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कहानी- उलझन (Short Story- Uljhan)

"… भाभी, हम मानते हैं कि ग़लती हमारी भी थी, जो हमने उसको अपनी ओर आकर्षित होते देखकर भी ख़ुद सचेत होने की बजाय उसके आकर्षण में बह गए. हद तो यह है भाभी कि वो अब हमारे यहां भी फोन करने लगा है. हमने उसे फोन करने से मना किया, तो उल्टी-सीधी बातें करने लगा. अब तो हमारी हालत यह हो गई है कि अपने किए पर ग्लानि तो होती ही है, साथ ही यह डर भी लगा रहता है कि आशु और मम्मीजी को पता चलेगा तो क्या होगा?.."

बच्चों को स्कूल भेज, पतिदेव को ऑफिस विदा कर, घर का काम निपटाकर, नहा-धोकर एक कप चाय लेकर लॉन में आ बैठी. मार्च की सुबह की कुनकुनाती धूप बड़ी भली लग रही थी. पिंकू के लिए स्वेटर बुन रही थी. उसका गोला भी हाथ में था. इतने में पड़ोस की नीता आती दिखाई दी.
"हम आ जाएं भाभी?" बोलती हुई वह गेट खोलकर अंदर आ गई. मैं भी उठने का उपक्रम करते हुए बोली, "अरे आओ नीता." नीता को मालूम है कि इस वक़्त मैं खाली होती हूं, इसीलिए जब भी कभी आती है, इसी वक़्त आती है.
"नीता, तुम बैठो. मैं एक कप चाय बना लाऊं." कहते हुए उठ ही रही थी कि उसने हाथ पकड़कर बैठा लिया, बोली, "भाभी, बिल्कुल इच्छा नहीं है." नीता बहुत बेचैन सी लग रही थी. मैं भी उसकी इस बैचेनी का कारण पूछे बिना नहीं रह सकी. वैसे तो जब से वो विवाह के बाद आई है, मुझसे इतनी घुलमिल गई है कि हम दोनों ही अपने मन की बातें एक-दूसरे से करती रहती हैं.
पड़ोस में ही अग्रवाल आंटी रहती हैं, उनके बच्चे भी मुझसे काफ़ी खुले हुए हैं, ख़ासतौर से छोटा वाला आशु. जब आशु का विवाह हुआ, तो आंटी ने काजल डालने की रस्म मुझसे ही करवाई और बड़ी भाभी होने का नेग भी दिया. मुंह दिखाई की रस्म के दिन जब मैंने नीता के हाथ में अपना तोहफ़ा रखा तो आंटी के कहने पर उसने मेरे पैर भी छुए, तब मैंने ही कहा था, "आंटी, प्लीज़ इसे मैं अपने पैर नहीं छूने दूंगी, इसे तो गले से लगाऊंगी. मुझे तो इसे देखकर अपनी छोटी बहन की याद आ गई."
उस दिन के बाद से हमारे बीच एक अजीब सा रिश्ता बन गया. कहती तो वो मुझे भाभी थी, पर मानती बड़ी बहन की तरह थी. शुरू-शुरू में नए घर-परिवार में सामंजस्य बैठाने में तकलीफ़ आती है, मैं भी गुज़र चुकी थी उस दौर से. अतः मैं हर बात की सीख छोटी बहन के नाते से उसे देती. धीरे-धीरे वह घर में घुलमिल गई. हमारे रिश्ते और प्रगाढ़ होते चले गए.

