कहानी- ठोकर के बाद (Short Story-...

कहानी- ठोकर के बाद (Short Story- Thokar Ke Baad)

“अब मेरा यहां दम घुटने लगा है. आप कैसे भी कोई दूसरा मकान देख लीजिए चाहे वह किराए पर ही क्यों न हो.”
“हां सुमि, मैं भी यही चाहता हूं. भगवान ऐसा कपूत किसी को न दें. हमने जिस पर सारी उम्र सब कुछ लुटाया आज उसने इस उम्र में हमें बाहर ठोकरें खाने के लिए छोड़ दिया. मैं रिटायरमेंट के बाद चैन से रहना चाह रहा था, पर अब तो यहां पल-पल जीना दुश्‍वार हो चला है.”

“अब आंखें खोलो सुमि.”
कहने के साथ ही विनोद ने सुमिता की आंखों से अपने दोनों हाथ हटा दिए. अचकचाकर आंखें खोलते ही सुमि ने ख़ुद को एक छोटे लेकिन ख़ूबसूरत से घर के सामने पाया. बाहर लोहे के गेट के साथ ही लगी नेमप्लेट पर ‘विनोद एवं सुमि’ लिखा देखकर उसका मन अनूठे एहसास से तरंगित हो गया. विनोद ने उसकी मनोदशा का अनुमान लगाते हुए चुपचाप उसके हाथ में चाबी धर दी.
“विनोद ये सब क्या..?” उसने कुछ पूछना चाहा, तो विनोद ने उसके होंठों पर उंगली रखते हुए गेट खोलने का संकेत किया. गेट खोलकर दोनों भीतर दाख़िल हुए. सामने लकड़ी के दरवाज़े पर भी ताला झूल रहा था. सुमि ने वह ताला भी खोला. अंदर कदम रखते ही रोशनदान व खिड़कियों से झांक रही सूरज की पीली किरणों ने उनका स्वागत किया.
सुमि ने चारों तरफ़ नज़रें दौड़ाई. कमरा खाली था. बस सामने एक सोफासेट लगा हुआ था. कमरे में ताज़ा किए गए पेंट की गंध साफ़ महसूस हो रही थी. उसकी नज़रों में उत्सुकता देख विनोद ने उसका हाथ थाम लिया,
“आओ तुम्हें घर दिखाता हूं.” सुमि हतप्रभ-सी साथ चल दी.
रसोईघर में नया गैस चूल्हा व रोज़मर्रा के काम आने वाले कुछ बर्तन पड़े थे. साथ ही किराने की दुकान से लाया गया पैकेटबंद सामान बेतरतीब रखा हुआ था. सुमि कुछ कहती कि विनोद उसका हाथ थामे ही एक तरफ़ मुड़ गया.
“ये है टॉयलेट और साथ में ये रहा बाथरूम.” सुमि मंत्रमुग्ध-सी सब देखती रही.
“और ये रहा हमारा अपना कमरा.” लाइट ऑन करते ही सामने बिछे डबलबेड व साथ पड़े कुर्सी, मेज़, आलमारी से उठती सुमि की नज़र दीवार पर गई जहां एक बड़ी सी फ्रेमयुक्त फोटो टंगी हुई थी. जिसमें सुमि के कंधे पर हाथ रखे विनोद खड़ा था और सुमि की गोद में मयंक हंस रहा था. बरसों पुरानी इस फोटो को देखते ही सुमि यादों में खो गई.
मयंक के जन्म के साथ ही उनके जीवन में बहार आ गई थी. सुमि की सास ने अपने पोते को पलकों पर बिठा लिया था. सुमि और विनोद भी अपने जिगर के टुकड़े पर पूरा प्यार कुर्बान कर रहे थे. उनके लिए यह ख़ुशी बेहद ख़ास थी, क्योंकि पहले तीन बार गर्भपात के बाद अब जाकर सुमि मां बन पाई थी. डॉक्टर ने भविष्य में उसके दोबारा मां बनने की संभावना भी ख़त्म कर दी थी. दोनों के लाड़-प्यार में मयंक कब बड़ा हो गया, इसका पता ही न चला. इस बीच सुमि की सास भी दुनिया छोड़कर जा चुकी थीं. सुमि आगे कुछ और सोचती कि विनोद ने पूछ लिया,
“कैसा लगा घर? बगल में स्टोररूम भी है. आओ दिखाऊं.”
“वो बाद में, पहले आप आराम से बैठिए, मैं चाय बनाकर लाती हूं. मुझे आपसे बहुत कुछ पूछना है.”
“हां, चाय की तलब तो मैं भी महसूस कर रहा था.” कहते हुए विनोद ड्रॉइंगरूम में सोफे पर बैठ गया. दो कप चाय बनाकर लाने के साथ ही सुमि सोफे पर विनोद के साथ बैठ गई.
“विनोद, ये घर… क्या ये हमारा अपना घर है?”
“हां सुमि, ये हमारा अपना घर है और हम कल ही यहां शिफ्ट हो रहे हैं. मैं भूल नहीं पा रहा कि हमारे ही बेटा-बहू हमें बोझ मानने लगे हैं.” चाय का घूंट भरने के साथ ही सुमि के सामने रिश्तों की प्ले बैक रील चलने लगी.
एमटेक करने के बाद मयंक एक नामी कंपनी में बतौर इंजीनियर लग गया था. इसी दौरान उसने अपने प्यार के रूप में अपनी सहकर्मी निशा को जीवनसंगिनी बनाने की सोच ली. जबकि विनोद ने मयंक के लिए अपने एक दोस्त की बेटी को चुन रखा था, लेकिन बेटे की भावनाओं को अहमियत देते हुए उन्होंने इस रिश्ते के लिए हामी भर दी और निशा उनके परिवार में बहू बनकर आ गई.


