जब फाइल संलग्न पत्रकों को वहन करते-करते मोटी और थुलथुल हो जाती है तो संबंधित कर्मचारी उसकी तरफ़ देखने-पढ़ने से भी जी चुराने लगता है. वह इस आफ़त को टालने के लिए फाइल आगे बढ़ाता रहता है.
घूरे के दिन बदलते रहें, मेरे भी बदल गए. मेरी पदोन्नति हो गई. मैं अधिकारी से बॉस बन गया, प्रशासन को धन्यवाद! देर से ही सही, उसने मेरी योग्यता को तो परखा, जब मैं अधिकारी था, तब मुझे लगता था बॉस हमेशा ग़लत होता है. सब कुछग़लत हाथों में है. बॉस हमेशा असंतुष्ट रहता है. कितना भी काम करो. यह धारणा बन गई है कि सरकारी काम ठीक से नहीं होते? ठीक से होंगे भीकैसे? सरका…र का काम है काम को सरकाना.
सरकारी काम भला कभी निपटाने के लिए होते हैं. वे तो सरकाने के लिए ही होते हैं, अडंगा लगाने के लिए होते हैं. बॉस काम सरकाता है, नुक्स निकालता है, ग़लतियां ढूंढ़ता है, हस्ताक्षर करने में आनाकानी करता है. मैं पूछता हूं कि ‘बॉस फाइलक्यों नहीं निपटाता?’
वे कहते हैं ‘सरकारी काम करना मज़ाक है क्या? जवाबदेही का काम है, सिर पर हरदम भय की तलवार लटकती रहती है. थोड़ी सी ग़लती हुई नहीं कि गए काम से.
स्वतंत्रता के बाद देश का कोई भी सरकारी प्रतिष्ठान हो, उसमें कार्य करनेवाले अधिकारियों, कर्मचारियों को अपनी अपनी सत्ता के अनुरूप नाना प्रकार के विशेषाधिकार प्राप्त हैं. शासकीय अधिकारियों, कर्मचारियों की स्वेच्छाचारी प्रवृत्ति के बारे में कुछ कहना सूर्य को दीपक दिखाने का प्रयास करना है, विशेषकर प्रथम एवं द्वितीय श्रेणी के. तृतीय श्रेणी के कर्मचारी ही वास्तवमें शासकीय कार्यालयों के वर्किंग हेड होते हैं औरइनका हाल तो बड़ा ही निराला है.
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‘करे नौकरी आवे चोट, उससे भले भीख के रोट’ अथवा ‘नौकरी न कीजै चाहे घास खोद खाइए’ जैसी जनश्रुतियों के बावजूद नौकरियों में मज़े ही मज़े हैं, लेकिन जो नौकरी हेड ऑफिस में हुआकरती है, उसकी तो बात ही कुछ और है. अधीनस्थ ऑफिसों के कर्मचारी जब अपने हेड ऑफिस में जाकर अपने ही स्तर के कर्मचारी को सहते है तबवे सोचते हैं ‘काश वह भी वहां कार्यरत होते?’ शाखा कार्यालय के उच्च पदस्थ अधिकारी का रुतबाभी हेड ऑफिस के अदने से कर्मचारी के सामने गौण है. वाह! क्या बात है, क्या जादू है हेड ऑफिस की हवा में! ब्रांच ऑफिस की बिल्ली भी कुछ दिन वहां रह जाए तो शेर की मानिंद दहाड़ने लगे.
हर जगह आरंभ तो ‘टेम्परेरी’ से ही होता है, मसलन- सरकार को गांवों में शिक्षकों को नियुक्ति देनी है तो पहले ‘अस्थायी’ भर्ती होगी और कम पैसों में ज़्यादा मेहनत करवाई जाएंगी, फिर तमाम शोर-शराबे के बाद धीरे से ख़बर आएगी कि ‘तीन साल से कार्यरत शिक्षाकर्मी स्थायी होंगे.” तमाम शासकीय और अशासकीय संस्थान, निजी कंपनियां, व्यावसायिक प्रतिष्ठान अपने कर्मचारी एवं अधिकारियों को पहले टेम्परेरी तौर पर रखते हैं, फिर एक-दो वर्ष उनसे निष्ठा और कार्यक्षमता रूपी पापड़ बिलवाकर उनका भविष्य निर्धारित करते हैं. इस अवधि को अंग्रेज़ीवालों ने बड़ी ख़ूबसूरती से ‘प्रोबेशन’ तथा हिंदी हिमायतियों ने ‘परिवीक्षा’ का नाम दिया है. इसलिए नौकरी मिलने पर आमतौर पर पहला प्रश्न यही होता है- क्या नौकरी परमानेंट है?’
सरकार किसकी और किसके लिए होती है? ज़ाहिर है सरकार जनता की और जनता के लिए होती है तो सरकारी संपत्ति किसकी हुई? सीधी सी बात है जनता की. सरकारी संपत्ति अपनी लोचशीलता के लिए भी जानी जाती है. यह इतनी लचीली होती है कि कोई सरकारी कर्मचारी एक सरकारी पेन ग़लती से भी अपनी जेब के हवाले कर दे तो पेन वहीं का होकर रह जाता है, यह तो पेन है, लोग तो मकान-के-मकान डकार जाते हैं. विशेष तौर पर जनप्रतिनिधिः सांसद विधायक न रहते हुए भी सरकारी बंगले को न छोड़ने जैसी लोच आख़िर किस संपत्ति में हो सकती है? सरकारी संपत्ति का एक और गुण उसका बहुपयोगी होना है.
