बीते पंद्रह वर्ष यक्ष प्रश्न से खड़े हो जाते हैं. उनके जंगल में मैं दिग्भ्रमित होने लगती हूं. पिता की मृत्यु के दिन क्षणांश में अट्ठारह वर्षीय किशोरी से प्रौढ़ा बन गई थी. करती भी क्या? विवश, असहाय, अकेली, मजबूर इन शब्दों का अर्थ, मैं आज समझ रही थी…
कुछ अचानक हो गया था. सिराओं में संयत प्रवाह तेज हो गया, उन्माद की स्थिति लांघ कर सैलाब का आकार धारण कर चुकी थी. मैं पिछले पन्द्रह वर्षों की मृत्तिका आधार से रसे बनी पाषाणी-मोम बन कर पिघलने लगी थी. अन्दर ही अन्दर कुछ टप-टप कर पसीजने लगा था. चारों तरफ़ एक धुंध-सा छा गया था. वह स्वयंनिर्मित भी हो सकता है. चारों तरफ़ मध्यवर्गीय नैतिकता की समुद्री लहरें काले नाग की तरह फन पटक रही थीं. और मैं उनके बीच द्वीप बनी, ‘देह-धर्म’ को जी लेने की कोशिश में ‘भारी-शरीर’ से, मन से पूरी तृप्ति के लिए छटपटाई थी. उसकी आंखों में मैं अपना प्रतिबिंब देख सिहर गई थी. उसकी दृष्टि में ऐसा कुछ अनाम था जो ‘बरबस’ ही मुझे खींचे जा रहा था और मैं पगहे में बंधी गाय की तरह घिसटती चली जा रही थी. उसकी आंखों की अतल गहराइयों में डूबते हुए लगा जैसेइस शरीर में ‘एक साथ’ ढेर सारे ‘दूधिया बल्ब’ जल उठे हों. मैं नहीं उठी हूं रोशनी से, किसी ने पलाश की डाल को खींच कर छोड़ दिया हो और ‘लाल अग्नि स्फुलिंगों में लद गईं. मुझे लगा था, ‘दुनिया में न कुछ अच्छा है, न कुछ बुरा, ये सब हमारे नज़रिए से है. आदमी खुद-ब-खुद एक दायरा खींच लेता है और फिर ख़ुद ही उसी दायरे से निकलने के लिए छटपटाता है. जाति-धर्म, विवाह सब दायरे ही हैं न, जो आदमी ने अपनी सुविधा और सुरक्षा के लिए बनाए थे, आज बंधन बन गए हैं. यह क्या कोई बात हुई? एक बार दायरा खींचा जाए, फिर बांधा जाए. अपने को बांधना ज़रूरी है क्या? मैं तो इसे एक दिखावा समझती हूं. अनुभव करती हूं दूसरों की नज़रों में विशिष्ट बनने की. एक बार अपने को मसीहा घोषितकरना, ‘किए जाओ’ के लिए क्रास में जड़वाना, फिर तड़पते जाना…
बीते पन्द्रह वर्ष यक्ष प्रश्न से खड़े हो जाते हैं. उनकेजंगल में मैं दिग्भ्रमित होने लगती हूं. पिता की मृत्यु के दिन क्षणांश में अट्ठारह वर्षीय किशोरी से प्रौढ़ा बन गई थी. करती भी क्या? विवश, असहाय, अकेली मजबूर इन शब्दों का अर्थ, मैं आज समझ रही थी. बूढ़ी अनपढ़ मां बर्तन-वासन के सिवाय और कर ही क्या सकती थी? कॉलेज छोड़ कर प्राइवेट स्पीकर होने की सोच रही थी. तुषार को उत्तर देना तो दूर रहा, उसके पत्रको दोबारा पढ़ने का साइस नहीं कर पाई. जिसे…बाथरूम, कैंटीन, किचन कहां-कहां नहीं छिप-छिप कर बीसों बार पढ़ती और ब्लाउज़ में खोंस लेती थी. वह अब डायरी के पन्नों में चिपक कर रह गया था. पिता की अंत्येष्टि और तेरहवीं के बीच, तुषार कई बार घर आया, मगर मैं कतराने लगी. अंत में एक दिन जाड़े की रात, खिड़की पर वही जानी पहचानी दस्तक. एक मन कहता कि खोल दूं, दूसरा मन कहता, नहीं, कमज़ोर पड़ जाऊंगी. छोटे भाई-बहन अनाथ हो जाएंगे. विधवा मां भीख मांगने को बाध्य हो जाएंगी. कानों में बड़े ज़ोर से उंगलियां ठूंस ली और बिस्तर पर पड़ गई. फिर भी रात भर दस्तकों की आवाज़ का भ्रम होता रहा,
“अब भी सोच लो, क्यों अपनी जिन्दगी नर्क कर रही हो?” वह मिलता और कहता. मैं ख़ामोश सुनती, कुछ उत्तर न देती. पंछी की तरह जैसे नीले आकाश में गोते लगाने लगती थी.
