कहानी- धुंधलका 4 (Story Ser...

कहानी- धुंधलका 4 (Story Series- Dhundhlka 4)

इस व़क़्त तो मुझे ख़ुश होना चाहिए था कि अपर्णा राज़दान की देह मेरी मुट्ठी में थी. उसके जिस्म की सीढ़ियां चढ़कर जीत हासिल की थी. ये मेरे ही शब्द थे शुरू-शुरू में. पर नहीं, कुछ नहीं था ऐसा. अपर्णा बिल्कुल भी वैसी नहीं थी, जैसा उसके बारे में कहा जाता था. यह रिश्ता तो मन से जुड़ गया था.

सूरज उसकी आंखों में उतर आया और उसने आंखें बंद कर लीं. जैसे एक मोती को प्यार करना चाहिए वैसे ही किया था मैंने. धीरे-धीरे झील-सी शांत हो गयी थी वह. बिजली फिर से लौट गयी थी, पर मैं जानता था कि वह अब इधर-उधर इतराती रहेगी, कैद नहीं रह सकती. वह देखती रही मुझे और मैं उसे.

इस व़क़्त तो मुझे ख़ुश होना चाहिए था कि अपर्णा राज़दान की देह मेरी मुट्ठी में थी. उसके जिस्म की सीढ़ियां चढ़कर जीत हासिल की थी. ये मेरे ही शब्द थे शुरू-शुरू में. पर नहीं, कुछ नहीं था ऐसा. अपर्णा बिल्कुल भी वैसी नहीं थी, जैसा उसके बारे में कहा जाता था. यह रिश्ता तो मन से जुड़ गया था.

अपर्णा ने धीरे से कहा, “अब तक तो खुले आसमान के नीचे रहकर भी उम्रकैद भुगत रही थी मैं. सारी ख़ुशियां, सारी इच्छाएं इतने सालों से पता नहीं देह के किस कोने में क़ैद थीं. तुम्हारा ही इंतज़ार था शायद.”

और यही अपर्णा, जिसने मुझे सिखाया कि दोस्ती के बीजों की परवरिश कैसे की जाती है, वह जा रही थी. उसी ने कहा था, इस परवरिश से मज़बूत पेड़ भी बनते हैं और महकती नर्म नाज़ुक बेल भी.

“तो तुम्हारी इस परवरिश ने पेड़ पैदा किया या फूलों की बेल?” पूछा था मैंने.

यही अपर्णा जो मेरे व़क़्त के हर लम्हे में है, अब नहीं होगी मेरे पास. उसके पास आकर मैंने मन को तृप्त होते देखा है- मर्द के मन को. देह कैसे आज़ाद होती है जाना. पता चला कि मर्द कितना और कहां-कहां ग़लत होता है. मुझे चुप-चुप देखकर नवनीता ने ही एक दिन कहा था, “उससे क्यों कट रहे हो सौरभ? उसे क्यों दुख पहुंचा रहे हो. इतने सालों बाद उसे ख़ुश देखा तुम्हारी वजह से. उसे फिर दुखी न करो.” दोस्ती का बरगद बनकर मैं बाहर आ गया अपने खोल से.

मैंने उसका पासपोर्ट, वीज़ा बनवाने में मदद की. मकान-सामान बेचने में उसका हाथ बंटाया. ढेरों और काम थे, जो उसे समझ नहीं आ रहे थे कि कैसे होंगे. मुझे खुद को अच्छा लगने लगा. वह भी ख़ुश थी शायद.

उस शाम हम बाहर धूप में बैठे थे. कोयल इधर-उधर घूमती पैकिंग वगैरह में व्यस्त थी.

अपर्णा चाय बनाने अंदर चली गयी. बाहर आई तो वह एक पल मेरी आंखों में बस गया. दोनों हाथों में चाय पकड़े, खुले बाल, नीली जीन्स, स्वैटर में वह बिल्कुल उदास मासूम बच्ची लग रही थी, पर साथ ही ख़ूबसूरत भी.

