
"नई पीढ़ी है, नई स्थितियों के हिसाब से उनमें नई सोच विकसित हो रही है, क्या ग़लत है? हमें उन्हें ध्यान से सुनना, समझना होगा. डर के नहीं आत्मविश्वास से अपने विचार कहने देना चाहिए. अभिव्यक्ति की आज़ादी, जीवन के अहम फ़ैसलों में अपना मनचाहा करने की स्वतंत्रता क्या हम भी जवानी में नहीं चाहते थे? हम ग़लत तो नहीं थे अपनी पीढ़ी के हिसाब से सही ही थे. हर बात बड़ों की सही छोटों की ग़लत ऐसा नहीं होता!"
"शिवि कहां है तू दूध देख तो रही है ना?" अद्रिजा ने घबराकर बाथरूम से शिवि को पुकारा था.
"हां मम्मी बिल्कुल वही हूं..."
'हये हये...' बुदबुदाती शिवि दांतों तले उंगली दबाए, दबे पांव भाग कर किचन में आ गई थी. "मम्मी को भी न इस समय नहाने क्यूं जाना होता है? और दूध भी जाने क्यूं रधिया के जाने के बाद आता है... इससे पहले मम्मी आ जाए मुझे फटाफट सारी सफा़ई कर डालनी होगी..." फैले हुए दूध को देखकर उसका माथा चकरा रहा था. प्लेटफार्म, स्टोव सब.. उसने मम्मी के बाहर निकलने से पहले ताबड़तोड़ प्लेटफार्म चमकाने में लग गई. साफ़ कर उसने राहत की सांस ली थी. मम्मी अभी नहीं निकली थीं. सोचने लगी, 'वह क्यूं करती है ऐसा. दूध इतनी देर से देख रही थी अचानक क्या याद आ गया जो फट चली गई. एक बार हो तो एक बार कितनी ही बार..! अरे बस दो ही सेकंड को गई थी वहां जाकर कुछ और याद आ गया. क्या करूं इस दिमाग़ का उसने अपने सिर पर चपत लगाई. जाने क्यों होता है मेरे साथ ऐसा. आज तो दूध उबलते-उबलते गाढ़ा होके हल्का-हल्का गुलाबी ही हो गया है. कुछ तो करना पड़ेगा इसका वरना...'
पहले तो उसने दूसरा पैकेट उबालने रख दिया. उसने सूजी ढूंढ़ते हुए चावल का आटा निकाला था. बस फिर क्या उसे देशी घी और मुट्ठी भर मम्मी के कटे रखे मेवे डालकर थोड़ा भुना-भाना और फिर दूध के भगोने में सब डाल कर उबाला. चीनी इलायची भी मिला दी. फिर फूंकते हुए चखा, "वाह क्या बात है. वाह मान गए क्या खीर बनाई है शिवि. विनी दी ही नहीं मम्मी मैं भी वेरी गुड कुक हूं." कहते हुए एक ओर छुपा कर रख दिया.
शाम को सरप्राइज़ दूंगी मैं भी किचन में कुछ बढ़िया बना सकती हूं. मम्मी पापा को मज़ा आएगा. और दूसरा पैकेट दूध उबल चुका था उसने गैस बंद कर दी.
अद्रिजा बाहर आई उसने देखा शिवि किचन में ही है. उसने दूर से ही आवाज़ दी, "क्या हुआ तू तैयार नहीं हुई? दूध उबालने में कितना टाइम लगता है. मार्केट तुझे भी जाना है ना कि भूल गई."
"हां मम्मी बस आप दीया जला लो, मैं तैयार ही हूं." वह स्टोल गले में डाल फटाफट सैंडल पहन के बाहर आ गई.
"मैं गाड़ी निकालती हूं."
"अरे रुक तो शिवि... कैसी लड़की है तू, आईना नहीं देखा ऐसा कैसे हो सकता है?" वह हंसे ही जा रही थीं.
"फेस पैक लगे जाएगी मार्केट?" शिवि की उंगलियां अपने चेहरे पर चली गईं.
"ओह नो, आपने मुझे दूध उबालने में उलझा दिया.. मुझे... मुझे तो... उफ्फ़!" वह अपनी मूर्खता पर खीजते हुए भी ठुनकी, फिर सरपट अंदर भागी.
"अभी आई माॅम... आप गाड़ी में बैठो." वह चाभी थमाते हुए धड़ाधड़ सीढ़ियों पर चढ़ती फिसल गई, "हये मम्मी!" तो अद्रिजा बोल उठीं,"देख सम्भल के शिवि... क्या करती है, इतनी हड़बड़ाहट अच्छी नहीं तेरी. लगी न चोट?.. विनी जितनी समझदार है उतनी ही तू भिल्लड़ और भुलक्कड़!"
शाम को फ्रिज के कोने से निकालकर जब ठंडी गुलाबी खीर का अपना सरप्राइज़ पापा-मम्मी के सामने रखा तो शुगर होने के बावजूद भी उन्हें खीर एक-एक चम्मच तो खाना ही था, जो पहली बार अपनी शिवि ने बनाई थी. खीर वास्तव में बहुत स्वादिष्ट बनी थी.
"कब कैसे किससे बनाई, शिवि बढ़िया नहीं बहुत बढ़िया है."अद्रिजा हैरान थीं.
"तुम बेकार ही परेशान होती हो अद्रिजा अपनी शिवि, विनी जैसी ही समझदार है जब करना चाहेगी तो सब कर लेगी.. सबको बताऊंग!" उनके चेहरे पर हर्ष और संतुष्टि के भाव से खिले थे.