“तुषार, अब तुम मेरे घर कभी न आना, एक विवश लड़की को बदनाम करते तुम्हें शर्म नहीं आती.” न जाने मैं कहां से साहस बटोर कर कह गई थी.
तुषार स्तब्ध-सा खड़ा रह गया था. मैं बिलख बिलख कर रोने लगी थी, लेकिन वह कब तक इंतज़ार करता? पन्द्रह साल पर्यंत यातना-शिविर भोगने के लिए मैं प्रतिबध्द थी.
मोहपाश में बंधी नौकरी करती, दौड़ती रहती, बी.ए. से पी एच.डी. की यात्रा पूरी की आज एक प्रोफेसर और हेड हूं, मात्र ३६ वर्ष की उम्र में यह पहला उदाहरण है. मगर इसको पाने के लिये क्या क्या खोया, यह सिर्फ मैं ही जानती हूं. नारी से मैं अहिल्या पत्थर बन गई थी. लोग मुझे पूजने लगे थे, किन्तु नारी की हैसियत से नहीं, पत्थर की हैसियत से.
मैं कहीं से गुज़रती हूं, तो आसपास के खड़े हुए लोगों में सम्मान होता है, साथ ही सहानुभूति भी. कुछ लोग मेरे अहं के दर्प से भय खाते हैं, कुछ चिर स्वयंवरा की नियति से हमदर्द भी बनते हैं. मगर उनकी भी क्या ग़लती है? सोचते-सोचते टूट जाती हूं. ऐसा चांटा तो नीलू ने मारा था, उसके अदृश्य निशान आज भी महसूस करती हूं, मगर कर ही क्या सकती थी. दीदी, आप बड़ी हैं, समझदार हैं. सब कुछ समझतीहैं. मुझे पिता की तरह पढ़ाया-लिखाया और बड़ा किया. इस योग्य बनाया कि मैंअपने पैरों पर खड़ी हो सकी. मगर अपनी ज़िंदगी मुझ पर नहीं लाद सकतीं. मैं आपकी ज़िंदगी दोहरा नहीं सकती. मैं अपनी ज़िंदगी अपने ढंग से, अपने लिए जीना चाहती हूं.”
अपने अधकचरे रोमांस पर मेरे द्वारा हल्की सी उंगली उठाने पर नीलू बिफर पड़ी थी.
पी. एफ. से, एल. आई. सी. से और न जाने कहां-कहां से कर्ज़ लेकर, धूमधाम से उसकी शादी की. बड़ी संतुष्टि का एहसास हुआ था. मां ने मुझे अपना बड़ा बेटा कह कर संबोधित किया था उस समय. मां बड़ी निरीह निर्दोष एवं असहाय सी लगी थी. मगर वही मां, उस दिन मुझे बड़ी मायावी लगी थी, जब थकी-मांदी सी कॉलेज से लौटते ही मुझे सुना कर कराहने लगी थी ‘तुझे क्या बताऊं बेटी अकेली तू ही क्या-क्या करेगी? आनंद ने लड़की पसंद कर ली है. नीलू भी देख आई है. नीलू का तार आया है, परसों गोद भरने जाना है.”