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बड़ी बहुएं अपने-अपने घर जा चुकी थीं, क्योंकि दोनों बड़े भैया बाहर नौकरी करते थे. आशु मां के साथ रहता था, अतः नीता को ही घर संभालना था. नीता इस बीच प्यारी-सी बेटी की मां बन गई. अब तो वह घर-परिवार में व्यस्त हो गई. फिर भी समय निकालकर कभी-कभी आ जाती. अग्रवाल आंटी और नीता दोनों में काफ़ी पटती थी, अतः घर का वातावरण सौहार्दपूर्ण रहता था.
नीता को देखकर कोई कह नहीं सकता था कि वह एक बच्चे की मां है. गोरा रंग, सुतवां नाक, बड़ी-बड़ी बोलती सी आंखें, घने काले बाल, अच्छा क़द, कुल मिलाकर ऐसा लगता मानो अप्सरा ही पृथ्वी पर उतर आई हो. मैं तो आशु से कभी-कभी मज़ाक भी करती, "तेरे जैसे लंगूर को यह हूर की परी कैसे मिल गई?" इस पर वह, "भाभी आप भी…" कहकर रह जाता. बेटी भी मां पर गई थी, बिल्कुल गुड़िया-सी.
"भाभी, आज हम काफ़ी तनाव में हैं, पर कैसे कहें सारी बातें, समझ नहीं आ रहा, आप भी न जाने क्या सोचेंगी सुनकर हमारे बारे में."
"अरे पगली, ऐसी भी क्या बात हो गई? क्या आशु से लड़ाई हो गई या आंटी से कुछ कहासुनी हो गई?"
"नहीं भाभी! ऐसी कोई बात नहीं है. भाभी, आप क़सम खाइए, किसी से कुछ नहीं बताएंगी, यहां तक कि भाई साहब से भी नहीं."
"लो, तुम्हारी कसम खाती हूं. अब तो बोलो, ऐसी क्या बात हो गई?" मेरा यह कहना था कि उसका रोना शुरू हो गया. मैं स्तब्ध रह गई, ऐसी क्या बात हो गई? अभी तक कभी मैंने उसे इतना बेहाल नहीं देखा था. मेरे चुप कराने पर, सांत्वना देने पर उसने जो कुछ बताया, चुपचाप सुनती रही मैं.
"भाभी। बात हमारी शादी के पहले की है. हम गर्मी की छुट्टियों में अक्सर मम्मी के साथ अपनी नानी के यहां जाया करते थे. हम भाई-बहन, हमारे मामाओं के बच्चे, सब हमउम्र होने के कारण आपस में काफ़ी घुलमिल गए थे. हमारे मंझले मामाजी का बेटा तुषार उम्र में हमसे साल भर बड़ा है. धीरे-धीरे हमारी दोस्ती गहरी होती चली गई. शुरू-शुरू में हमने विशेष ध्यान नहीं दिया कि वो हमसे कुछ ज़्यादा ही खुला हुआ क्यों है, लेकिन बाद में आभास हुआ कि उसके मन में हमारे लिए कुछ और ही भावना थी. उसका व्यक्तित्व इतना आकर्षक कि हम भी उसके प्रति आकर्षित होते चले गए.
पिक्चर जाना, घूमना-फिरना, घंटों बातें करना, ये सब हमें और क़रीब लाता गया. उम्र के उस मोड़ पर भावनाओं की रौ में बहकर हमने ऊंच-नीच का ख़्याल नहीं किया. हमारी नानी कभी-कभी हमारी मम्मी से कहती भी थीं कि इस तरह इनका ज़्यादा मेलजोल ठीक नहीं. तब मम्मी कहती, "मां, आप अब पुराने ज़माने की हो गई हो. आजकल के बच्चे अपने हमउम्र भाई-बहनों के साथ दोस्त सा व्यवहार करते हैं. आपकी आशंका निर्मूल है."
इस पर नानी भी चुप हो जातीं, काश! उस समय नानी की बातों पर मम्मी ने ध्यान दिया होता.