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'चलो शुक्र है डांट भी नहीं पड़ी और पापा को इतनी पसंद आ गई मेरी खीर कि सब जगह मुझे फेमस करके छोड़ेंगे.' शिवि प्रसन्नता से आश्वस्त हुई. अभयेन्द्र वास्तव में उसकी ठंडी गुलाबी खीर खाने के लिए हर तीसरे चौथे किसी न किसी को न्योता ही दे आते.
जब शिवि के रिश्ते की बात चली तो अद्रिजा एकबारगी चिंतित हो उठी, "राम जाने क्या होगा इस लड़की का... जाने कैसी ससुराल मिलेगी... कैसे निभा पाएगी. थोड़ी चंचल, जल्दबाज़ और मुंहफट जो है.. पर सोच-समझ में हम सबसे बहुत आगे. मुझे कहती रहती है आपकी पीढ़ी की महिलाएं यदि आत्मनिर्भर होतीं तो ग़लत बातों के आगे कभी झुकना नहीं पड़ता... वैसे एमबीए कर जाॅब पकड़ लेती फिर ही इसकी शादी होती इसके लिए वही सही होता. आज ज़रूरी भी है लड़कियां शादी से पहले अपने पैरों पर खड़ी हो जाएं. अब तो मेरे भी ये ही विचार हैं. पर इसके पापा अपनी ज़िद के आगे किसी की मानते नहीं. बस सही घर-वर मिल जाए तो अपनी ज़िम्मेदारी पूरी हो जाए...' यही रट लगा रखी है उन्होंने... सोचती हुई अद्रिजा जाकर गाड़ी में बैठ गई थी.
विनी तो अपनी ससुराल में, अपने सुंदर व्यवहार आचार से ख़ूब नाम क्या पूरी धाक जमा ली है सब पर. इसकी भी अच्छे परिवार में शादी हो जाए. अपने ससुरालवालों के दिल जीत ले, यही प्रार्थना है राम जी से. कल इसे देखने लोग आ रहे हैं, कुछ गड़बड़ ना करें. बता दूंगी इसे तो कहीं फिर हाय-तौबा मचा करके किसी सहेली के घर भाग न जाए पिछली बार की तरह... अभी उसे रिश्ते की बिल्कुल सुन गुन नहीं है. वो तो मुंबई जाकर एमबीए जाॅइन करने की तैयारी में जुटी है, तभी तो कुछ ढंग के नए कपड़े लेने के बहाने माॅल जाने को तैयार हुई है.
"आ जा शिवि कहांं रह गई?" सोचते हुए अद्रिजा ने बाहर से आवाज़ लगाई थी. शिवि झटपट आई और धम्म से ड्राइविंग सीट पर आ बैठी, "हय हय मम्मी कितनी गर्मी है गाड़ी में, शीशे तो खोल लेतीं... अब रहने दीजिए उसने गाड़ी का एसी ऑन कर दिया था. कार सरपट भागते हुए माॅल पहुंच गई. हड़बड़ाहट में पार्क करते समय पहले रास्ता बताने वाले को फिर कार से निकल रहे युवक को वह टक्कर मारती चली गई.
"क्या करती हो मैडमजी? मुझे तो मुझे साब जी को भी ठोंक दिया." पार्किंग मैन चिल्लाया.
"हये हये... अरे कुछ ज़्यादा लगी तो नहीं ना.. ख़ामखां क्यों शोर मचा रहे हो! कहां लगी दिखाओ. बताशे जैसे नाज़ुक हो क्या तुम और तुम्हारे साब. हमसे हो गई ग़लती भई सॉरी बोल रहे हैं न!.. अब बच्चे की जान लोगे क्या? चलो चलो रास्ता दो." उसने दूर युवक को भी उचटती नज़रों से देखते हुए कहा.
"... चलो मां आप तो उतरो, क्या करतीं हैं आप. चलिए चलिए जल्दी, इन फ़ालतू झमेले को छोड़िए... लगी-वगी कुछ नहीं फ़ालतू के पैसे ऐंठने के चक्कर में रहते हैं लोग."
वह युवक उसे ही देख रहा था, 'अजीब ही लड़की है... ये मिस हाय तौबा!' मन में सद्य: हुए उसके नामकरण से ही उसके होंठों पर मुस्कान तैरने लगी.
अद्रिजा युवक के समीप चली आई, "सॉरी वह थोड़ी जल्दबाज़ है, हड़बड़ी में कभी गड़बड़ी कर जाती है. शुक्र है ज़्यादा लगी नहीं."
"कोई बात नहीं आंटी... आप जाएं मैं ठीक हूं." उसने हाथ हटाते हुए कोहनी सीधी की.
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अद्रिजा सोच रही थी कि चेहरा तो जाना-पहचाना लग रहा है लड़के का... वह सोचते हुए शिवि के पीछे सीढ़ियां चढ़ रही थीं. अरे हां, ये तो सत्यम के फोटो से ही थोड़ा-थोड़ा मिल रहा है, मोहिनी जी का डाॅक्टर बेटा जो कल देखने आ रहा है. कहीं यह उसी का भाई तो नहीं.
शर्मा जी ने ज़्यादा तो कुछ बताया नहीं, बस लड़का शिवि के लिए पसंद कर लिया है. अपने बाॅस की बीवी मोहिनी जी की ही चर्चा करते रहते हैं ये अक्सर. कहते हैं, "उन्हें अपने बेटे के लिए अपनी शिवि बहुत पसंद आ गई . बस तभी से इस रिश्ते का मन बना लिया. लड़के से एक बार मिला हूं भला है सिम्पल है."
अद्रिजा पति अभयेन्द्र की बातें मन ही मन दोहराए जा रही थी.
बस एक बार उनके बेटे सत्यम् को भी पसंद आ जाए. राम जी भली करें.
