दोनों की आंखें मिलीं, दोनों घबरा गए. इस घटना के पीछे कितनी घटनाएं हैं. इस छोटी सी बात के पीछे जो पुष्पा से अनजाने में हो गई थी. कितनी अनुभूतियां हैं, कितने सिलसिले हैं, कितनी कड़ियां हैं.
राम की झांकी निकली तो वह भी दर्शन करने लोगों के साथ सड़क पर निकल आई. राम का रथ पूरी परंपरा के साथ सजाया गया था. राम, लक्ष्मण और सीता के साथ अयोध्या वापस आ रहे थे. उनके चेहरे पर अजीब आभा थी.
हर साल की तरह यह बस्ती अयोध्या नगरी बनी हुई थी और इस के वासी अपने प्यारे राम के दर्शन करने के लिए काम-काज छोड़ कर खड़े थे. आकाश गूंज रहा था ‘सिया राम की जय’.
इस वातावरण में खो कर पुष्पा भी आगे बढ़ी औरउसने राम के चरण छू लिए, पल भर के लिए वह भूल गई कि वह आदमी जो राम की भूमिका कर रहा है, उसका पति है और इस अनहोनी घटना को चौंक कर उसके पति ने भी देख लिया. दोनों की आंखें मिलीं, दोनों घबरा गए. इस घटना के पीछे कितनी घटनाएं हैं. इस छोटी सी बात के पीछे जो पुष्पा से अनजाने में हो गई थी. कितनी अनुभूतियां हैं, कितने सिलसिले हैं, कितनी कड़ियां हैं. दोनों को महसूस हुआ कि कहीं कोई शाखा टूट गई है.
पुष्पा को पाने के लिए जगदीश ने शिव की कमान राजा जनक के दरबार में नहीं तोड़ी थी, लेकिन ज़िंदगी के रण में उसे जो संघर्ष करना पड़ा, अगर ख़ुद राम देखते तो वह इस स्वयंवर के लिए तैयार न होते.
विभाजन के बाद के वह दिन थे. जगदीश अपनी मां और दो बहनों के साथ (शरणार्थी) कैंप में रहता था. घर में वही एक मर्द था. मां उसकी ज़िंदगी बन गई थी. जगदीश का जिस्म गठीला और क़द ऊंचा था.
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मां उसको सामने बैठा कर इस चाव से खाना खिलाती थी, जैसे वह अपने पत्ति को खिलाया करती थी.
जगदीश सर्कस के घोड़े की तरह काम करता. कॉलेज से लौटता तो ट्यूशन करता, परिवार के लिए अनाज लाता, अपनी बहनों को स्कूल का ख़र्च देता कुछ ही दिनों में सिफ़ारिश से वह एक बैंक में लग गया. अब वह प्राइवेट कॉलेज में जाने लगा.
एक दिन उसकी मां हमेशा की तरह चौके में बिठाकर उसे खाना खिला रही थी कि वह बेइख्तयार रो पड़ी. जगदीश ने हाथ रोक लिया, वजह पूछने पर उसकी मां और ज़ोर से रोने लगी, छाती पीटने लगी. जगदीश पूछता और वह रोती. उस रोज़ जगदीश ने खाने की प्लेट पटक दी. मिट्टी का घड़ा तोड़ दिया और अपना सिर दीवार से मारने लगा. भीड़ जमा हो गई. तब मां हिचकियां ले कर बोली, “मेरे बेटे का सोने जैसा शरीर मिट्टी हो गया है, हाय जिसे मैने, एक राजकुमार बनाया था, दुनिया ने उसकी शक्ल बिगाड़ दी है.”
