कहानी- स्वध्यान (Short Story- Swadhyan)

Hindi Kahani

सबके हंसते-खिलखिलाते चेहरों के बीच वो भी हंसती-खिलखिलाती काम किए जा रही थी. हर काम के लिए उसे पुकारा जाना, हर सलाह-मशवरे में उसकी राय लेना, इतना ही काफ़ी था उसका ये विश्‍वास कायम रखने के लिए कि सब उसे चाहते हैं, उसकी कद्र करते हैं. मगर तीन-चार दिनों से उसका ये विश्‍वास एक छलावा सिद्ध हो रहा है. उसे लग रहा है कि यह एक सोच-समझकर बुना गया भ्रमजाल है, जो उसके इर्द-गिर्द फैलाया गया है, ताकि कहीं किसी विद्रोही स्वर की गुंजाइश न बचे.

मानसी ने घड़ी पर नज़र डाली, 6 बज चुके हैं. उफ्! इतनी ज़ल्दी सुबह क्यों हो जाती है? उसके मानस पटल पर अगले तीन  घंटे चलनेवाला दैनिक घटनाक्रम घूमने लगा. बच्चों को उठाना, नहलाकर तैयार करना, पापाजी का बादाम दूध और स्प्राउट… मम्मीजी का चरणामृत… उफ्! उसे इतने काम सोचकर ही चक्कर आने लगे. झटके से चादर हटाकर उठना चाहती थी, मगर कमर जवाब दे गई थी. हफ़्ते भर से पीछे पड़ा बुखार कल विदा हो गया, मगर कमज़ोरी अभी भी साथ छोड़ने को तैयार नहीं थी. ऊपर से इस कमरदर्द ने आ जकड़ा था.

मानसी ने ख़ुद को इतना असहाय कभी महसूस नहीं किया होगा, जितना आज कर रही है. घर की बैकबोन, अकेली कर्ता-धर्ता गृहिणी के बिस्तर पर पड़े रहने से घर की सारी व्यवस्था ही चरमरा गई थी, कोई काम ठीक से और समय पर नहीं हो पा रहा था. जिधर देखो बिखरा सामान, बच्चों की क़िताबें, धुले-बेधुले कपड़े. मानसी को ऐसी अव्यवस्था की तनिक भी आदत नहीं है. बीमारी से ़ज़्यादा बदहाल घर ने उसे फ्रस्ट्रेट कर रखा है. कल ख़ुद से वादा करके सोई थी कि सुबह उठेगी और घर की गाड़ी वापस पटरी पर ले आएगी, मगर आज उसकी कमर धोखा दे गई.

अब चाहे जो भी हाल हो, काम तो करने ही हैं. उसने एक स्ट्रॉन्ग पेनकिलर निगला, ख़ुद को संयत किया और उठ खड़ी हुई. “शुभम, शैली उठो, स्कूल को देर हो जाएगी.” बच्चों को उठाकर बाहर आई. पतिदेव नितिन हॉल में अख़बार पढ़ रहे थे, चाय शायद ख़ुद बना ली है. मांजी नहाने जा चुकी हैं. बाथरूम से ही मंत्रों की आवाज़ें आ रही हैं. उनका पूजा-पाठ नहाने के साथ ही शुरू हो जाता है. रसोई में आई, तो देखा कुछ भी काम शुरू नहीं हुआ. लाचारी मिश्रित ग़ुस्सा उबलने को तैयार है. मन किया फट पड़े सभी पर. घर में किसी का भी दुख-दर्द हो, हारी-बीमारी हो, बढ़-चढ़कर सेवा की है और ये लोग उसे हफ़्ता भर भी न निबाह पाए. माना नितिन को ऑफ़िस जाना है, तो क्या थोड़ा जल्दी उठकर अख़बार पढ़ने की बजाय बच्चों को तैयार नहीं कर सकते? मम्मीजी उठकर सीधे नहाने और पूजा-पाठ करने की बजाय बच्चों के टिफ़िन तैयार नहीं कर सकतीं? पापाजी 5 बजते ही सैर और योगा के लिए क्लब चले जाते हैं और फिर नाश्ते तक का समय अख़बारों के ढेर में घिरे बिताते हैं, क्या वो बच्चों को बस स्टॉप तक छोड़ने की ज़िम्मेदारी भी नहीं उठा सकते?