"कहां खो जाती हो मम्मा जल्दी आओ ना." "शिवि रुक तो, साथ साथ चल, एस्क्लेटर पे डर लगता है."
"आप भी न मम्मा. अकेले सब;कुछ करने की आदत डाल लीजिए. दीदी अपनी ससुराल गईं और मैं चली मुम्बई एमबीए के लिए तो क्या करोगी आप?"
"तू मुम्बई जा या ससुराल, अरे हैं न तेरे पापा साब."
"मैंने बोला था न ससुराल का नाम मत लेना मम्मा." वह उसे चिढ़ा हुआ देख थोड़ा हंसी थीं. सारी ख़रीदारी हो गई तो वे पैकेट थामे बिलिंग काउन्टर पर आ गए.
"ये क्या इसमें कट लगा है मैडम. आपने देखा नहीं चेंज कर आइए."
"हाय हाय कमाल है आप लोगों का. अरे तो ऐसा सामान रखते ही क्यूं हो सजाकर इतने सारे काम करनेवालों को अम्बानी जी मुफ़्त के पैसे देते हैं क्या? ठीक से अपना काम क्यूँ नहीं करते? अब मैंने सामानों की भीड़ में जाने कहां से उठाया था कहांं ढूंढूंगी?"
"आइए मैडम मैं आपको ले चलती हूं." एक कर्मचारी सहयोगी उसे ले के चली थी.
"मम्मा तब तक बाकी की बिलिंग करवाइए, वरना लाइन में पीछे हो जाएंगी ओके." वह चली गई. तभी एक लड़का जल्दी में लग रहा था.
''अरे कोई बात नहीं बेटा आप पहले करवा लो?हम इकट्ठे करवा लेंगे. उसने देर से पीछे खड़े उस लड़के को देखते हुए कहा था, जिससे नीचे गाड़ी टकराई थी.
"ओके... थैंक्यू आंटी." वह लड़का अपने सामानों की बिलिंग करवाने लगा. जब तक शिवि चेंज करके भागती हुई दूसरा पीस ले आई.
बिलिंग करवा कर जा रहे उस लड़के से फिर टकरा गई.
"ओह सम्भल के मिस हाय तौबा." वह मुस्कुराते हुए धीरे से बोला था.
"कुछ बोला मुझसे आपने मुझे? ख़ुद भी तो देखकर चल सकते थे." नहीं के अंदाज़ में उसने मुंह बनाया.
कुछ न बोलना ही सही, खामख़्वाह फिर शुरू हो जाती मिस हाय तौबा!
दो लोग अद्रिजा के आगे खड़े हो चुके थे.
"बोला था न मम्मी आप बाकी सामानों को तो करवा लेतीं. लोग तो ऐसे ही है सही हों न हों घुसे चले जाएंगे." उसने ताना कसते हुए मुंह बनाया.
"अरे इन्हें मैंने ही आगे कर दिया, जाते तो हम दोनों ही एक साथ बाहर." अद्रिजा ने उसे चुप रहने का इशारा किया. जा रहा वो लड़का अपनी ट्राली ले जाते हुए उसे देखकर मुस्कराया. तो शिवि जल-भुन गई जैसे वो उसके आगे अपनी जीत का झंडा गाड़ दिया ह.
वे फिर से कार के पास आ गए. शिवि बेफ़िक्री से डिक्की खोल पैकेट्स गाड़ी में डालने लगी. कार में रखते समय शुभम् की नज़र एक पैकेट के अंदर पड़ी थी, 'अरे ये तो... इसमें लड़की के कपड़े हैं मेरा सोबर मगर फ्लैशी कुर्ता-पजामा कहां गया बड़ी मुश्किल से अपने लिए एक ही पसंद आए था. दूसरे पैकेट्स देखें.
"शुक्र है भइया का तो है ये लम्बा चौड़ा साइज़." वह भागकर ऊपर काउन्टर पर गया था. "जाने क्यूं भैया ने मुझे अपने चक्कर में फंसा दिया."
"लगता है शायद ग़लती से काउन्टर पर रखे उन मैडम का पैकेट आपने उठा लिया. जल्दी जाइए उधर...क्षथोड़ी देर पहले निकली हैं!"
शुभम् उस तरफ़ दौड़ा. नीचे पार्किंग बेसमेंट में पहुंचा तो शिवि की कार दूर बाहर जाती हुई दिखी!" माय फुट कल क्या पहनूंगा? मम्मी ने ख़ासतौर पर कहा था.कि लंदन वाला नहीं बन के जाना, बढ़िया कुर्ता-पजामा ख़रीद के आ. भइया के लिए लड़की देखने हमारे साथ तुझे भी जाना है. पसंद आ गई तो उसी समय इंगेजमेंट कर देंगे."
ऊपर जाकर काउंटर पर ही उसने पैकेट वापस रख दिया.
"भाई अगर कोई पैकेट बदलने आएगा तो मुझे कलेक्ट करने के लिए इस नम्बर पर कॉल करवा देना."
"ओके श्योर सर. चांस की बात है सर प्राइस दोनों की सेम थी." कहते हुए वह मुस्कुराया. उधर अद्रिजा ने घर पहुंच कर पैकेट्स खोले तो शिवि का घाघरा चोली सेट नदारत था.
"शिवि देख तू फिर भूल गई कहां है तेरा घाघरा चोली सेट? डिक्की में देख के आ."
"अच्छा हुआ पहले ही कह रही थी मुम्बई में इतनी चमकदार घाघरा-चोली का क्या करूंगी मैं, पर आप हैं कि मानी नहीं. आपको इतना जाने क्या पसंद आ गया था... नीचे देख के आती हूं..." उसने बुरा सा मुंह बनाया.