उस दिन के बाद जगदीश ने अपने बारे में सोचा. उसे अपने वजूद का ख़्याल आया. उस एक फ़िक्र ने उसकी ज़िंदगी बदल दी, इसके कारण उसने मां से रिश्ता तोड़ दिया. उसने अपने चेहरे को आईने में देखा. वह उसचेहरे को अपनाने की कोशिश करता रहा. अब उसे अपने आप से नफ़रत हो गई. काम से नफ़रत हो गयी. सूरज से नफ़रत हो गई, जो रोज़ उसके सिरहाने आकर खड़ा हो जाता है. दिन से नफ़रत हो गई जो रोज़ नए तकाजे ले कर आता है. तब उसकी ज़िंदगी में पुष्मा दाख़िल हुई.
पुष्पा का परिवार शरणार्थी होने के बावजूद मालदार था. जेवर पैसा था, लेकिन उन दिनों वर का मिलना कठिन था. पुष्पा ख़ूबसूरत थी. हंसमुख थी. घरवालों ने काफ़ी दहेज़ पैसा दे कर पुष्पा को ब्याह दिया. पुष्पा से विवाह करके जगदीश को एहसास हुआ कि उसकी ज़िंदगी में एक कारण पैदा हो गया है जीने का एक बहाना मिल गया है. उसने तय कर लिया कि वह पुष्पा को ख़ुश रखेगा, चाहे उसे शिवजी की कमान का चिल्ला क्यों न चढ़ाना पड़े.
अब वह बैंक के डिपार्टमेंटल इम्तहानों में मसरूफ़ हो गया. एक के बाद एक मंज़िल पार करता गया. धीरे-धीरे उसकी कनपटियों के बाल सफ़ेद हो गए और आंखों के नीचे कालापन छा गया. ज़िंदगी में धु़ध छाने लगी. चीज़ें बिखरने लगीं, ताल्लुक टूटने लगा. पुष्पा को ख़ुश रखने की बजाय वह उसके और अपने बीच एक दरार पैदा कर बैठा. और जिस दिन वह डिपार्टमेंटका इंचार्ज बना, उसे काम से विरक्ति हो गई. ख़ुद ज़िंदगी से बैराग हो गया.
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फिर उसने राम की भूमिका अदा की. कनपटियों के बालों को काला किया गया. आंखों में काजल लगाया गया. होंठों पर हल्की-सी सुर्खी और जब वह कमान ले कर रथ पर बैठ तो बस्तीवालों को लगा कि ख़ुद राम साक्षात रूप में प्रगट हुए हैं. आंखों में बैराग तो पहले से था, ज़िंदगी से विरक्ति तो पहले ही हो गई थी. आधे चांद की मुस्कुराहट उसके होंठों पर ख़ुद-ब-ख़ुद किसी पंछी की तरह बैठ गई थी. अब राम की तस्वीर मुकम्मल थी. जगदीश ने बाहरी ज़िंदगी से संबंध तोड़ कर, अंदरुनी ज़िंदगी से रिश्ता जोड़ लिया था. सच्ची और असली ज़िंदगी को छोड़ कर, बनावटी ज़िंदगी को अपना लिया था.
हर साल राम की झांकी निकलती, हर साल भीड़ उसके चरण छूती, हर साल आकाश गूंजता.
जब वह मेकअप उतार कर, अपने कपड़े पहन कर घर पहुंचा तो हैरान रह गया कि घर का दरवाज़ा खुला है और उसकी मां कौशल्या की तरह पृथ्वी पर पछाड़ खा रही है, रो रही है, चिल्ला रही है.
“राम, तेरी सीता का हरण हो गया है. कोई रावण उसे उठा कर ले गया है.”
लोगों की आंखों में अश्रुधारा थी. माताएं घरों से बाहर आ गई थीं. बूढ़ी औरतें ऐसे देख रही थीं जैसे उनका राम बनवास पर जा रहा है. लेकिन वह तो कब से बस्ती में रहकर बनवास काट रहा था. वह राम नहीं था. उसकी पत्नी सीता नहीं थी.
वह आदमी रावण नहीं था.
और उसके सामने कोई लंका नहीं थी, जिसे वह जीत सके. सिर्फ़ बेमानी, बेमतलब ज़िंदगी थी, जिसका अंत नहीं था.
– सागर सरहदी
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