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सुमि और विनोद ने निशा को अपनी बेटी मानकर लाड़-प्यार लुटाना चाहा, लेकिन वह तो जैसे किसी दूसरी मिट्टी की बनी थी. उनके विचारों तथा निशा के विचारों में हर बात पर ज़मीन-आसमान का अंतर झलकने लगा. हद तो तब हो गई जब मयंक भी हर बार अपनी पत्नी का पक्ष लेने लगा. सुमि ने निशा के माता-पिता को उसे समझाने को कहा, तो घर में जैसे बवाल ही मच गया.
निशा ने साफ़ कह दिया कि या तो इस घर में वह रहेगी या मयंक के माता-पिता. अब मयंक ने भी रंग बदल लिया. पुरखों का यह घर वह अपने नाम तो करवा ही चुका था. विनोद ने जब उसे अपने बुढ़ापे का हवाला दिया तो वह पलटकर बोला, “पापा, आप मम्मी के साथ किसी वृद्धाश्रम में चले जाएं. निशा गर्भवती है. मैं नहीं चाहता कि आपकी किसी बात को लेकर वह तनाव में आ जाए.”
बमुश्किल से विनोद बोल पाए, “बेटा तुम दोनों अच्छा कमाते-खाते हो, तुम अपने लिए अलग घर का इंतज़ाम क्यों नहीं कर लेते?”
तभी निशा वहां पहुंच गई,
“यह घर हमारे नाम पर है. हम कहीं नहीं जाएंगे, वैसे भी हमें नौकर रखना है, उसे कहां ठहराएंगे?”
सारी बातचीत सुन रही सुमि की रूलाई फूट पड़ी. विनोद ने निशा को डांटने के लिए मुंह खोला ही था कि सुमि अपना वास्ता देकर उसे अलग कमरे में ले गई.
“अब मेरा यहां दम घुटने लगा है. आप कैसे भी कोई दूसरा मकान देख लीजिए चाहे वह किराए पर ही क्यों न हो.”
“हां सुमि, मैं भी यही चाहता हूं. भगवान ऐसा कपूत किसी को न दें. हमने जिस पर सारी उम्र सब कुछ लुटाया आज उसने इस उम्र में हमें बाहर ठोकरें खाने के लिए छोड़ दिया. मैं रिटायरमेंट के बाद चैन से रहना चाह रहा था, पर अब तो यहां पल-पल जीना दुश्‍वार हो चला है.”
विनोद की भावनाएं इस कदर आहत हुई थीं कि उसी पल किराए का मकान ढूढ़ने बाहर निकल गया. इसी दौरान उसके एक दोस्त ने सस्ते मूल्य पर बिकाऊ एक मकान की जानकारी दी. शहर से दूर विकसित हो रही एक नई कॉलोनी में बने इस छोटे-से मकान के इर्दगिर्द प्रकृति की बहार थी. विनोद को यह मकान देखते ही पसंद आ गया था. मकान मालिक विदेश में बसे अपने बेटे के पास जाकर बसने जा रहे थे. सो उन्हें भी इस मकान को औने-पौने भाव पर बेच देने की जल्दी थी.
