान्य औपचारिक मुलाक़ात तो ऐसी ही होती. फिर तो अक्सर मुलाक़ात होती.
अनिका ने महसूस किया कि हर बात में वसुधा अपने बेटे अनुराग का ज़िक्र करती थी. मेरा अनु फुटबॉल का चैम्पियन है, तो कभी अनु गिटार पर ये धुन बहुत अच्छी बजाता था, तो कभी उसकी पसंद, तो कभी नापसंद की बातें!..
एक खीझ-सी अनिका को होने लगी अब.
वह प्रसंग बदलने का प्रयास करती, पर ना चाहते हुए भी वसुधा बातों का केन्द्र अनु को ही बनाती. अनिका बस ‘हूं हां’ कह बचना चाहती उससे. उसके घर के पास ही बड़ा-सा पार्क था. अपूर्व वहीं दोस्तों के साथ खेलने जाता.
एक दिन बदहवास हालत में अपूर्व के दोस्त आए. “आंटी अपूर्व को फुटबॉल से चोट लगी है जल्दी चलिए.” भागते हुए अनिका पहुंची, तो देखा वसुधा अपूर्व की चोट को धो रही है.
“मैं यहां वाॅक करने आई, तो देखा इसे चोट लगी है. घबराओ मत ठीक हो जाएगा. चाहो तो डाॅक्टर को दिखा दो.” मुस्कुराकर वसुधा ने कहा.

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“अनु को तो कितनी बार ऐसे ही लगती थी और वो बताता भी नहीं था…” कहकर ज़ोर से वसुधा हंस पड़ी.
अनिका पहले से ही घबराई हुई थी, उसे ग़ुस्सा आ गया.
“आप हर बात में अनु को क्यूं खींच लाती. माना वो हर चीज़ में परफेक्ट है, पर हर बच्चा एक-सा नहीं होता ना!.. भड़ास निकाल कर अनिका अपूर्व को लेकर घर आ गई.
घर आकर काम में लग गई, पर मन कचोट रहा था. सोचा घर जाकर वसुधा से माफ़ी मांग लूंगी. ज़्यादा ही बोल दिया मैंने! पहले कभी गई भी नहीं उसके घर जाकर सबसे मिल भी लूंगी.
दूसरे दिन ही शाम को अनिका वसुधा के यहां गई. दरवाज़ा नौकर ने खोला.
बोला, “वो दोनो अनाथाश्रम गए हैं देर लगेगी.” “अनाथाश्रम क्यूं?” बेसाख्ता उसके मुंह से निकल गया.

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“जन्मदिन है बेटे का. हर साल जाते हैं.”
“अच्छा अनु का जन्मदिन है मेरी शुभकामनाएं और आशीर्वाद कहिएगा…” बोलने के साथ ही नज़र अचानक सामने दीवार पर मुस्कुराते फोटो पर पड़ी. सुंदर मुस्कुराता गोल-मटोल चेहरा, पन्द्रह-सोलह का लगभग. ताजे रजनीगंधा के फूलों की माला हवा में ख़ुशबू फैला रही थी.
अनिका स्तब्ध, सदमे में खड़ी थी. नौकर आंखें पोंछता अंदर जा चुका था.

भावना झा

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