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कहानी- स्नेह के सहारे (Short Story- Sneh Ke Sahare)

“अरे, हिमांशु बेटा तुम? मैं तो तुम्हें पहचान ही नहीं सका. वर्षों बाद देख रहा हूं ना.” उनके चेहरे पर किसी बेहद प्रिय से मिलने की चमक छा गई.
“लेकिन, मैंने तो सुना था कि आप रिटायरमेंट के बाद अपने बेटे-बहू के पास चले गए थे?”
कटु स्मृतियां पुनः उनके मन पर हावी हो उठीं, बेहद खिन्न मन से बोल पड़े, “हमारा कोई परिवार नहीं, हम अकेले हैं.”

हिमांशु की नज़रें बैंच पर बैठे वृद्ध दंपति पर ठहर जा रही थीं. उनके चेहरे में जाने कैसी सम्मोहक शक्ति थी, जो हिमांशु को अपनी तरफ़ आकर्षित किए हुए थी. वृद्ध दंपति भी उसी की तरह ट्रेन के इंतज़ार में थे. उनके चेहरे से उदासी व बेचैनी साफ़ झलक रही थी. न जाने क्यों हिमांशु को ऐसा लग रहा था, जैसे इन्हें कहीं देखा है, पर कहां? यह उसे अपने दिमाग़ पर जोर डालने पर भी याद नहीं आ रहा था. हिमांशु के मन में बार-बार यह विचार आ रहा था कि उनके पास जाकर उनकी समस्या का कारण मालूम कर सके. लेकिन क्या प्लेटफॉर्म पर ट्रेन की प्रतीक्षारत किसी अपरिचित व्यक्ति से उसकी व्यक्तिगत बातों की जानकारी लेना उचित होगा? यह विचार आते ही वह अपने मन में उठ रहे अंतर्द्वंद्व को दबा देता था.
ट्रेन दो घंटे विलंब थी. उमस भरी गर्मी और अत्यधिक भीड़ के कारण हालत ख़राब हो रही थी, ऊपर से मन में भरी बेचैनी. घर पहुंचकर क्या जवाब देगा वह सुजाता को कि भइया-भाभी ने सदैव की भांति इस बार भी उसकी बात मानने से इंकार कर दिया?
तीन वर्ष पूर्व सुजाता से प्रेम-विवाह किया था हिमांशु ने. उसके विवाह में घर-परिवार का कोई सदस्य शामिल नहीं हुआ था. सुजाता का तो कोई था ही नहीं, दूर-दराज के मामा-मामी के घर किसी तरह से पली-बड़ी थी वह. हिमांशु के साथ विवाह करने के कारण मामा-मामी ने राहत की सांस ली. किसी तरह से ही सही, पर बला तो टली. विवाह पूर्व ही मामा-मामी ने इस भय से पल्ला झाड़ लिया था कि कहीं शादी पर उनको कुछ ख़र्च ना करना पड़ जाए.
हिमांशु के घर से भी विवाह में शामिल होने कोई नहीं आया था. हिमांशु की परवरिश कठिनाइयों के किन-किन दौर से गुज़र कर हुई थी, यह तो हिमांशु ही समझ सकता था. 14-15 वर्ष की किशोरवय में ही उसके पिता की आकस्मिक मृत्यु हो गई थी. पति की मौत से दुखी व व्यथित रहने वाली मां भी उसे थोड़े ही समय बाद बेसहारा छोड़कर चली गई.


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वैसे तो वह अपने सगे भइया-भाभी के पास ही पला-बढ़ा था, परंतु उसके साथ उनका बर्ताव नौकरों से भी गया गुज़रा था. यदि उन्हें उसके हिस्से की ज़मीन-जायदाद का लोभ न रहता तो मां के गुज़रते ही किनारा कर गए होते. ट्यूशन वगैरह करके कठिनाइयों के बीच उसने अपनी मंज़िल तय की.
पीसीएस में चयन होते ही उसके प्रति भइया-भाभी के व्यवहार में अचानक परिवर्तन आ गया. एक दिन उसके सामने मिठाई, पकौड़ों के साथ चाय पेश करते हुए मीठे स्वर में भाभी बोलीं, “हिमांशु, मैं सोच रही हूं कि अब ब्याह करके तेरा घर बसा दूं.”