काफ़ी कम क़ीमत पर यह घर हाथ में आया देख विनोद ने भगवान का शुक्रिया अदा किया और अपने बैंक खाते से पैसे निकाल मकान का बयाना अदा कर दिया. अब मकान मालिक को रजिस्ट्री के समय एकमुश्त भुगतान करना था. जिसके लिए विनोद ने वृद्ध नागरिकों को दी जा रही योजना की तहत रियायती दरों पर बैंक से कर्ज़ ले लिया था. उसे आगे की भी कोई चिंता नहीं थी, क्योंकि हर माह मिलनेवाली पेंशन का एक हिस्सा कुछ वर्षों तक बैंक किश्त भरने के बावजूद इतने पैसे तो बचने ही थे कि वह अपना और सुमि का गुज़ारा सादगी से कर सके.
सुमि को सरप्राइज़ देने की सोचकर विनोद ने उसे मकान ख़रीदने के बारे में कुछ नहीं बताया. उसने एक पुराना स्कूटर भी ख़रीद लिया और नए सिरे से घर के साजो सामान की ख़रीददारी व रंगरोगन में जुट गया. आज शाम को बाहर घूमने के बहाने सुमि को स्कूटर पर बिठा वह यहां ले आया था. चाय के आख़िरी घूंट के साथ ही सुमि के विचारों की कड़ी विनोद की आवाज़ से टूटी,
“कैसा लगा ये घर?”
“बिल्कुल सपनों के घरौंदे जैसा. बस, अब हम वहां और नहीं रहेंगे. मैं ये भी चाहती हूं कि उन दोनों को हमारे घर की भनक भी न लगे.”
“ऐसा ही होगा बेग़म साहिबा.” विनोद ने सुमि की आंखों में झांकते हुए कहा.
अगले दिन दोनों ने अपना कुछ ज़रूरी सामान लेकर मयंक और निशा को अलविदा कह दिया. निशा ने उनसे कुछ पूछने की ज़रूरत नहीं समझी थी, लेकिन मयंक ने ज़रूर पूछ लिया था,
“पापा आप किस जगह पर रहने जा रहे हैं?”
“बेटा हम जहां भी रहें हमारी दुआएं तुम दोनों के साथ रहेंगी. अब मज़े से रहो और हमेशा ख़ुश रहो.”
कहने के साथ ही विनोद सुमि को लेकर बाहर आ गया था.
लगभग महीना होने को था. सुमि ने अपने घर को सजाने के साथ ही खाली पड़े एक टुकड़े पर तुलसी, अमरूद, अनार, अंगूर तथा कुछ सब्ज़ियों के पौधे लगा दिए थे जिनका ख़्याल वह बच्चों की तरह रखती. विनोद ने भी समय बिताने के लिए कॉलोनी में बनी एक लाइब्रेरी को अपना लिया था. शाम को वह आस-पड़ोस के बच्चों को पढ़ाकर सुकून महसूस करता. हां, इस बीच कभी-कभार मयंक और निशा की बात छिड़ती तो दोनों के मन में एक कसक-सी उठकर रह जाती.
ट्रिन-ट्रिन…! दरवाज़े की घंटी बजने पर विनोद ने दरवाज़ा खोला, तो ठिठक गया. गेट पर मयंक खड़ा था. पापा को देखते ही उसकी आंखों में चमक उभरी पर अगले ही पल उसने अपनी नज़रें झुका लीं.
“अरे मयंक… सुमि देखो तो कौन आया है?”
सुमि भी बाहर चली आयी. मयंक ने मम्मी-पापा के चरण स्पर्श किए तथा उनके साथ भीतर आ गया.
“कहो बेटा, आज इधर कैसे आना हुआ?” मयंक को एकटक नीचे देखते सुमि ने चुप्पी तोड़ी.