आज तक उसने ऐसा कुछ नहीं सोचा था, जो आज सोच रही है. अब तक ज़रूरत ही नहीं पड़ी कभी. हफ़्ते भर पहले तक सब सामान्य था. पिछले 12 सालों से सभी की पसंद-नापसंद और ज़रूरतों का ख़्याल रखते हुए घर के सभी काम नियत समय पर आगे से भाग-भागकर किए जा रही थी, वो भी स्वेच्छा और ख़ुशी के साथ. अजीब-सी संतुष्टि मिलती थी उसे ऐसा करके. सास- ससुर तारीफ़ करते नहीं थकते थे. बड़ी क़ाबिल है हमारी बहू. घर के साथ-साथ बाहर के सभी कामों को भी बख़ूबी करती है. कार ड्राइव करती है, तो बच्चों को क्लासेस में लाना-ले जाना, ख़रीददारी, बैंक के काम सभी वही निपटा लेती है. ‘मानसी तुम न होती तो ये घर कैसे चलता, इस घर के लिए तुम्हारा जो कॉन्ट्रीब्यूशन है उसका कोई मूल्य नहीं है.’ नितिन भी अक्सर प्रशंसा करते. ऐसी तारीफ़ ही उसे थकान के बावजूद निरंतर कार्यरत रहने की ऊर्जा प्रदान करती थी. ख़ुद को लकी समझती थी वो. उसके जैसी कितनी ऐसी गृहिणियां हैं, जो गृहकार्यों की अनवरत् चलनेवाली चक्की में पिसती जाती हैं, मगर कहीं किसी प्रशंसा के दो बोल भी सुनने को नहीं मिलते. उनके हर काम को टेक इट फॉर ग्रांटेड लिया जाता है, मगर उसे कितनी सराहना मिलती है. ख़ासकर उसके बनाए हुए खाने को लेकर. पापाजी तो मम्मीजी को कह भी देते हैं, ‘तुम तो अब किचन में हाथ मत ही लगाओ तो अच्छा है, बहू जैसी पाक कला तुममें कहां?’ और चाहे-अनचाहे मम्मीजी ने इस तथ्य को स्वीकारते हुए अपना कार्यक्षेत्र सीमित कर लिया. सबके हंसते-खिलखिलाते चेहरों के बीच वो भी हंसती-खिलखिलाती काम किए जा रही थी. हर काम के लिए उसे पुकारा जाना, हर सलाह-मशवरे में उसकी राय लेना, इतना ही काफ़ी था उसका ये विश्‍वास कायम रखने के लिए कि सब उसे चाहते हैं, उसकी कद्र करते हैं. मगर तीन-चार दिनों से उसका ये विश्‍वास एक छलावा सिद्ध हो रहा है. उसे लग रहा है कि यह एक सोच-समझकर बुना गया भ्रमजाल है, जो उसके इर्द-गिर्द फैलाया गया है, ताकि कहीं किसी विद्रोही स्वर की गुंजाइश न बचे.

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इससे पहले जब कभी बुखार आया, पेनकिलर खाकर किसी भी तरह खड़ी हो जाती थी. धीरे-धीरे ही सही सब निपटा देती थी, मगर इस बार शरीर साथ नहीं दे रहा है. नितिन ने कह दिया कि मेरे नाश्ते-टिफ़िन की चिंता मत करो, ऑफ़िस में खा लूंगा. मम्मीजी भी अपना और पापाजी का टोस्ट व दाल-रोटी से काम चला रही हैं, मगर उसका क्या?  और बच्चे, नित नए व्यंजन खानेवाले बच्चे कब तक टोस्ट व दाल-रोटी खा पाएंगे? उनके कपड़े, यूनिफ़ॉर्म, होमवर्क, प्रोजेक्ट वर्क – वो सब कौन देखेगा? इतने सालों में पहली बार स्कूल से शिकायत आई है. शैली का प्रोजेक्ट समय पर नहीं बना, कोई साथ बैठकर कराता तभी तो. पापाजी चाहते, तो बनवा सकते थे, ग्लोबल वॉर्मिंग पर ही तो था. सबने अपना-अपना खाना-पीना संभाल लिया, पर इससे आगे कुछ करने की किसी ने ज़रूरत नहीं समझी. क्या इसी को कहते हैं सहयोग देना और ख़्याल करना?