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उम्र के उस नाज़ुक मोड़ पर जो रिश्ते बने, उनकी नैतिकता का आभास हमें तब हुआ, जब तुषार हमारे लौट जाने पर भी हमें पत्र लिखता, घंटों फोन पर अपनी भावनाओं का इज़हार करता. हमारी शादी पक्की हो जाने पर उसके आक्रोश भरे पत्र आने लगे. हालांकि उसकी शादी हमसे पहले ही हो गई थी और वो दो बच्चों का पिता भी है, पर हमारी तरफ़ उसका आकर्षण बना रहा. हमने उसे पत्र लिखने, फोन करने के लिए मना किया, तो वो हमें ही दोषी ठहराने लगा कि हमने उसकी भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया है.
भाभी, हम मानते हैं कि ग़लती हमारी भी थी, जो हमने उसको अपनी ओर आकर्षित होते देखकर भी ख़ुद सचेत होने की बजाय उसके आकर्षण में बह गए. हद तो यह है भाभी कि वो अब हमारे यहां भी फोन करने लगा है. हमने उसे फोन करने से मना किया, तो उल्टी-सीधी बातें करने लगा. अब तो हमारी हालत यह हो गई है कि अपने किए पर ग्लानि तो होती ही है, साथ ही यह डर भी लगा रहता है कि आशु और मम्मीजी को पता चलेगा तो क्या होगा? भाभी, हम तो शर्म से डूबकर मर ही जाएंगे. आशु इतने अच्छे हैं कि हमने उनके साथ ऐसा विश्वासघात किया, यह सोचकर ही हम बहुत शर्मिन्दगी महसूस करते हैं.
अब कल ही की बात है. तुषार का रात को फोन आया था. फिर वही रटी-रटाई बातें कह रहा था. इस पर हमने उसे बुरी तरह डांट दिया कि क्या तुमको ऐसी बातें करते शर्म नहीं आती? तुम्हारी बीवी है, बच्चे हैं, मैं भी एक बच्चे की मां हूं, क्या अब यह तुम्हें शोभा देता है? आगे फोन किया, तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा. इस पर वह बेशर्मी से बोला, "जरूर फोन करूंगा. एक बार नहीं, बार-बार करूंगा बोलो, क्या बिगाड़ लोगी मेरा?" यह तो गनीमत थी भाभी कि उस वक़्त तक ये ऑफिस से लौटे नहीं थे और मम्मीजी भी सो चुकी थीं. अब आप ही कोई रास्ता बताइए, हमें तो कुछ भी समझ में नहीं आ रहा." और फिर वह सिसक-सिसक कर रो पड़ी.
मैंने भी दुनिया देखी है, इतना लिखती-पढ़ती हूं, उसकी मनोव्यथा सुनकर समस्या का क्या निदान हो, यह सोचने लग गई. परेशान तो मैं भी हो उठी थी. नहीं चाहती थी कि कोई ऐसी घटना हो, जिससे दो परिवार उजड़ें. नीता तो रो-रो कर बेहाल हो रही थी और मैं असमंजस की स्थिति में थी. उसे दिलासा दिया कि कोई-न-कोई उपाय ज़रूर निकल आएगा. चूंकि ग़लती नीता की भी थी, अतः मामला ज़्यादा उलझ गया था.
अक्सर हम देखते हैं कि उम्र के उस नाजुक मोड़ पर जरा-सा भी पांव फिसला नहीं कि गर्त में धकेल देता है. पर उस समय अच्छे-बुरे की समझ किसे होती है? बड़े-बूढ़े कुछ दख़लअंदाज़ी करते हैं, तो उन्हें दक़ियानूसी या उम्र का फासला कहकर, अनजाने ही किशोर वर्ग ऐसी ग़लतियां कर बैठता है, जिसका नतीज़ा कभी-कभी बहुत भयावह हो सकता है.
नीता तो पूरी बात बताकर चली गई, पर मेरा मन बहुत असहज हो उठा. सोचती रही कि इस समस्या का क्या निराकरण हो? पर कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था. कहते हैं ना कि भगवान सारे दरवाज़े एक साथ बंद नहीं करता, एक-न-एक दरवाज़ा तो खुला छोड़ ही देता है. हर भूल को सुधारने के लिए रास्ता भी वही सुझाता है.
हुआ यूं कि ऑफिस के काम से आशु को छह-सात दिनों के लिए टूर पर जाना था. पर सिर्फ़ आशु के जाने से रास्ता निकल नहीं रहा था. इसी बीच खुदा के करम से अग्रवाल आंटी के सत्संग की स्त्रियां हरिद्वार जा रही थीं. आंटी की भी जाने की इच्छा थी, पर नीता अकेली रह जाएगी, यह सोचकर वह प्रोग्राम नहीं बना रही थीं. तब मौक़े का फ़ायदा उठाने के लिए मैंने आंटी को दिलासा दिया कि नीता की देखरेख मैं कर लूंगी. आंटी को मुझ पर पूरा विश्वास था, अतः उन्होंने निश्चिंत होकर प्रोग्राम बना लिया.