“… अभी क्या जल्दी है? आनंद बी.ए. भी तो नहीं कर पाया है… सोच कर रह गई बस, लेकिन कहा, “अच्छा…”
“हां बेटी, अकेले में बस नहीं चलता. घर में बहू आ जाएगी तो चार दिन आराम की ज़िंदगी जी लूंगी.”
“ठीक सोचती हो मां.” सोच रही थी मैं, मां मरने को आ गई है, फिर भी चार दिन सुख का लोभ संवरण नहीं कर पा रही है. क्या कभी मेरी ज़िंदगीके सन्दर्भ में भी किसी ने कुछ सोचा? तो क्या मैं अपनी ज़िंदगी नहीं जी सकती?
सोचते सोचते मैं एकदम प्रौढ़ा से युवती हो गई थी. गाल रक्तिम हो गए थे, होंठों में कंपन होने लगा था. आंखों में एक दिव्य चमक आ गई थी, शायद मैं पहली बार ही अपने सौन्दर्य पर स्वयं मुग्ध हुई थी.
“तू क्या सोच रही है?” मां ने मुझे कल्पना के आकाश से यथार्थ पर खींच लिया था, “गोद भरने के लिए पैसे चाहिएं.”
“कितने?” संक्षिप्त सा उत्तर है, वैसे तो सोने की एक चेन, अंगूठी नीलू अपनी ननद के साथ ला रही थी. उसको एक साड़ी देनी है, मगर अब तो दबे हाथ से ही…” हाथ को दबाने और कहने की ऐसी कौन सी ज़रूरत आन पड़ी मैं सोच कर रह गई, शब्दों ने साथ नहीं दिया…
“कितना चाहिए?” मैंने पूछा.
“एक हजार निकाल लेना. मां ने इतनी सरलता से कहा, जैसे लाखों का बैंक बैलेंस मेरे पास हो. मैंने पैसे निकलवा कर मां के हाथ में रख दिए. मेरा मां का, मेरा आनंद का, मेरा सबसे छोटी रश्मि का संबंध बस पैसे तक का है. यही एक ऐसा सेतु है, जो हमें परस्पर जोड़े हुए है.
आने के बाद बहू पैर छूने आई थी, मगर उसके चेहरे पर मुझे एक वितृष्णा का भाव दिख रहा था. उसने भी आशीर्वाद की प्रतीक्षा नहीं की. औपचारिकता निभाते हुए चली गई.. सभी की तरह रश्मि ने भी बड़ी ईमानदारी के साथ अपना रोल निभाया था. जब मैंने उसे एक लड़के के साथ कई बार घूमते देखा और उसके पास लेटर पाए जाने पर छिछले रोमांस के लिए डांटा फटकारा, तो उसका चेहरा जम सा गया. विरोध में शब्दों की बुदबुदाहट में सुन नहीं पाई. मगर उसका चेहरा साफ़ कह रहा था ‘दीदी, रोमांस मैं नहीं तो क्या आप करेंगी? रोमांस की उम्र तो मेरी है, आपकी नहीं…
मैं रश्मि नहीं हो सकती, रोमांस करने वाली नीलू नहीं हो सकती, अपनी इच्छा से विवाह कर लेने वाली. शायद मेरी नियति बस मौन की है, जो किसी का विरोध करना नहीं जानती, अपनी ज़िंदगी जीना नहीं मयस्सर जिसे, बस दूसरों के लिए ज़िंदगी तबाह कर देना. नहीं, अब मैं उस मौन का गला घोंट दूंगी, जो लगातार १५ वर्षों से मुझे छलता रहा है. आदर्श के कोहरे में भटकती रही हूं. लेकिन अब तो बहुत देर हो चुकी. नहीं, यह मेरा भ्रम है, पश्चिमी देशों में विवाह इसी उम्र में होता है.
नहाने के बाद घंटों ड्रेसिंग टेबल के सामने खड़ी अपनी तन्वंगी देह को निहारती रही. ये मांसल उभार, ये पंखुड़ियों-सी कोमल त्वचा, भौंहों के कटाक्ष. मैं अपने ही रूप पर मोहित हो रही थी. आंखों की झील-सी अतल गहराइयों में डूबती हुई महसूस कर रही थी.