सरकारी गाड़ी का ही उदाहरण ले लीजिए, यह कितनी ही तरह से काम आती है. अफसर इससे अपने दफ़्तर तो जाता ही है, उसके बच्चे भी इसी गाड़ी से स्कूल-कॉलेज जाते हैं. अफसर की बीवी सब्ज़ी ख़रीदने भी इसी गाड़ी से जाती है. हुई न बहुपयोगी. तो भला क्या गाड़ी (संपत्ति) इतने उपयोगों में लाई जा सकती है? इसके अलावा नेताओं की सभा, हडतालों में तोड़-फोड़ के लिए, घोटालों के रूप में डकारने के लिए सरकारी संपत्ति का जैसे प्रयोग होता है, वह वाकई काबिल-ए-तारीफ़ है. सरकारी कर्मचारी तो सरकारी और निजी संपत्ति में विभेद करना भी पाप समझता है.
विवाहित होने और कई वर्षों से नौकरी करते रहने के बावजूद मैं आज तक यह नहीं समझ पाया कि विवाहित और नौकरीपेशा को संवेदनहीन, निःसंकोची और चालू भाषा में कहें तो बेशर्म क्यों बन जाना चाहिए. यह सच है कि काम करनेवाले से ही ग़लती होती है, लेकिन यदि ग़लती न होने पर भी डांट खानी पड़े तो संवेदना जागृत हो ही जाएगी.
सरकारी नौकरी पाकर संवेदनहीन हो जानेवाले कर्मचारी मैंने देखे हैं. अफ़सोस मैं नहीं हो पाया? कर्मचारी पूरी निष्ठा से अपनी नौकरी करते हैं, किसी भी काम की कायदे से करना चाहते हैं, लेकिन बेईमान जनता उन्हें भ्रष्ट बनाने पर आमादा हो ही जाती है. जनता है कि मानती ही नहीं, बरबस कर्मचारियों को रिश्वत दे-देकर अपना और कर्मचारियों का परलोक बिगाड़ रही है.
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कार्यालय फाइलों से अटे हुए होते हैं. उन्हें रखने का स्थान भी कम पड़ता जा रहा है. फाइल अपने जन्म के समय इकहरे बदनवाली नायिका की तरह होती है. नवोढ़ा (नायिका) की तरह नखरेवाली! संकोच और लज्जा के साथ वह मंद गति से अपने कदम बढ़ाती है. वो जिसकी भी नज़रों के आगे से गुज़रती है, वह मुग्ध हुए बिना नहीं रहता, प्रतिक्रिया स्वरूप वह अपनी कलम को कोरी फाइल पर चलाने से रोक नहीं पाता, कलम और टिप्पणियों की मार-भरमार से शीघ्र ही वह इतनी क्षत-विक्षत हो जाती है कि प्रौढ़ा नायिका की तरह हो जाती है. अनेक नज़रों और हज़ारों हाथों से गुज़रते हुए फाइल अपने लक्ष्य से भटक जाती है.
उसका आकार और वज़न बढ़ता रहता है, लेकिन वह गंतव्य तक नहीं पहुंच पाती. ऐसी स्थिति में वह फाइलों के ढेर में दब जाती है. धूल और सीलन उसे घेर लेती है. कभी-कभी उसे चूहों का शिकार भी होना पड़ता है. जब फाइल संलग्न पत्रकों को वहन करते-करते मोटी और थुलथुल हो जाती है तो संबंधित कर्मचारी उसकी तरफ़ देखने-पढ़ने से भी जी चुराने लगता है. वह इस आफ़त को टालने के लिए फाइल आगे बढ़ाता रहता है.
हमारी नई नीति यही है कि अगर दफ़्तर का समय दस बजकर, तीस मिनट है तो इस पुरानी लीक पर चलकर आना तो पुरानी नीति कहलाएगी? ऐसे में प्रत्येक जनतंत्रीय कर्मचारी को कार्यालय में साढ़े दस की जगह ग्यारह बजे आना धर्मसिद्ध अधिकार है. जब बहुमत ग्यारह बजे आएगा तभी तो नई नीति अनुसार कार्यालय का समय स्वाभाविक रूप से ग्यारह बजे का हो पाएगा. इसी तरह अगर लंच ब्रेक का समय एक बजकर, तीस मिनट है तो वह भी स्वाभाविक रूप से एक बजे का और लंच ब्रेक की समाप्ति का समय दो बजे की जगह तीन बजे हो जाएगा. यह बात हर अनपढ़ समझता है फिर पता नहीं क्यों पढ़े-लिखे नहीं समझते? आपको नौकरी सहानुभूति, दया या भीख से नहीं मिली है. जाने कितनी बार अफसरों के चक्कर लगाए होंगे, ज़मीन बेची होगी, नाक रगड़ी होगी, लिफ़ाफ़ा… खैर.. तब कहीं जाकर ये गरिमामय पद आपको हासिल हुआ होगा, जिस पर आज पूरे विभाग को नाज़ है. नाज़ है हमें यहां के घिसे-पिटे फाइलीय कर्मकांड के साथ-साथ ‘एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटीज़’ पर, उस शतरंज पर, कैरम पर, ताश पर, चाय पर और कहीं-कहीं स्वेटर बुनने पर भी. मगर समझदार तो वह होता है, जो किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करता तथा उक्त जीवात्माओं से आतंकित हुए बिना अपना धंधा अनवरत् ज़ारी रखता है.
– कन्हैयालाल मंगलानी
