कहानी- विरोध प्रदर्शन (Shor...

कहानी- विरोध प्रदर्शन (Short Story- Virodh Pradarshan)

कोई प्रयास, कोई संघर्ष काम न आया. वे किसके विरुद्ध प्रदर्शन करें?
उस डॉक्टर के विरुद्ध, जिसने केस बिगड़ जाने पर रीवा ले जाने की सलाह दी? प्रशासन के विरुद्ध, जिसने समय सीमा में सड़क निर्माण नहीं कराया? फरार ट्रक चालक के विरुद्ध, जो शायद कभी भी न पकड़ा जाए? प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध, जिन्होंने विरोध प्रदर्शन का ग़लत तरीक़ा चुना?

Short Story

कहा नहीं जा सकता कि चौराहे पर लगा जाम कब तक खुलेगा. चौराहे से सीधे जानेवाली सड़क पड़ोसी जिला रीवा और बाईं ओर जानेवाली सड़क निकटवर्ती तहसील मैहर को जोड़ती है. चौराहे पर लगे जाम के कारण रीवा और मैहर का मार्ग अवरुद्ध हो गया है.
भारी यातायात को ध्यान में रखते हुए विरोध प्रदर्शन इसी चौराहे पर किया जाता है कि यातायात सुचारु करने की गरज से सरकारी विभाग जल्दी ध्यान देगा.
यहां काफ़ी दिनों से सड़क चौड़ीकरण का काम हो रहा है. मार्क के एक ओर खाईं और खुदाई कर दी गई है. दूसरी ओर ढोके, सोलिंग, गिट्टी के ढेर लगे हैं. कभी चौमास का बहाना, कभी मटेरियल का टोटा, कभी नौ दिन चले अढ़ाई कोस जैसी शासकीय सुस्ती के चलते कयास नहीं बन रहा है कि चौड़ीकरण पूर्णता को कब प्राप्त होगा.
अधूरे निर्माण के कारण मार्ग पहले से अधिक असुविधाजनक हो गया है. सड़क दुर्घटना के मामले बढ़ते जा रहे हैं. दुर्घटनाग्रस्त हो अब तक कितने लोग चोटिल हुए, कहना कठिन है. जबकि चार लोग प्राण गंवा चुके हैं, जिनमें दो तो नवविवाहित थे. बाइक पर सवार नवविवाहित जोड़ों को ओवर लोडेड ट्रक ने यूं चपेट में लिया कि उनके अस्थि-पंजर अलग हो गए.
उनके क्षत-विक्षत शवों को चौराहे पर रखकर शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन.
देखते-देखते ऐसा विकट हो गया कि चारों ओर वाहन ही वाहन नज़र आ रहे हैं. सड़क चौड़ीकरण का काम तत्काल प्रभाव से पूरा हो और फरार ट्रक चालक पकड़ा जाए- जैसी मांग को लेकर नवविवाहित जोड़े के परिजन,
प्रदर्शनकारी, विपक्षी राजनीतिक दल, शवों को चौराहे पर रखकर धरना प्रदर्शन कर रहे हैं.
ठीक चौराहे पर रखे स़फेद चादरों से ढंके शवों को हर कोई एक नज़र देख लेना चाहता है. घटना जानने-सुनने के उपक्रम में पैदल, साइकिल सवार, बाइक, कारवाले रुककर भीड़ का हिस्सा बनते गए.
चार पहिया वाहन चारों दिशाओं से आते गए और स्थिति जो बन गई, उसे चक्का जाम कहा जा सकता है.
ध्वनि विस्तारक यंत्र से कुछ कहा जा रहा है, जिस पर लोग ध्यान नहीं दे रहे हैं. जाम में काफ़ी देर से यह टैक्सी फंसी हुई है.
माहौल भांपता टैक्सी चालक अपनी सीट पर बैठा है. उसके बगल की सीट पर सोमनाथ है. पीछे की सीट पर सोमनाथ का पीलिया रोग से पीड़ित दस वर्ष का पुत्र गुड्डू अपनी मां की गोद में सिर रखकर लेटा हुआ है. सोमनाथ कभी जाम को देखते हैं, कभी शिथिल गुड्डू को.
गुड्डू ने पूछा, “पापा, हम रीवा हॉस्पिटल कब पहुंचेंगे?”
सोमनाथ ने फिर यही उत्तर दिया, “बस बेटा, पहुंचनेवाले हैं.”
वाहनों की चिंघाड़ से चौराहा दहल रहा है. वाहनों के गंधाते तीक्ष्ण धुएं… दोपहर की चिलचिलाती धूप से लोगों के कपोल, कनपटी, कमीज़ें पसीने से भीग रही हैं. ट्रकों-ट्रैक्सियों के चालक बीड़ी-सिगरेट सुलगाकर अपने साथ दूसरों का भी स्वास्थ्य चौपट कर रहे हैं. स्कूलों की छुट्टी हुई है. अस्पताल में भर्ती पिता के लिए दवाइयां ले जा रहा युवक कार का हॉर्न बजाकर व्यग्रता दिखा रहा है. अपनी बेटी को लड़केवालों को दिखाने के लिए दूसरे शहर जा रहा एक परिवार वाहन में असहाय बैठा है. ये लोग व़क्त पर रेलवे स्टेशन नहीं पहुंचेंगे, तो ट्रेन छूट जाएगी. ट्रैफिक पुलिस के जवान डंडा ठोककर भीड़ और वाहनों के निकलने लायक जगह बनाना चाहते हैं, पर जानते हैं नहीं बना पाएंगे.