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डॉ. रंजन कितने पुलकित भाव से देखता है. अब अपने ही बनाये गये सिद्धान्तों की होली जला दूंगी, दायरों को तोड़ दूंगी. लक्ष्मण रेखा का अतिक्रमण करने के बाद कैसा महसूस होता है, स्वयं झेल रही थी. एक कालजयी की मुद्रा में फेकल्टी में घुसते ही छात्र-छात्राओं का हुजूम अपनी स्वाभाविकता पर ब्रेक लगा, अवसन्न हो ‘विश’ करता है. मुझे यह अच्छा नहीं लगता, दिल करता है, इन्हीं के बीच बैठ जाऊं और इनसे हंसी मज़ाक करूं. अन्य दिनों की तरह चेहरे से उभरते यांत्रिकअभिवादन स्वीकार करने की बजाय, दोनों हाथ जोड़ एक मधुलिप्त मुस्कुराहट बिखेर देती हूं. सब स्तब्ध हो जाते हैं. “क्या हो गया बड़ी दीदी को आज? साड़ी का रंग भी आज अधिक सुन्दर था.” लड़के-लड़कियों में एक फुसफुसाहट हो रही थी.
चेंबर में पहुंचकर घंटी बजाई. चपरासी हाज़िर था, “यस मैडम.”
“डॉ. रंजन को बुलाओ.”
रंजन अपनी नौकरी को जेब में रख कर चेंबर में घुसा. ज़रूरत पड़ने पर जेब से निकाल कर इस्तीफा मेज़ पर रख देगा. कई लोग चेम्बर से बाहर कान लगाए खड़े थे.
“गुडमार्निंग मैडम.”
“गुड मार्निंग, बैठिए,”
‘जी, बस ठीक है.’
“आपको कोई क्लास तो नहीं है?’ शीशे के नीचे दबे चार्ट की तरफ़ देखते हुए मैंने कहा.
“जी नहीं.” रंजन ज़रूरत से ज़्यादा घबरा गया था. कुछ परेशान सा लग रहा था.
“जी, बात ऐसी है कि लड़के शोर ज़्यादा मचा रहे थे, उनका मूड नहीं था इसलिए…*
“क्या इसलिए… मैं समझी नहीं. बैठ तो जाओ, आई से सिट डाउन प्लीज… प्लीज़.”
रंजन मिलिट्री के सिपाही की तरह कुर्सी से चिपकगया, “जी, पन्द्रह मिनट पहले मैंने जो क्लास छोड़ी थी, उसी के लिए शायद आपने…”
“ओह नो.” मेरे चेहरे पर बरबस माधुर्य घिर आया, एक आत्मिक तृप्ति का, जिसमेंकहीं भी कृत्रिमता नहीं थी. घंटी बजी, चपरासी आया, “दो कप कॉफ़ी.”
“जी?”
“कॉफी. कम सुनाई पड़ता है क्या?” जिसे हमेशा कापियां-किताबें ही मांगते सुना गया हो, उसके मुख से ‘कॉफी’ भी ‘कापी’ सुनाई पड़ता है.
“आप कहां रह रहे हैं, आजकल?”
‘कहीं भी, अकेले को क्या? गेस्ट हाउस तो छोड़ ही देना पड़ा.’
‘क्यों?’
‘डीन का ऑर्डर है कि कोई पन्द्रह दिन से अधिक गेस्ट हाउस का प्रयोग नहीं कर सकता.”
“डीन, यू मीन आई?”
“यस मैडम.”
“मेटर्स लिटिल, गेस्ट हाउस भी ज्वाइन कर सकते हो. मगर मैं तुम्हें एक अच्छा मकान दिलाना चाहती हूं. कल शाम्म को माल रोड के स्टैंडर्ड रेस्तरां में आ जाना, साथ चलूंगी.”