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“बहुत याद आओगे तुम.” चाय थमाते हुए वह बोली थी. मैं मुस्कुरा दिया. वह भी. कई दिन से उसकी खिलखिलाहट नहीं सुनी थी. अच्छा नहीं लग रहा था. क्या करूं कि वह हंस दे? चाय पीते-पीते धूप की गर्माहट कुछ कम होने लगी थी शायद, इसलिए ज़मीन पर उतर रही थी….

“चलो अपर्णा एक छोटी-सी ड्राइव पर चलते हैं.”

“चलो.” वह एकदम खिल गयी. अच्छा लगा मुझे.

“कोयल चलो, घूमने चलें,” मैंने बुलाया उसे.

“नहीं अंकल, आप दोनों जाएं, मुझे ढेरों काम हैं और रात को हम इकट्ठे डिनर पर जा रहे हैं. याद है न आपको?”

“अच्छी तरह याद है.” मैंने देखा था कि वह हम दोनों को कैसे देखती रही थी. एक बेबसी-सी थी उसके चेहरे पर. थोड़ा आगे जाने पर मैंने अपर्णा का हाथ अपने हाथ में लिया तो वह लिपट कर रो ही पड़ी. मैंने गाड़ी रोक दी. “क्या हो गया अपर्णा?” उसके आंसू रुक ही नहीं रहे थे.

“मुझे लगा कि तुम अब अच्छे-से नहीं मिलोगे, ऐसे ही चले जाओगे. नाराज़ जो हो गए थे, ऐसा लगा मुझे.”

“तुमसे नाराज़ हो सकता हूं मैं कभी? मैं क्या, तुमसे तो कोई भी नाराज़ नहीं हो सकता. हां, उदास ज़रूर होंगे सभी. ज़रा जाकर तो देखो द़फ़्तर में, बेचारे मारे-मारे फिर रहे हैं.” वह मुस्कुरा दी.

“अब अच्छा लग रहा है रोने के बाद?” मैंने मज़ाक में कहा तो हंस दी. शाम की धूप खिली हो जैसे. अपर्णा मुझे आज धूप की तरह लग रही है.

“अपर्णा तुम ऐसे ही हंसती रहना, बिल्कुल सब कुछ भुलाकर, समझीं?” उसने एक बच्ची की तरह हां में सिर हिलाया.

“और तुम? तुम क्या करोगे?”

“मैं तुम्हें अपने पास तलाश करता रहूंगा. कभी मिल गईं तो बातें करूंगा तुमसे. वैसे तुम कहीं भी चली जाओ, रहोगी मेरे पास ही.”

“और क्या करोगे?”

“और परवरिश करता रहूंगा उन रिश्तों की, जिनकी जड़ें हम दोनों के दिलों में हैं.”

वह चुप रही. मैं भी. मेरा प्यार, जो पिछले कई दिन से रात की रौशनी में किसी छाया-सा लरज रहा था. अब स्थिर लग रहा था मुझे. मैंने अपर्णा से कहा भी, “जानती हो, तुम्हारे जाने के ख़याल से ही डर गया था. रोकना चाहता था तुम्हें. इतने दिनों घुटता रहा, पर अब… अब सब ठीक लग रहा है…”

अपर्णा ने कार रोकने के लिए कहा. फिर बोली, “हर रिश्ते की अपनी जगह होती है. अपनी क़ीमत. जो तुम्हें पहले लगा वह भी ठीक था, जो अब लग रहा है वह भी ठीक है. पर एक बात याद रखना कि इस प्यार की बेचैनी कभी ख़त्म नहीं होनी चाहिए. मुझे पाने की चाह बनी रहनी चाहिए तुम्हारे दिल में… क्या पता अपर्णा कब आ टपके तुम्हारे चैम्बर में…. कभी भी आ सकती हूं मैं अपना हिसाब-किताब करने….”

और वह खिलखिलाकर हंस दी.

– अनिता सभरवाल

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