उसे बड़ा आश्‍चर्य हुआ. सदैव दुर्व्यवहार करने की आदी भाभी मेरा भी भला सोच सकती हैं? फिर भी वह मन ही मन प्रसन्न हो उठा. देर से ही सही, परंतु उनका हृदय परिवर्तन तो हुआ. वह कुछ-कुछ निश्‍चिंत-सा हो चला था. सुजाता के संबंध में बताने का समय आ गया है. सुजाता के बारे में अभी कुछ बता पाता, इसके पूर्व ही उन्होंने अपनी तलाक़शुदा बहन मीनाक्षी का प्रस्ताव रखकर कहा, “हिमांशु कब का मुहूर्त निकलवा दूं?” उनका प्रस्ताव सुनकर उसे आकस्मिक परिवर्तन का रहस्य समझ में आ गया. उनके आडंबरयुक्त बदलाव के समक्ष स्वार्थ का पलड़ा भारी था.
उसकी चाहत तो स़िर्फ सुजाता ही थी, जो वर्षों से उसके सुख-दुख में भागीदार  रही थी. सुजाता के अलावा किसी अन्य के साथ विवाह के संबंध में वह सोच भी नहीं सकता था. भाभी की बहन के साथ रिश्ता न जोड़ने की उसे ये सज़ा दी गई कि भविष्य में वह उनके घर में कभी क़दम नहीं रख सकता.
हिमांशु ने सारा वृतांत सुजाता को सुनाया, तो उसने बेहद निराशापूर्ण शब्दों में कहा, “हिमांशु, विवाह रिश्तों को जोड़ने के लिए होता है, तोड़ने के लिए नहीं. तुम उनकी बात मान लो. मेरे कारण तुम्हारा घर-परिवार टूटे, यह उचित नहीं है.”
“विवाह पश्‍चात् सब कुछ सामान्य हो जाएगा. वैसे पहले ही मेरा संबंध उनके साथ मधुर कब था.” बहुत समझाने के पश्‍चात् ही उनका विवाह संभव हो सका था. सुजाता से विवाह करने के बाद उसने उन्हें मनाने की पुरज़ोर कोशिश की, पर सब व्यर्थ रहा.
इन दिनों सुजाता गर्भवती थी. उसकी हार्दिक इच्छा थी कि उसके पास कोई अपना हो. कितनी आशाओं के साथ उसने हिमांशु को यह कहकर भेजा था, “हिमांशु, तुम जबलपुर जाकर किसी तरह उन्हें मनाकर यहां ले आओ.” पर लाख अनुनय-विनय के बाद भी हिमांशु उनके मन से अपने प्रति नाराज़गी दूर करने में सफल नहीं हो सका. इस बार भी उसे खाली हाथ ही लौटना पड़ा.


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हिमांशु की नज़र फिर उन वृद्ध दंपति पर पड़ी. उनकी नज़रें शून्य में जैसे कुछ ढूंढ़ रही हों. मनमाफिक सहयात्री मिल जाए, तो समय बड़ी आसानी से कट जाता है, ऐसा सोचकर हिमांशु ने वृद्ध महिला से पूछा, “मांजी, क्या मैं आपके पास बैठ सकता हूं?”
“हां, हां, क्यों नहीं बेटा?”
सुनीता देवी के साथ उनके पति ने भी बड़े अपनत्व से कहा.
ट्रेन प्लेटफॉर्म पर लगते ही सभी यात्री अपने-अपने कंपार्टमेंट की तरफ़ तीव्र गति से बढ़ चले. हिमांशु की सीट भी उसी कंपार्टमेंट में थी, जहां वृद्ध दंपति की. ट्रेन के चलते ही वृद्धावस्था व थकान के कारण वृद्ध महिला, सुनीता देवी अपनी सीट पर चादर बिछाकर लेट गईं. हिमांशु भी उनके पास बैठ गया. बातचीत से हिमांशु को लगा कि पति-पत्नी दोनों ही सहृदय व नेक इंसान हैं. एक-दो बार हिमांशु ने पूछा भी, “अगर आप लोगों को डिस्टर्ब हो रहा हो तो मैं अपनी सीट पर चला जाता हूं.”
“नहीं बेटा, पास ही बैठे रहो. तुमसे बातें करना अच्छा लग रहा है. वैसे भी कौन-सी नींद आनी है.”
