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कहानी- लावण्यमयी (Short Story- Lavanyamayi)

"आपने तो मुझे बड़े धर्मसंकट में डाल दिया है राजकुमार. ऐसा तो आज तक कभी नहीं हुआ. कोई निर्धन राजपूत भी युवकों के सामने बेटी की प्रदर्शनी नहीं लगाता, फिर मैं तो सामंत हूं. आप स्वयं क्षत्रिय होकर परंपरा के विरुद्ध प्रस्ताव रख रहे हैं."

कितनी उमंगों के साथ वे अपनी बहन का संबंध तय करने कुम्भलमेर आए थे. किंतु राजकुमार जयमल के अपमानजनक प्रस्ताव से आहत होकर वे दुखी मन से बदनौर लौट रहे थे, हमेशा के लिए मेवाड़ छोड़कर चले जाने का दृढ़ निश्चय करके.

बात बहुत पुरानी है. पंद्रहवीं शताब्दी के बाद अंत की, सावन का महीना था, आकाश में घनघोर घटा छाई थी, रात आधी से अधिक व्यतीत हो चुकी थी. कुम्भलमेर के दुर्ग के ऊपर पश्चिम दिशा में रह-रहकर बिजलियां चमक रही थीं. बादलों के घनघोर घटा के कारण चारों तरफ़ घुप्प अंधेरा था. प्रचण्ड वेग से चलती वायु आने वाले तूफ़ान का स्पष्ट संकेत कर रही थी. मनुष्य ही नहीं, पशु-पक्षी भी अपने-अपने दड़बों, खोहों में दुबके हुए थे. ऐसे भयानक मौसम में भी कुछ अश्वारोही कुम्भलमेर के दुर्ग से निकल कर बदनौर की ओर जाने वाले मार्ग पर बढ़े चले जा रहे थे.

सबसे आगे द्रुत गति से घोड़ा दौड़ा रहे राव सुल्तानसिंह तो मानो उड़कर अपने घर पहुंच जाना चाहते थे. क्रोध से उनकी मुट्ठियां भिंची जा रही थीं. कानों में रह रहकर राजकुमार जयमल के अपमानजनक बोल गूंज रहे थे. जी तो उनका चाह रहा था कि अभी वापस लौट कर जयमल की गर्दन उड़ा दें, किंतु फिर जयमल के पिता महाराणा रायमल के उपकारों को याद करके वे जैसे खून के घूंट पिए जा रहे थे.

कितनी उमंगों के साथ वे अपनी बहन का संबंध तय करने कुम्भलमेर आए थे. किंतु राजकुमार जयमल के अपमानजनक प्रस्ताव से आहत होकर वे दुखी मन से बदनौर लौट रहे थे, हमेशा के लिए मेवाड़ छोड़कर चले जाने का दृढ़ निश्चय करके.

कुछ ही दिन पहले मेवाड़ के राजकुमार जयमल ने एक विश्वस्त व्यक्ति के साथ सामंत सुल्तान सिंह के पास संदेश भिजवाया था कि मैं आपकी बहन तारा के साथ विवाह करने को इच्छुक हूं. आप आकर इस संबंध में मुझसे बात कर लें.

मेवाड़ जैसे विशाल राज्य के राजकुमार ने स्वयं आगे होकर उनकी बहन का हाथ मांगा था, सुल्तान सिंह ख़ुशी-ख़ुशी अपने कुछ संबंधियों के साथ कुम्भलमेर पहुंचे. राजकुमार जयमल व राजकुमार पृथ्वीराज दोनों उन दिनों कुम्भलमेर के किले में रह रहे थे. महाराणा ने पुत्रों की मनमानियों से तंग आकर उन्हें राजधानी चित्तौड़ से निष्काषित कर दिया था.

सामंत सुल्तानसिंह व उनके संबंधियों ने कुम्भलमेर पहुंचकर राजकुमार को अभिवादन किया. जयमल ने उन्हें आदर सहित अपने पास बिठाया और यथोचित सत्कार किया. कुछ देर इधर-उधर की बातें करने के बाद राजकुमार मुस्कुराते हुए बोले, "सुना है आपकी बहन तारा अतुल सौंदर्य की स्वामिनी है."

