पैरेंट्स की 5 ग़लतियां

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बदलती लाइफस्टाइल में बड़ों के साथ ही बच्चे भी तनावग्रस्त होते जा रहे हैं. पढ़ाई की टेंशन और पीयर प्रेशर के साथ ही बच्चों के तनाव का एक कारण पैरेंट्स का प्रेशर भी होता है. बच्चे को ख़ुश और स्ट्रेस फ्री रखने के लिए पैरेंट्स को किन ग़लतियों से बचना चाहिए? बता रही हैं कंचन सिंह.

जरा याद कीजिए अपना बचपन, 4-5 साल की उम्र में आप क्या करते थे? पड़ोस/गली के बच्चों के साथ धमा-चौकड़ी मचाते होंगे, शायद ही आपके माता-पिता छड़ी लेकर होमवर्क करवाने के लिए आपके सिर पर खड़े रहते होंगे… अल्फाबेट्स और पोएम के बारे में भी शायद ही आपको कुछ पता होगा… मगर आजकल के बच्चों को वो सुकून नसीब नहीं है. डेढ़-दो साल की उम्र से ही प्ले स्कूल, फिर नर्सरी, केजी यानी पढ़ाई का सिलसिला शुरू हो जाता है. इतना ही नहीं, इसी उम्र से बाकी बच्चों से बेहतर करने के लिए पैरेंट्स भी उन पर दबाव डालना शुरू कर देते हैं. यदि आप भी ऐसा करते हैं, तो अब ख़ुद को थोड़ा बदलिए और फ़र्क़ देखिए.

मिस्टेक 1- आजकल के पैरेंट्स की सबसे बड़ी ग़लती है बच्चे के साथ क्वालिटी टाइम न बिताना. कई घरों में तो डिनर टेबल पर भी बच्चे पैरेंट्स के साथ नहीं बैठते, क्योंकि उस व़क्त वो किसी और काम में बिज़ी रहते हैं. ऐसे में माता-पिता को पता ही नहीं चलता कि उनके बच्चे की ज़िंदगी में क्या चल रहा है.
क्या करें? बड़े शहरों व मेट्रो सिटीज़ में कामकाजी होने के चलते पैरेंट्स के पास बच्चों के लिए ज़्यादा व़क्त नहीं रहता. ऐसे में कम से कम डिनर साथ में करने की आदत डालें ताकि खाना खाते समय ही सही, पर आप बच्चे के साथ हों और उससे बातचीत कर सकें. आप बच्चे से जितना ज़्यादा बात करेंगे आपका रिश्ता उतना ही मज़बूत बनेगा और कोई समस्या होने पर बच्चा बेझिझक आपसे बोल सकेगा.

मिस्टेक 2- एग्ज़ाम में अच्छे मार्क्स लाने पर गिफ्ट के रूप में अधिकतर पैरेंट्स बच्चों को मोबाइल, आइपैड या उसकी कोई भी पसंदीदा चीज़ दे देते हैं. ये सुनने में भले ही अच्छा लगे, मगर पैरेंट्स का ये तरीक़ा सही नहीं है. ज़्यादातर पैरेंट्स स़िर्फ मार्क्स देखते हैं, कई बार ऐसा भी होता है कि बच्चे ने तो अपनी तरफ़ से पूरी मेहनत और लगन से पढ़ाई की, मगर अच्छे नंबर नहीं आए. ज़रा सोचिए, ऐेसे में आपके लाड़ले/लाड़ली के दिल पर क्या बीतेगी.
क्या करें? बच्चे ने जो हासिल किया उसके लिए उपहार देने की बजाय लक्ष्य को पाने के लिए उसके द्वारा की गई मेहनत की तारीफ़ करें और उसका हौसला बढ़ाएं. भले ही वो अपने लक्ष्य में सौ फीसदी सफल न रहा हो, मगर उसने अपनी तरफ़ से कोशिश तो की. अतः अगली बार उसे उसकी कोशिश के लिए इनाम दें, न कि रिज़ल्ट के लिए.

