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कविता- खिड़की के सरिए पर… (Poetry- Khidki Ke Sariye Par…)

Poetry- Khidki Ke Sariye Par

आज खिड़की से

सूखे पत्तों के साथ उड़ कर

यादों की एक कतरन भी

अटक गई सरिए पर

वो दिन जब

यूं ही बेमतलब गुज़रा करते थे

तुम सड़क से गली के मोड़ तक

और नज़रें ढूंढ़ती थी

खिड़की के सरियों के भीतर

दीवार से सट कर मैं

देखा करती थी तुम्हारी बेचैनी

एक झलक मुझे देखने की

दो जोड़ी आंखें आज भी

अटकी हुई है सरिए पर

एक बार नज़र मिल जाने की

राह देखती हुई…

– विनीता राहुरीकर

कविता- खिड़की के सरिए पर

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Photo Courtesy: freepik

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