हिमांशु ने पूछा, “आप लोग कहां जा रहे हैं?” वृद्ध देवधर बाबू खोई-खोई नज़रों से मौन देखते रहे, परंतु सुनीता देवी बोल पड़ीं, “जहां ईश्‍वर ले जाए बेटा.”
न जाने क्यों सुनीता देवी के शब्द हिमांशु के दिल में उतर गए. रातभर का सफ़र था, लेकिन न तो हिमांशु की आंखों में नींद थी और न ही दोनों पति-पत्नी की. सुपरफ़ास्ट ट्रेन अपनी तीव्र गति से दौड़ रही थी. देवधर बाबू ने कभी सोचा भी नहीं था कि ज़िंदगी उन्हें ऐसे मोड़ पर भी पहुंचा सकती है. अतीत के पन्ने उनके समक्ष खुलने लगे थे. उच्च पदस्थ सरकारी अधिकारी होते हुए भी उनके मन में बेईमानी से धन-दौलत इकट्ठी करने की कभी लालसा नहीं रही. मां-पिताजी साथ रहते थे. सगे-संबंधियों का आना-जाना लगा ही रहता था, फिर भी कितने ख़ुश और संतुष्ट रहा करते थे दोनों.
तीनों बेटों की परवरिश और सुख-सुविधा में उन्होंने कोई कमी नहीं रखी, फिर चाहे  उन्हें इसके लिए अपनी इच्छाओं-आकांक्षाओं का दमन ही क्यों न करना पड़ा हो. परंतु बच्चों की हर इच्छाओं को पूरा करने की हर संभव कोशिश करते रहे. बच्चों को अच्छे संस्कार दिए, ऊंची से ऊंची शिक्षा दिलवाई. बड़ा बेटा अविनाश शुरू से ही पढ़ाई-लिखाई में मेधावी था. वह उच्च शिक्षा के लिए विदेश चला गया और फिर कुछ समय बाद मनपसंद लड़की से विवाह करके वहीं बस गया. दूसरे बेटे अनुज का विवाह उन्होंने स्वयं अपनी पसंद की लड़की से किया था. उनके सहकर्मी महेन्द्रनाथ अपनी पुत्री शैली के लिए बहुत परेशान थे. उनकी परेशानी देवधर बाबू ने अपने इंजीनियर बेटे से विवाह की स्वीकृति देकर समाप्त कर दी. जल्दी ही भोली-भाली सी दिखने वाली लड़की उनकी बहू बनकर घर आ गई.  शुरुआती दिनों में तो शैली सास-ससुर का आदर-सत्कार करती रही, परंतु थोड़े ही दिनों बाद उसके रंग-ढंग बदलने लगे. उसकी त्योरियां हमेशा चढ़ी ही रहती थीं. सास-ससुर को नीचा दिखाने का कोई भी अवसर वह अपने हाथ से जाने नहीं देती थी.
सबसे छोटा बेटा आकाश बचपन से ही माता-पिता के इजाज़त के बगैर कोई काम नहीं करता था. आज्ञाकारी पुत्र था वह.
अपने विनम्र एवं सुयोग्य पुत्र का विवाह सुनीता देवी ने अपनी पसंद की लड़की मीता के साथ किया. मीता के घर के  रहन-सहन और उनके पारिवारिक स्तर में कहीं कोई समानता नहीं थी, फिर भी बड़ी बहू शैली के बदले तेवर देखकर सुनीता देवी ने साधारण शक्ल-सूरत वाली मीता को ही अपनी बहू बनाना उचित समझा. उन्हें सुयोग्य बहू की प्राप्ति की लालसा अधिक थी. उन्हें विनम्र, नेक व सहृदय बहू चाहिए थी, जो उन्हें अपने माता-पिता समान अपनापन व मान-सम्मान दे सके. परंतु भाग्य की विडंबना के आगे किसकी चलती है? मीता ने घर में आते ही क्लेश फैलाना शुरू कर दिया. वह गृहलक्ष्मी नहीं, बल्कि उनकी सुख-शांति के लिए अभिशाप साबित हुई.