"नो नो नो मम्मा किसी से पैकेट बदल गया. ये जेंट्स फ्लैशी कुर्ता-पजामा... वाह! पसंद तो है लाजवाब जिसकी भी, पर अक्ल शायद टखने में ही होगी." वह कार चेक कर आ गई थी.
"अरे तेरी भी तो अक्ल ख़ूब ही है अब कल क्या पहनेगी?"
"कल... क्यों मुझे क्या पहनना है?"
"कल तुझे देखने लड़केवाले आ रहे हैं... इस बार कोई शरारत नहीं... बहुत बढ़िया परिवार है. नेक लड़का है." पापा अभयेन्द्र प्रवेश करते ही अपनी गंभीर आवाज़ में बोले थे.
"मगर पापा... मैं... मुम्बई... एमबीए..! ऐसे कैसे? शादी...नहीं...मैं...नहीं..." अभयेन्द्र ने उसे अपने मुंह पर उंगली रख कर आंखें दिखाई थीं.
"नाॅट फे़यर पापा! मुझे कोई शादी-वादी नहीं करनी. मुझे एमबीए ही करना है बस..." वह रूठकर पांव पटकती अपने कमरे में चली गई.
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"कौन सी अभी हो रही है शादी उन लोगों को तेरे एमबीए से कोई परेशानी नहीं. हां बस लड़के को तू पसंद आ जाए तू पढ़ाई कान्टिन्यू रखना. जा माॅल जा अपना पैकेट ले के आ, जिससे बदला है वो भी वापस करने आएगा ही."अद्रिजा ने उसे समझाने की कोशिश की.
शिवि चली गई तो अभयेन्द्र ने अद्रिजा को बताया कि मैडम मोहिनी ने शिवि की फोटो मेरे लैपटाप पर देखी थी. उन्हें बहुत पसंद आई,. उन्होंने बताया कि वो अपने डॉक्टर बेटे के लिए लड़की ढूंढ़ रही हैं. बात-बात में उन्होंने यूंं ही बताया था कि उनके डॉक्टर बेटे को खीर बहुत पसंद है तो मैंने झट अपनी शिवि की बनाई गुलाबी खीर की तारीफ़ कर दी थी.
उन्होंने कहा, "अगर मेरे बेटे ने पूरा बाउल आपकी बेटी की बनाई खीर पसंद से खा ली तो समझिए लड़का आपका हुआ." बस तभी से इस रिश्ते का मन बना लिया."
"शिवि सब कुछ रेडी हो गया है बस अब तू तैयार हो जा समझी. शुक्र है तेरा ड्रेस तुझे मिल गया. लो ऋतु भी आ गई. पार्लर तो तू जाती नहीं उसे यहीं बुला दिया तेरी मदद करेगी. अब जा जल्दी एक घंटे का टाइम है अभी."
"चल शिवि मुंह क्यूंं फुलाए है. देर न कर आ चल." ऋतु उसे पकड़कर अंदर ले गई.
"अरे यार ऐसे कोई लड़की देखता है आजकल... पुराने ज़माने का पिछड़ू द्दीन लगता है. मिलना ही था तो बाहर कहीं मिल लेता, देख लेता मेरी शकल और अकल भी." उसने आंखें भैंगी बना ली थी तो ऋतु हंस पड़ी.
"... अरे मांग लेता फोन नंबर मेरा पापा से या बोल देता किसी जीवनसाथी डॉट काम पर बात करने को... मैं जगह टाइम फिक्स कर अपने विचार बता देती कि मुझे शादी-वादी नहीं करनी है."
"चल चल जल्दी कपड़े बदल, मैं तेरा मेकअप करती हूं और बाल बनाती हूं... चल न आंटी से डांट खिलवाएगी क्या?" उसने बेड से शिवि को उठाया. फिर किसी तरह ज़ोर-ज़बरदस्ती कर उसकी तैयारी में जुट गई.
"अब देख खड़ी होकर आईना देख, कितनी प्यारी लग रही है. तू और तेरा घाघरा तो गज़ब ढा रहा है. वाह देखते ही वो बंदा फ्लैट हो जाएगा!" ऋतु उसे पकड़ कर झूम उठी.
"कुछ गड़बड़ मत करना शिवि मैं आंटी को बुलाती हूं." वह बाहर आई.
"हो गई तैयार शिवि चल के देखिए कितनी प्यारी लग रही है. अच्छा मैं चलती हूं आंटी कस्टमर छोड़ के आई हूं. वेट कर रहे होंगे मेरा.
"अरे रुक तो कुछ खा के..."
"पूरा डिब्बा मिठाई खाऊंगी आंटी शादी पक्की होने के बाद! आप देखिए उसे अभी मूड बहुत सही नहीं उसका. मैं आती हूं कल." ऋतु चली गई. शिवि तैयार हो अनमनी ही मुंह फुलाए बैठी थी.
"चल न शिवि आ चल के किचन में एक बार सब चख कर कन्फर्म कर ले कुछ कमी तो नहीं है. ये सही रहेगा." अद्रिजा उसका हाथ पकड़ किचन में ले आई थी!
"तू चख मैं अभी आई."
ये ही सही रहेगा... आइडिया! अद्रिजा के जाते ही उसने चुटकी बजाई थी. शिवि ने ढंके डोंगे, पतीलों से चखना शुरू किया था. उसने अपनी बनाई खीर का डोंगा खोला तो उसने नमकदानी उठा ली. पापा-मम्मी तो खीर खाएंगे नहीं शुगर जो है उन्हें. अतिथि साहब लोग कैसे खीर खाएंगे देखती हूं. उसने नमकदानी से मुट्ठी भर नमक खीर में मिला दिया और शरारत से मुस्कुरा उठी,.