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"आपने ठीक ही सुना है कुमार तारा सचमुच बहुत रूपवती है. आपकी और उसकी जोड़ी बहुत सुंदर लगेगी." सुल्तानसिंह ने नम्रतापूर्वक कहा.

"यदि आपको आपत्ति न हो तो हम उस लावण्यमयी की एक झलक देख लें." राजकुमार फिर से मुस्कुराए,

जयमल का प्रस्ताव सुनकर सुल्तानसिंह दुविधा में पड़ गए, सिर झुकाए धीमे स्वर में बोले, "इतनी जल्दी भी क्या है कुमार, थोड़े ही दिनों की तो बात है. विवाह के बाद जी भरकर देख लीजिएगा."

"विवाह के बाद तो पानी सिर से गुज़र चुका होगा सुल्तानसिंह जी. जितनी हम उम्मीद कर रहे हैं, लारा उतनी सुंदर न हुई तो?" जयमल ने आशंका व्यक्त की.

"आप ऐसा कीजिए, अपने महल की कुछ चतुर दासियों को बदनौर भेज दीजिए, आपकी दासियों ने तो एक से बढ़कर एक सुंदरियां देखी हुई हैं, आपकी भाभियां, काकियां आदि बड़ी-बड़ी रियासतों की राजकुमारियां हैं. और सुंदरता में एक दूसरी से बढ़-चढ़कर हैं. अतः आपकी चतुर दासियां आपको बता देंगी कि सौंदर्य की दृष्टि से तारा किस रानी के समकक्ष है या किस रानी से उन्नीस और किससे इक्कीस है." सामंत ने सुझाव दिया.

"नहीं, हम दासियों की पसंद पर भरोसा नहीं कर सकते. हम स्वयं रूप के पारखी हैं और स्वयं ही यह निर्णय लेंगे कि तारा मेवाड़ के महलों की शोभा बनने योग्य है अथवा नहीं." राजकुमार ने हठपूर्वक अपनी बात कही.

जयमल की बात सुनकर सुल्तानसिंह असहज हो उठे. आज के आधुनिक युग में किसी लड़के द्वारा विवाह से पहले भावी वधू को देखना आम बात है, किंतु छह सौ बरस पहले के ज़माने के हिसाब से यह प्रस्ताव बढ़ा अपमानजनक था.

सुल्तानसिंह गंभीर स्वर में बोले, "आपने तो बड़ा विचित्र प्रस्ताव रखा है कुमार, आप तो जानते ही हैं कि क्षत्रिय कन्याओं पर परपुरुष दृष्टि नहीं डाल सकते. जब तक कन्यादान नहीं किया जाता आप तारा के लिए परपुरुष ही हैं. आपके पिता, काका, भाई आदि राजपुरुष, कन्याओं को देखे बिना ही विवाह करते रहे हैं. वे कन्याएं भी तो मेवाड़ के राजमहलों की शोभा बनी ही हैं. फिर अब यह संदेह क्यों?"

"मैं अपनी बात कर रहा हूं राव जी. मुझे दूसरों से क्या लेना-देना, मेरी होने वाली पत्नी मेरी कल्पना के अनुरूप सुंदर होगी तो ही में विवाह करूंगा, अन्यथा नहीं." जयमल ने निश्चयात्मक स्वर में कहा.

सुल्तान परेशान हो उठे. अनमने होकर बोले, "आपने तो मुझे बड़े धर्मसंकट में डाल दिया है राजकुमार, ऐसा तो आज तक कभी नहीं हुआ, कोई निर्धन राजपूत भी युवकों के सामने बेटी की प्रदर्शनी नहीं लगाता, फिर में तो सामंत हूं. आप स्वयं क्षत्रिय होकर परंपरा के विरुद्ध प्रस्ताव रख रहे हैं."

