कहानी- मनवा लागे 5 (Story S...

कहानी- मनवा लागे 5 (Story Series- Manwa Laage 5)

“नहीं, ऐसा तो मैं सोच भी नहीं सकती. भगवान करे आप दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति करें. मां की जासूसी में चोरी-चोरी आपकी कहानियां पढ़ते-पढ़ते मैं तो ख़ुद आपकी लेखनी की कायल हो गई हूं. मां की तरह मेरा भी इन सबमें ख़ूब मन लगने लगा है. आप लेखकों के पास मनोविज्ञान का जादू होता है. किसी के भी मन में कैसा भी मनोभाव आप कभी भी जगा सकते हैं. अपनी जादू की छड़ी यानी लेखनी से आप यदि किसी की भावनाओं को उद्वेलित कर सकते हैं, तो मैं समझती हूं. उन्हें सुखद सकारात्मक मोड़ भी दे सकते हैं. कैसे करना है यह आप मुझसे बेहतर निश्‍चित कर सकते हैं.”
शिव निरुत्तर खड़े रह गए थे. उस एक ही पल ने उनकी लेखनी को अपनी दिशा बदलने के लिए मजबूर कर दिया था.

“आप मेरा नाम कैसे जानती हैं?”
प्रत्युत्तर में टिया ने सवाल उछाल दिया था, “आपको विभा याद है?”
मानो एक विस्फोट हुआ हो. शिव गौर से टिया को देखने लगे. अब उन्हें उसमें विभा का प्रतिरूप स्पष्ट नज़र आने लगा था. अपने प्रथम और अंतिम प्यार से इस प्रतिरूप में मिलना होगा, इसकी तो उन्होंने कभी कल्पना ही नहीं की थी. लड़खड़ाते शरीर को संभाला, तो ज़ुबान लड़खड़ा गई.
“त… तुम विभा की बेटी हो?”
“आपने ठीक पहचाना. मेरे पापा इंजीनियर हैं. टेक्नोलॉजी से जुड़े उस इंसान का साहित्य से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है. लेकिन साहित्यिक अभिरुचि रखनेवाली मेरी मां से वे बहुत प्यार करते हैं. तीन प्राणियों का हमारा ख़ुशहाल परिवार स्थिर पानी की तरह शांत है, पर आपकी कहानियां कंकड़ की तरह गिरकर उस स्थिर पानी में जब-तब हलचल पैदा कर देती हैं. हलचल क्या पैदा करती हैं, हम सबको हिला डालती हैं.”
“मतलब?”
“मैं अपनी मां को उनसे भी ज़्यादा अच्छी तरह समझती हूं. हालांकि उन्होंने मुझे आपके बारे में ज़्यादा कुछ नहीं बताया है. पर आपकी कहानियों के लिए उनकी आतुरता, पढ़ते वक़्त उनके चेहरे पर आते उतार-चढ़ाव, रक्तिम होता चेहरा, उस पूरे दिन चेहरे पर छाई लजीली-सी मुस्कुराहट चुगली कर देती है कि आप दोनों के बीच कुछ तो था. उ़द्वेग और उत्तेजना की ये उठती-गिरती लहरें भविष्य में कोई तूफ़ान न ला दें, इसलिए मैं आपसे विनती…”
“मैं आपकी मां से कभी नहीं मिलूंगा, वादा करता हूं.”
“पर आप अभी भी तो बिना मिले ही अपनी लेखनी से हमारी ज़िंदगी में हलचल मचाए हुए हैं.”
“तो आप क्या चाहती हैं मैं लिखना बंद कर दूं.”
“नहीं, ऐसा तो मैं सोच भी नहीं सकती. भगवान करे आप दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति करें. मां की जासूसी में चोरी-चोरी आपकी कहानियां पढ़ते-पढ़ते मैं तो ख़ुद आपकी लेखनी की कायल हो गई हूं. मां की तरह मेरा भी इन सबमें ख़ूब मन लगने लगा है. आप लेखकों के पास मनोविज्ञान का जादू होता है. किसी के भी मन में कैसा भी मनोभाव आप कभी भी जगा सकते हैं. अपनी जादू की छड़ी यानी लेखनी से आप यदि किसी की भावनाओं को उद्वेलित कर सकते हैं, तो मैं समझती हूं. उन्हें सुखद सकारात्मक मोड़ भी दे सकते हैं. कैसे करना है यह आप मुझसे बेहतर निश्‍चित कर सकते हैं.”

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शिव निरुत्तर खड़े रह गए थे. उस एक ही पल ने उनकी लेखनी को अपनी दिशा बदलने के लिए मजबूर कर दिया था. अभी तक प्यार पाने के लिए लिख रहे थे. अब उसी प्यार को खोने के लिए कुछ लिखना होगा. उनके मौन को सहमति मानते हुए टिया ने ख़ुशी-ख़ुशी उन्हें धन्यवाद दिया था.
“शुक्रिया स्वरूप मैं आपको एक आख़िरी बार मां से मिलवाने का वादा करती हूं.”
टिया ने अपना वादा निभाया, लेकिन ख़ुद शिव को अपने क़दम डगमगाने का भय था, इसलिए उन्होंने पहले ही अपने क़दम पीछे खींच लेना उचित समझा.
विभा आज भी उतने ही चाव से एस. दीपक की कहानियां पढ़ती है और आश्‍चर्य, टिया का मन भी इसमें रमने लगा है. बस, लेखक के प्रति दोनों के भाव बदल गए हैं. विभा अब ख़ुद को उनकी प्रेमिका नहीं प्रशंसिका के रूप में देखती है और टिया… उसके दिल में अब उनके प्रति नफ़रत नहीं, कृतज्ञता और सम्मान है.

    संगीता माथुर

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