मम्मीजी ने भी दो दिन तो हालचाल पूछा, तीसरे दिन स्वर से चिंता और झल्लाहट टपकने लगी. “अभी भी बुखार उतरा नहीं क्या? खड़ी नहीं हो पा रही हो क्या? दवाई बदल कर देख लो.” चेहरे के भाव स्पष्ट थे- बहुत आराम हुआ, अब खड़े होकर घर संभालो. नितिन भी एक-दो दिन सपोर्ट दिखाकर तीसरे दिन से रूटीन लाइफ़ में व्यस्त हो गए. सबसे ज़्यादा बच्चों पर बन आई है. अब न कोई उन्हें टीवी से हटकर पढ़ाई करने को कहता है, न ही कोई रात को ज़बरदस्ती ब्रश कराता है. किसी-किसी दिन तो बगैर नहाए ही स्कूल चले गए हैं. छठे दिन बुखार उतरा, तो मम्मीजी ने राहत की सांस ली और पहले की तरह अपने रूटीन पूजा-पाठ में लग गईं. ये पूछना भी ज़रूरी नहीं समझा कि मेरी सुबह उठकर काम करने की हालत है भी या नहीं… मानसी के विचारों की अनवरत धारा बहे जा रही थी. सोचते-सोचते बच्चों का नाश्ता, टिफ़िन कब तैयार हो गए, उसे पता ही नहीं चला. मानसी दोहरे अवसाद में है. पहला यह कि उसे घरवालों का रवैया ग़ैरज़िम्मेदाराना लग रहा है और दूसरा यह कि अब उसका शरीर उसकी ज़िम्मेदारियों से लय नहीं मिला पा रहा है.

“नितिन आज बच्चों को स्कूल बस में बैठा कर ऑफ़िस जाना.” स्वर आदेशात्मक था और गंभीर भी, नितिन कोई ना-नुकुर नहीं कर पाए.

मम्मीजी पूजा से निपटकर रसोई में आ गई हैं. “बहू पापाजी के लिए कुछ तैयार किया क्या?” मानसी ने प्रत्युत्तर नहीं दिया. इतनी ऊर्जा भी शेष नहीं बची है कि किसी से उलझ सके. बच्चों का काम ख़त्म कर चुपचाप कमरे में आकर लेट गई. उसके विचित्र व्यवहार से मांजी हतप्रभ थीं. नितिन भी कुछ घबरा गए.

“तबियत अभी भी ठीक नहीं है क्या? मेरी चिंता मत करना, मैं ऑफ़िस में कुछ खा लूंगा.”

“तुम्हारी चिंता नहीं, अपनी चिंता है मुझे.” स्वर तीखा हो चला.

“डॉक्टर को कंसल्ट…”

“थैंक्स, मैं अपना ख़ुद देख लूंगी.” मानसी ने बात बीच में ही काट दी. नितिन ने चुपचाप कमरे के बाहर जाना ही बेहतर समझा.

पेनकिलर अपना असर दिखा चुकी थी, मानसी हिम्मत बटोरकर अपनी फैमिली डॉक्टर से कंसल्ट करने चली गई. सभी रिपोर्ट साथ ले ली थी. उसने पिछली बार न जाने क्या-क्या टेस्ट और एक्स-रे बताए थे. सभी रिपोर्ट देखकर डॉक्टर कुछ देर मौन रही.

“सब ठीक तो है न डॉक्टर?”

“हूं… मेरी नज़र से तो कुछ भी ठीक नहीं है. हां, मगर तुम्हारे जैसी औरतों के लिए ये कुछ ख़ास बात नहीं है. तुम्हारे लिए तो ख़ास बात उस दिन होती है, जब तुम बिल्कुल ही बिस्तर पकड़ लेती हो.”

“क्या मतलब? मैं समझी नहीं.”

“मतलब ये मानसी कि तुम्हारी सभी रिपोर्ट मुझसे तुम्हारी ये शिकायत कर रही हैं कि घर में सबका बख़ूबी ख़्याल रखनेवाली मानसी ने अपना ज़रा भी ख़्याल नहीं रखा. तुम में कैल्शियम, विटामिन ‘बी-12’ की ज़बरदस्त कमी है. हीमोग्लोबिन भी बहुत कम है और तुम्हारी स्पाइन का एक्स-रे बता रहा है कि अगर तुमने तुरंत फ़िज़ियोथेरेपी और प्रॉपर एक्सरसाइज़ शुरू नहीं की, तो कभी भी स्लिप डिस्क हो सकती है.”