"आपको इसमें आपत्ति नहीं करनी चाहिए राव जी. सोचिए कितना बड़ा सम्मान मिलने वाला है आपको, आप महाराणा के समधी बन जाएंगे, आपकी बहन मेवाड़ की रानी बनेगी."

"आप मेरी बहन से विवाह कर रहे हैं', यह मेरा सौभाग्य है. मैं विवाह से इन्कार नहीं कर रहा हूं, किन्तु क्षमा करें, अपनी बहन पर दृष्टि डालने की अनुमति मैं किसी भी परपुरुष को नहीं दे सकता, चाहे वे स्वयं महाराणा ही क्यों न हो." सुल्तान सिंह ने धीमे किंतु दृढ़ स्वर में कहा.

सुल्तानसिंह की बात सुनकर जयमल को क्रोध आ गया. राजकुमार जयमल मेवाड़ जैसे विशाल राज्य के भावी अधिपति थे और सुल्तानसिंह थे मेवाड़ के ही अधीनस्थ एक छोटे से प्रदेश बदनौर के ठाकुर. बदनौर पर भी वे कोई पीढ़ियों से काबिज नहीं थे. सुल्तानसिंह के पूर्वज तो टोडा ठिकाने के थे.

कुछ वर्षों पूर्व जब लल्ला खां पठान ने टोडा पर आक्रमण करके उस पर अधिकार कर लिया था, तब लस्त पस्त हालत में सुल्तानसिंह के पिता चित्तौड़ आए थे, महाराणा की शरण में. महाराणा रायमल ने उन्हें सांत्वना देकर अपने पास रखा था, और गुज़ारे के लिए बदनौर की जागीर बख़्शी थी. एक मामूली ठाकुर होकर बदनौर के सामंत, राजकुमार जयमल का प्रस्ताव मानने से इन्कार कर रहे थे.

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राजकुमार रोषपूर्ण स्वर में बोले, "एक झलक देख लेने से आपकी बहन के मोती नहीं झड़ जाएंगे सुल्तानसिंह जी. क्या आप मेरे पिता के उपकारों और अपने दुर्दिनों को इतनी जल्दी भूल गए? आप महाराणा की कृपा से ही समृद्ध हैं, यह भी क्या याद दिलाना पड़ेगा आपको?"

"नहीं कुमार याद दिलाने का कष्ट मत कीजिए." सुल्तानसिंह अपने क्रोध पर किसी तरह काबू रखने का प्रयास करते हुए बोले, "मैं इतना नीच और अकृतज्ञ नहीं कि किसी की कृपाओं को भूल जाऊ. आपके पिता ने हमें शरण देकर हम पर बड़ा उपकार किया है. इस उपकार का ऋण हम अपने प्राण देकर चुकाएंगे, किंतु क्षमा करें मेवाड़धीशा उपकारों का मोल बहन की नुमाइश लगाकर नहीं चुकाया जा सकता."

"तेरी ये मजाल, टुकड़ैल." राजकुमार क्रोध से भड़क उठे. "तू हमें इन्कार कर रहा है..? हमें? क्या इसका परिणाम नहीं जानता? कल ही जागीर छीन ली जाएगी तेरी."

"जागीर आप कल छीनते हों तो आज ही छीन लीजिए राजकुमार. किंतु मैं आपको अपनी बहन पर दृष्टि डालने की अनुमति कदापि नहीं दूंगा, तारा मेरी बहन है, कोई दो टके की ठीकरी (मटकी) नहीं, जिसे ख़रीदने से पहले आप बजा कर देख लेना चाहते हैं." सुल्तानसिंह की भी भृकुटियां तन गई.

"अच्छा इतना घमंड अब तो मैं तारा को अवश्य निरखूंगा, देखता हूं कौन रोकता है मुझे." जयमल ने दांत पीसे, "बदनौर की ईंट से ईंट नहीं बजा दी तो मेरा नाम जयमल नहीं."