'अब मज़ा आएगा. सुना है खीर के बड़े शौकीन हैं जनाब." वह उत्कण्ठा से उस दृश्य को देखने के लिए प्रतीक्षा करने लगी कि कब खाए और कब थू थू कर भाग छूटे.
अद्रिजा उसे देख संतुष्ट हुई कि उसका मूड कुछ ठीक तो हुआ, परन्तु वो जान नहीं पाई किसलिए हुआ है. आने वाले अतिथि आ गए थे. आगे वे दो ही थे एक लड़का और एक लड़के का भाई.
"नमस्ते आंटी अंकल." शुभम आंटी को देखकर हैरान था. 'ये तो वही कल वाली...'
"मम्मी-पापा नहीं आए?" अद्रिजा ने पूछा था, पर वह भी शुभम को देख हैरान थी.
"अरे बेटा आपसे तो कल माॅल में हम... " वह शुभम् की ड्रेस को पहचानते हुए चकित सी देख रही थी.
"येस आंटी... ये सत्यम् भैया और मैं सत्यम् भैया का छोटा भाई शुभम हूं. मम्मी पापा आए हैं न... वे रहे." उसने पीछे दिखाते हुए कहा. तभी सत्यम के माता-पिता ने प्रवेश किया. माई गाॅड सीधे-सादे भैया के लिए कहीं मम्मी ने मिस हाय तौबा से ही तो रिश्ते की बात नहीं चलाई है... मारे जाते भैया अगर उन्हें उनकी साथी डाॅ. सना जीवनसाथी के रूप में पसंद न होती और उन्होंने मुझे ये बात बताकर अपनी मदद के लिए इंडिया न बुला लिया होता.
"नमस्ते नमस्ते! आइए आप सभी का बहुत स्वागत है." अद्रिजा और अभयेन्द्र आदर सत्कार से उन्हें अंदर ले आए. मोहिनी जी और उनके पति शिशिर कान्त पाण्डे अपने दोनों सुपुत्रों के साथ बैठ गए तो उन्होंने छोटे बेटे शुभम का भी परिचय दे दिया.
"ये हमारा छोटा बेटा शुभम है, बताया था न शर्मा जी यूके से एमबीए कर रहा है. दो दिन पहले ही अचानक आ गया. कोई प्लान नहीं था इसका तो सबसे ही मुलाक़ात के लिए इसे भी ले आए." शुभम ने सत्यम भैया को चिकोटी काटी मुस्कुराया, क्योंकि उन्हीं की रिक्वेस्ट पर वह लंदन से उन्हें इस शादी से बचाने के लिए आया था.
"अच्छा किया मोहिनी जी, ये आपका अपना ही घर है कोई फारमेलिटी थोड़ी है. अद्रिजा शिवि को तो बुलाओ." "हां, मैं बुला लाती हूं."
"आंटी एक्सक्यूज़ मी, क्या मैं वॉशरूम यूज़ कर सकता हूं." शुभम बोला था.
"हां हां आओ बेटा! वो उस तरफ़..."
"शिवि! कहां है जल्दी चल... अरे अपने कमरे में नहीं..." "आंटी ये तो अंदर से बंद है."
"ओह तो शिवि इसमें घुसी है."
"आंटी प्लीज़ प्लीज़... आप मेरी बात सुनिए पहले मैं आपसे कुछ बताने ही अंदर आया हूं,. मुझे विश्वास है आप समझेंगी. दरअसल मेरे भैया किसी और लड़की को पसंद करते हैं वे उनकी साथी डाॅक्टर सना कुरैशी. पर मम्मी-पापा के आगे बोल नहीं पा रहे थे. इसीलिए उन्होंने मुझे यहां बुलाया कि कोई बहाना बना कर रिश्ता होने नहीं देना, नहीं तो लड़की से धोखा होगा. भैया हद से ज़्यादा सीधे हैं और ये मिस हाय तौबा तो..."
"क्या बोला मुझे..." शिवि ने फटाक से दरवाज़ा खोल दिया था.
"तुम..?" उसने सिर से पांव तक उसे देखा था. कल जो लड़का दो बार टकराया और जिससे कपड़े बदल गए थे वो यही था... वह आश्चर्य से देख रही थी.
"मुझे नहीं करनी कोई शादी वादी... तुमसे तो बिल्कुल नहीं."
"अरे मुझे ही कौन सी करनी है. मैं तो भैया के लिए आया था वो भी मना करने... नाट बैड वैसे घाघरा चोली तुम पर ख़ूब जंच रहा है मिस हाय तौबा." उसने छेड़कर चिढ़ाया था.
"हां वैसे तुम भी फ्लैशी कुर्ते के कारण कुछ कम बुरे दिख रहे हो." उसने मुंह बिचकाया तो शुभम् को हंसी आ गई. "चलो कुछ तो कम बुरा हुआ."
"उधर मम्मी इधर पापा दोनों ज़िद के पक्के हैं मनाना आसान नहीं. तुम समझ रहे हो न... अब झगड़ों नहीं आपस में... तुम्हीं कोई समाधान निकालो बच्चों. मैं तो तुम दोनों से सहमत हूं. विवाह प्रेम प्रीत का बंधन है. समझौते, मजबूरी अथवा ज़बरदस्ती का नहीं... अच्छा तेरे पापा आवाज़ दें, इससे पहले मैं पानी लेकर जाती हूं... तू जूस-कोल्ड ड्रिंक लेकर जल्दी बाहर आ शिवि." अद्रिजा पानी की ट्रे लेकर चली गई.