“डॉक्टर, आप तो जानती हैं मेरे घर का हाल, मरने तक की फुर्सत नहीं निकाल पाती हूं.”

“हां, मैं अच्छे से जानती हूं और ये वाला जुमला तो मैं रोज़ अपने न जाने कितने पेशेंट से सुनती हूं, जिन्हें लगता है कि दुनिया उनके दम पर ही चल रही है. अगर उन्होंने अपनी व्यस्त दिनचर्या के कुछ लम्हे ख़ुद को दे दिए, तो संसार में बड़ी भारी उथल-पुथल मच जाएगी. अच्छा, ज़रा सोचकर बताओ तुम्हारी हफ़्ते भर की बीमारी ने घर को हिलाकर रख दिया, तो अगर अगली बार ये अवधि ज़्यादा बढ़ गई, तो फिर उनका क्या होगा? तब क्या तुम्हारे बच्चे परेशान नहीं होंगे और अगर तुम्हें स्पाइन की कोई बड़ी प्रॉबल्म हो गई, तो संभव है महीनों बिस्तर पर रहना पड़े, तब क्या करोगी?”

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डॉक्टर की बातों ने मानसी को हिला दिया. पिछले एक हफ़्ते में जो उसके बच्चों पर गुज़री थी, उसके दोहराव की बात सोचकर ही वो कांप उठी. बच्चों के साथ वो किसी बात पर समझौता नहीं कर सकती थी. उनके खान-पान, पढ़ाई, स्वास्थ्य आदि को लेकर वो बेहद सजग थी. डॉक्टर ने अपना काम कर दिया था. कुछ फूड सप्लिमेंट्स, कुछ दवाइयां, लगातार 15 दिनों की फ़िज़ियोथेरेपी और प्रॉपर रेस्ट प्रिस्क्राइब कर दिया. इससे ज़्यादा वो कुछ नहीं कर सकती थी. इससे आगे जो कुछ करना था, मानसी को ही करना था. उसे पता था, इस बिज़ी शेड्यूल से दो-तीन घंटे अपने लिए निकालना टेढ़ी खीर है. घर में सब को जी हुज़ूरी की आदत जो लगी हुई है, मगर वो जानती थी कि इसके लिए वो स्वयं ही ज़िम्मेदार है. शैली 10 और शुभम 8 साल का है. मगर अभी तक वही उनके सारे काम कर रही है. चाहे कपड़े निकालकर देना हो, बाथरूम में तौलिया पकड़ाना हो, जूते-चप्पलें व्यवस्थित रखना हो, बैग लगाना हो या फिर बाल बनाना हो. हर काम के लिए वे उसी पर निर्भर हैं. हों भी क्यों न, उसने कभी कोशिश ही नहीं की, उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की. ममता में अंधी होकर उसने कभी ये भी नहीं सोचा कि ऐसी आदतें आगे बच्चों को दुख देंगी और उसे भी. तभी उसकी हफ़्तेभर की बीमारी ने बच्चों पर इतना बुरा असर डाला. अगर वो अपने काम ख़ुद करना जानते, तो इस समय न उसे परेशानी होती, न ही उन्हें. ख़ैर जो हो गया, उसके बारे में सोचकर कुढ़ने से क्या फ़ायदा? अब आगे कैसे स्थिति सुधारी जाए, इस पर ध्यान देना है. सबका अच्छे से ध्यान रखने के लिए उसे अपना ध्यान रखना ही होगा. धीरे-धीरे ही सही, सब ठीक हो जाएगा. मन में सकारात्मक पहल लिए मानसी घर की ओर चल पड़ी.

“आ गई बहू, क्या बोली डॉक्टर? सब ठीक है न?” मांजी चिंतित थीं.