"अवश्य देखना राजकुमार अभी तक तो आपने मेरी नम्रता ही देखी है, अब तलवार की धार भी परख लेना, बदनौर की तलवारें ही नहीं, चील और गिद्ध भी प्रतीक्षा करेंगे आपके सैनिकों की." सुल्तानसिंह का भी स्वर ऊंचा होने लगा. झगड़ा बढ़ता देखकर दोनों पक्ष के लोगों ने बीच-बचाव किया. सुल्तानसिंह के संबंधी उन्हें वहां से खींचकर बाहर ले गए, और घोड़ों परं सवार होकर वे लोग तत्काल कुम्भलमेर से चल दिए. सुल्तानसिंह मारे क्रोध के पागल हुए जा रहे थे. नेत्रों से जैसे ज्वाला बरस रही थी. किंतु महाराणा के एहसानों ने मानो उनके हाथ-पैरों में बेड़ियां डाल दी थीं. महाराणा का लिहाज़ करके वे स्वयं पर नियंत्रण रखने का प्रयास करते हुए वापस बदनौर लौट रहे थे.

आधे रास्ते तक पहुंचते-पहुंचते मूसलाधार वर्षा होने लगी. सुल्तानसिंह को वेगपूर्वक घोड़ा दौड़ाते देखकर उनके साले रत्नसिंह ने उन्हें पुकारा तो वे रुक गए, रत्न सिंह बोले, "अश्व को इतना द्रुत गति से मत भगाइए कुंवर साहब, रास्ता अंधेरा है. किसी चिकने स्थान पर इसका पैर फिसल गया तो अनर्थ हो जाएगा."

"अनर्थ तो हो चुका दादा, अब कसर क्या रह गई है. राजकुमार जयमल चुपचाप बैठने वाले नहीं हैं. अपना हठ पूरा करने के लिए वे अब तारा का अपहरण करेंगे. मुझे अपने हश्र की चिंता नहीं है, लेकिन यदि हमारे हाथों से राजकुमार का अनिष्ट हो गया, तो महाराणा क्या सोचेंगे कि हमने उनके उपकारों का ऋण इस तरह चुकाया."

"इसमें हमारा कोई दोष नहीं होगा जवांई साहब, हम तो राजकुमार से लड़ने जा नहीं रहे, अब अगर वे घर बैठे ही गले पड़ेंगे, तो हम चूड़ियां तो पहनने से रहे."

"मैं चाहता हूं कि ऐसी स्थिति आने ही न पाए, राजकुमार से उलझने की बजाय हम मेवाड़ को ही त्याग कर चले जाएं, तो बेहतर है. जागीर छूट जाए, तो कोई ग़म नहीं, मेहनत करके पेट भर लेंगे, किंतु राजकुमार के प्राण लेकर महाराणा की नज़रों में नमक हराम तो नहीं बनेंगे, "

"जैसी आप की इच्छा." रत्न सिंह ने उत्तर दिया. फिर दोनों मार्ग पर चुपचाप बढ़ने लगे.

बदनौर के गढ़ में जिस समय वे पहुंचे, वर्षा थम चुकी थी. अंदर जाते ही सुल्तानसिंह ने अपने नौकरों को आदेश दिया कि सारी बहुमूल्य वस्तुएं तत्काल छकड़ों और बेलगाड़ियों में लादी जाएं. स्वामी की कठोर मुखमुद्रा देखकर सेवकों को यह पूछने का भी साहस नहीं हुआ कि ऐसी कौन सी विपदा आ गई जिसके कारण आधी रात को ऐसे भयानक मौसम में प्रस्थान की तैयारियां की जा रही हैं. शीघ्रता से वे आदेश का पालन करने लगे.

अंतःपुर में जाकर भी उन्होंने यही आदेश दिया, सुल्तानसिंह की पत्नी स्तब्ध रह गई, "क्यों... क्या हुआ? आप तो बाई साहब का संबंध तय करने गए थे न?"

"बाई का संबंध तो तय नहीं हो सका, हां! मेरे क्रियाकर्म अवश्य तय हो गए हैं."