दोनों बहुओं का अभद्र व्यवहार देखकर पति-पत्नी ठगे से रह गए. कहां कमी रह गई थी उनके व्यवहार में? क्या उन्होंने स्नेह, आत्मीयता या हर तरह से सहयोग देने में किसी तरह की कोताही की थी? परिवर्तन तो जीवन का शाश्‍वत सत्य है. यह तो वे भी जानते थे कि समय सदा एक समान नहीं रहता. उनके जीवन में भी परिवर्तन होगा. परंतु यह परिवर्तन उन्हें इतना एकाकी, उपेक्षित और तिरस्कृत कर देगा, ऐसा तो उन्होंने कभी सोचा ही नहीं था.
सुनीता देवी के अंतर्मन में अनेक स्मृतियां सजीव हो उठीं. कितने धूमधाम और शौक़ से बेटों का विवाह करके बहुओं का स्वागत किया था. उन्हें हर तरह की सुख-सुविधा उपलब्ध करवाने के साथ-साथ बेटी समान स्नेह व ममता न्योछावर करती रही थीं. परंतु प्रतिदान में उन्हें क्या मिला?
कितना गर्व था उन्हें अपने लाडलों पर. सारी ज़िंदगी घर-गृहस्थी के चक्कर में पिसती रही थीं वे. पर अब भला उन्हें किस बात की चिंता-फ़िक्र. कभी इंजीनियर बेटे के पास रहेंगी, तो कभी मैनेजर बेटे के पास. बहुओं के हाथ की रोटियां खाकर बुढ़ापा अपने भरे-पूरे परिवार के साथ आनंदपूर्वक गुज़ारेंगी. पर पति के रिटायरमेंट के पश्‍चात् उनका भ्रम पूरी तरह से टूट गया. ममतावश जिस बेटे-बहू के पास जातीं, वहां पहुंचते ही दिल के टुकड़े-टुकड़े हो जाते. पति के पेंशन के सारे पैसे उन्हीं पर ख़र्च हो जाते थे. यदि कुछ बचाना भी चाहतीं, तो बहुएं ऐसा होने नहीं देती थीं. किसी न किसी बहाने सारे पैसे निकलवा ही लेती थीं. जितना अधिक उनके पास सुख-सुविधा का साधन एकत्रित होता जा रहा था, उतनी ही उनकी आंखों में अतृप्ति बढ़ती जा रही थी. सुनीता देवी ने अपनी आंखों से बहते आंसुओं को अपने आंचल से पोंछ लिया, परंतु यादों का सिलसिला अनवरत चलता रहा था.


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छोटी बहू भी कौन-सी दूध की धुली है? वह तो शैली से भी बढ़-चढ़कर निकली. जिस मीता को वह अपने पति व बेटे के विरोध के बावजूद इस घर में लाई थी, घर में पदार्पण करते ही वह उनके स्वप्नों को छिन्न-भिन्न करके उनके जीवन में ग्रहण समान छा गई. उसकी अमर्यादित हरकतें करने की कोई सीमा ही नहीं रह गई थी. बात-बात पर झल्लाना और घर के माहौल को तनावग्रस्त कर देना उसकी दिनचर्या में शामिल हो गया था. आकाश और बाहर वालों के सामने ऐसा स्वांग रचाती, मानो उनका कितना ख़याल रखती है, पर पीठ पीछे कटुक्तियों के नुकीले नश्तर चलाती. उसके दोहरे चरित्र को देखकर पति-पत्नी स्तब्ध रह जाते. आकाश भी जाने-अनजाने क्लेश व अशांति से बचने के लिए पत्नी का साथ देने लगा था. बेटे-बहू ने उन्हें एकदम अवांछनीय बना कर रख दिया था.
एकाकीपन एवं घुटनपूर्ण माहौल जब उनकी सहनशक्ति से परे हो गया, तो उन्होंने अपनी संतानों के प्रति मोह-माया को त्याग बेटों की ज़िंदगी से निकल जाने का फैसला कर लिया.
अंधेरा छंटने लगा था. ट्रेन किसी स्टेशन पर रुकी हुई थी. रात विचारों के झंझावत में कैसे कट गई बुज़ुर्ग दंपति को पता ही नहीं चला. हिमांशु उनके लिए भी चाय ले आया था. वह देवधर बाबू और सुनीता देवी से रातभर में ही इतना घुल-मिल गया था कि वे उसे अपने से लगने लगे थे.
“आपको कहां उतरना है? आपने अभी तक बताया नहीं.”
