“अच्छा आकाश तुम्हारा भाई है. उसका काम तो हमेशा पूरा रहता है. बहुत तेज बच्चा है.” स्नेहा ने गर्वमिश्रित ख़ुशी के साथ कहा, “जी मैम, जब हम खाना बनाते हैं तो उसको अपने संग बैठाकर उसका गृहकार्य पूरा करा देते हैं.”
“नेहा, सॉरी यार, ड्राइवर का इंतज़ाम नहीं हो पा रहा है. अपना ड्राइवर भी अभी वापस नहीं लौटा है. मेरी भी ज़रूरी मीटिंग है. तुम आज मैनेज कर लो, कल कोई न कोई बंदोबस्त हो जाएगा.”
“ओह! फिर मैं स्कूल से कैसे आऊंगी? क्या व्योम तुमसे इतना भी नहीं हो पाता है, सुबह तो मैं बस से आ गई, अब फिर बस से जाऊ!एक तो बीस किलोमीटर दूर के प्राइमरी स्कूल में टीचर की नौकरी करो, फिर घर आकर बच्चों को देखो. ज़िंदगी आफ़त हो गई है. बाहर इतनी तेज धूप है, बस से कैसे जाऊंगी घर!
तुमको तो दिनभर बैंक के एयरकंडीशंड कमरे में बैठना है. तुम मेरी परेशानी क्या समझोगे.”
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फोन रखा ही था कि उसके कक्षा की बच्ची स्नेहा अपनी कॉपी दिखाने आ गई.
“ये क्या स्नेहा, तुमने फिर से अपना गृहकार्य पूरा नहीं किया. कल तुमसे कहा था कि अपने पापा को लेकर आना. कहां हैं वो, कब आएंगे?”
स्नेहा चुपचाप सिर झुकाकर खड़ी हो गई.
“बोलो स्नेहा, अब तुम फिर चुप हो गई. कब आएंगे तुम्हारे पापा?”
“पापा, नहीं आ सकते.”
“क्यों?
“पिछले साल शहर में मकान बनाते समय छत पर से गिर गए थे, तब से चल नहीं पाते हैं.”
“ओह! तब अपनी मां को बुला लाना.”
“पापा घर में रहते हैं तो अब मां ही काम करने जाती हैं. शाम को घर आती हैं. बहुत थक जाती हैं.”
भावुक होकर नेहा ने कहा, “अच्छा कोई बात नहीं, लेकिन अपना काम पूरा कर लिया करो बेटा. बार बार अभ्यास करोगी तब तुम्हें सही से लिखने आ जाएगा.”
स्नेहा स्वीकृति में सिर हिलाकर जाने लगी तो नेहाने पूछा, “घर पर और कौन है तुम्हारे?”
“मेरा छोटा भाई है, पहली कक्षा में पढ़ता है आकाश.”
“अच्छा आकाश तुम्हारा भाई है. उसका काम तो हमेशा पूरा रहता है. बहुत तेज बच्चा है.”
स्नेहा ने गर्वमिश्रित ख़ुशी के साथ कहा, “जी मैम, जब हम खाना बनाते हैं तो उसको अपने संग बैठाकर उसका गृहकार्य पूरा करा देते हैं.”
आज नेहा को बस से वापस लौटने में किसी भी कष्ट का आभास नहीं हो रहा था.!आठ साल की स्नेहा की ज़िंदगी पर पड़ रही तेज धूप के बारे में सोच कर उसकी आंखें बरस रही थीं.
– पल्लवी विनोद

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