“मम्मी-पापा, आपके जाने के बाद हम बिल्कुल अकेले हो गए हैं. पापा ने तो अपना मोबाइल नंबर भी बदल दिया, आपके रहने का भी कुछ पता नहीं चल पा रहा था. ऐसे में पापा के किसी दोस्त से मुझे यहां का पता चला, तो मैं मिले बिना न रह सका…” मयंक ठिठका.
मम्मी-पापा को चुपचाप देख उसने कहा, “कुछ दिन पहले बाथरूम में पैर फिसल जाने से निशा के पेट में पल रहा बच्चा नहीं रहा…. मम्मी-पापा हमें उस अजन्मे बच्चे के पैदा न होने का बड़ा अफ़सोस हुआ. निशा ने तो खाना-पीना ही छोड़ दिया था. फिर हमें समझ आई कि मां-बाप के लिए औलाद क्या मायने रखती है? सच कहूं पापा हमें ये महसूस हो गया कि हमने आप दोनों का दिल दुखाकर घर छोड़ने को मजबूर किया जिसकी हमें सज़ा मिली. निशा भी आपसे मिलकर माफ़ी मांगना चाहती थी, पर तबीयत ठीक न होने की वजह से मैंने उसे साथ लाना मुनासिब नहीं समझा. मैं जानता हूं कि हम आपके गुनहगार हैं, लेकिन भूल भी बच्चों से ही होती है. मैं आप दोनों को वापस ले जाने आया हूं.”
“मयंक, निशा के साथ जो हुआ उसका हमें बेहद अफ़सोस है. हम निशा से मिलने भी आएंगे, लेकिन जहां तक वापस चलने की बात है तो अब यह संभव नहीं. हर किसी को जीवन की राह में चलते हुए ठोकरें खानी पड़ती हैं. जो ठोकर से सीख ले, वह इंसान है, पर जो ठोकर के बाद भी नहीं समझता, उस मूर्ख को भविष्य में और भी ठोकरें खानी पड़ती हैं. बेटा हमें तुमसे कोई गिला नहीं, पर हम ठोकर खाने के बाद अब जाकर संभले हैं और अपने घर में ख़ुश हैं.”


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“मम्मी प्लीज़, आप पापा को मनाइए.”
“बेटा, तुम्हारे पापा ने जो कुछ कहा सब ठीक है. हम दोनों दिल से तुमसे दूर नहीं. तुम दोनों जब भी चाहो हमसे मिलने आ सकते हो. हमारा भी जब भी जी चाहेगा तुम दोनों से मिलने आ जाया करेंगे.”
मयंक दयनीय चेहरा लिए उठ खड़ा हुआ,
“मम्मी-पापा, आप एक बार फिर सोचिएगा.” विनोद-सुमि ने सहमति में सिर हिला दिया.
मयंक के जाने पर विनोद सोफे पर पसर गया, “सुमि मेरे विचार से मैंने हमारे आत्मसम्मान की दृष्टि से जो कुछ किया ठीक ही किया. मैं तो यही सोचता हूं कि हमारी असली ज़िंदगी अब शुरू हुई है. ख़ैर… तुम तैयार रहना, शाम को निशा का हालचाल पूछ आएंगे.”
अपने पति के अंदाज़ से सहमत सुमि भी चाय बनाने चुपचाप रसोई की तरफ़ बढ़ गई.

– संदीप कपूर

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Photo Courtesy: Freepik

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