"रिश्ता न जुड़े इसका उपाय तो मैंने पहले ही कर रखा है, देखते जाओ..." उसने भौंहें उचकाईं.
"अच्छा, क्या करने वाली हो मिस हाय तौबा? इतना यक़ीन. अभी तो लड़के वालों के सामने चाय की ट्रे लेकर नहीं जाओगी, जूस-कोल्ड ड्रिंक की ट्रे लेकर यूं..?" वह ठुमक ठुमक कर चलती हुई लड़की की नकल करने लगा.
"शटअप! माय फुट!"
"अरे अरे मिस हाय तौबा सीरियसली मेरी बात सुनो, भैया मम्मी की ज़िद में फंसे हुए यहां आ गए हैं. उन्हें अपनी साथी एक मुस्लिम डाॅक्टर लड़की पसंद है. शादी उसी से करना है उन्हें, पर अभी तक बोल नहीं पाए सबसे. और मुझे मदद के लिए यूके से बुला लिया यहां."
"वाह क्या जिगरा है आपके भाई साहब का..." उसने व्यंग्य से आंखें नचाईं.
"ये तो और भी अच्छा है मुझे नहीं करनी, आपके भाई को भी नहीं करनी..." वह उसके हाथ पर ताली मार कर बच्चों सी प्रसन्न हो गई. दो मिनट की बाद में ही दोनों पुरानी पीढ़ी की ज़बरदस्ती लाई विपदा से साथ निपटने के लिए एक-दूसरे के हमदर्द जैसे सहमत और तैयार थे।पर सवाल ये था बाहर विवाह के लिए मना कौन कैसे करें.
"मेरे पास है न आइडिया..."
"क्या... मिस हाय तौबा?"
"जल्द पता चल जाएगा मिस्टर भोंदू सिंघ."
"अच्छा नाम दिया मुझे!"
"पसंद आया न? क्या खाली तुम ही नए नाम दे सकते हो?.."
"सुना है एक खीर के दम से तय होगा इस रिश्ते का होना न होना... तो समझो बन गया अपना काम." वह किचन में सीधे गई. पांच मिनट बाद जूस की ट्रे बाहर ले जाने लगी.
"अरे रे सुनो तो... मिस... कुछ तो गड़बड़ किया है..." वह रोकते रोकते पीछे चलने लगा.
"अरे कुछ और बचकाना करना ठीक नहीं. हम मैच्योर हैं सीधे चल कर सब क्लीयर कर देते हैं. थोड़ा बिगड़ेंगे सही फिर हमारे ठोस कारण और तर्क पर उन्हें मानना ही होगा." शिवि अनसुनी कर निकल गई थी. खाना ख़त्म हुआ तो शिवि अपनी गुलाबी खीर ले आई थी. उसने शुभम को चुपके से आंख मारी.
'ओ बाॅस आगे कुछ तो गड़बड़ हुई समझो जो अब तक न हुई.' उसका माता ठनका. 'इस मिस हाय तौबा ने खीर में ज़रूर कुछ मिलाया है तो बहुत डांट पड़ने वाली है इसे. कुछ करता हूं.'
"मैं मदद करता हूं..." इस बहाने से वह तेज़ी से बढ़ा और जान-बूझकर अपना बैलेंस बिगाड़ कर शिवि और खीर की ट्रे समेत नीचे जा गिरा.
"ओह शिट साॅरी मिस... साॅरी आंटी... साॅरी... नाहक ही मदद करने चला था..!" उसने सबको देखते हुए कहा. उसने अपने सिर पर दिखावे में चपत लगाई और शिवि को उठने में मदद करने लगा. शिवि को ग़ुस्सा तो ख़ूब आ रहा था कि उसका प्लान फेल हो गया, पर धीरे से बोली, "शुक्र करो कार्पेट पे कांच गिरे पर टूट कर हमें लगे नहीं, हम बच गए. खीर से कपड़े भी गंदे नहीं हुए..."
शुभम् झुककर बर्तन उठाने चला तो अद्रिजा ने उसे इशारे से रोका, "रधिया जल्दी आ..." अद्रिजा ने नौकरानी को आवाज़ लगाई थी. रधिया ने आकर जल्दी सब साफ़ करने लगी.
"शिवि तू जाकर सबके लिए आइसक्रीम निकाल ला."
"खीर तो हम फिर कभी खा लेंगे अभयेन्द्र जी, पर आए हैं तो रिश्ता पक्का करके ही जाएंगे. आपकी बेटी तो हमें बग़ैर खीर खाए ही पसंद है. वो स्पेशल खीर हम फिर खाते रहेंगे. क्यूं ठीक है न सत्यम?"
वह पर्स में से कुछ निकालने लगी थी. सत्यम् घबरा उठा, "मम्मी वो..." सत्यम कोई रस्म कर देंगी, इसके लिए बिल्कुल तैयार न था. शुभम ने समझा, उससे पहले कि वे कुछ निकालें उसने अपना हाथ मम्मी के हाथ पर रख दिया.
"ऐसे कैसे मम्मी भैया कोई बच्चे थोड़ी ही हैं. उनको थोड़ा समझने दीजिए पहले. आप ने ज़िद की तो मान रखा आपका, मिलने आ गए हम सब. पर दोनों को अकेले में बात तो कर लेने दीजिए कि वे अभी इस रिश्ते को चाहते भी हैं या नहीं. ये नई पीढ़ी है मम्मा... सोच नई, समझ नई... ज़िंदगीभर के साथ में बंधने से पहले एक दूसरे को समझना बहुत ज़रूरी है."
"ठीक है जा सत्यम... बेटा शिवि जाओ और ख़ुशी का अपना निर्णय हमें जल्दी सुनाओ."