“हां, अभी तक तो सब ठीक, मगर…”

“चलो शुक्र है भगवान का.” मांजी मानसी की बात बीच में ही काटते हुए ईश्‍वर को धन्यवाद देने लगीं. इतना भर सुनकर ही उनकी समस्त चिंताएं दूर हो गई थीं. इससे आगे कुछ डिटेल जानने की न उन्हें ज़रूरत थी, न ही चाहत. “लंच के लिए काफ़ी देर हो गई है. ऐसा करो कुछ हल्का-फुल्का ही बना लो. तुम्हारे पापाजी भी आते होंगे.” मांजी ने फटाफट आदेश दिया.

“मेरी तो अभी हिम्मत नहीं है. आपने पीछे कुछ नहीं बनाया है, तो फिर कुछ बाहर से ही ऑर्डर कर दीजिए.” मानसी ने स्पष्ट लाचारी व्यक्त की. जवाब सुन मांजी के चेहरे पर भले ही तनाव की रेखा खिंच गई थी, मगर मानसी ने ख़ुद को बेहद हल्का महसूस किया. उसे लगा जैसे इतना कहने भर से ही उसके ऊपर लदा भारी लबादा एकाएक उतर गया. शायद एक निश्‍चित निर्णय पर पहुंचकर असंभव-सी दिखनेवाली चीज़ें भी आसान हो जाती हैं.

“तेरे पापाजी को तो बाहर का खाना बिल्कुल भी पसंद नहीं. बेकार में उनका मूड बिगड़ जाएगा.”

“तो फिर आप देखिए, कैसे मैनेज करना है. वैसे स़िर्फ आज ही की बात है, कल से एक नौकर आ रहा है. मैंने बात कर ली है, वो घर के ऊपर के काम के साथ-साथ खाना भी बना लिया करेगा.”

“मगर तेरे पापाजी को तो नौकरों के हाथ का बिल्कुल नहीं चलता.” स्वर के साथ-साथ चेहरे पर भी कड़वाहट छितरने लगी.

“तो फिर पापाजी के लिए आप देख लेना, बाकी सबका वो बना दिया करेगा.”

“फिर तुम क्या करोगी?” लगभग चीखती-सी मांजी पहली बार अपना आपा खो बैठीं.

“मुझे अब ख़ुद को भी समय देना है.” संक्षिप्त-सा उत्तर देकर मानसी अपने कमरे की तरफ़ बढ़ चली. वो विस्मित थी. कितनी बड़ी बात हो गई आज घर में, जीवन में पहली बार उसके और सासू मां के बीच इस तरह की बात हुई, मगर उसे न कोई ग्लानि है, न ही कोई चिड़चिड़ाहट, बल्कि वो ख़ुद को बेहद शांत और सहज महसूस कर रही है.

बच्चे स्कूल से आ चुके थे. मानसी उनका खाना-पीना अच्छे-से निपटाकर ऊपर अपने कमरे में ले गई. मांजी घंटे भर से अपने कमरे में अकेले बैठी बड़बड़ा रही थीं, जब बात बर्दाश्त से बाहर हो चली, तो रहा न गया. सोचा बहू की ऐसी बेअदबी बिल्कुल नहीं सहेगी. जो भी हो, वो अभी भी घर की बड़ी हैं. माना बहू को थोड़ी ढील दे रखी थी, मगर ज़रूरत पड़ने पर लगाम कसना उन्हें आता है. अगर वो चाहती है कि घर के कामकाज से कटकर बस अपने बच्चों का करे, तो इस घर में ऐसा नहीं चलेगा. उसके बिगड़े तेवर ठीक करने ही पड़ेंगे. रौद्र रूप धारण किए मांजी मानसी के कमरे की ओर बढ़ चलीं, मगर अंदर से आती आवाज़ों ने उनके क़दम रोक दिए. मानसी बच्चों को अपनी बिगड़ती सेहत और उनकी ज़िम्मेदारियों के बारे में समझा रही थी और बच्चे उससे वादा कर रहे थे कि वो न स़िर्फ अपने काम अच्छे से करेंगे, बल्कि अपनी प्यारी मम्मी की सेहत का भी ध्यान रखेंगे. मांजी सब चुपचाप सुन रही थीं. उन्होंने महसूस किया कि उनके पैर कमरे में दाख़िल होने को तैयार नहीं हैं और वो बोझिल क़दमों से अपने कमरे में वापस लौट गईं.

 

Deepali Agarwal

दीपाली अग्रवाल

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