"ये क्या कह रहे हैं आप कहां जा रहे हैं हम लोग?"

"जहां भाग्य ले जाए."

"ऐसे अंधकार में किस प्रकार जा सकेंगे? मैं आसन्न प्रसवा हूं, कहीं मार्ग में ही कुछ..."

"समय नष्ट मत करो, सामान बांधो." कहकर सुल्तानसिंह कक्ष से बाहर निकल गए.

उनकी पत्नी और अंतःपुर की अन्य स्त्रियां दुखी मन से कपड़े व आभूषण आदि सहेजने, समेटने लगी. बेचारी तारा एक कोने में खड़ी होकर आंसू बहाने लगी. आज उसी के कारण परिवार पर यह विपत्ति आई थी. रूप की अधिकता भी कभी-कभी विनाश का कारण बन जाती है. सामान बांधकर सुल्तानसिंह उसी समय अपने परिवार, नौकरों व सैनिकों सहित वहां से चल दिए. वे जानते थे कि जयमल हठी है. तारा को हथियाने के लिए पीछा अवश्य करेंगे.

बिजलियां अब भी चमक रही थीं, गांव से निकलकर वे जंगली रास्तों पर बढ़ गए. वर्षों की फुहारों से मशालें बार-बार बुझ रही थीं. पहाड़ और हवा से झूमते वृक्षों के साये भयानक लग रहे थे. रात के सन्नाटे में जंगली पशुओं की आवाज़ें दिल को दहला रही थीं. कीचड़ भरे ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर बग्घी बुरी तरह हिचकोले खा रही थी.

कहानी- लावण्यमयी

दचके लगने से सुल्तानसिंह की गर्भवती पत्नी रह-रहकर कराह उठती. उसे थामे बैठे स्नेही पति धीरज तो बंधा रहे थे, पर गाड़ीवान को गति धीमी करने की आज्ञा नहीं दे रहे थे.

सात कोस मार्ग तय करके वे ग्राम आकड़सादा के पास पहुंचे. एक मोड़ पर जब सुल्तान सिंह के साले रत्न सिंह ने पीछे मुड़कर देखा, तो उन्हें दूर मशालों की रोशनी दिखाई दी. वे समझ गए कि राजकुमार जयमल सैनिकों सहित आ पहुंचे हैं. जयमल ने अनुमान लगा लिया था कि विवाद से बचने के लिए कहीं सुल्तान सिंह मेवाड़ छोड़कर ही न चले जाएं, उनका अनुमान ठीक निकला.

सुल्तान सिंह बग्घी में बैठे होने के कारण पीछे का दृश्य नहीं देख पा रहे थे. रत्न सिंह ने बहनोई को सूचित करना, ठीक नहीं समझा. सुल्तान सिंह नवविवाहित थे. रत्न सिंह नहीं चाहते थे कि बहन इतनी जल्द विधवा हो जाए, इसलिए किसी से कुछ कहे-सुने बिना वे अकेले ही पीछे लौटे.

निकट जाकर उन्होंने राजकुमार का अभिवादन किया.

"कुंवर जयमल को रत्न सांखला का मुजरा पहुंचे. वार संभालिए राजकुमार." कहकर उन्होंने बरछी का वार किया. जयमल कुछ समझ पाते या संभल पाते, उससे पहले ही बरछी उनकी छाती के पार हो गई, राजकुमार तड़पने लगे.

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उनके सैनिकों ने तुरंत रत्न सिंह को घेर लिया. चारों तरफ़ से उन पर वार होने लगे. इतने सारे सैनिकों से वे कब तक लड़ते. शीघ्र ही उनका क्षत-विक्षत शरीर घोड़े की पीठ पर झूल गया. कोलाहल सुनकर सुल्तान सिंह ने बग्धी से बाहर झांका. शत्रु निकट ही आ गए थे. तलवारें खींचकर वे अपने साथियों सहित वहां पहुंचे, लेकिन राजकुमार के सैनिकों ने उनसे युद्ध नहीं किया. राजकुमार की अचानक मृत्यु हो जाने के कारण वे सब भौचक्के रह गए और इस चिंता में डूब गए कि अब महाराणा को क्या उत्तर देंगे, भय के मारे वे राजकुमार के शव को चित्तौड़ भी नहीं ले गए, वहीं उनका अंतिम संस्कार करके वे कुम्भलमेर चले गए.

