कहानी- प्रीत के रंग हज़ार 3 ...

कहानी- प्रीत के रंग हज़ार 3 (Story Series- Preet Ke Rang Hazar 3)

वेद की परिणीता बनने के लिए मुझे मंगलसूत्र और सिंदूर की कोई आवश्यकता नहीं थी. कितना अपार था उसका प्रेम. शब्दों में तो उसे कभी बांध ही नहीं पाई, फिर जीवन में उसे कहां और कैसे बांध पाती?

रेस्टॉरेंट से निकलने के बाद श्‍लोक का हाथ थामे रेस्टॉरेंट के अहाते में फव्वारे के पास बने पत्थर के चबूतरे पर जाकर बैठ गई और अपने और वेद के बीच के रिश्ते की सारी सच्चाई उसे बता गई. किस तरह अपने मम्मी-पापा को एक साथ खोकर इस पराए देश में उसका अकेला होना. जीने की सारी इच्छाओं का मृतवत हो जाना. वेद के प्यार का सावन बनकर बरस कर उसके जीवन के ताप को हरना. अंधेरी रातों में आकाशदीप बनकर उसके पथ का प्रदर्शन कर सुगम बनाना आदि.

“आंतरिक पलों में कभी कमज़ोर पड़कर उसने अपने संपूर्ण अस्तित्व को वेद में समा देना चाहा, तो अपनी सारी ममता उड़ेेलकर वह उसे सहला दिया करता था. वेद तो सधा हुआ योगी था, जिसमें धरती जैसा धैर्य और आकाश जैसा विस्तार था. कहीं से कोई कलुषता नहीं. उसके इसी ऋषि-मुनी तपस्वी जैसी एकाग्रता ने ही तो उसे बांध रखा था. मेरे जीवन की देहरी पर देव का उतरना मानो सपनों के सावन का ठहर जाना था. सांसों में जैसे ख़ुशबू का मौसम ही समा गया हो. दिन तितलियां बनकर उड़ते थे. मैं बावरी बनी इतरा उठी थी अपने सुख-सौभाग्य पर. किसे भूलती है वो पहली दस्तक! वो पहली आहट. वो पहला प्यार, जो शीत की स्याह रातों में मिला हो. बिखरी प्रीत की केसर गंध को भूल पाना कहीं से भी आसान नहीं होता है श्‍लोक.

जानते हो श्‍लोक! जीवन की गहनतम घटनाएं किसी अनजान क्षण में हो जाती हैं. घोर पीड़ा की शुरुआत सदा रहस्यपूर्ण होती है, पर उसकी अनुभूति स्पष्ट होती है. उसका अंकुर कब, कहां, कैसे फूटता है पता नहीं चलता, क्योंकि इसके लिए परिस्थितियां हमें चौकन्ना होने नहीं देतीं. ऐसे तो दुख तमाम जीवनदायिनी शक्तियों का केंद्र है. जीवन में यह नहीं हो, तो जीवन के औचित्य पर ही प्रश्‍न खड़ा हो जाए. यही दुख जीवन से विमुख करनेवाली तमाम शक्तियों का भी मूल कारण है. जीवन में केंद्र से परिधि और परिधि से केंद्र की ओर व्याप्त सभी शक्तियां दुख के अनंत सागर में चक्कर लगाती-सी दिखती हैं और हम सभी इसी व्यूह में फंसे हुए हैं.

ये तो सभी जानते हैं कि दुख सबको मांजता है. कहते हैं, जब दुख से भर जाओ, तो अपने दिल की गहराइयों में उतरकर देखो, शायद उल्लास का कारण वही हो, जिसके लिए तुम रो रहे थे. वही उल्लास बनकर वेद मेरे जीवन में अवतरित हुआ. वेद की परिणीता बनने के लिए मुझे मंगलसूत्र और सिंदूर की कोई आवश्यकता नहीं थी. कितना अपार था उसका प्रेम. शब्दों में तो उसे कभी बांध ही नहीं पाई, फिर जीवन में उसे कहां और कैसे बांध पाती?