इसी बीच वाइस चांसलर का फोन आया, एक मीटिंग के सिलसिले में. समय वही था, जिस समय मैंने रंजन को रेस्तरां में बुलाया था. रंजन सामने बैठा एक तरफ़ की बात तो सुन ही रहा था.
“क्षमा कीजिएगा, मैं आपकी मीटिंग अटेंड नहीं कर सकूंगी.”
“क्यों?”
“एक ज़रूरी काम है.”
“कोई डिपार्टमेंटल?”
“नो पर्सनल.”
वी.सी. ने इस तरह कहा था कि सामने बैठा रंजनभी सुन बैठा, “आप मीटिंग अटेंड कर लें. मैं फिर कभी…”
“मीटिंग विल गो टू हेल.” मैं झुंझला उठी थी.
टन-टन करके चार बार घंटा लगा था.
“मेरा पीरियड है.” कह रंजन उठने लगा.
कहना चाहती थी, ‘छोड़ दो पीरियड, मैं चपरासी से कहलाए देती हूं, बैठे रहो, तुमसे बात करते बहुत अच्छा लग रहा है.’ सोच कर रह गई, ऐसे समय शब्द साथ नहीं देते मेरा. जो शायद पन्द्रह वर्षों की संजोई कुंठा का परिणाम है. यों तो अभिशाप कहना ज़्यादा सार्थक लगता है.
“कौन-सा पीरियड है?”
“सोशल सायकोलॉजी का है.”
“क्या पढ़ा रहे हो?”
“प्रीज्यूडिस-पूर्वाग्रह.”
“क्या कोई भी कार्य पूर्वाग्रह से मुक्त हो सकता है?” मेरी नज़रें दीवारों पर हिलते हुए पुराने कैलेंडर पर रुक गईं.
“आपका सोचना ठीक है. शायद नहीं भी हो सकता है. मगर जो कटिबद्ध हो…”
रंजन क्लास में चला गया था. मैं सोचने लगी, क्या मैं अपने पूर्वाग्रहों से मुक्त नहीं हो सकती? शायद नहीं, शायद हां. मुक्त होना ही पड़ेगा अब, इसी तरह से जी नहीं सकती मैं.
घर में आकर कमरा बंद कर लेने पर भी जैसे सबमेरा पीछा किए जा रहे हैं, जिससे मैं मुक्त नहीं होपा रही हूं, साथ ही सहज भी नहीं हो पा रही हूं. बाथरूम का शावर फुल खोल कर नीचे घंटों बैठी रही. एक अजीब सी मगर मधुर गुनगुनाहट का एहसास हो रहा था. शावर की सनसनाहट से ‘रंजन रंजन’ की ध्वनि सुनाई पड़ रही थी.
बाथरूम से ड्रेसिंग टेबल तक मैं ऐसे ही चली आईथी. बाल सुखाने के लिए पंखा फुल पर ऑन कर दिया. चेहरे पर मेकअप के डबल फाउंडेशन किए,हेयर ट्रीटमेंट लिया. पिछली रात सोते समय घंटों कोल्ड क्रीम मलने के कारण, चेहरे में एक ख़ास नर्मी महसूस हो रही थी. आज मैं अपने ही सौन्दर्यपर मुग्ध हो रही थी. कई साड़ियां पहनती-उतारती रही, कोई पसन्द नहीं आ रही थी. अन्त में एक मैरून रंग की पहन ली. रंजन को मैरून रंग बेहद पसंद है. आंखों की बरौनियों को आइ-ब्रो पेंसिल से संवारती हुई सोच रही थी कि तभी रोशनदान पर गौरेया का जोड़ा फुदक कर आ गया था. घबराहट में मेरे हाथ से पेंसिल छूट कर गिर गई. फिर होंठों पर इंपोर्टेड लिपिस्टिक व गालों पर हल्का पफ किया.
दरवाज़ेपर दस्तक हुई. इस तरह जाकर दरवाज़ा खोलने का साहस नहीं जुटा पा रही थी. दस्तक की आवृत्ति बढ़ती जा रही थी. कमरे से निकल कर कॉरीडोर के आदमकद शीशे में अपनी आकृति, स्वयं मुझे अनजानी प्रतीत हो रही थी. दरवाज़ा खोल कर अलग खड़ी हो गई. देखा, तो सामने कॉलेज का एक चपरासी खड़ा था.