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मिस्टेक 3- अक्सर पैरेंट्स अपने बच्चे की तुलना उसके दोस्तों या भाई-बहन से करते हैं. उन्हें लगता है कि ऐसा करके वो बच्चे को बेहतर करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं, मगर इसका उल्टा असर होता है. बार-बार ऐसा करने पर बच्चे को लगता है कि उसकी कोई अहमियत नहीं है और वो ख़ुद को अयोग्य समझने लगता है.
क्या करें? हर बच्चा अलग होता है और हर किसी की अपनी क्षमता/योग्यता होती है. पैरेंट्स होने के नाते आपको उसकी क्षमताओं का ध्यान रखते हुए उसे प्रोत्साहित करना चाहिए. साथ ही उसे इस बात का भी एहसास कराएं कि वो जैसा भी है. आपके लिए सबसे ख़ास है. दूसरों से उसकी तुलना करने की आदत छोड़ दीजिए.

मिस्टेक 4- घर और ऑफिस के काम के बाद आप भी थोड़ा रिलैक्स होकर ख़ुद को रिचार्ज करते होंगे यानी अपना कोई पसंदीदा काम, जैसे- म्यूज़िक सुनना, गेम खेलना, बुक पढ़ना आदि. इससे आप फ्रेश महसूस करते हैं और दोबारा नई ऊर्जा के साथ काम कर पाते हैं. इसी तरह बच्चों को भी ख़ुद को रिचार्ज करने के लिए थोड़ा खाली समय चाहिए, जिसमें स्कूल/ट्यूशन के होमवर्क से अलग वो अपना मनपसंद काम कर सकें. वैसे आजकल के बच्चों के पास समय की बहुत कमी है, क्योंकि स्कूल/ट्यूशन से आने के बाद वो अपने गैजेट्स में बिज़ी हो जाते हैं. अतः पैरेंट्स को हमेशा बच्चे के पीछे नहीं पड़ना चाहिए.
क्या करें? हर पैरेंट्स की ये ज़िम्मेदारी है कि बच्चे की बाकी ज़रूरतों का ध्यान रखने के साथ ही इस बात का भी ध्यान रखें कि उनके लाड़ले/लाड़ली को हर रोज़ थोड़ा समय उनके मनमुताबिक काम के लिए भी मिलना चाहिए. इस खाली समय में वो चाहें तो बाहर खेलने जाएं, म्यूज़िक सुनें या फिर दोस्तों के साथ टाइम पास करें. यदि आपको लगे कि बच्चा तनाव की वजह से ठीक से सो नहीं पा रहा है, तो सोने के क़रीब एक घंटे पहले से ही उसे मोबाइल, लैपटॉप, आइपैड आदि से दूर रहने को कहें. गैजेट्स के ज़्यादा इस्तेमाल से बच्चों की नींद और सेहत प्रभावित होती है, ये बात कई रिसर्च से भी साबित हो चुकी है.

मिस्टेक 5- एग्ज़ाम पीरियड में बच्चों का तनावग्रस्त होना आम बात है, मगर तनाव का असर यदि उनके व्यवहार पर बहुत ज़्यादा और लंबे समय तक दिखने लगे, तो इसका मतलब है कि आपका बच्चा उस सिच्युएशन से अच्छी तरह डील नहीं कर पा रहा है. स्ट्रेस के कारण बच्चे बहुत थके हुए दिखते हैं, खाना नहीं खाते, उदास और रोने जैसी शक्ल बनाए रहते हैं. साथ ही उन्हें सिरदर्द की भी शिकायत हो सकती है. अतः पैरेंट्स को इन संकेतों को नज़रअंदाज़ करने की ग़लती नहीं करनी चाहिए.
क्या करें? बच्चे को समझाएं कि एग्ज़ाम उनकी ज़िंदगी का एक हिस्सा है, पूरी ज़िंदगी नहीं. यदि वो अच्छे ग्रेड नहीं ला पाते, तो इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. अगली बार वो फिर कोशिश कर सकते हैं या उनके पास और भी विकल्प रहेंगे. अतः एग्ज़ाम की तैयारी रिलैक्स होकर करें, तनाव लेकर नहीं. यदि समस्या ज़्यादा गंभीर लगे तो काउंसलर की मदद लें.