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गुड्डू, “पापा, हॉस्पिटल कब पहुंचेंगे?”
सोमनाथ ने फिर यही उत्तर दिया, “बस बेटा, पहुंचनेवाले हैं.”
देवेन्द्रनगर तहसील में गुड्डू का उपचार चल रहा था. स्थिति बिगड़ने पर डॉक्टर ने रीवा मेडिकल कॉलेज के लिए रेफर कर दिया. मामूली हैसियतवाले सोमनाथ कुछ हज़ार में पत्नी मंगला के आभूषण गिरवी रख टैक्सी से इकलौते पुत्र गुड्डू को लेकर रीवा के लिए चल दिए. देवेन्द्रनगर से रीवा जाने के लिए इस शहर के चौराहे से गुज़रना होगा. जाम देखकर सोमनाथ के होश गुम होने को हैं.
मंगला से कहते हैं, “वो डॉक्टर पहले ही कह देता रीवा ले जाओ, तो गुड्डू अब तक ठीक हो जाता, लेकिन डॉक्टर की फीस मारी जाती न. ये लोग मानव सेवा नहीं कर रहे हैं. मानव को लूट रहे हैं. चिकित्सा न हुई, महाजनी हो गई.”
मंगला इतनी निराश है कि उसके चेहरे पर कातरता स्पष्ट दिख रही है, “जी घबरा रहा है, कुछ करो.”
“क्या करूं? कहो तो उस बिजली के खंभे पर अपना सिर पटक दूं.”
कहकर सोमनाथ कार से उतर गए.
कुछ जानकारी मिलने की उम्मीद में कई बार कार से उतरकर भीड़ के पास जा चुके हैं. उन्होंने लोगों को कहते सुना, “ट्रकवाला तो भाग गया. जाम लगाकर लोगों की दिक़्क़त बढ़ाने से नहीं पकड़ा जाएगा.”
“युद्धस्तर पर विरोध न करो, तो शासन-प्रशासन नहीं सुनता.”
“कर्फ़्यू, जाम, बंद, हड़ताल से समस्याएं हल नहीं होतीं. आप लोग देखोगे, अफ़सर और पुलिसवाले आश्‍वासन देंगे कि सड़क जल्दी से जल्दी बनेगी, ट्रक चालक पकड़ा जाएगा, उसे सख़्त सज़ा मिलेगी. लोग थोड़ी-बहुत बहस कर धरना ख़त्म कर देंगे. फिर कोई ध्यान न देगा आश्‍वासन को अमली जामा पहनाया जा रहा है या नहीं.”
“ठीक कहते हैं. धरना और जाम से होता कुछ नहीं है, लेकिन आजकल जिसे देखो वह जाम, धरना, हड़ताल, घेराव में लगा है. इसी तरह कुछ लोग राजनीति में घुसने के मौ़के बना लेते हैं.”
एक युवक ख़फा हो गया, “ग़ज़ब करते हैं आप. हम लोग राजनीति में घुसने के लिए टनों पसीना बहा रहे हैं? प्रजातंत्र है. हमें अपनी मांग रखने का अधिकार है.”
“मांग रखने का एक तरीक़ा होता है.”
“तरीक़ा बता दीजिए. रोज़ चोरी, डकैती, मर्डर, रेप, एक्सीडेंट हो रहे हैं. नगर निगम सो रहा है. नेता सुनते नहीं. कलेक्टर को दौरे से फुर्सत नहीं. आवाज़ तो उठानी पड़ेगी.”