“मैडम नहीं है क्या?”
“क्यों, क्या काम है?”
“उनको यह लेटर दे दीजिएगा.” चपरासी ने
बुक आगे बढ़ाई तो दस्तख़त करते-करते रह गई.
“ठीक है, दे दूंगी.”
लो, मैं कितनी बदल गई हूं कि रोज़-रोज़ के चपरासी तक ने नहीं पहचाना, सच ही तो है, पहले वाली मैं अब रह ही कहां गई हूं?
रंजन को फोन करके घर ही आने को कह दिया. साथ खाने के लिए भी राज़ी कर लिया था. पहले तो औपचारिकतावश ना नुकुर करता रहा, मगर दिली इच्छा तो उसकी भी थी. कहते ही तैयार हो गया.
बाहर का काम निपटा कर नौकरानी की आज छुट्टी कर दी थी. पूरी कोठी में बस एक नेपाली संतरी था. इस बियाबान में उसकी अनिवार्यता थी, नहीं तो उसे भी कहीं सरका देती. रंजन निश्चित समय से आ गया था.
ड्रॉइंगरूम खोल कर बिठाया. एक-दो
पत्रिकाएं सामने दीं.
“जरा किचन से आती हूं, तब तक आप इन्हें देखिए.”
रंजन स्तब्ध, मौन सा कुछ मुझे ऐसे ताकने लगा जैसे कह रहा हो कि आपसे मुलाक़ात के बाद, अब इनमें क्या देखना है?
हम लोग घण्टों खाते रहे, खाते रहे, बातें करते रहेजब डाइनिंग टेबल से उठे तो घड़ी की सुइयां रात के बारह से भी आगे बढ़ रही थीं.
बाहर बर्फ़ पड़ रही थी. सब कुछ धुंध में छिप गया था. मालरोड के बंगले अलग द्वीप की शक्ल अख़्तियार कर चुके थे. रंजन ओवरकोट डालते हुए चलने की तैयारी कर रहा था. शायद जाने की औपचारिकताका महज अभिनय ही कर रहा था.
“जा रहे हो?”
“सोचता हूं, आपके भले के लिए चला ही जाऊं.” चुप तो था रंजन मगर उसकी आंखें कुछ ऐसा कहती सी प्रतीत हो रही थीं… मेरे भले के लिए सोचने वाले, मेरा संरक्षक बनने वाले ‘तुम होते कौन हो!’ जी में आया डांट पिलाऊं.
“रंजन…”
“जी…”
“रुक हो जाओ.”
मैं आगे जस्टीफिकेशन देने लगी, “बगलवाली स्टडी में तुम्हारा बिस्तर लगा देती हूं. कोई डिस्टरबेंस नहीं होगा. सुबह जल्दी ही जगा दूंगी?”
और अलार्म में चाबी भरने लगी.
स्टडी में बिस्तर लग गया था, “थक गए होंगे. आराम करें. आपकी नींद मैंने ख़राब की…”
क्या आप अपने दिल से कह रही हैं… उसकी आंखों की लालिमा में यह प्रश्न तैर रहे थे.
“मुझे तो देर तक जागने की आदत है. आप थक गए हों तों…” वह कुछ कहते-कहते रुक गया था.
“आपने अभी तक शादी क्यों नहीं की?” जी में आया रंजन से पूछूं, मगर कहीं यही सवाल वह मुझसे कर बैठा तो… वैसे मेरी परिस्थितियां तो किसी से छिपी नहीं. एकदम खुली किताब, हरकोई जानता है.
“रंजन, क्या हम दोनों लाइफ पार्टनर बन सकते हैं?” पूंछू.
नहीं, इतनी जल्दी नहीं करनी चाहिए, ब्लैंक चेक मिलने पर भी कैश करने के बीच एक प्रक्रिया तो होती है.
