लघुकथा- संतुलन (Short Story...

लघुकथा- संतुलन (Short Story- Santulan)

“सिड! मुझे कुछ बात करनी है बेटा… ये पौधे नए हैं, इनका ध्यान रखते समय मैं पुराने पौधों की तरफ़ से मुंह थोड़ी मोड़ लेती हूं…”
“मां प्लीज़!” सिड मोबाइल में कुछ देखते हुए अचानक रुक गया, “साफ़-साफ़ कहिए, ये उदाहरण देकर बातें आप अपनी कहानियों में किया करिए, घर में कौन इस तरह बात करता है?”

घर के माहौल को हर दिन और बोझिल होते देखना मेरे लिए मुश्किल होता जा रहा था. सब अपने-अपने कमरे में मुंह बनाए बैठे रहते थे और सामना होने पर फीकी हंसी का आदान-प्रदान करके एक-दूसरे पर एहसान कर दिया करते थे. बेटे की शादी, नई बहू का चाव, सब एक तरफ़ हो गया था.
“मिनी कितनी गुमसुम घूमती है… मैं बात करूं सिद्धार्थ से? ग़लती तो है उसकी ही, ऐसा भी क्या पत्नी प्रेम में पगलाना कि बहन को भूल जाए…” इन्होंने मुंह बिचकाया.
“देखिए, ग़लती तो मिनी की भी है. भाई की शादी हो गई, तो वो अपनी पत्नी को भी तो समय देगा…” मैंने अपनी बात रखी.


“देखो, तुम तो लेखिका हो. इशारे से समझा दो, वो क्या कहती हो? हां, बिंब प्रयोग, उसी तरह समझा दो. रही बात पत्नी को समय देने की तो दे समय, लेकिन बहन का भी ध्यान रखे. अब बताओ, हमारी शादी जब हुई थी, तब हम जहां जाते थे विमला को साथ ले जाते थे, कभी कोई दिक़्क़त नहीं हुई.. है कि नहीं?”
बिना मेरा जवाब सुने ये टूथपिक से दांत कुरेदते बाहर चले गए.
मैं अपना जवाब मन में ही लिए बैठी रह गई, होती तो थी दिक़्क़त जब हर जगह विमला दीदी हमारे साथ चल देती थीं. ना खुलकर बोल पाओ, ना हंस पाओ… बाज़ार, दोस्तों के घर, मेला… हर जगह! झूले में पति की जगह अपनी ननद का हाथ पकड़कर कौन बैठना चाहता है?
“ये कपड़े की बाल्टी छत पर रखनी है मां?” सिद्धार्थ कब वहां आ गया, मुझे पता ही नहीं चला.
“हैं? हां, छत पर रख दो.. चलो, मैं भी चल रही हूं.” दिमाग़ में इनकी कही बात घूम रही थी. छत पर गमले देखकर दिमाग़ में कुछ कौंधा.
“सिड! मुझे कुछ बात करनी है बेटा… ये पौधे नए हैं, इनका ध्यान रखते समय मैं पुराने पौधों की तरफ़ से मुंह थोड़ी मोड़ लेती हूं…”
“मां प्लीज़!” सिड मोबाइल में कुछ देखते हुए अचानक रुक गया, “साफ़-साफ़ कहिए, ये उदाहरण देकर बातें आप अपनी कहानियों में किया करिए, घर में कौन इस तरह बात करता है?”
अपनी नासमझी पर मैं ख़ुद ही झेंप गई. उसका हाथ पकड़कर मैं सीढ़ियों पर बैठ गई, “सिड! जब मिनी पैदा हुई थी, तुम उससे बहुत जलते थे, क्योंकि सब उसका ज़्यादा ध्यान रखते थे. जब मैंने तुमको समझाया था कि छोटा बच्चा घर का नया सदस्य है, उसको ज़्यादा देखभाल चाहिए, तब तुमने कहा था कि इसका ये मतलब तो नहीं कि सब लोग मुझे भूल जाएंगे? उसी तरह मिनी भी आजकल…”


“लेकिन मां… मिनी भी तो कुछ अजीब-सी हरकतें…”
सिड कुछ बोलनेवाला था, मैंने रोक दिया, “पूरी बात सुनो! अभी तक तो मिनी और तुम एक-दूसरे की दुनिया थे ना? अब तुम्हारी दुनिया में कोई और भी आ गया है, ये बात समझने में उसको वक़्त लगेगा. उसको झिड़को नहीं… साथ घुमाने मत ले जाओ, लेकिन उसके लिए कुछ ले आया करो. उसको आवाज़ देकर अपने कमरे में बुलाया करो, पहले की तरह लड़ो-झगड़ो… थोड़ी देर के लिए ही सही!..”
सिड अपराधी की तरह बैठा सब सुन रहा था, संभवत: पिछले दिनों की कुछ कड़वी बातें दिमाग़ में घूम रही होंगी, मैंने उसका सिर सहलाते हुए नीचे चलने को कहा.
“कर आई अपने शब्दों का जादू?” ये सीढ़ियों के पास खड़े मुझे देखते हुए मुस्कुरा रहे थे.
“अभी कहां? अभी तो आधा काम हुआ है…” मैंने लंबी सांस खींचकर कहा.
“मतलब?”


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“मतलब अभी आपकी बिटिया रानी को भी तो समझाना है…” मैं मिनी के कमरे की ओर बढ़ते हुए मन ही मन अपने संवाद याद करने लगी,
“देखो मिनी! जब तुम पैदा हुई थी, तो मैं तुम्हारा ज़्यादा ध्यान रखती थी. तुम परिवार की नई सदस्य थी… उसी तरह भाभी भी नई हैं ना, तो सिद्धार्थ भइया को उन पर ज़्यादा ध्यान देना होगा ना…”

Lucky Rajiv
लकी राजीव

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