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आशु और आंटी के जाने के बाद रात को सोने के लिए मैं उसके घर जाने लगी. पहली रात शांति से गुज़री. तुषार का फोन आने पर क्या करना था, यह हमने पहले ही सोच लिया था. भगवान ने हमारी जल्दी ही सुन ली. दूसरी रात तुषार का फोन आया, तो नीता ने ही फोन उठाया. हालचाल पूछने के बाद कहा, "तुषार, मम्मीजी यानी मेरी सासूजी तुमसे कुछ बात करना चाहती हैं." इस पर वह हकलाते हुए बोला, "क्यों? आंटीजी को मुझसे क्या बात करनी है?" वह आगे कुछ बोल पाता, इससे पहले ही मैंने रिसीवर ले लिया. मेरी आवाज़ सुनते ही वह घबरा गया. मैंने कहा, "बेटा, मैं नीता की सास ही नहीं, उसकी मां भी हूं. और वह भी मेरी बहू नहीं, बेटी है. उसने तुम्हारे बारे में मुझे सब कुछ बता दिया है. अब ज़रा अपनी पत्नी को फोन देना, उसको भी तुम्हारी जलील हरकतों के बारे में बता दूं."
इस पर वह माफ़ी मांगने लगा, कहने लगा, "आंटी, मैं क़सम खाता हूं, आगे से नीता को परेशान नहीं करूंगा, मेरी पत्नी को पता चल गया, तो हंगामा खड़ा हो जाएगा. वैसे ही वह बहुत शक्की स्वभाव की है. मेरी गृहस्थी उजड़ जाएगी. प्लीज़ आंटी, ऐसा मत करना, प्लीज़." मैंने धमकाते हुए कहा, "आगे कभी तुमने नीता को तंग करने की कोशिश भी की, तो उसका अंजाम बहुत बुरा होगा." और मैंने फोन रख दिया.
नीता सारी बातें सुन रही थी. अपनी समस्या का यूं समाधान होते देख ख़ुशी के मारे रो पड़ी और मेरे गले लग गई. तब मैंने ही उसको प्यार से कहा, "पगली, दुख में भी रोती है और ख़ुशी में भी. जब तक ये तेरी बड़ी बहन कम भाभी तेरे साथ है, किसी दुख की छाया भी तुझ पर नहीं पड़ने दूंगी. अरे! यह तो अब ज़िंदगीभर तुमसे डरता रहेगा. ऐसे लोगों से निबटने का तरीक़ा आना चाहिए. ज़िंदगी में भूल किससे नहीं होती, पर अपनी भूल का एहसास समय रहते ही कर लो, तो नौबत यहां तक नहीं पहुंचती."
उस रात हम काफ़ी देर तक बातें करते रहे. नीता बार-बार मेरा शुक्रिया अदा कर रही थी. इतने दिनों के मानसिक तनाव के बाद अब वह काफ़ी सुकून का अनुभव कर रही थी. मम्मीजी और आशु के लौट आने के दिन क़रीब आ रहे थे. मुझे भी ख़ुशी थी कि समय पर ही सारी समस्याओं का अंत हो गया. इस घटना के बाद से नीता और मैं और क़रीब आ गए.
आज नीता दो प्यारे बच्चों की मां है. ख़ुशहाल गृहस्थ जीवन व्यतीत कर रही है. नीता की सुखी गृहस्थी देखकर संतोष होता है. कभी-कभी विचार आता है कि न जाने ऐसे कितने तुषार पैदा होते रहेंगे, जिनके चंगुल में नीता जैसी भोली-भाली बालिकाएं फंस जाती हैं. ऐसी स्थिति में यह फ़र्ज़ है हम बड़ों का कि अपने बच्चों का सही मार्गदर्शन करें. जीवन की ऊंच-नीच समझाएं, रिश्तों के नैतिक मूल्यों का बोध कराएं.
मेरी बेटी भी बड़ी हो रही है और मैं काफ़ी सचेत रहती हूं. मेरी टोकाटाकी की आदत से कभी-कभी वह कह उठती है, "जेनरेशन गैप मम्मी, जेनरेशन गैप." पर जीवन के अनुभवों से जो दिखा है, वही संस्कार अपनी बेटी में डालने की कोशिश करती हूं. चाहती हूं कि उसे सही दिशा, ज्ञान और सही मार्गदर्शन मिले, ताकि वह जीवन के मूल्यों का सही विश्लेषण कर सके और वही आगे आनेवाली पीढ़ी को भी विरासत में दे सके.

- श्रीमती विभा गोयल

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