“दिल्ली, जहां मैंने अपनी ज़िंदगी का एक लंबा समय गुज़ारा है. वहां हमारा एक छोटा-सा घर है. टूटी कड़ियों को पुनः समेटना पड़ेगा.” दीर्घ निःस्वास लेकर देवधर बाबू बोल पड़े.
हिमांशु का मन वर्षों पुरानी स्मृतियों में उलझ-सा गया. अचानक उसके मन-मस्तिष्क में दबी धुंधली-धुंधली सी तस्वीरें स्पष्ट होने लगीं. प्रसन्नता से विभोर होकर बोल पड़ा हिमांशु, “कहीं आप मेरे वही देवधर चाचा तो नहीं हैं, जो मेरे पिता विपिन शर्मा के अभिन्न मित्र थे और जिनकी स्नेह छाया में मैंने अपने बचपन के सुखद पल गुज़ारे थे.”
“अरे, हिमांशु बेटा तुम? मैं तो तुम्हें पहचान ही नहीं सका. वर्षों बाद देख रहा हूं ना.” उनके चेहरे पर किसी बेहद प्रिय से मिलने की चमक छा गई.
“लेकिन, मैंने तो सुना था कि आप रिटायरमेंट के बाद अपने बेटे-बहू के पास चले गए थे?”
कटु स्मृतियां पुनः उनके मन पर हावी हो उठीं, बेहद खिन्न मन से बोल पड़े, “हमारा कोई परिवार नहीं, हम अकेले हैं.”
हिमांशु को सब कुछ समझते तनिक भी देर नहीं लगी. तो यह है इनकी बेचैनी और परेशानी का रहस्य. हिमांशु को लगा, जैसे उसकी मनचाही मुराद पूरी हो गई हो. अपनत्व से बोल पड़ा, “नहीं, चाचाजी, आप लोग अकेले नहीं हैं. आप दोनों मेरे साथ चलेंगे. हम मिलकर प्यार व मान-सम्मान से परिपूर्ण परिवार बनाएंगे. आप तो मेरे सुख-दुख के साक्षी रहे हैं चाचाजी, आपके मार्गदर्शन के कारण ही तो मैं विषम परिस्थितियों को पार करके सफलता की इस मंज़िल तक पहुंचा हूं. मेरा अंतस वर्षों से ही किसी अपने के सान्निध्य की तलाश में भटकता रहा है. आप दोनों को मेरे साथ चलना ही होगा.” भावुकता के साथ अनुरोधपूर्ण शब्दों में कहा हिमांशु ने.
दोनों पति-पत्नी नियति के इस चक्र को देखते ही रह गए. बड़े पशोपेश की स्थिति में सुनीता देवी के मुंह से शब्द निकले, “पर, बेटा, ऐसा भला कैसे संभव हो सकता है?”
“क्यों नहीं हो सकता है चाचीजी? एक तरफ़ तो आप मुझे ‘बेटा’ कहकर अपनेपन का एहसास करा रही हैं, दूसरी तरफ़ इंकार करके परायापन भी ज़ाहिर कर रही हैं. चाचीजी, हम लोग अपनी ज़िंदगी स्नेह-बंधन के सहारे आनंदपूर्वक गुज़ारेंगे. आप लोग इंकार मत कीजिए, नहीं तो हमारा दिल टूट जाएगा. आपकी बहू बड़ी बेसब्री से हम सबका इंतज़ार कर रही होगी.” उनकी हथेलियों को स्नेह से थामकर साधिकार कहा हिमांशु ने. आनंदातिरेक के कारण उसका गला भर उठा.
ममतामयी दृष्टि से हिमांशु की तरफ़ निर्मिमेष निहारती ही रह गईं सुनीता देवी. कहीं ऐसा भी होता है? इस सुखद स्थिति की तो कभी कल्पना तक नहीं की थी उन्होंने. ज़िंदगी कब करवट बदल ले, यह भला कौन जान सकता है?
भोर का धुंधलका छंट चुका था. सुबह की सुनहरी धूप फैलने लगी थी. हिमांशु और उनके बीच स्नेह व आत्मीयता की जिस मधुर रिश्ते की बुनियाद पड़ चुकी थी, उसके एहसास मात्र से ही उनके हृदय में आनंद की किरणें प्रस्फुटित होने लगी थीं.

- रंजना श्रीवास्तव

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