कहानी- मन्नत के सिक्के 3 (Story Series- Mannat ke sikke 3)

“अनु, अब परेशान होने से क्या होगा? ऐसा करो इंटरनेट पर सर्च करके देखो, शायद कोई सोल्यूशन हो और नहीं तो फिर डॉक्टर के पास चली जाना…” माला फेरती दमयंतीजी और अमृता दोनों के कान खड़े हुए, पर इन सब से बेपरवाह पलक इत्मिनान से बतिया रही थी, “अनु, तू भी पागल है. अब ऐसा कर ऊपरवाले पर छोड़ दे… और अगले महीने का इंतज़ार कर, फिर मुझे बताना, क्या रिज़ल्ट आया…”

दूसरे दिन पलक उनसे मिलने होटल में आई. आज वे सब देहरादून दर्शन को निकले थे. देहरादून घूमती अम्मा रह-रहकर पलक को देखतीं. ऊटपटांग बेशर्मीभरी बातों से लबरेज़ उसका लड़कपन कहीं गायब हो गया था. कितना बदल गई थी पलक… भारत सरकार की ज़िम्मेदार सैनिक की गंभीरता उसके व्यक्तित्व से झलकने लगी थी. सिविल कपड़ों में भी वह ऑफिसर पलक सिसौदिया नज़र आती.
“सुन, तू तो यहां आकर बिल्कुल बदल ही गई. अब हमारे साथ अलवर चल, अपने अफ़सर को बोलकर छुट्टियां ले ले.” दमयंतीजी के कहने पर पलक हंसते हुए बोली, “दादी, ये स्कूल थोड़े है, जो कभी भी छुट्टी मांग लूं. अब पंद्रह दिन बाद आऊंगी अपने बर्थडेवाले दिन… फिर एक हफ़्ते रुकूंगी.” सुनकर दमयंतीजी चुप हो गईं. फिर दोबारा कोशिश करती हुई बोलीं, “चल ना… अपनी उस सहेली से मिल लियो.. अरे, हां-हां वही अनुदिता. अरे, तेरी वही मुई सहेली, जो निरोध नहीं लेती थी. उसका क्या हुआ… कोई ख़बर है? पेट से है या बच गई…”
“क्यों…?” पुरानी चुलबुली-बिंदास पलक को पाने की लालसा में दादी ने उसे छेड़ने का उपक्रम किया, तो वह ठठाकर हंस पड़ी, “मम्मी, दादी को क्या हुआ है, सब यूं खुल्लम-खुल्ला बोल रही हैं. थोड़ी तो शर्म कर दादी…” यह सुनकर मुस्कुराती दमयंतीजी बांहें फैलाकर, ‘आ मेरी लाडो.’ कहकर उसे सीने से लगा बैठीं. यह दृश्य अमृता और साकेत के लिए अद्भुत था.

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यह दृश्य इस जनम में देखने को मिलेगा, इसकी उम्मीद तो लगभग छोड़ ही दी थी उन्होंने. अमृता कभी अपनी सास को देखती, तो कभी बेटी को… दोनों में कितना परिवर्तन, जैसे यकायक ही दोनों शांत और परिपक्व हो गई हों. एक-दूसरे को समझने लगी हों.
अमृता की आंखों के सामने चार साल पहले की दमयंतीजी और पलक घूम गई. पटर-पटर दादी को जवाब देती पलक और उसे झिड़कती-चिढ़ती उसकी दादी… अनगिनत क़िस्सों के बीच ना भूलनेवाला वो अनुदितावाला प्रसंग आंखों के सामने घूम गया. जब बैठक में बैठी दमयंतीजी माला फेर रही थीं और पलक वहीं बैठी अपनी सहेली अनुदिता से फोन पर बतिया रही थी.
ही-ही करती पलक बेशर्मी से कह रही थी, “अनु, अब परेशान होने से क्या होगा? ऐसा करो इंटरनेट पर सर्च करके देखो, शायद कोई सोल्यूशन हो और नहीं तो फिर डॉक्टर के पास चली जाना…” माला फेरती दमयंतीजी और अमृता दोनों के कान खड़े हुए, पर इन सब से बेपरवाह पलक इत्मिनान से बतिया रही थी, “अनु, तू भी पागल है. अब ऐसा कर ऊपरवाले पर छोड़ दे… और अगले महीने का इंतज़ार कर, फिर मुझे बताना, क्या रिज़ल्ट आया…” अपनी दादी की घूरती आंखों को देख पलक ने, ‘बाद में बात करती हूं.’ कहते हुए फोन रख दिया.

         मीनू त्रिपाठी

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