“आज खाना बड़ा अच्छा था. पिछले पांच साल से होटल में खाते-खाते अच्छे टेस्ट का आभास ही भूल गया था.”
“आदमी और औरत के खाना बनाने में फ़र्क लाज़मी है, क्या बराबर ऐसा खाना खाना चाहोगे?” बात बिन्दु पर आते देख, मैंने पैतस डाल दिया.
“कहां नसीब होगा मुझे.”
“होगा…”
“कैसे..?”
“मैं कहती हूं न… “
“आप कहती हैं मतलब…?”
“तुम्हारी शादी करा दूं.” मेरा यह वाक्य सुनते ही रंजन को काटो तो खून नहीं, जैसे ढकेल दिया गया हो.
“क्यों, शादी के नाम से घबरा गए?”
“नहीं-नहीं, ऐसी बात…” वह स्वयं की अंतः अनुभूतियों को दबाते हुए झुठलाने का प्रयास करने लगा.
“अच्छा तुमने अभी तक शादी क्यों नहीं की…?”
रंजन चुप था…
“क्या कोई पसन्द की लड़की नहीं मिली?”
“जो पसन्द की लगती है, वह करेगी नहीं. न ही प्रपोज करने की हिम्मत कर सकता हूं.” रंजन ने मुझे इतने आत्मीय भाव से देखा था कि अब परस्पर कुछ कहने-सुनने की ज़रूरत ही न रह गई थी.
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घड़ी ने टन टन करके तीन बजाए थे.
“अच्छा, अब आप आराम करें… मैं भी चली.” वैसे उठने को जी बिल्कुल चाहता नहीं था.
“आप अन्दर से सांकल बन्द कर लें… चाहें तो…” अंतिम वाक्य मन में ही रह गया. सांकल के बन्द होने के साथ ही खुलने की आवाज आई थी. मैंने तो खैर, अपनी तरफ से खुली ही छोड़ रखी थी.
दो अलग-अलग कमरों में लाइट बुझा कर पड़े हुए हम सोने का का ढोंग रच रहे थे, जबकि मानसिक रूप से गुत्थमगुत्था थे. एक-दूसरे की एक-एक सांस का एहसास कर रहे थे. कैसी है यह पीड़ा? कैसी है यह यातना? विवशता, समाज-मर्यादा? नहीं, नहीं, कुछ भी नहीं. मैंने एक झटके के साथ उठकर दरवाज़ा खोल दिया. तो देखा कि रंजन भी दरवाजे पर ही खड़ा-खड़ा, दरवाज़े के सूराखों से मेरे कमरे का एहसास जी रहा था. दो आकृतियां धुंध के अंधेरे में एक हो गई थी.
खिड़की से झांक कर सुबह के उजाले की किरणों ने हमें अलग कर दिया. अब रंजन एकदम सहज था. नहाया-धोया और तैयार होकर चलने लगा.
“कॉलेज से सीधे आओगे न?”
“सोच रहा हूं, मैरेज रजिस्ट्रार से मिलता जाऊं. इफ यू डोंट माइन्ड फादर का नाम बतलाओगी क्योंकि वहां एप्लीकेशन में देना होता है.”
मैं ख़ामोश ही रही. रंजन चुपचाप चला गया.
मैं बड़ी देर तक सोचती ही रही. मेकअप की पर्तों से कब तक उम्र ढंकती रहूंगी. कहीं सच का सामना न कर सका रंजन तो? दूसरे को झुठलाना आसान होता है, लेकिन स्वयं को झुठलाया नहीं जा सकता है. मैं वही तो कर रही हूं. फोन उठाया, कॉलेज के नम्बर यंत्रवत मिल गए.
“रंजन…”
“यस मैडम…”
“तुम… तुम…” रजिस्ट्रेशन ऑफिस मत जाना…
“हैलो… हैलो… हैलो…” उधर से बराबर आवाजें आती ही रहीं, मगर मैं बड़ी निर्भयता से रिसीवर खटाक से क्रेडिल पर रख देती हूं.
– डॉ. जयसिंह प्रदीप
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