"इतनी जल्दी डिसीज़न लेने की!" शुभम् जल्दी निर्णय लेने के आदेश पर हैरान था.
"... और शुभम् आप भी साथ चले जाओ, यहां पुरातन लोगों संग बैठ के क्या करोगे... नई पीढ़ी वाले हो न..." अद्रिजा मुस्कुराईं.
"जी!" वह भी जवाब में मुस्कुराया और साथ जाने को उठ गया. दस मिनट में ही तीनों बाहर आ गए.
"मम्मी हम अच्छे दोस्त हो सकते हैं, पर रिश्ते के लिए सही नहीं हम." शिवि पापा से नज़रें चुराते हुए अद्रिजा से धीरे से बोली. अभयेन्द्र ने उसे घूर कर देखा.
"मैं क्लीयर कर देता हूं मम्मी, भैया को डाॅक्टर लड़की चाहिए उन्होंने पसंद भी कर रखी है, इनकी साथी डाॅ. सना, सना कुरैशी. और शिवि पहले अपना एमबीए पूरा कर कोई अच्छी जाॅब पकड़ लेना चाहती है. एक बड़ी कम्पनी में शानदार नौकरी उसका सपना है शादी-वादी उसके बाद." शुभम् ने सत्य सामने खोल कर रख दिया.
"अरे तूने पहले बताया क्यूं नहीं सत्यम. लड़की मुस्लिम है और तुमने सोचा कि हम इतने पुरातन पंथी हैं इसलिए हमसे कहने की हिम्मत नहीं हुई. यदि ऐसा था तो प्यार की पेंगे बढ़ाने से पहले सोचना था. एक बार बोल के तो देखता. क्या समझ रखा था हमें..? इतने आर्थोडाॅक्स?" उन्होंने अपने स्लीवलेस ब्लाउज़ पर साइड से आंचल ठीक किया था.
"... चलो माना इसे पसंद है कोई और लड़की पर शुभम तुझे तो कोई और पसंद नहीं है ना?" मोहिनी कहते हुए शुभम की ओर मुड़कर मुस्कुराईं.
"देख शुभम तू एमबीए कर रहा है और शिवि भी एमबीए करने जा रही है. मुझे तो शिवि पसंद है, अब तू बता मैं शगुन का उपहार वापस नहीं लेना चाहती, तुझे कोई ऐतराज़ है? मैं तेरे लिए शिवि को इसे देना चाहती हूं."
"माॅम!"शुभम् चौंका था.
'मर गए... आसमान से गिरे तो खजूर पर अटके...'
"... माॅम ये क्या बात हुई."
"चौंक क्यों रहा है आज ही शादी थोड़ी करनी. मालूम है लंदन वाला है, तुझे तो डेटिंग-वेटिंग बिना समझ ही नहीं आएगा. जब भोला भाला सत्यम् भी अछूता नहीं और शायद ठीक भी होगा आजकल के हिसाब से... आप भी बलताओ शिवि बेटा आप क्या कहती हो... भाई साब लोग भी चिंता मुक्त हो जाएंगे और हम भी." वह शिवि की ओर मुड़ी थीं.
"आप लोग मिलते-समझते रहना... बस रिश्ता तय रहेगा."
"ऐसे कैसे मम्मी, कुछ मिनटों में हम क्या समझेंगे. आजकल तो एक दो क्या कई-कई साल एक-दूसरे को परखने-समझने में लगा देते हैं! और सही भी है, ताकि बाद में कोई परेशानी न हो और दूसरों को इसके लिए हम कोसते न फिरें. शादी हो या तलाक़ हम ख़ुद ही अपने निर्णय की ज़िम्मेदारी लें. क्या आप नहीं चाहती?"
"नो आंटी, मेरा एम तो शुभम ने बता दिया आप सबको. उससे पहले मैं बंधना नहीं चाहती किसी से. मुझे उड़ना है, बहुत कुछ सीखना है ज़िंदगी में. डिपेंडेंट रह कर गले की फांस बिल्कुल भी नहीं बनना चाहती, न ही बनाना चाहती हूं किसी को. अब वक़्त बदल गया है. लड़कियों के लिए सुविधाएं, सुरक्षा बढ़ गई हैं. उनके लिए भी ऊंचाई चढ़ने के कितने रास्ते खुल गए हैं. हमें भी आगे, बहुत आगे बढ़ना है. हमें सिर्फ़ मदद मांगते, सब कुछ हर वक़्त औरों से पूछते नहीं रहना. स्वयं भी कुछ बताने, मदद करने के योग्य बनना है. आज हर लड़की का ये अधिकार है. पिछलग्गू अथवा बोझ बनना नहीं."
'वाह मिस हाय तौबा, मान गए, विचार तो बड़े सही हैं आपके!' शुभम् मन ही मन शिवि को सराह रहा था.
"आप सबसे क्षमा चाहता हूं, पर बिल्कुल सही कह रही हैं शिवि... मैं भी ऐसा ही सोचता हूं. विवाह जीवन का लक्ष्य नहीं, बिना जाने, पसंद किए किसी से भी कर लेना कि बस जीवन का लक्ष्य पूरा हो जाए, अब ऐसा नहीं है. हमें पहले करियर में मज़बूत पकड़ बनानी चाहिए. हमें आगे आने वाली पीढ़ी को समाज में कुछ नया सही माॅडल सेट करने देना ही चाहिए. ऐसे परिवर्तन में कोई बुराई नहीं लाभ ही होगा!" अब तक चुप से सत्यम ने पहली बार एक से अधिक वाक्य बोले थे.