“लाशें क्यों ख़राब कर रहे हैं? क्रियाकर्म करें. बेचारों को मुक्ति मिले.”
कुछ लोग बोल नहीं रहे हैं, सुन रहे हैं. जिसकी बात सुनते हैं, इन्हें वही बात उचित लगने लगती है.
सोमनाथ जानते हैं लोग उन्हें गंभीरता से नहीं लेंगे, लेकिन व्यथा बताने लगे, “मेरा बच्चा बहुत बीमार है. जल्दी से जल्दी उसे रीवा मेडिकल में भर्ती कराना है. बताइए क्या करूं? इस तरह का धरना क्या व्यावहारिक है? न जाने कौन, कैसे ज़रूरी काम से जा रहा होगा..?”
कुछ लोगों ने उन्हें देखा ज़रूर, लेकिन विस्तृत ब्योरा किसी ने नहीं पूछा. सोमनाथ वापस कार में बैठ गए.
गुड्डू ने फिर कहा, “पापा, रीवा चलो. मुझे अच्छा नहीं लग रहा है.”
“थोड़ी देर और. तुम बहादुर बच्चे हो. पानी पीयोगे?”
“नहीं, उल्टी आती है.”
मंगला गुड्डू के बाल सहलाने लगी.
“बच्चे का छोटा-सा मुंह हो गया है. देह में मांस-कपास नहीं बचा. डॉक्टर ने गरम दवाइयों और इंजेक्शन से यह हालत कर दी है.”
सोमनाथ ने आपत्ति की, “अच्छी बात करो मंगला. गुड्डू का दिल बहले.”
मंगला का कंठ भरा है, “मुझसे न होगा.”
सोमनाथ ने गुड्डू को पुचकारा, “याद है गुड्डू, हम लोग एक बार पहले भी जाम में फंस चुके थे. संकरी पुलिया में दो ट्रक आपस में टकराकर इस तरह तिरछे हो गए थे कि रास्ता जाम हो गया था. हम लोग बस में थे. बहुत से लोगों के साथ तुम भी बस से उतर गए थे. झाड़ियों से जंगली फूल तोड़े थे, महुआ बीना था. याद है?”
“हां पापा, मैं बीमार न होता, तो वह जो दुकान दिख रही है, हम लोग वहां बैठकर समोसे खाते.”
“अच्छे हो जाओ, तो ख़ूब सारे समोसे खिलाऊंगा.”
“पढ़ाई भी बहुत करूंगा. बहुत कोर्स हो गया होगा.”
सोमनाथ द्रवित हो गए. अच्छा है कि बच्चे आशावादी और स्वप्नदृष्टा होते हैं, इसलिए गुड्डू जाम की गंभीरता को उस तरह नहीं समझ पा रहा है, जिस तरह वे बेचैन हैं.
“कुछ करो.” मंगला जानती है सोमनाथ कुछ नहीं कर सकते, पर कहे बिना वह रह नहीं पा रही है.
सोमनाथ ने कई रातों से जागी, उनींदी, कुम्हलाई मंगला की हथेली थपकी. वे लाचार मां को यही सांत्वना दे सकते हैं.
“देखता हूं.”
कार से उतरकर उन्होंने दूर तक नज़र डाली. आड़े-तिरछे खड़े वाहन और वाहन.
कौन कहता है भारत गरीबों का देश है? कितने अधिक वाहन हैं इस देश में. जैसे ऑटोमोबाइल के बिना लोग ज़िंदा नहीं रहेंगे!

