कहानी- तुम कब आओगे? 2 (Story Series- Tum Kab Aaoge? 2 )

फोन रखते ही मेरा बचपनवाला मन लौट आया था. वो मन जो उन साहित्यकारों से मिलना चाहता था, जिन्होंने ऊंचाइयों को छुआ था. आज मैं उन पाठकों के बारे में जानना चाहती थी, जो मेरे लेखन का गहरा भेद जानना चाहते हैं.
एक दिन फिर रोहित का फोन आया था कि वो मेरी क़िताबें पढ़ना चाहता है. मैंने कहा- “क़िताबें बहुत सारी हैं, मिलूंगी तब दूंगी…” मैंने दरअसल रोहित को सफ़ाई से टालना ही चाहा था.
फोन रखकर मैं मन ही मन अल्हड़-सी बुदबुदाई थी, “मैं भला कब मिलूंगी उसे? मैं भला कब मुंबई जाऊंगी? ना मिलना होगा, ना देना… हुंह!”

पाठकों के फोन का आना जारी था, पर उनकी संख्या कुछ कम हो गई थी. अब मैं उन्हें धन्यवाद कहती और उनके बारे में एक-दो बातें ज़रूर पूछती. फिर एक दिन एक पाठक का दोबारा फोन आया था.
“नंदिताजी! मैंने वो कहानी फिर पढ़ी.” संभवतया उसी पाठक का फोन था, जिसे कहानी का अंत समझ न आने पर मैंने दोबारा पढ़ने की सलाह दी थी.
मैं उत्साह से बोली थी इस बार, “अरे! तुम! समझ में आया न!” उस पाठक के प्रति मेरे मन में दया भाव उमड़ आया था.
“हां! हां! समझ आया… पर कुछ आप खुलासा करें न!”
“क्या नाम है तुम्हारा?”
“रोहित!”
“देखो रोहित! जब दर्द एक हो जाते हैं, तो सारे शिकवे ख़त्म हो जाते हैं और यही कहानी का अंत है.” मैंने उस पाठक का नाम लेकर प्रोफेशनल अंदाज़ में कहा था.
“……..” रोहित जैसे कुछ और सुनना चाह रहा था.
“कहां रहते हो?”
“मुंबई में.”
“क्या करते हो?”
“कंप्यूटर हार्डवेयर का व्यापारी हूं.”
“ओह! फिर भी साहित्य में रुचि…”
“क्या मैं फिर बात कर सकता हूं?”
“हां! क्यों नहीं.”

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फोन रखते ही मेरा बचपनवाला मन लौट आया था. वो मन जो उन साहित्यकारों से मिलना चाहता था, जिन्होंने ऊंचाइयों को छुआ था. आज मैं उन पाठकों के बारे में जानना चाहती थी, जो मेरे लेखन का गहरा भेद जानना चाहते हैं.
एक दिन फिर रोहित का फोन आया था कि वो मेरी क़िताबें पढ़ना चाहता है. मैंने कहा- “क़िताबें बहुत सारी हैं, मिलूंगी तब दूंगी…” मैंने दरअसल रोहित को सफ़ाई से टालना ही चाहा था.
फोन रखकर मैं मन ही मन अल्हड़-सी बुदबुदाई थी, “मैं भला कब मिलूंगी उसे? मैं भला कब मुंबई जाऊंगी? ना मिलना होगा, ना देना… हुंह!”
इसी बीच बंगलुरू में मौसी के छोटे बेटे के विवाह का निमंत्रण था. वही मौसी जिसने बचपन में मुझे बहुत प्यार दिया और आज भी पग-पग पर साथ है. विवाह में जाना ज़रूरी था, पर शीतांशु की छुट्टी मंज़ूर नहीं हुई. शीतांशु ने मेरा और वैभव का टिकट बुक करवा दिया था. लंबी दूरी की गाड़ी में यूं जल्दी टिकट मिलना आसान नहीं था, फिर भी शीतांशु ने नेट की गहरी खोजबीन के बाद मुंबई के रास्ते टिकट बुक करवाने की सहमति मांगी. “मुझे तो मौसी के बेटे के विवाह में जाना है. अब यह तुम पर छोड़ा कि तुम मुझे किस रास्ते से भेजते हो…” मैंने बिंदास होकर नेट पर बैठे शीतांशु के गले में बांहें डाल दी थीं. यात्रा करना वैसे भी मुझे अच्छा लगता है, क्योंकि लंबी यात्राएं मुझे मनपसंद क़िताबें पढ़ने का मौक़ा देती हैं.

       संगीता सेठी

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