"और जो गिफ्ट आंटी आप लाई हैं यहां, उसे मुझे नहीं उसे डाॅ. सना के हवाले करिएगा. उस दिन मैं आप सबको अपनी स्पेशल ठंडी गुलाबी खीर बनाकर खिलाऊंगी." मौक़े का फ़ायदा उठा कर शिवि ने अपने से हटाकर अब नई जगह पर सबका ध्यान आकृष्ट करने के उद्देश्य से कहा. "पर आज की तरह नमक वाली गुलाबी खीर नहीं पापा..." उसने अभयेन्द्र को देखते हुए अपने कानों को हाथ लगाया था.
"मतलब तुमने खीर में नमक ... फिर शरारत?"
"वो तो अच्छा हुआ जो शुभम ने इसी आशंका में ट्रे से टकरा कर खीर का डोंगा गिरा दिया. थैंक्स!" उसने शुभम को देखते हुए कहा.
"मुझे लगा था कुछ तो गड़बड़ की है इसमें इन्होंने... वरना सबके चखते ही शर्तिया बड़ी डांट पड़ती थी." "मना किया था कोई शरारत करने को पर बाज़ नहीं आई तुम, बड़ों की तुम्हारी नज़र में कोई इज़्ज़त है या नहीं?" अभयेंद्र को क्रोध तो बहुत आ रहा था, पर अद्रिजा अभयेन्द्र को तो मोहिनी देवी के पति शिशिरकान्त उन्हें नियंत्रित करने में लगे हुए थे.
"नई पीढ़ी है, नई स्थितियों के हिसाब से उनमें नई सोच विकसित हो रही है, क्या ग़लत है? हमें उन्हें ध्यान से सुनना, समझना होगा. डर के नहीं आत्मविश्वास से अपने विचार कहने देना चाहिए. अभिव्यक्ति की आज़ादी, जीवन के अहम फ़ैसलों में अपना मनचाहा करने की स्वतंत्रता क्या हम भी जवानी में नहीं चाहते थे? हम ग़लत तो नहीं थे अपनी पीढ़ी के हिसाब से सही ही थे. हर बात बड़ों की सही छोटों की ग़लत ऐसा नहीं होता!" शिशिर कान्त बोले थे.
"हां भाई साहब हमारे समय में भी बड़ों का ऐसे कोई नियम आदेश थोपना हमें भी कहां अच्छा लगता था, पर वे अपनी बात मनवाने पर अड़े रहते. हमें मन मारकर सही पर लिहाज़ में हर बात में झुकना ही पड़ा था. पर यह सही नहीं आज... अपनी इच्छानुसार न कर पाने के लिए बहुत सी बातों का हमें आज तक पछतावा होता रहा है."
"बिल्कुल सही बात क्यों हम उन परिपाटियों पर चलते रहें जिनका आज के परिवेश में कोई औचित्य नहीं रहा, जब बच्चों की ख़ुशियां ही नहीं रहीं उसमें. हम तो अपनी ज़िंदगी लगभग पूरी जी चुके, उन्हें रहना है, जीना है. उन्हें अपनी तरह जीने दें हम. बेवजह की ज़िद में क्या रखा है मोहिनी समझो!" कहते हुए शिशिर कान्त ने अभयेन्द्र को सहमति के लिए देखा था.
"आप सही कह रहे हैं. ग़लती हमारी ही है, जो हमने बच्चों को ऐसा बनाया ही नहीं कि ये दिल खोलकर हमसे अपनी बात कह सकें, दोस्त समझ सके. ऐसा दबदबा रखा कि वे हमें कहने में डरते-झिझकते रहे. आज बच्चे न बतलाते तो हम अपनी आन और अपने बड़े होने के रौब में बड़ी ग़लती करने जा रहे थे,." मोहिनी ने गहरी सांस लेते हुए कहा.
"बच्चे आपस में अभी घुल मिल रहे हैं, पर दोस्त बनना बाकी है. लाइफ पार्टनर बनने के लिए सोचना तो दूर की बात है उनके लिए. पहले हम उन्हें वक़्त दें समझने दें कि उनके लिए क्या सही, कौन सही है, यही श्रेयस्कर होगा. और शगुन के लिए शिवि ने बता ही दिया उसकी सही अधिकारी डाॅ. सना ही है. कल ही हम उनके पैरेंट्स से बात करते हैं. सगाई की डेट पक्की होते ही हम आपको इन्फ़ार्म करते हैं अभयेंन्द्र जी. आइसक्रीम बढ़िया खिलाई बेटा शिवि तूने. अच्छा किया जो शुभम ने नमकीन खीर खाने से हमें बचा लिया." कहकर शिशिर कान्त मुस्कुराए और अपना खाली बाउल शिवि को थमा दिया.कुछ समय उपरान्त "अच्छा अब हम चलते हैं. डेट की कन्फ़र्मेशन होते ही हम बताएंगे. तब अपनी स्पेशल गुलाबी खीर तैयार रखना बेटा शिवि, एंड होप आलवेज़ फाॅर द बेस्ट अभयेंद्र जी. चलें मोहिनी?"
"हम्म.. चलें, सही राह.. जो बच्चे हमें दिखा गए." वह हंसी थीं.
"ठीक है बेटा!" उन्होंने शिवि के गाल पर हाथ फेरा. "तुम्हारी गुलाबी खीर ड्यू रही." वह मुस्कुराई.
मोहिनी और अभयेंद्र बच्चों की बात पर सहमत होने लगे थे. अद्रिजा और शिशिरकान्त राहत में थे. सत्यम, शुभम और शिवि के चेहरों पर ज़िन्दगी की उड़ान भरने की उमंग स्पष्ट झलक रही थी, वे एक दूसरे को देख मुस्कुरा उठे.

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