वेद जैसे व्यक्ति की आराधना की जाती है श्‍लोक! इन सच्चाइयों के साथ अगर मैं तुम्हें स्वीकृत हूं, तो ठीक है, वरना तुम मेरे सारे बंधनों से आज़ाद हो.” कहते हुए आज भी उसके जीवन में हर रिश्ते का पर्याय देव ही है. संशय की नींव पर खड़ी रिश्ते की यह इमारत उसे किसी भी हालत में स्वीकार नहीं कहते हुए अंतर की सारी वेदनाएं उसकी पलकों पर घनीभूत होकर बरसने ही वाली थीं कि झटके के साथ उठकर अपने दृढ़ क़दमों के साथ सड़क के किनारे की भीड़ में खो गई.

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उसे आज इस बात का बड़ा संतोष था कि श्‍लोक उसके जीवन के कटु, पर मधुर सत्य से अवगत हो चुका है, जिसे उसने कितनी बार हिम्मत करके उससे कहना चाहा था, लेकिन उसे खो देने के डर से कह नहीं पाई थी.

संत पैट्रिक चर्च में जाकर मोमबत्तियां जलाईं. आज के दिन की आख़िरी मंज़िल यही चर्च था, जहां डिनर के बाद श्‍लोक के साथ वह आनेवाली थी. हर दिन के भय के सलीब को वहीं पर छोड, हल्की-फुल्की होकर वह वहां से निकल गई. अनमनी होकर टाइम स्न्वायर की चकाचौंध में सड़कों पर इधर-उधर घूमती रही. उसके अंतर्मन के अंधेरे जब वहां की चमचमाती रोशनी को झेल नहीं सके, तो वह रॉक फेलर सेंटर में आ गई. फूलों की झाड़ियों के ओट में बनी पत्थर की उसी बेंच पर जा बैठी, जहां वह अक्सर वेद के साथ बैठा करती थी. यह और बात थी कि आज उसकी पीठ पर फिसलने के लिए वेद का प्यारभरा हाथ नहीं था. फिर भी कस्तूरी मृग की तरह उसकी ख़ुशबू, उसकी मौजूदगी को वह महसूस कर रही थी. आंखों से

सावन-भादो भी बरस रहा था. अचानक अपनी पीठ पर किसी का स्पर्श पाकर उसने सिर उठाया, तो श्‍लोक को अपने बगल में बैठे देख चौंक गई.

“कहां मुझे छोड़कर यूं अकेली चली आईं. तुम्हारे और वेद के रिश्ते की सारी सच्चाई का पता मुझे था. वेद ही ने तो बताया था. जब मेरे मन में किसी प्रकार का संशय ही नहीं था, तो मैं तुमसे उसकी तहक़ीक़ात क्या करता. रिश्तों के अवलोकन में वेद जिस ऊंचाई पर आसीन है, वहां मैं पहुंच ही नहीं सकता ऋचा. दुख इसी बात का है कि इधर तुम जैसी जीवनसंगिनी पाकर मैं निहाल हूं, पर वेद को क्या मिला? कितनी ख़ामोशी से नीलकंठ बनकर सबके जीवन का हलाहल पी रहा है. तुम्हारे प्रति उसके निश्छल प्यार का प्रतिदान बनकर ही तो मैं तुम्हारे जीवन में प्रविष्ट हुआ हूं. कुछ नहीं हूं मैं सिवाय वेद के प्रति तुम्हारे प्यार का प्रतिदान के या यूं कहो तुम दोनों के पावन रिश्ते का प्रतिदान ही तो मैं हूं. वेद में अगर ऋचाएं हैं, तो कहीं न कहीं श्‍लोक भी अवश्य ही होगा. हम दोनों के प्यार का प्रतीक ही तो वेद है. अगले महीने ही वेद का आशीर्वाद लेने हम दोनों भारत जाएंगे. कितना चकित व ख़ुश होगा वह अचानक हमें यूं आया देखकर.” कहते हुए ऋचा की आंखों से बहते हुए आंसुओं को अपनी हथेलियों में समेटते हुए श्‍लोक ने उसे अपनी बांहों में भर लिया, तो फिर ऋचा भी रुक नहीं सकी. सारे गिले-शिकवे को भूल श्‍लोक की बांहों में समां गई.

 रेणु श्रीवास्तव

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