सुल्तान सिंह भी अपने परिवार व सामान सहित बदनौर वापस लौट आए. जिस अप्रिय स्थिति से बचने के लिए उन्होंने बदनौर छोड़ा था, वह अंततः सामने आ ही गई. उनका विचार था कि बदनौर के गढ़ की खाली देखकर शायद राजकुमार वापस लौट जाएंगे, किंतु जयमल ने उनका पीछा किया और मृत्यु को प्राप्त हुए.

दुखी मन से सुल्तान सिंह ने अपने परिवार से अंतिम विदा ली और दण्ड भोगने के लिए महाराणा के सामने प्रस्तुत हो गए. बेचारी तारा रो-रोकर बेहाल हुई जा रही थी. हालांकि महाराणा रायमल बुद्धिमान और न्यायप्रिय शासक थे, किंतु राजाओं के दिमाग़ का क्या भरोसा.

युवा पुत्र की मृत्यु से व्यथित होकर संभव है वे कोई कठोर दण्ड दे डालें, वह रह-रहकर सिहर उठती. न जाने महाराज अब उसके भाई को कुत्तों से नुचवाएंगे या हाथी के पैरों तले रौंद डालेंगे, राजपुत्र की हत्या जैसा गुरुतर अपराध किया था उन्होंने, दण्ड तो कठोर मिलना ही था.

राजकुमार के निधन की सूचना मिलते ही राजधानी चित्तौड़ में सन्नाटा छा गया, किसी भी घर में चूल्हा नहीं जला. राजमहल में हाहाकार मच गया, यद्यपि महाराणा रायमल पुत्रों की मनमानियों के कारण उनसे कुपित थे, फिर भी, पिता तो थे ही आख़िर वे. युवा पुत्र की मृत्यु से बढ़कर दारुण दुख और कौन सा होगा किसी बाप के लिए.

जब सुल्तानसिंह ने भीगे स्वर में उन्हें पूरी घटना सुनाई, सफ़ेद पगड़ियां बांधे सभी दरबारियों के चेहरों पर विषाद छाया था. सुल्तानसिंह ने आपबीती सुनाकर निवेदन किया, "यद्यपि राजकुमार की मृत्यु मेरे हाथों नहीं हुई, किन्तु स्वर्गीय रत्न सिंह ने मेरी बहन के सम्मान की रक्षा के लिए ही राजकुमार के प्राण लिए थे. अतः मैं दण्ड भोगने के लिए प्रस्तुत हूं."

महाराणा अपने सिंहासन से उठे और शिथिल कदमों से धीरे-धीरे चलते सुल्तान सिंह के पास पहुंचे. उसके कंधे पर हाथ रखकर धीमे व्यथित स्वर में बोले, "दण्ड किस बात का युवक? किस अपराध के लिए दण्ड दूं मैं तुम्हें? तुमने वही किया, जो तुम्हें करना चाहिए था. मुझे दुख है कि मेरे दुराचारी पुत्र के कारण तुम्हारे परिवार को कष्ट उठाना पड़ा. जाओ, अपने घर लौट जाओ और निर्भय होकर रहो."

सुल्तान सिंह व उनके संबंधी महाराणा की जयजयकार करते बदनौर लौट आए. बाद में महाराणा की महानता से अभिभूत सुल्तान सिंह ने अपनी बहन के विवाह का नारियल राजकुमार पृथ्वीराज के लिए प्रस्तुत किया, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया. इस प्रकार सुंदरी तारा अंततः मेवाड़ की युवरानी बनी.

- नीरज

कहानी- लावण्यमयी

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