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उन्हें याद आया चतुर्थ और तृतीय श्रेणी कर्मचारियों के साथ एक-दो बार उन्होंने भी धरना प्रदर्शन में भाग लिया था. कुछ समय के लिए जाम लग गया था. नहीं सोचते थे जाम ऐसा अवरोध होता है, जो गतिशीलता को ख़त्म कर देता है. मनुष्य के मस्तिष्क को सुन्न कर हाथ-पैर को जकड़ देता है.
लोग कह रहे हैं, “नगर निरीक्षक, नगर पुलिस अधीक्षक, एस.डी.एम. आ गए हैं. बात चल रही है, लेकिन ट्रैफिक क्लियर होने में घंटा-दो घंटा लग जाएगा.”
वे मानो दीवाने की तरह भीड़ को चीरते हुए चौराहे की ओर बढ़ने लगे. जैसे सत्यापित करना चाहते हैं बात सचमुच चल रही है.
उन्हें ढूंढ़ता हुआ टैक्सी ड्राइवर आ पहुंचा. “साहब, बच्चे की तबीयत बिगड़ रही है.”
सोमनाथ बदहवासी में कार तक पहुंचे. अनियमित सांसों के बीच गुड्डू छटपटा रहा था. सब कुछ ख़त्म करने के लिए कुछ क्षण बहुत होते हैं. गुड्डू की गर्दन एक ओर तिरछी हो गई.
दुलारे पुत्र की बीच मार्ग में हुई खानाबदोश मृत्यु पर उनका कलेजा फटने लगा. चीखना चाहते थे, चीख न पाए. अलबत्ता चीख मारकर मंगला बेहोश हो गई.
सोमनाथ कभी मृत पुत्र को देखते, तो कभी बेहोश पत्नी को. यह बच्चा तो जीवन और मृत्यु का अर्थ ठीक से नहीं जानता था. तीन साल पहले इसकी दादी का स्वर्गवास हुआ था.
यह पूछ रहा था, ‘पापा, दादी कब तक मरी रहेंगी? ज़िंदा कब होंगी?’
वो मासूम नहीं जानता था कि मरनेवाले फिर ज़िंदा नहीं होते.
बेचारा… कोई प्रयास, कोई संघर्ष काम न आया. वे किसके विरुद्ध प्रदर्शन करें?
उस डॉक्टर के विरुद्ध, जिसने केस बिगड़ जाने पर रीवा ले जाने की सलाह दी? प्रशासन के विरुद्ध, जिसने समय सीमा में सड़क निर्माण नहीं कराया? फरार ट्रक चालक के विरुद्ध, जो शायद कभी भी न पकड़ा जाए? प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध, जिन्होंने विरोध प्रदर्शन का ग़लत तरीक़ा चुना?
वे मृत पुत्र को देखते हैं. बेहोश पत्नी को देखते हैं. फिर जाम को देखते हैं. उन्हें लग रहा था एक ओवरलोडेड ट्रक अभी-अभी उनके ऊपर से गुज़री है और वे सूर्य की आंच से पिघल रही सड़क में रेशा-रेशा छितरा गए हैं.

सुषमा मुनीन्द्र

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