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कहानी- प्यार को प्यार ही रहने दो 4 (Story Series- Pyar Ko Pyar Hi Rahne Do 4)

उसने पहली बार अपने प्यार को शब्दों का जामा पहनाया. मैं निःशब्द होकर उसकी बातें सुनती रही. उसने मुंबई में मेरे साथ रहते हुए क्या-क्या अनुभव किया, सब बताया. फिर मैंने भी उसके प्रति अपनी चाहत का इज़हार किया. समय के अंतराल में, अल्हड़ प्रेम की नदी ने परिपक्व दोस्ती के समुद्र का रूप ले लिया, जिसमें ठहराव था, गहराई थी. इसका पूरा श्रेय श्याम को जाता है, जिसने मेरे पूरे अस्तित्व को ही अपने में समेट लिया था. उम्र के इस पड़ाव में जब मैं वैवाहिक जीवन के कर्त्तव्यों का बोझ ढोते-ढोते थक गई थी, शरीर में शिथिलता आने के कारण जीवन खालीपन और नीरसता से व्याप्त हो गया था, वह श्याम की बातों से सरसता, नई ऊर्जा और उमंग से सराबोर हो गया था. ‘हां, पिताजी का ट्रांसफर हो गया था.’ मैंने लंबी सांस लेते हुए कहा. ‘और तुम कैसी हो?’ ‘ठीक हूं, फिर बात करते हैं.’ मेरा मन अजीब-सी उदासी से घिर गया था, इसलिए मैंने संक्षिप्त उत्तर दिया और ऑफलाइन हो गई. मन बहुत उदास हो गया था. आंखों में आंसू छलछला आए. सोचने लगी, तक़दीर भी क्या-क्या रंग दिखाती है. कोई भी घटना अकारण नहीं घटती. श्याम मेरी फ्रेंड लिस्ट में स्थान ले चुका था. तीन-चार बार की चैटिंग से ही हमने एक-दूसरे के परिवार के बारे में काफ़ी कुछ जान लिया था. उसकी दो बेटियां ही थीं. पत्नी बहुत अच्छी थी, लेकिन मेरा स्थान उसके जीवन में रिक्त ही रहा. यही मेरे साथ हुआ था. पति के नीरस स्वभाव के कारण दिल का कोना खाली ही रहा. एक दिन उसने मेरा मोबाइल नंबर मांगा, पहले तो मैंने कई बार टाला, लेकिन उसके बार-बार आग्रह ने और पुराने ज़माने के विपरीत आधुनिक पुरुष-स्त्री के बीच दोस्ती के संबंधवाली सोच ने मुझे दुस्साहसी बनने पर मजबूर कर दिया. इतने वर्षों बाद जब उसकी आवाज़ मैंने फोन पर सुनी, तो लगा कि मूक प्रेम निवेदन मुखरित हो गया था. उसने पहली बार अपने प्यार को शब्दों का जामा पहनाया. मैं निःशब्द होकर उसकी बातें सुनती रही. उसने मुंबई में मेरे साथ रहते हुए क्या-क्या अनुभव किया, सब बताया. फिर मैंने भी उसके प्रति अपनी चाहत का इज़हार किया. यह भी पढ़े: Feb- March में घूमने के लिए 5+ बेहतरीन जगहें समय के अंतराल में, अल्हड़ प्रेम की नदी ने परिपक्व दोस्ती के समुद्र का रूप ले लिया, जिसमें ठहराव था, गहराई थी. इसका पूरा श्रेय श्याम को जाता है, जिसने मेरे पूरे अस्तित्व को ही अपने में समेट लिया था. उम्र के इस पड़ाव में जब मैं वैवाहिक जीवन के कर्त्तव्यों का बोझ ढोते-ढोते थक गई थी, शरीर में शिथिलता आने के कारण जीवन खालीपन और नीरसता से व्याप्त हो गया था, वह श्याम की बातों से सरसता, नई ऊर्जा और उमंग से सराबोर हो गया था. जब कभी वह कहता, “पाखी, तुम्हारी हंसी बहुत प्यारी है” या मेरी फोटो देखकर कहता, “आज भी तुम उतनी ही ख़ूबसूरत लगती हो.” तो मुझे अपने पर गर्व होने लगता. यह सोचकर कि आज भी मैं किसी की यादों में बसी हूं. मुझे अपना पूरा अस्तित्व ही महत्वपूर्ण और अर्थपूर्ण लगने लगता.             सुधा कसेरा

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